भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

करा देता है। अतः साधक इन्द्रियोंका संयमन करनेमें कभी अपने बलका अभिमान न करे उसमें अपने उद्योगको कारण न माने, प्रत्युत केवल भगवत्कृपाको ही कारण माने कि मेरेको इन्द्रियोंके संयमनमें जो सफलता मिली है, वह केवल भगवान्की कृपासे ही मिली है। इस प्रकार केवल भगवान्के परायण होनेसे उसका साधन सिद्ध हो जाता है।

यहाँ ‘मत्परः’ कहनेका मतलब है कि मानवशरीरका मिलना, साधनमें रुचि होना, साधनमें लगना, साधनका सिद्ध होना—ये सभी भगवान्की कृपापर ही निर्भर हैं। परन्तु अभिमानके कारण मनुष्यका इस तरफ ध्यान कम जाता है। कर्मयोगीमें तो कर्म करनेकी ही प्रधानता रहती है और उसमें वह अपना ही पुरुषार्थ मानता रहता है। अतः भगवान् विशेष कृपा करके कर्मयोगी साधकके लिये भी अपने परायण होनेकी बात कह रहे हैं।

भगवान्के परायण होनेका तात्पर्य है—केवल भगवान्में ही महत्त्वबुद्धि हो कि भगवान् ही मेरे हैं और मैं भगवान्का हूँ; संसार मेरा नहीं है और मैं संसारका नहीं हूँ। कारण कि भगवान् ही हरदम मेरे साथ रहते हैं; संसार मेरे साथ रहता ही नहीं। इस प्रकार साधकका ‘मैं-पन’ केवल भगवान्में ही लगा रहे।

परिशिष्ट भाव —कर्मयोगके साधकके लिये भी भगवान्ने ‘मत्परः’ पदसे अपने परायण होनेकी बात कही है, यह भक्तिकी विशेषता है! कारण कि भगवान्के परायण हुए बिना इन्द्रियोंका सर्वथा वशमें होना कठिन है।

कर्मयोगमें त्याग है और त्यागसे शान्ति, सुख मिलता है। परन्तु यह प्राप्तिका सुख नहीं है, प्रत्युत दुःख (अशान्ति) मिटनेका सुख है, जबकि भक्तिमें प्राप्तिका सुख मिलता है। अतः भक्तिका (प्रेमका) सुख मिले बिना इन्द्रियाँ सर्वथा वशमें नहीं होतीं। दूसरी बात, कर्मयोगमें तो अत्यन्त वैराग्य होनेपर इन्द्रियाँ वशमें होती हैं, पर भक्तिमें (भगवान्के परायण होनेसे) थोड़े वैराग्यसे भी इन्द्रियाँ सुगमतासे वशमें हो जाती हैं। इसलिये भगवान्ने ‘मत्परः’ पद दिया है।

सम्बन्ध—भगवान्के परायण होनेसे तो इन्द्रियाँ वशमें होकर रसबुद्धि निवृत्त हो ही जायगी, पर भगवान्के परायण न होनेसे क्या होता है—इसपर आगेके दो श्लोक कहते हैं।

ध्यायतो विषयान्युंसः सङ्गस्तेषूपजायते।

सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्समृतिविभ्रमः।

समृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ ६३ ॥

विषयान्= विषयोंकातेषु= उन विषयोंमेंसङ्गात्= आसक्तिसे
ध्यायतः= चिन्तन करनेवालेसङ्गः= आसक्तिकामः= कामना
पुंसः= मनुष्यकीउपजायते= पैदा हो जाती हैसञ्जायते= पैदा होती है।