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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक ६२-६३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१५१

कामात्= कामनासे (बाधा लगनेपर)भवति= हो जाता है।बुद्धिनाशः= बुद्धि (विवेक) का नाश हो जाता है।
क्रोधः= क्रोधसम्पोहात्= सम्पोहसेबुद्धिनाशात्= बुद्धिका नाश होनेपर (मनुष्यका)
अभिजायते= पैदा होता है।स्मृतिविभ्रमः= स्मृति भ्रष्ट हो जाती है।प्रणश्यति= पतन हो जाता है।
क्रोधात्= क्रोध होनेपरस्मृतिभ्रंशात्= स्मृति भ्रष्ट होनेपर
सम्पोहः= सम्पोह

व्याख्या—‘ध्यायतो विषयान्युसः सङ्गस्तेषूपजायते’— भगवान्के परायण न होनेसे, भगवान्का चिन्तन न होनेसे विषयोंका ही चिन्तन होता है। कारण कि जीवके एक तरफ परमात्मा हैं और एक तरफ संसार है। जब वह परमात्माका आश्रय छोड़ देता है, तब वह संसारका आश्रय लेकर संसारका ही चिन्तन करता है; क्योंकि संसारके सिवाय चिन्तनका कोई दूसरा विषय रहता ही नहीं। इस तरह चिन्तन करते-करते मनुष्यको उन विषयोंमें आसक्ति, राग, प्रियता पैदा हो जाती है। आसक्ति पैदा होनेसे मनुष्य उन विषयोंका सेवन करता है। विषयोंका सेवन चाहे मानसिक हो, चाहे शारीरिक हो, उससे जो सुख होता है, उससे विषयोंमें प्रियता पैदा होती है। प्रियतासे उस विषयका बार-बार चिन्तन होने लगता है। अब उस विषयका सेवन करे, चाहे न करे, पर विषयोंमें राग पैदा हो ही जाता है—यह नियम है।

‘संगतंजायते कामः’— विषयोंमें राग पैदा होनेपर उन विषयोंको (भोगोंको) प्राप्त करनेकी कामना पैदा हो जाती है कि वे भोग, वस्तुएँ मेरेको मिलें।

‘कामाल्क्रोधोऽभिजायते’— कामनाके अनुकूल पदार्थकिल मिलते रहनेसे ‘लोभ’ पैदा हो जाता है और कामनापूर्तिकी सम्भावना हो रही है, पर उसमें कोई बाधा देता है, तो उसपर ‘क्रोध’ आ जाता है।

कामना एक ऐसी चीज है, जिसमें बाधा पड़नेपर क्रोध पैदा हो ही जाता है। वर्ण, आश्रम, गुण, योग्यता आदिको लेकर अपनेमें जो अच्छाईका अभिमान रहता है, उस अभिमानमें भी अपने आदर, सम्मान आदिकी कामना रहती है; उस कामनामें किसी व्यक्तिके द्वारा बाधा पड़नेपर भी क्रोध पैदा हो जाता है।

‘कामना’ रजोगुणी वृत्ति है, ‘सम्पोह’ तमोगुणी वृत्ति है और ‘क्रोध’ रजोगुण तथा तमोगुणके बीचकी वृत्ति है।

कहीं भी किसी भी बातको लेकर क्रोध आता है, तो उसके मूलमें कहीं-न-कहीं राग अवश्य होता है। जैसे, नीति-न्यायसे विरुद्ध काम करनेवालेको देखकर क्रोध आता है, तो नीति-न्यायमें राग है। अपमान-तिरस्कार

करनेवालेपर क्रोध आता है, तो मान-सत्कारमें राग है। निन्दा करनेवालेपर क्रोध आता है, तो प्रशंसामें राग है। दोषारोपण करनेवालेपर क्रोध आता है, तो निर्दोषताके अभिमानमें राग है; आदि-आदि।

‘क्रोधाद्भवति सम्पोहः’— क्रोधसे सम्पोह होता है अर्थात् मूढ़ता छा जाती है। वास्तवमें देखा जाय तो काम, क्रोध, लोभ और ममता— इन चारोंसे ही सम्पोह होता है; जैसे—

(१) कामसे जो सम्पोह होता है, उसमें विवेकशक्ति ढक जानेसे मनुष्य कामके वशीभूत होकर न करनेलायक कार्य भी कर बैठता है।

(२) क्रोधसे जो सम्पोह होता है, उसमें मनुष्य अपने मित्रों तथा पूज्यजनोंको भी उलटी-सीधी बातें कह बैठता है और न करनेलायक बर्ताव भी कर बैठता है।

(३) लोभसे जो सम्पोह होता है, उसमें मनुष्यको सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म आदिका विचार नहीं रहता और वह कपट करके लोगोंको ठग लेता है।

(४) ममतासे जो सम्पोह होता है, उसमें समभाव नहीं रहता, प्रत्युत पक्षपात पैदा हो जाता है।

अगर काम, क्रोध, लोभ और ममता—इन चारोंसे ही सम्पोह होता है, तो फिर भगवान्ने यहाँ केवल क्रोधका ही नाम क्यों लिया ? इसमें गहराईसे देखा जाय तो काम, लोभ और ममता—इनमें तो अपने सुखभोग और स्वार्थकी वृत्ति जाग्रत् रहती है, पर क्रोधमें दूसरोंका अनिष्ट करनेकी वृत्ति जाग्रत् रहती है। अतः क्रोधसे जो सम्पोह होता है, वह काम, लोभ और ममतासे पैदा हुए सम्पोहसे भी भयंकर होता है। इस दृष्टिसे भगवान्ने यहाँ केवल क्रोधसे ही सम्पोह होना बताया है।

‘सम्पोहात्स्मृतिविभ्रमः’— मूढ़ता छा जानेसे स्मृति नष्ट हो जाती है अर्थात् शास्त्रोंसे, सद्विचारोंसे जो निश्चय किया था कि ‘अपनेको ऐसा काम करना है, ऐसा साधन करना है, अपना उद्धार करना है’ उसकी स्मृति नष्ट हो जाती है, उसकी याद नहीं रहती।

