श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ६१ ]
- साधक-संजीवनी *
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| हित | = कारण कि | विपश्चितः | = विद्वान् | इन्द्रियाणि | = इन्द्रियाँ |
|---|---|---|---|---|---|
| कौन्तेय | = हे कुन्तीनन्दन ! | ||||
| (रसबुद्धि रहनेसे) | पुरुषस्य | = मनुष्यकी | मनः | = (उसके) मनको | |
| यतः | = यल करते हुए | अपि | = भी | प्रसभम् | = बलपूर्वक |
| प्रमाथीनि | = प्रमथनशील | हरन्ति | = हर लेती हैं। |
व्याख्या —‘यततो ह्यपि .... प्रसभं मनः’१—जो स्वयं यल करता है, साधन करता है, हरेक कामको विवेकपूर्वक करता है, आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करता है, दूसरोंका हित हो, दूसरोंको सुख पहुँचे, दूसरोंका कल्याण हो—ऐसा भाव रखता है और वैसी क्रिया भी करता है, जो स्वयं कर्तव्य-अकर्तव्य, सार-असारको जानता है और कौन-कौन-से कर्म करनेसे उनका क्या-क्या परिणाम होता है—इसको भी जाननेवाला है, ऐसे विद्वान् पुरुषके लिये यहाँ ‘यततो ह्यपि पुरुषस्य विपश्चितः’ पद आये हैं। प्रयत्न करनेवाले ऐसे विद्वान् पुरुषकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं, विषयोंकी तरफ खींच लेती हैं अर्थात् वह विषयोंकी तरफ खिंच जाता है, आकृष्ट हो जाता है। इसका कारण यह है कि
जबतक बुद्धि सर्वथा परमात्मत्वमें प्रतिष्ठित (स्थित) नहीं होती, बुद्धिमें संसारकी यत्किंचित् सत्ता रहती है, विषयेन्द्रिय-सम्बन्धसे सुख होता है, भोगे हुए भोगोंके संस्कार रहते हैं, तबतक साधनपरायण बुद्धिमान् विवेकी पुरुषकी भी इन्द्रियाँ सर्वथा वशमें नहीं होतीं। इन्द्रियोंके विषय सामने आनेपर भोगे हुए भोगोंके संस्कारोंके कारण इन्द्रियाँ मन-बुद्धिको जबर्दस्ती विषयोंकी तरफ खींच ले जाती हैं। ऐसे अनेक ऋषियोंके उदाहरण भी आते हैं, जो विषयोंके सामने आनेपर विचलित हो गये। अतः साधकको अपनी इन्द्रियोंपर कभी भी ‘मेरी इन्द्रियाँ वशमें हैं’, ऐसा विश्वास नहीं करना चाहिये२ और कभी भी यह अभिमान नहीं करना चाहिये कि ‘मैं जितेन्द्रिय हो गया हूँ।’
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें यह बताया कि रसबुद्धि रहनेसे यल करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी इन्द्रियाँ उसके मनको हर लेती हैं, जिससे उसकी बुद्धि परमात्मामें प्रतिष्ठित नहीं होती। अतः रसबुद्धिको दूर कैसे किया जाय—इसका उपाय आगेके श्लोकमें बताते हैं।
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६१ ॥
| युक्तः | = कर्मयोगी साधक | मत्परः | = मेरे परायण | इन्द्रियाणि | = इन्द्रियाँ |
|---|---|---|---|---|---|
| तानि | = उन | होकर | वशे | = वशमें हैं, | |
| सर्वाणि | = सम्पूर्ण | आसीत | = बैठे; | तस्य | = उसकी |
| इन्द्रियोंको | हि | = क्योंकि | प्रज्ञा | = बुद्धि | |
| संयम्य | = वशमें करके | यस्य | = जिसकी | प्रतिष्ठिता | = स्थिर है। |
व्याख्या —‘तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः’—जो बलपूर्वक मनका हरण करनेवाली इन्द्रियाँ हैं, उन सबको वशमें करके अर्थात् सजगतापूर्वक उनको कभी भी विषयोंमें विचलित न होने देकर स्वयं मेरे परायण हो
जाय। तात्पर्य यह हुआ कि जब साधक इन्द्रियोंको वशमें करता है, तब उसमें अपने बलका अभिमान रहता है कि मैंने इन्द्रियोंको अपने वशमें किया है। यह अभिमान साधकको उन्नत नहीं होने देता और उसे भगवान्से विमुख
१—यहाँ भगवान्ने इन्द्रियोंको ‘प्रमाथीनि’ कहा है और छठे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें अर्जुनने मनको ‘प्रमाथि’ कहा है। अतः इन्द्रियाँ और मन दोनों ही प्रमथनशील हैं। ऐसे ही यहाँ बताया कि इन्द्रियाँ मनको हर लेती हैं और आगे इसी अध्यायके सड़सठवें श्लोकमें बताया है कि मन बुद्धिको हर लेता है अर्थात् यहाँ तो इन्द्रियोंकी प्रबलता बताया और वहाँ मनकी प्रबलता बताया। तात्पर्य यह निकला कि साधकको इन दोनोंका संयमन करना चाहिये, तभी वह संयमी बन सकता है।
२—मात्रा स्वस्वा दुहिता वा न विविक्षासन्तो भवेत्। बलवान्जित्त्रियग्रामो विद्वान्समपि कर्षति ॥ (मनु २। २१५) ‘मनुष्यको चाहिये कि वह माता, बहन अथवा पुत्रीके साथ भी एकात्म्य न बैठे; क्योंकि बलवान् इन्द्रियसमूह विद्वान्को भी अपने वशमें कर लेता है।’