भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक ५९ ]

  • साधक-संजीवनी *

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भोगों-(विषयों-) के साथ सम्बन्ध रखते हुए और सम्बन्धरूप परदा रहनेसे उसका अनुभव नहीं होता और भोगोंको भोगते हुए भी वैसा ही है। परन्तु भोगोंके साथ यह परदा हटते ही उसका अनुभव हो जाता है।

सम्बन्ध—केवल इन्द्रियोंका विषयोंसे हट जाना ही स्थितप्रज्ञका लक्षण नहीं हैं—इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।

रसवर्ज रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥ ५९ ॥

निराहारस्य= निराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले)रसवर्जम्= रस निवृत्त नहीं होता। (परन्तु)रसः= रस
देहिनः= मनुष्यके (भी)परम्= परमात्मतत्त्वकाअपि= भी
विषयाः= विषय तोदृष्ट्वा= अनुभव होनेसेनिवर्तते= निवृत्त हो जाता है
विनिवर्तन्ते= निवृत्त हो जाते हैं,अस्य= इस स्थितप्रज्ञअर्थात् उसकी संसारमें रसबुद्धि नहीं रहती।

व्याख्या—‘विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः रसवर्जम्’ —मनुष्य निराहार दो तरहसे होता है—(१) अपनी इच्छासे भोजनका त्याग कर देना अथवा बीमारी आनेसे भोजनका त्याग हो जाना और (२) सम्पूर्ण विषयोंका त्याग करके एकान्तमें बैठना अर्थात् इन्द्रियोंको विषयोंसे हटा लेना।

यहाँ इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले साधकके लिये ही ‘निराहारस्य’ पद आया है।

रोगीके मनमें यह रहता है कि क्या कर्तु, शरीरमें पदार्थोंका सेवन करनेकी सामर्थ्य नहीं है, इसमें मेरी परवशता है; परन्तु जब मैं ठीक हो जाऊँगा, शरीरमें शक्ति आ जायगी, तब मैं पदार्थोंका सेवन करूँगा। इस तरह उसके भीतर रसबुद्धि रहती है। ऐसे ही इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेपर विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर साधकके भीतर विषयोंमें जो रसबुद्धि, सुखबुद्धि है, वह जल्दी निवृत्त नहीं होती।

जिनका स्वाभाविक ही विषयोंमें राग नहीं है और जो तीव्र वैराग्यवान् हैं, उन साधकोंकी रसबुद्धि साधनावस्थामें

ही निवृत्त हो जाती है। परन्तु जो तीव्र वैराग्यके बिना ही विचारपूर्वक साधनमें लगे हुए हैं; उन्हीं साधकोंके लिये यह कहा गया है कि विषयोंका त्याग कर देनेपर भी उनकी रसबुद्धि निवृत्त नहीं होती।

‘रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’ —इस स्थितप्रज्ञकी रसबुद्धि परमात्माका अनुभव हो जानेपर निवृत्त हो जाती है। रसबुद्धि निवृत्त होनेसे वह स्थितप्रज्ञ हो ही जाता है—यह नियम नहीं है। परन्तु स्थितप्रज्ञ होनेसे रसबुद्धि नहीं रहती—यह नियम है।

‘रसोऽप्यस्य’ पदसे यह तात्पर्य निकलता है कि रसबुद्धि साधककी अहंतामें अर्थात् ‘मैं’-पनमें रहती है। यही रसबुद्धि स्थूलरूपसे रागका रूप धारण कर लेती है। अतः साधकको चाहिये कि वह अपनी अहंतासे ही रसको निकाल दे कि ‘मैं तो निष्काम हूँ; राग करना, कामना करना मेरा काम नहीं है’। इस प्रकार निष्कामभाव आ जानेसे अथवा निष्काम होनेका उद्देश्य होनेसे रसबुद्धि नहीं रहती और परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे रसकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है।

परिशिष्ट भाव— भोगोंकी सत्ता और महत्ता माननेसे अन्तःकरणमें भोगोंके प्रति एक सूक्ष्म खिंचाव, प्रियता, मिठास पैदा होती है, उसका नाम ‘रस’ है। किसी लोभी व्यक्तिको रुपये मिल जायँ और कामी व्यक्तिको स्त्री मिल जाय तो भीतर-ही-भीतर एक खुशी आती है, यही ‘रस’ है। भोग भोगनेके बाद मनुष्य कहता है कि ‘बड़ा मजा आया’—यह उस रसकी ही स्मृति है। यह रस अहम् (चिञ्चडग्रन्थि) में रहता है। इसी रसका स्थूल रूप राग, सुखासक्ति है।

जबतक संयोगजन्य सुखमें रसबुद्धि रहती है, तबतक प्रकृति तथा उसके कार्य (क्रिया, पदार्थ और व्यक्ति) की पराधीनता रहती ही है। रसबुद्धि निवृत्त होनेपर पराधीनता सर्वथा मिट जाती है, भोगोंके सुखकी परवशता नहीं रहती, भीतरसे भोगोंकी गुलामी नहीं रहती।