श्रीमद्भगवद्गीता

‘स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाश:’—स्मृति नष्ट होनेपर बुद्धिमें प्रकट होनेवाला विवेक लुप्त हो जाता है अर्थात् मनुष्यमें नया विचार करनेकी शक्ति नहीं रहती।

‘बुद्धिनाशात्प्रणश्यति’—विवेक लुप्त हो जानेसे मनुष्य अपनी स्थितिसे गिर जाता है। अतः इस पतनसे बचनेके लिये सभी साधकोंको भगवान्‌के परायण होनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है।

यहाँ विषयोंका ध्यान करनेमात्रसे राग, रागसे काम, कामसे क्रोध, क्रोधसे सम्मोह, सम्मोहसे स्मृतिनाश, स्मृतिनाशसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे पतन—यह जो क्रम बताया है, इसका विवेचन करनेमें तो देरी लगती है, पर इन सभी वृत्तियोंके पैदा होनेमें और उससे मनुष्यका पतन होनेमें देरी नहीं लगती। बिजलीके करंटकी तरह ये सभी वृत्तियाँ तत्काल पैदा होकर मनुष्यका पतन करा देती हैं।

सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके श्लोकमें ‘स्थितप्रज्ञ कैसे चलता है?’—इस चौथे प्रश्नका उत्तर देते हैं।

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ ६४ ॥ प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥ ६५ ॥

तु = परन्तु विधेयात्मा = वशीभूत अन्तःकरणवाला (कर्मयोगी साधक) रागद्वेषवियुक्तैः = राग-द्वेषसे रहित आत्मवश्यैः = अपने वशमें की हुई इन्द्रियैः = इन्द्रियोंके द्वारा विषयान् = विषयोंका चरन् = सेवन करता हुआ प्रसादम् = (अन्तःकरणकी) निर्मलताको अधिगच्छति = प्राप्त हो जाता है। प्रसादे = (अन्तःकरणकी) निर्मलता प्राप्त होनेपर अस्य = साधकके सर्वदुःखानाम् = सम्पूर्ण दुःखोंका हानिः = नाश उपजायते = हो जाता है (और ऐसे) प्रसन्नचेतसः = शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धिः = बुद्धि हि = निःसन्देह आशु = बहुत जल्दी पर्यवतिष्ठते = (परमात्मामें) स्थिर हो जाती है।

व्याख्या—‘तु’—पूर्वश्लोकमें भगवान्‌ने कहा कि आसक्ति रहते हुए विषयोंका चिन्तन करनेमात्रसे पतन हो जाता है और यहाँ कहते हैं कि आसक्ति न रहनेपर विषयोंका सेवन करनेसे उत्थान हो जाता है। वहाँ तो बुद्धिका नाश बताया और यहाँ बुद्धिका परमात्मामें स्थित होना बताया। इस प्रकार पहले कहे गये विषयसे यहाँके विषयका अन्तर बतानेके लिये यहाँ ‘तु’ पद आया है।

‘विधेयात्मा’—साधकका अन्तःकरण अपने वशमें रहना चाहिये। अन्तःकरणको वशीभूत किये बिना कर्मयोगकी सिद्धि नहीं होती, प्रत्युत कर्म करते हुए विषयोंमें राग होनेकी और पतन होनेकी सम्भावना रहती है। वास्तवमें देखा जाय तो अन्तःकरणको अपने वशमें रखना हरेक साधकके लिये आवश्यक है। कर्मयोगीके लिये तो इसकी विशेष आवश्यकता है।

‘आत्मवश्यैः रागद्वेषवियुक्तैः इन्द्रियैः’—जैसे ‘विधेयात्मा’ पद अन्तःकरणको वशमें करनेके अर्थमें आया है, ऐसे ही ‘आत्मवश्यैः’ पद इन्द्रियोंको वशमें करनेके अर्थमें आया है। तात्पर्य है कि व्यवहार करते समय इन्द्रियाँ अपने वशीभूत होनी चाहिये और इन्द्रियाँ वशीभूत होनेके लिये इन्द्रियोंका राग-द्वेषरहित होना जरूरी है। अतः इन्द्रियोंसे किसी विषयका ग्रहण रागपूर्वक न हो और किसी विषयका त्याग द्वेषपूर्वक न हो। कारण कि विषयोंके ग्रहण और त्यागका इतना महत्त्व नहीं है, जितना महत्त्व इन्द्रियोंमें राग और द्वेष न होने देनेका है। इसीलिये तीसरे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्‌ने साधकके लिये सावधानी बतायी है कि ‘प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें राग और द्वेष रहते हैं। साधक इनके वशीभूत न हो; क्योंकि ये दोनों ही साधकके शत्रु हैं।’ पाँचवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्‌ने कहा है कि ‘जो साधक राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे रहित हो जाता है, वह सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है।’

श्लोक ६४-६५ ]

  • साधक-संजीवनी *

१५३

‘विषयान् चरन्’—जिसका अन्तःकरण अपने वशमें है और जिसकी इन्द्रियाँ राग-द्वेषसे रहित तथा अपने वशमें की हुई हैं, ऐसा साधक इन्द्रियोंसे विषयोंका सेवन अर्थात् सब प्रकारका व्यवहार तो करता है, पर विषयोंका भोग नहीं करता। भोगबुद्धिसे किया हुआ विषय-सेवन ही पतनका कारण होता है। इस भोगबुद्धिका निषेध करनेके लिये ही यहाँ ‘विधेयात्मा’, ‘आत्मवश्यैः’ आदि पद आये हैं।

‘प्रसादमधिगच्छति’—राग-द्वेषरहित होकर विषयोंका सेवन करनेसे साधक अन्तःकरणकी प्रसन्नता-(स्वच्छता-)को प्राप्त होता है। यह प्रसन्नता मानसिक तप है (गीता—सत्रहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक), जो शारीरिक और वाचिक तपसे ऊँचा है। अतः साधकको न तो रागपूर्वक विषयोंका सेवन करना चाहिये और न द्वेषपूर्वक विषयोंका त्याग करना चाहिये; क्योंकि राग और द्वेष—इन दोनोंसे ही संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ता है।

