भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 154

श्लोक ६४-६५ ]

  • साधक-संजीवनी *

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‘विषयान् चरन्’—जिसका अन्तःकरण अपने वशमें है और जिसकी इन्द्रियाँ राग-द्वेषसे रहित तथा अपने वशमें की हुई हैं, ऐसा साधक इन्द्रियोंसे विषयोंका सेवन अर्थात् सब प्रकारका व्यवहार तो करता है, पर विषयोंका भोग नहीं करता। भोगबुद्धिसे किया हुआ विषय-सेवन ही पतनका कारण होता है। इस भोगबुद्धिका निषेध करनेके लिये ही यहाँ ‘विधेयात्मा’, ‘आत्मवश्यैः’ आदि पद आये हैं।

‘प्रसादमधिगच्छति’—राग-द्वेषरहित होकर विषयोंका सेवन करनेसे साधक अन्तःकरणकी प्रसन्नता-(स्वच्छता-)को प्राप्त होता है। यह प्रसन्नता मानसिक तप है (गीता—सत्रहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक), जो शारीरिक और वाचिक तपसे ऊँचा है। अतः साधकको न तो रागपूर्वक विषयोंका सेवन करना चाहिये और न द्वेषपूर्वक विषयोंका त्याग करना चाहिये; क्योंकि राग और द्वेष—इन दोनोंसे ही संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ता है।

राग-द्वेषसे रहित इन्द्रियोंसे विषयोंका सेवन करनेसे जो प्रसन्नता होती है, उसका अगर संग न किया जाय, भोग न किया जाय, तो वह प्रसन्नता परमात्माकी प्राप्ति करा देती है।

‘प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते’—चित्तकी प्रसन्नता (स्वच्छता) प्राप्त होनेपर सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है अर्थात् कोई भी दुःख नहीं रहता। कारण कि राग होनेसे ही चित्तमें खिन्नता होती है। खिन्नता होते ही कामना पैदा हो जाती है और कामनासे ही सब दुःख पैदा होते हैं। परन्तु जब राग मिट जाता है, तब चित्तमें प्रसन्नता होती है। उस प्रसन्नतासे सम्पूर्ण दुःख मिट जाते हैं।

जितने भी दुःख हैं, वे सब-के-सब प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर-संसारके सम्बन्धसे ही होते हैं और शरीर-संसारसे सम्बन्ध होता है सुखकी लिप्सासे। सुखकी लिप्सा होती है खिन्नतासे। परन्तु जब प्रसन्नता होती है, तब खिन्नता मिट जाती है। खिन्नता मिटनेपर सुखकी लिप्सा नहीं रहती। सुखकी लिप्सा न रहनेसे शरीर-संसारके साथ सम्बन्ध नहीं रहता और सम्बन्ध न रहनेसे सम्पूर्ण दुःखोंका अभाव हो जाता है—‘सर्वदुःखानां हानिः।’

तात्पर्य है कि प्रसन्नतासे दो बातें होती हैं—संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद और परमात्मामें बुद्धिकी स्थिरता। यही बात भगवान्ने पहले तिरपनवें श्लोकमें ‘निश्चत्ता’ और ‘अचत्ता’ पदोंसे कही है कि उसकी बुद्धि संसारमें निश्चल और परमात्मामें अचल हो जाती है।

यहाँ ‘सर्वदुःखानां हानिः’ का तात्पर्य यह नहीं है कि उसके सामने दुःखदायी परिस्थिति आयेगी ही नहीं, प्रत्युत इसका तात्पर्य यह है कि कर्मोंके अनुसार उसके सामने दुःखदायी घटना, परिस्थिति आ सकती है; परन्तु उसके अन्तःकरणमें दुःख, सन्ताप, हलचल आदि विकृति नहीं हो सकती।

‘प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते’—प्रसन्न (स्वच्छ) चित्तवालेकी बुद्धि बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है अर्थात् साधक स्वयं परमात्मामें स्थिर हो जाता है, उसकी बुद्धिमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता।

मार्मिक बात

भगवद्विषयक प्रसन्नता हो अथवा व्याकुलता हो—इन दोनोंमेंसे कोई एक भी अगर अधिक बढ़ जाती है, तो वह शीघ्र ही परमात्माकी प्राप्ति करा देती है। जैसे, भगवान्के पास जाती हुई गोपियोंको माता-पिता, भाई, पति आदिने रोक दिया, मकानमें बंद कर दिया, तो उन गोपियोंमें भगवान्से मिलनेकी जो व्याकुलता हुई, उससे उनके रजोगुण-तमोगुण नष्ट हो गये और भगवान्का चिन्तन करनेसे जो प्रसन्नता हुई, उससे उनका सत्त्वगुण नष्ट हो गया। इस प्रकार गुणसंगसे रहित होकर वे शरीरको वहीं छोड़कर सबसे पहले भगवान्से जा मिलीं*। परन्तु सांसारिक विषयोंको लेकर जो प्रसन्नता और खिन्नता होती है, उन दोनोंमें ही भोगोंके संस्कार दृढ़ होते हैं अर्थात् संसारका बन्धन दृढ़ होता है। इसके उदाहरण संसारमात्रके सामान्य प्राणी हैं, जो प्रसन्नता और खिन्नताको लेकर संसारमें फँसे हुए हैं।

प्रसन्नता और व्याकुलता-(खिन्नता-) में अन्तःकरण द्रवित हो जाता है। जैसे द्रवित मोममें रंग डालनेसे मोममें वह रंग स्थायी हो जाता है, ऐसे ही अन्तःकरण द्रवित

  • अन्तर्गृह्णातः काश्चिद् गोप्योऽलब्धविनिर्गमाः। कृष्णं तद्भावनायुक्ता दध्यूर्मीलितलोचनाः॥ दुःसहप्रेच्छविरहतीव्रतापधुताशुभाः। ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्वृत्या क्षीणमङ्गलाः॥ तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि सङ्गताः। जहर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः॥

( श्रीमद्भागवतम् १०।२१।१-११ )

(—इन श्लोकोंकी विस्तृत व्याख्याके लिये गीताप्रेससे प्रकाशित ‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ पुस्तकके अन्तर्गत ‘अलौकिक प्रेम’ लेख पढ़ना चाहिये।)

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