भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 152

श्लोक ६२-६३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१५१

कामात्= कामनासे (बाधा लगनेपर)भवति= हो जाता है।बुद्धिनाशः= बुद्धि (विवेक) का नाश हो जाता है।
क्रोधः= क्रोधसम्पोहात्= सम्पोहसेबुद्धिनाशात्= बुद्धिका नाश होनेपर (मनुष्यका)
अभिजायते= पैदा होता है।स्मृतिविभ्रमः= स्मृति भ्रष्ट हो जाती है।प्रणश्यति= पतन हो जाता है।
क्रोधात्= क्रोध होनेपरस्मृतिभ्रंशात्= स्मृति भ्रष्ट होनेपर
सम्पोहः= सम्पोह

व्याख्या—‘ध्यायतो विषयान्युसः सङ्गस्तेषूपजायते’— भगवान्के परायण न होनेसे, भगवान्का चिन्तन न होनेसे विषयोंका ही चिन्तन होता है। कारण कि जीवके एक तरफ परमात्मा हैं और एक तरफ संसार है। जब वह परमात्माका आश्रय छोड़ देता है, तब वह संसारका आश्रय लेकर संसारका ही चिन्तन करता है; क्योंकि संसारके सिवाय चिन्तनका कोई दूसरा विषय रहता ही नहीं। इस तरह चिन्तन करते-करते मनुष्यको उन विषयोंमें आसक्ति, राग, प्रियता पैदा हो जाती है। आसक्ति पैदा होनेसे मनुष्य उन विषयोंका सेवन करता है। विषयोंका सेवन चाहे मानसिक हो, चाहे शारीरिक हो, उससे जो सुख होता है, उससे विषयोंमें प्रियता पैदा होती है। प्रियतासे उस विषयका बार-बार चिन्तन होने लगता है। अब उस विषयका सेवन करे, चाहे न करे, पर विषयोंमें राग पैदा हो ही जाता है—यह नियम है।

‘संगतंजायते कामः’— विषयोंमें राग पैदा होनेपर उन विषयोंको (भोगोंको) प्राप्त करनेकी कामना पैदा हो जाती है कि वे भोग, वस्तुएँ मेरेको मिलें।

‘कामाल्क्रोधोऽभिजायते’— कामनाके अनुकूल पदार्थकिल मिलते रहनेसे ‘लोभ’ पैदा हो जाता है और कामनापूर्तिकी सम्भावना हो रही है, पर उसमें कोई बाधा देता है, तो उसपर ‘क्रोध’ आ जाता है।

कामना एक ऐसी चीज है, जिसमें बाधा पड़नेपर क्रोध पैदा हो ही जाता है। वर्ण, आश्रम, गुण, योग्यता आदिको लेकर अपनेमें जो अच्छाईका अभिमान रहता है, उस अभिमानमें भी अपने आदर, सम्मान आदिकी कामना रहती है; उस कामनामें किसी व्यक्तिके द्वारा बाधा पड़नेपर भी क्रोध पैदा हो जाता है।

‘कामना’ रजोगुणी वृत्ति है, ‘सम्पोह’ तमोगुणी वृत्ति है और ‘क्रोध’ रजोगुण तथा तमोगुणके बीचकी वृत्ति है।

कहीं भी किसी भी बातको लेकर क्रोध आता है, तो उसके मूलमें कहीं-न-कहीं राग अवश्य होता है। जैसे, नीति-न्यायसे विरुद्ध काम करनेवालेको देखकर क्रोध आता है, तो नीति-न्यायमें राग है। अपमान-तिरस्कार

करनेवालेपर क्रोध आता है, तो मान-सत्कारमें राग है। निन्दा करनेवालेपर क्रोध आता है, तो प्रशंसामें राग है। दोषारोपण करनेवालेपर क्रोध आता है, तो निर्दोषताके अभिमानमें राग है; आदि-आदि।

‘क्रोधाद्भवति सम्पोहः’— क्रोधसे सम्पोह होता है अर्थात् मूढ़ता छा जाती है। वास्तवमें देखा जाय तो काम, क्रोध, लोभ और ममता— इन चारोंसे ही सम्पोह होता है; जैसे—

(१) कामसे जो सम्पोह होता है, उसमें विवेकशक्ति ढक जानेसे मनुष्य कामके वशीभूत होकर न करनेलायक कार्य भी कर बैठता है।

(२) क्रोधसे जो सम्पोह होता है, उसमें मनुष्य अपने मित्रों तथा पूज्यजनोंको भी उलटी-सीधी बातें कह बैठता है और न करनेलायक बर्ताव भी कर बैठता है।

(३) लोभसे जो सम्पोह होता है, उसमें मनुष्यको सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म आदिका विचार नहीं रहता और वह कपट करके लोगोंको ठग लेता है।

(४) ममतासे जो सम्पोह होता है, उसमें समभाव नहीं रहता, प्रत्युत पक्षपात पैदा हो जाता है।

अगर काम, क्रोध, लोभ और ममता—इन चारोंसे ही सम्पोह होता है, तो फिर भगवान्ने यहाँ केवल क्रोधका ही नाम क्यों लिया ? इसमें गहराईसे देखा जाय तो काम, लोभ और ममता—इनमें तो अपने सुखभोग और स्वार्थकी वृत्ति जाग्रत् रहती है, पर क्रोधमें दूसरोंका अनिष्ट करनेकी वृत्ति जाग्रत् रहती है। अतः क्रोधसे जो सम्पोह होता है, वह काम, लोभ और ममतासे पैदा हुए सम्पोहसे भी भयंकर होता है। इस दृष्टिसे भगवान्ने यहाँ केवल क्रोधसे ही सम्पोह होना बताया है।

‘सम्पोहात्स्मृतिविभ्रमः’— मूढ़ता छा जानेसे स्मृति नष्ट हो जाती है अर्थात् शास्त्रोंसे, सद्विचारोंसे जो निश्चय किया था कि ‘अपनेको ऐसा काम करना है, ऐसा साधन करना है, अपना उद्धार करना है’ उसकी स्मृति नष्ट हो जाती है, उसकी याद नहीं रहती।