राग-द्वेषसे रहित इन्द्रियोंसे विषयोंका सेवन करनेसे जो प्रसन्नता होती है, उसका अगर संग न किया जाय, भोग न किया जाय, तो वह प्रसन्नता परमात्माकी प्राप्ति करा देती है।

‘प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते’—चित्तकी प्रसन्नता (स्वच्छता) प्राप्त होनेपर सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है अर्थात् कोई भी दुःख नहीं रहता। कारण कि राग होनेसे ही चित्तमें खिन्नता होती है। खिन्नता होते ही कामना पैदा हो जाती है और कामनासे ही सब दुःख पैदा होते हैं। परन्तु जब राग मिट जाता है, तब चित्तमें प्रसन्नता होती है। उस प्रसन्नतासे सम्पूर्ण दुःख मिट जाते हैं।

जितने भी दुःख हैं, वे सब-के-सब प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर-संसारके सम्बन्धसे ही होते हैं और शरीर-संसारसे सम्बन्ध होता है सुखकी लिप्सासे। सुखकी लिप्सा होती है खिन्नतासे। परन्तु जब प्रसन्नता होती है, तब खिन्नता मिट जाती है। खिन्नता मिटनेपर सुखकी लिप्सा नहीं रहती। सुखकी लिप्सा न रहनेसे शरीर-संसारके साथ सम्बन्ध नहीं रहता और सम्बन्ध न रहनेसे सम्पूर्ण दुःखोंका अभाव हो जाता है—‘सर्वदुःखानां हानिः।’

तात्पर्य है कि प्रसन्नतासे दो बातें होती हैं—संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद और परमात्मामें बुद्धिकी स्थिरता। यही बात भगवान्ने पहले तिरपनवें श्लोकमें ‘निश्चत्ता’ और ‘अचत्ता’ पदोंसे कही है कि उसकी बुद्धि संसारमें निश्चल और परमात्मामें अचल हो जाती है।

यहाँ ‘सर्वदुःखानां हानिः’ का तात्पर्य यह नहीं है कि उसके सामने दुःखदायी परिस्थिति आयेगी ही नहीं, प्रत्युत इसका तात्पर्य यह है कि कर्मोंके अनुसार उसके सामने दुःखदायी घटना, परिस्थिति आ सकती है; परन्तु उसके अन्तःकरणमें दुःख, सन्ताप, हलचल आदि विकृति नहीं हो सकती।

‘प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते’—प्रसन्न (स्वच्छ) चित्तवालेकी बुद्धि बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है अर्थात् साधक स्वयं परमात्मामें स्थिर हो जाता है, उसकी बुद्धिमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता।

मार्मिक बात

भगवद्विषयक प्रसन्नता हो अथवा व्याकुलता हो—इन दोनोंमेंसे कोई एक भी अगर अधिक बढ़ जाती है, तो वह शीघ्र ही परमात्माकी प्राप्ति करा देती है। जैसे, भगवान्के पास जाती हुई गोपियोंको माता-पिता, भाई, पति आदिने रोक दिया, मकानमें बंद कर दिया, तो उन गोपियोंमें भगवान्से मिलनेकी जो व्याकुलता हुई, उससे उनके रजोगुण-तमोगुण नष्ट हो गये और भगवान्का चिन्तन करनेसे जो प्रसन्नता हुई, उससे उनका सत्त्वगुण नष्ट हो गया। इस प्रकार गुणसंगसे रहित होकर वे शरीरको वहीं छोड़कर सबसे पहले भगवान्से जा मिलीं*। परन्तु सांसारिक विषयोंको लेकर जो प्रसन्नता और खिन्नता होती है, उन दोनोंमें ही भोगोंके संस्कार दृढ़ होते हैं अर्थात् संसारका बन्धन दृढ़ होता है। इसके उदाहरण संसारमात्रके सामान्य प्राणी हैं, जो प्रसन्नता और खिन्नताको लेकर संसारमें फँसे हुए हैं।

प्रसन्नता और व्याकुलता-(खिन्नता-) में अन्तःकरण द्रवित हो जाता है। जैसे द्रवित मोममें रंग डालनेसे मोममें वह रंग स्थायी हो जाता है, ऐसे ही अन्तःकरण द्रवित

  • अन्तर्गृह्णातः काश्चिद् गोप्योऽलब्धविनिर्गमाः। कृष्णं तद्भावनायुक्ता दध्यूर्मीलितलोचनाः॥ दुःसहप्रेच्छविरहतीव्रतापधुताशुभाः। ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्वृत्या क्षीणमङ्गलाः॥ तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि सङ्गताः। जहर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः॥

( श्रीमद्भागवतम् १०।२१।१-११ )

(—इन श्लोकोंकी विस्तृत व्याख्याके लिये गीताप्रेससे प्रकाशित ‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ पुस्तकके अन्तर्गत ‘अलौकिक प्रेम’ लेख पढ़ना चाहिये।)

१५४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

होनेपर उसमें भगवत्सम्बन्धी अथवा सांसारिक—जो भी भाव आते हैं, वे स्थायी हो जाते हैं। स्थायी होनेपर वे भाव उत्थान अथवा पतन करनेवाले हो जाते हैं। अतः साधकके

लिये उचित है कि संसारकी प्रिय-से-प्रिय वस्तु मिलनेपर भी प्रसन्न न हो और अप्रिय-से-अप्रिय वस्तु मिलनेपर भी उद्विग्न न हो।

परिशिष्ट भाव —एक विभाग भोगका है और एक विभाग योगका है। राग-द्वेषसे युक्त 'भोगी' मनुष्य अगर विषयोंका चिन्तन भी करे तो उसका पतन हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)। परन्तु राग-द्वेषसे रहित 'योगी' मनुष्य अगर विषयोंका सेवन भी करे तो उसका पतन नहीं होता, प्रत्युत वह परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है।

