भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्रीमद्भगवद्गीता

‘स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाश:’—स्मृति नष्ट होनेपर बुद्धिमें प्रकट होनेवाला विवेक लुप्त हो जाता है अर्थात् मनुष्यमें नया विचार करनेकी शक्ति नहीं रहती।

‘बुद्धिनाशात्प्रणश्यति’—विवेक लुप्त हो जानेसे मनुष्य अपनी स्थितिसे गिर जाता है। अतः इस पतनसे बचनेके लिये सभी साधकोंको भगवान्‌के परायण होनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है।

यहाँ विषयोंका ध्यान करनेमात्रसे राग, रागसे काम, कामसे क्रोध, क्रोधसे सम्मोह, सम्मोहसे स्मृतिनाश, स्मृतिनाशसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे पतन—यह जो क्रम बताया है, इसका विवेचन करनेमें तो देरी लगती है, पर इन सभी वृत्तियोंके पैदा होनेमें और उससे मनुष्यका पतन होनेमें देरी नहीं लगती। बिजलीके करंटकी तरह ये सभी वृत्तियाँ तत्काल पैदा होकर मनुष्यका पतन करा देती हैं।

सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके श्लोकमें ‘स्थितप्रज्ञ कैसे चलता है?’—इस चौथे प्रश्नका उत्तर देते हैं।

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ ६४ ॥ प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥ ६५ ॥

तु = परन्तु विधेयात्मा = वशीभूत अन्तःकरणवाला (कर्मयोगी साधक) रागद्वेषवियुक्तैः = राग-द्वेषसे रहित आत्मवश्यैः = अपने वशमें की हुई इन्द्रियैः = इन्द्रियोंके द्वारा विषयान् = विषयोंका चरन् = सेवन करता हुआ प्रसादम् = (अन्तःकरणकी) निर्मलताको अधिगच्छति = प्राप्त हो जाता है। प्रसादे = (अन्तःकरणकी) निर्मलता प्राप्त होनेपर अस्य = साधकके सर्वदुःखानाम् = सम्पूर्ण दुःखोंका हानिः = नाश उपजायते = हो जाता है (और ऐसे) प्रसन्नचेतसः = शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धिः = बुद्धि हि = निःसन्देह आशु = बहुत जल्दी पर्यवतिष्ठते = (परमात्मामें) स्थिर हो जाती है।

व्याख्या—‘तु’—पूर्वश्लोकमें भगवान्‌ने कहा कि आसक्ति रहते हुए विषयोंका चिन्तन करनेमात्रसे पतन हो जाता है और यहाँ कहते हैं कि आसक्ति न रहनेपर विषयोंका सेवन करनेसे उत्थान हो जाता है। वहाँ तो बुद्धिका नाश बताया और यहाँ बुद्धिका परमात्मामें स्थित होना बताया। इस प्रकार पहले कहे गये विषयसे यहाँके विषयका अन्तर बतानेके लिये यहाँ ‘तु’ पद आया है।

‘विधेयात्मा’—साधकका अन्तःकरण अपने वशमें रहना चाहिये। अन्तःकरणको वशीभूत किये बिना कर्मयोगकी सिद्धि नहीं होती, प्रत्युत कर्म करते हुए विषयोंमें राग होनेकी और पतन होनेकी सम्भावना रहती है। वास्तवमें देखा जाय तो अन्तःकरणको अपने वशमें रखना हरेक साधकके लिये आवश्यक है। कर्मयोगीके लिये तो इसकी विशेष आवश्यकता है।

‘आत्मवश्यैः रागद्वेषवियुक्तैः इन्द्रियैः’—जैसे ‘विधेयात्मा’ पद अन्तःकरणको वशमें करनेके अर्थमें आया है, ऐसे ही ‘आत्मवश्यैः’ पद इन्द्रियोंको वशमें करनेके अर्थमें आया है। तात्पर्य है कि व्यवहार करते समय इन्द्रियाँ अपने वशीभूत होनी चाहिये और इन्द्रियाँ वशीभूत होनेके लिये इन्द्रियोंका राग-द्वेषरहित होना जरूरी है। अतः इन्द्रियोंसे किसी विषयका ग्रहण रागपूर्वक न हो और किसी विषयका त्याग द्वेषपूर्वक न हो। कारण कि विषयोंके ग्रहण और त्यागका इतना महत्त्व नहीं है, जितना महत्त्व इन्द्रियोंमें राग और द्वेष न होने देनेका है। इसीलिये तीसरे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्‌ने साधकके लिये सावधानी बतायी है कि ‘प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें राग और द्वेष रहते हैं। साधक इनके वशीभूत न हो; क्योंकि ये दोनों ही साधकके शत्रु हैं।’ पाँचवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्‌ने कहा है कि ‘जो साधक राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे रहित हो जाता है, वह सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है।’