राग-द्वेषसे रहित मनुष्य भोगबुद्धिसे विषयोंका सेवन नहीं करता अर्थात् भोगजन्म सुख (रस) नहीं लेता; क्योंकि यह उसका ध्येय नहीं है। वह भोगोंको रागपूर्वक न भोगकर त्यागपूर्वक भोगता है (गीता—तीसरे अध्यायका चौंतीसवाँ श्लोक)। इसलिये उसका अन्तःकरण निर्मल हो जाता है। त्यागपूर्वक भोग वास्तवमें भोग है ही नहीं। लोगोंकी दृष्टिमें उसके द्वारा भोगका आचरण दीखता है, इसीलिये यहाँ 'विषयान् चरन्' पद आये हैं।

राग-द्वेषसे रहित होनेपर 'प्रसाद' की प्राप्ति होती है। हृदय प्रसन्नता रहे, कभी खिन्नता न आये, नीरसता न आये—यह 'प्रसाद' है। इस प्रसादकी प्राप्तिमें भी सन्तोष न करे, इसका उपभोग न करे तो बहुत जल्दी परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।

सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें जो बात कही है, उसीको आगेके दो श्लोकोंमें व्यतिरेक रीतिसे पृष्ट करते हैं।

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।

न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥ ६६ ॥

अयुक्तस्य | = जिसके मन- इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्यकी | अयुक्तस्य | = (व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे) उस अयुक्त मनुष्यमें | होनेसे (उसको) ---|---|---|---|--- बुद्धिः | = (व्यवसायात्मिका) बुद्धि | भावना | = निष्कामभाव अथवा कर्तव्य- परायणताका भाव | शान्तिः | = शान्ति न | = नहीं | न | = नहीं होता। | न | = नहीं मिलती। अस्ति | = होती | अभावयतः | = निष्कामभाव न | च | = फिर च | = और | | | अशान्तस्य | = शान्तिरहित मनुष्यको | | | | सुखम् | = सुख | | | | कुतः | = कैसे (मिल सकता है) ?

व्याख्या —[यहाँ कर्मयोगका विषय है। कर्मयोगमें मन और इन्द्रियोंका संयम करना मुख्य होता है। विवेकपूर्वक संयम किये बिना कामना नष्ट नहीं होती। कामनाके नष्ट हुए बिना बुद्धिकी स्थिरता नहीं होती। अतः कर्मयोगी साधकको पहले मन और इन्द्रियोंका संयम करना चाहिये। परन्तु जिसका मन और इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, उसकी बात इस श्लोकमें कहते हैं।]

'नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य '—जिसका मन और इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे अयुक्त (असंयमी) पुरुषकी 'मेरेको केवल परमात्मप्राप्ति ही करनी है—ऐसी एक निश्चयवाली बुद्धि नहीं होती'। कारण कि मन और इन्द्रियाँ संयमित न होनेसे वह उत्पत्ति-विनाशशील सांसारिक भोगों और संप्रहमें ही लगा रहता है। वह कभी मान चाहता है, कभी सुख-आराम चाहता है, कभी धन चाहता है, कभी भोग चाहता

  • अहंता ('मैं'-पन) का परिवर्तन हुए बिना इन्द्रियाँ वशमें नहीं होतीं और इन्द्रियोंको वशमें किये बिना एक निश्चयवाली बुद्धि नहीं होती। यदि अहंताका परिवर्तन हो जाय कि 'मैं साधक हूँ और साधन करना ही मेरा काम है' तो मन-इन्द्रियाँ अपने-आप वशमें हो जाती हैं, उनको वशमें करना नहीं पड़ता।

श्लोक ६७ ]

  • साधक-संजीवनी *

१५५

है—इस प्रकार उसके भीतर अनेक तरहकी कामनाएँ होती रहती हैं। इसलिये उसकी बुद्धि एक निश्चयवाली नहीं होती। ‘न चायुक्तस्य भावना’ —जिसकी बुद्धि व्यवसायात्मिका नहीं होती, उसकी ‘मेरेको तो केवल अपने कर्तव्यका पालन करना है और फलकी इच्छा, कामना, आसक्ति आदिका त्याग करना है’—ऐसी भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होनेमें कारण है—अपना ध्येय स्थिर न होना। ‘न चाभावयतः शान्तिः’ —जो अपने कर्तव्यके परायण नहीं रहता, उसको शान्ति नहीं मिल सकती। जैसे

साधु, शिक्षक, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि यदि अपने-अपने कर्तव्यमें तत्पर नहीं रहते, तो उनको शान्ति नहीं मिलती। कारण कि अपने कर्तव्यके पालनमें दृढ़ता न रहनेसे ही अशान्ति पैदा होती है। ‘अशान्तस्य कुतः सुखम्’ —जो अशान्त है, वह सुखी कैसे हो सकता है ? कारण कि उसके हृदयमें हरदम हलचल होती रहती है। बाहरसे उसको कितने ही अनुकूल भोग आदि मिल जायें तो भी उसके हृदयकी हलचल नहीं मित सकती अर्थात् वह सुखी नहीं हो सकता।

सम्बन्ध—अयुक्त पुरुषकी बुद्धि एक निश्चयवाली क्यों नहीं होती—इसका कारण आगेके श्लोकमें बताते हैं।

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।

तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ ६७ ॥

हि = कारण कि चरताम् = (अपने-अपने विषयोंमें) विचरती हुई इन्द्रियाणाम् = इन्द्रियोंमेंसे (एक ही इन्द्रिय)

यत् = जिस मनः = मनको अनुविधीयते = अपना अनुगामी बना लेती है, तत् = वह (अकेला मन)

अम्भसि = जलमें नावम् = नौकाको वायुः = वायुकी इव = तरह अस्य = इसकी प्रज्ञाम् = बुद्धिको हरति = हर लेता है।

व्याख्या —[मनुष्यको यह जन्म केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। अतः मुझे तो केवल परमात्मप्राप्ति ही करनी है, चाहे जो हो जाय—ऐसा अपना ध्येय दृढ़ होना चाहिये। ध्येय दृढ़ होनेसे साधककी अहंतामेंसे भोगोंका महत्त्व हट जाता है। महत्त्व हट जानेसे व्यवसायात्मिका बुद्धि दृढ़ हो जाती है। परन्तु जबतक व्यवसायात्मिका बुद्धि दृढ़ नहीं होती, तबतक उसकी क्या दशा होती है—इसका वर्णन यहाँ कर रहे हैं।]

‘इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते’ —जब साधक कार्यक्षेत्रमें सब तरहका व्यवहार करता है, तब इन्द्रियोंके सामने अपने-अपने विषय आ ही जाते हैं।

उनमेंसे जिस इन्द्रियका अपने विषयमें राग हो जाता है, वह इन्द्रिय मनको अपना अनुगामी बना लेती है, मनको अपने साथ कर लेती है। अतः मन उस विषयका सुखभोग करने लग जाता है अर्थात् मनमें सुखबुद्धि, भोगबुद्धि पैदा हो जाती है; मनमें उस विषयका रंग चढ़ जाता है, उसका महत्त्व बैठ जाता है। जैसे, भोजन करते समय किसी पदार्थका स्वाद आता है तो रसनेन्द्रिय उसमें आसक्त हो जाती है। आसक्त होनेपर रसनेन्द्रिय मनको भी खींच लेती है, तो मन उस स्वादमें प्रसन्न हो जाता है, राजी हो जाता है।

‘तदस्य हरति प्रज्ञाम्’ —जब मनमें विषयका महत्त्व बैठ जाता है, तब वह अकेला मन ही साधककी बुद्धिको हर

  • इस श्लोकके पूर्वार्धमें कर्मकर्तृ-प्रयोग करनेके पहले कर्तृवाच्य था अर्थात् ‘चरताम् इन्द्रियाणाम् इन्द्रियम् यत् मनः अनुविदधाति’ ऐसा वाक्य था। इस वाक्यमें इन्द्रिय कर्ता थी और मन कर्म था। परन्तु जब वाक्यको सरल बनानेके लिये ‘कर्मकर्तृ’ का प्रयोग किया जाता है अर्थात् कर्मको कर्ता बनाया जाता है, तब वहाँ उस कर्ताको कर्मबद्धाव किया जाता है। इससे कर्मको लेकर जो कार्य होते हैं, वे सभी कार्य कर्ताको लेकर हो जाते हैं। यहाँ मनकी मुख्यता दिखानेके लिये अर्थात् इन्द्रियोंके बिना मन ही सब कुछ करता है—यह दिखानेके लिये कर्मरूप मनको कर्ता बना दिया गया है। मन प्रथम पुरुष होनेसे प्रथम पुरुष ‘अनुविधीयते’ क्रियाका प्रयोग हुआ है। अब जो कर्तृवाच्यका कर्ता इन्द्रिय थी, उसकी आवश्यकता न होनेसे वह कर्ता हट गया, तो पूरा वाक्य बना—‘इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते’ जो कि उपर्युक्त श्लोकमें है। इस कर्मकर्तृका प्रयोग करनेका तात्पर्य यह हुआ कि इन्द्रियाँ जिन विषयोंमें विचरती हैं, उन विषयोंमेंसे मन जिस किसी विषयमें खिंच जाता है, रस लेने लग जाता है, वह अकेला मन ही बुद्धिको हर लेता है अर्थात् मनमें विषयभोगकी प्रधानता हो जाती है।

१५६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

लेता है अर्थात् साधकमें कर्तव्य-परायणता न रहकर भोगबुद्धि पैदा हो जाती है। वह भोगबुद्धि होनेसे साधकमें 'मुझे परमात्माकी ही प्राप्ति करनी है'—यह व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं रहती। इस तरहका विवेचन करनेमें तो देरी लगती है, पर बुद्धि विचलित होनेमें देरी नहीं लगती अर्थात् जहाँ इन्द्रियने मनको अपना अनुगामी बनाया कि मनमें भोगबुद्धि पैदा हो जाती है और उसी समय बुद्धि मारी जाती है।

'वायुनोवमिवाभ्मसि' —वह बुद्धि किस तरह हर ली जाती है—इसको दृष्टान्तरूपसे समझाते हैं कि जलमें चलती हुई नौकाको वायु जैसे हर लेती है, ऐसे ही मन बुद्धिको हर लेता है। जैसे, कोई मनुष्य नौकाके द्वारा नदी या समुद्रको पार करते हुए अपने गन्तव्य स्थानको जा रहा है। यदि उस समय नौकाके विपरीत वायु चलती है तो वह वायु उस नौकाको गन्तव्य स्थानसे विपरीत ले जाती है। ऐसे ही साधक व्यवसायात्मिका बुद्धिरूप नौकापर आरूढ़ होकर संसार-सागरको पार करता हुआ परमात्माकी तरफ चलता है, तो एक इन्द्रिय जिस मनको अपना

अनुगामी बनाती है, वह अकेला मन ही बुद्धिरूप नौकाको हर लेता है अर्थात् उसे संसारकी तरफ ले जाता है। इससे साधककी विषयोंमें सुखबुद्धि और उनके उपयोगी पदार्थोंमें महत्त्वबुद्धि हो जाती है।

वायु नौकाको दो तरहसे विचलित करती है—नौकाको पथभ्रष्ट कर देती है अथवा जलमें डुबा देती है। परन्तु कोई चतुर नाविक होता है तो वह वायुको क्रियाको अपने अनुकूल बना लेता है, जिससे वायु नौकाको अपने मार्गसे अलग नहीं ले जा सकती, प्रत्युत उसको गन्तव्य स्थानतक पहुँचानेमें सहायता करती है—ऐसे ही इन्द्रियोंके अनुगामी हुआ मन बुद्धिको दो तरहसे विचलित करता है—परमात्मप्राप्तिके निश्चयको दबाकर भोगबुद्धि पैदा कर देता है अथवा निषिद्ध भोगोंमें लगाकर पतन करा देता है। परन्तु जिसका मन और इन्द्रियाँ वशमें होती हैं, उसकी बुद्धिको मन विचलित नहीं करता, प्रत्युत परमात्माके पास पहुँचानेमें सहायता करता है (दूसरे अध्यायका चौसठवाँ-पैंसठवाँ श्लोक)।

परिशिष्ट भाव —यहाँ शंका हो सकती है कि प्रस्तुत श्लोकमें आये 'यत्' और 'तत्' पदोंसे इन्द्रियोंको न लेकर मनको क्यों लिया गया है अर्थात् इन्द्रियको बुद्धिका हरण करनेवाली न बताकर मनको बुद्धिका हरण करनेवाला क्यों बताया गया है? इसका समाधान है कि इसी अध्यायके साठवें श्लोकमें इन्द्रियोंको मनका हरण करनेवाली बताया है और तीसरे अध्यायके बयालीसवें श्लोकमें इन्द्रियोंसे मनको और मनसे बुद्धिको पर (सूक्ष्म, श्रेष्ठ, बलवान्) बताया है। इससे सिद्ध होता है कि इन्द्रियाँ मनका हरण करती हैं और मन बुद्धिका हरण करता है। दूसरी बात, बुद्धिको हरनेके विषयमें मन ही मुख्य है, इन्द्रियाँ नहीं। कारण कि जबतक किसी इन्द्रियके साथ मन नहीं रहता, तबतक उस इन्द्रियको अपने विषयका भी ज्ञान नहीं होता—'अधिष्ठाय मनश्चार्च विषयानुपसेवते ' (गीता १५।१)। श्रीमद्भागवतमें दत्तात्रेयजी महाराज कहते हैं—

तद्वैमात्मन्यवरुद्धचित्तो न वेद किञ्चिद् बहिरन्तरं वा। यथेषुकारो नृपतिं व्रजन्तमिषौ गतात्मा न ददर्श पाश्वं॥

(श्रीमद्भा० ११।१।१३)

'जिसका चित्त आत्मामें ही निरुद्ध हो जाता है, उसको बाहर-भीतर कहीं किसी पदार्थका भान नहीं होता। मैंने देखा था कि एक बाण बनानेवाला कारीगर बाण बनानेमें इतना तन्मय हो रहा था कि उसके पाससे ही दलबलके साथ राजाकी सवारी निकल गयी और उसको पतातक न चला।'

बाण बनानेवालेकी कर्णेंद्रिय भी थी और उसका विषय शब्द भी था, पर मन उस तरफ न रहनेसे वह सुनायी नहीं दिया। तात्पर्य है कि मन साथ रहनेसे ही इन्द्रियको अपने विषयका ज्ञान होता है। जब मन साथ न रहनेसे इन्द्रियको अपने विषयका भी ज्ञान नहीं होता, फिर वह इन्द्रिय बुद्धिको कैसे हर सकती है? नहीं हर सकती।

सम्बन्ध —अयुक्त पुरुषकी निश्चयात्मिका बुद्धि क्यों नहीं होती, इसका हेतु तो पूर्वश्लोकमें बता दिया। अब जो युक्त होता है, उसकी स्थितिका वर्णन करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६८ ॥

श्लोक ६९ ]

  • साधक-संजीवनी *

१५७

तस्मात्= इसलियेइन्द्रियार्थभ्यः= इन्द्रियोंकेहुई हैं,
महाबाहो= हे महाबाहो !विषयोंसेतस्य
यस्य= जिस मनुष्यकीसर्वशः= सर्वथाप्रज्ञा
इन्द्रियाणि= इन्द्रियाँनिगृहीतानि= वशमें कीप्रतिष्ठिता

व्याख्या— 'तस्माद्यस्य ..... प्रज्ञा प्रतिष्ठिता'—साठवें श्लोकसे मन और इन्द्रियोंको वशमें करनेका जो विषय चला आ रहा है, उसका उपसंहार करते हुए 'तस्मात्' पदसे कहते हैं कि जिसके मन और इन्द्रियोंमें संसारका आकर्षण नहीं रहा है, उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है।

यहाँ 'सर्वशः' पद देनेका तात्पर्य है कि संसारके साथ व्यवहार करते हुए अथवा एकात्ममें चिन्तन करते हुए—किसी भी अवस्थामें उसकी इन्द्रियाँ भोगोंमें, विषयोंमें प्रवृत्त नहीं होतीं। व्यवहारकालमें कितने ही विषय उसके सम्पर्कमें क्यों न आ जायें, पर वे विषय उसको विचलित नहीं कर सकते। उसका मन भी इन्द्रियके साथ मिलकर उसकी बुद्धिको विचलित नहीं कर सकता। जैसे पहाड़को कोई डिंगा नहीं सकता, ऐसे ही उसकी बुद्धिमें इतनी दृढ़ता आ जाती है कि उसको मन किसी भी अवस्थामें डिंगा नहीं

सकता। कारण कि उसके मनमें विषयोंका महत्त्व नहीं रहा।

'निगृहीतानि' का तात्पर्य है कि इन्द्रियाँ विषयोंसे पूरी तरहसे वशमें की हुई हैं अर्थात् विषयोंमें उनका लेशमात्र भी राग, आसक्ति, खिंचाव नहीं रहा है। जैसे साँपके दाँत निकाल दिये जायें, तो फिर उसमें जहर नहीं रहता। वह किसीको काट भी लेता है तो उसका कोई असर नहीं होता। ऐसे ही इन्द्रियोंको राग-द्वेषसे रहित कर देना ही मानो उनके जहरीले दाँत निकाल देना है। फिर उन इन्द्रियोंमें यह ताकत नहीं रहती कि वे साधकको पतनके मार्गमें ले जायें।

इस श्लोकका तात्पर्य यह है कि साधकको दृढ़तासे यह निश्चय कर लेना चाहिये कि मेरा लक्ष्य परमात्माकी प्राप्ति करना है, भोग भोगना और संग्रह करना मेरा लक्ष्य नहीं है। अगर ऐसी सावधानी साधकमें निरन्तर बनी रहे, तो उसकी बुद्धि स्थिर हो जायगी।

सम्बन्ध—जिसकी इन्द्रियाँ सर्वथा वशमें हैं उसमें और साधारण मनुष्योंमें क्या अन्तर है—इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ ६९ ॥

सर्वभूतानाम्= सम्पूर्ण प्राणियोंकीजागर्ति= जागता हैरहते हैं),
या= जो(और)सा
निशा= रात (परमात्मासे विमुखता) है,यस्याम्= जिसमेंमुनेः
तस्याम्= उसमेंभूतानि= सब प्राणीपश्यतः
संयमी= संयमी मनुष्यजाग्रति= जागते हैं (भोग और संग्रहमें लगेनिशा

व्याख्या— 'या निशा सर्वभूतानाम्'—जिनकी इन्द्रियाँ और मन वशमें नहीं हैं, जो भोगोंमें आसक्त हैं, वे सब परमात्मतत्त्वकी तरफसे सोये हुए हैं। परमात्मा क्या है? तत्त्वज्ञान क्या है? हम दुःख क्यों पा रहे हैं? सन्ताप-जलन क्यों हो रही है? हम जो कुछ कर रहे हैं, उसका परिणाम क्या होगा?—इस तरफ बिलकुल न देखना ही उनकी रात है, उनके लिये बिलकुल अंधेरा है।

यहाँ 'भूतानाम्' कहनेका तात्पर्य है कि जैसे पशु-पक्षी आदि दिनभर खाने-पीनेमें ही लगे रहते हैं, ऐसे ही जो मनुष्य रात-दिन खाने-पीनेमें, सुख-आराममें, भोगों

और संग्रहमें, धन कमानेमें ही लगे हुए हैं, उन मनुष्योंकी गणना भी पशु-पक्षी आदिमें ही है। कारण कि परमात्मतत्त्वसे विमुख रहनेमें पशु-पक्षी आदिमें और मनुष्योंमें कोई अन्तर नहीं है। दोनों ही परमात्मतत्त्वकी तरफसे सोये हुए हैं। हाँ, अगर कोई अन्तर है तो वह इतना ही है कि पशु-पक्षी आदिमें विवेक-शक्ति इतनी जाग्रत् नहीं है, इसलिये वे खाने-पीने आदिमें ही लगे रहते हैं और मनुष्योंमें भगवान्की कृपासे वह विवेक-शक्ति जाग्रत् है, जिससे वह अपना कल्याण कर सकता है, प्राणिमात्रकी सेवा कर सकता है, परमात्माकी प्राप्ति कर सकता है। परन्तु उस

१५८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

विवेक-शक्तिका दुरुपयोग करके मनुष्य पदार्थोंका संग्रह करनेमें एवं उनका भोग करनेमें लग जाते हैं, जिससे वे संसारके लिये पशुओंसे भी अधिक दुःखदायी हो जाते हैं। कारण कि पशु-पक्षी तो बेचारे जितनेसे पेट भर जाय, उतना ही खाते हैं, संग्रह नहीं करते; परन्तु मनुष्यको कहीं भी जो कुछ पदार्थ आदि मिल जाता है, वह उसके काममें आये चाहे न आये, उसका तो वह संग्रह कर ही लेता है और दूसरोंके काममें आनेमें बाधा डाल देता है।

‘तस्यां जागर्ति संयमी’—मनुष्योंकी जो रात है अर्थात् परमात्माकी तरफसे, अपने कल्याणकी तरफसे जो विमुखता है, उसमें संयमी मनुष्य जागता है। जिसने इन्द्रियों और मनको वशमें किया है, जो भोग और संग्रहमें आसक्त नहीं है, जिसका ध्येय केवल परमात्मा है, वह संयमी मनुष्य है। परमात्मतत्वको, अपने स्वरूपको और संसारको यथार्थरूपसे जानना ही उसका रातमें जागना है।

‘यस्यां जागर्ति भूतानि’—जो भोग और संग्रहमें बड़े सावधान रहते हैं, एक-एक पैसेका हिसाब रखते हैं, जमीनके एक-एक इंचका खयाल रखते हैं; जितने रुपये अधिकारमें आ जायें वे चाहे न्यायपूर्वक हों अथवा अन्यायपूर्वक, उसमें वे बड़े खुश होते हैं कि इतनी पूँजी तो हमने ले ही ली है, इतना लाभ तो हमें हो ही गया है—इस तरह वे सांसारिक क्षणभंगुर भोगोंको बटरनेमें और आदर-सत्कार, मान-बड़ाई आदि प्राप्त करनेमें ही लगे रहते हैं, उनमें बड़े सावधान रहते हैं, यही उन लोगोंका जागना है।

‘सा निशा पश्यतो मुनेः’—जिन सांसारिक पदार्थोंका भोग और संग्रह करनेमें मनुष्य अपनेको बड़ा बुद्धिमान्, चतुर मानते हैं और उसीमें राजी होते हैं, संसार और परमात्मतत्वको जाननेवाले मननशील संयमी मनुष्यकी दृष्टिमें वह सब रातके समान है; बिलकुल अंधेरा है। जैसे, बच्चे खेलते हैं तो वे कंकड़-पत्थर, काँचके लाल-पीले टुकड़ोंको लेकर आपसमें लड़ते हैं। अगर वह मिल

परिशिष्ट भाव—सांसारिक मनुष्य रात-दिन भोग और संग्रहमें ही लगे रहते हैं, उनको ही महत्ता देते हैं, सांसारिक कार्योंमें बड़े सावधान और निपुण होते हैं, तरह-तरहके कला-कौशल सीखते हैं, तरह-तरहके आविष्कार करते हैं, लौकिक वस्तुओंकी प्राप्तिमें ही अपनी उन्नति मानते हैं, सांसारिक वस्तुओंकी बड़ी महिमा गाते हैं, सदा जीवित रहकर सुख भोगनेके लिये बड़ी-बड़ी तपस्या करते हैं, देवताओंकी उपासना करते हैं, मन्त्र-जप करते हैं आदि-आदि। परन्तु जीवनमुक्त, तत्त्वज्ञ महापुरुष तथा सच्चे साधकोंकी दृष्टिमें वह बिलकुल रात है, अन्धकार है, उसका किंचिन्मात्र भी महत्त्व नहीं है। कारण कि उनकी दृष्टिमें ब्रह्मलोकतक सम्पूर्ण संसार विद्यमान है ही नहीं—‘नासतो विद्यते भावः’ (गीता २।१६), ‘आब्रह्मभुवनल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन’ (गीता ८।१६)।

सांसारिक लोग तो संसारमें ही रचे-पचे रहते हैं और ऐसा मानते हैं कि जो कुछ है, वह यही है—‘नायदस्तीति

जाता है तो राजी होते हैं कि मैंने बहुत बड़ा लाभ उठा लिया और अगर वह नहीं मिलता तो दुःखी हो जाते हैं कि मेरी बड़ी भारी हानि हो गयी। परन्तु जिसके मनमें कंकड़-पत्थर आदिका महत्त्व नहीं है, ऐसा समझदार व्यक्ति समझता है कि इन कंकड़-पत्थरोंके मिलनेसे क्या लाभ हुआ और मिलनेसे क्या हानि हुई ? इन बच्चोंको अगर कंकड़-पत्थर मिल भी जायेंगे, तो ये कबतक उनके साथ रहेंगे ? इसी तरह भोग और संग्रहमें लगे हुए मनुष्य भोगोंके लिये लड़ाई-झगड़ा, झूठ-कपट, बेईमानी आदि करते हैं और उनको प्राप्त करके राजी होते हैं, खुशी मनाते हैं कि हमने बहुत लाभ ले लिया। परन्तु संसारको और परमात्मतत्वको जाननेवाला मननशील संयमी मनुष्य साफ देखता है कि भोग मिल गये, आदर-सत्कार हो गया, सुख-आराम हो गया, खा-पी लिया, खूब शृंगार कर लिया तो क्या हो गया ? इसमें मनुष्योंको क्या मिला ? इनमेंसे इनके साथ क्या चलेगा ? ये कबतक इन भोगोंको साथमें रखेंगे ? इन भोगोंसे होनेवाली वृत्ति कितने दिनतक ठहरेगी ? इस तरह उसकी दृष्टिमें प्राणियोंका जागना रातके समान है।

वह मननशील संयमी मनुष्य परमात्माको, अपने स्वरूपको और संसारके परिणामको तो जानता ही है, वह पदार्थोंको भी अच्छी तरहसे जानता है कि कौन-सा पदार्थ किसके हितमें लग सकता है, इससे दूसरोंको कितना लाभ होगा। वह पदार्थोंका अपनी-अपनी जगह ठीक तरहसे सदुपयोग करता है। उनको दूसरोंकी सेवामें लगाता है।

जैसे नेत्रोंमें दोष होनेपर जब हम आकाशको देखते हैं, तब उसमें जाले-से दीखते हैं और आँखें मीच लेनेपर भी मोर-पंखकी तरह वे जाले दीखते हैं; परन्तु उनके दीखनेपर भी हमारी बुद्धिमें यह अटल निश्चय रहता है कि आकाशमें जाले नहीं हैं। ऐसे ही इन्द्रियों और अन्तःकरणके द्वारा संसार दीखनेपर भी मननशील संयमी मनुष्यकी बुद्धिमें यह अटल निश्चय रहता है कि वास्तवमें संसार नहीं है, केवल प्रतीतिमात्र है।

श्लोक ७० ]

  • साधक-संजीवनी *

१५९

वादिनः (गीता २।४२)। ‘कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः’ (गीता १६।११)। पारमार्थिक विषयमें उनकी बुद्धि जाती ही नहीं। परन्तु पारमार्थिक साधक पारमार्थिक विषयके साथ-साथ संसारको भी जानते हैं, इसलिये उनके लिये ‘पश्यतः’ पद दिया है। संसारी लोग तो केवल रातको ही देखते हैं, दिनको देखते ही नहीं, पर योगी दिनको भी देखता है और रातको भी—यह दोनोंमें फर्क है। उदाहरणार्थ बालकने केवल बालकपना ही देखा है, जवानी नहीं, पर वृद्ध पुरुषने वृद्धावस्थाके साथ-साथ बालकपना भी देखा है और जवानी भी! रुपये रखनेवाला व्यक्ति रुपयोंके त्यागको नहीं जानता, पर रुपयोंका त्याग करनेवाला रुपयोंके संग्रहको भी जानता है और त्यागको भी जानता है। यह सिद्धान्त है कि संसारमें लगा हुआ मनुष्य संसारको नहीं जान सकता। संसारसे अलग होकर ही वह संसारको जान सकता है; क्योंकि वास्तवमें वह संसारसे अलग है। इसी तरह परमात्माके साथ एक होकर ही मनुष्य परमात्माको जान सकता है; क्योंकि वास्तवमें वह परमात्माके साथ एक है।

जो ‘है’ में स्थित है, वह ‘है’ और ‘नहीं’—दोनोंको जानता है, पर जो ‘नहीं’ में स्थित है, वह ‘नहीं’ को भी यथार्थरूपसे अर्थात् ‘नहीं’-रूपसे नहीं जान सकता, फिर वह ‘है’ को कैसे जानेगा ? नहीं जान सकता। उसमें जानेकी सामर्थ्य ही नहीं है। ‘है’ को जाननेवालेका तो ‘नहीं’ को माननेवालेके साथ विरोध नहीं होता, पर ‘नहीं’ को माननेवालेका ‘है’ को जाननेवालेके साथ विरोध होता है।

सम्बन्ध—मननशील संयमी मनुष्यको संसार रातकी तरह दीखता है। इसपर यह प्रश्न उठता है कि क्या वह सांसारिक पदार्थोंके सम्पर्कमें आता ही नहीं? अगर नहीं आता तो उसका जीवन-निर्वाह कैसे होता है? और अगर आता है तो उसकी स्थिति कैसे रहती है? इन बातोंका विवेचन करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्भूत।

तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ७० ॥

यद्भूत= जैसेअचलप्रतिष्ठम्= (समुद्र अपनी मर्यादामें) अचल स्थित रहता है,ही)प्रविशन्ति= प्राप्त होते हैं,
आपः= (सम्पूर्ण नदियोंका) जलतद्वत्= ऐसे हीसः= वही मनुष्य
आपूर्यमाणम्= चारों ओरसे जलद्वारासर्वे= सम्पूर्णशान्तिम्= परमशान्तिको
परिपूर्णकामाः= भोग-पदार्थआप्नोति= प्राप्त होता है,
समुद्रम्= समुद्रमेंयम्= जिस संयमीकामकामी= भोगोंकी कामनावाला
प्रविशन्ति= आकर मिलता है, (पर)मनुष्यको (विकार उत्पन्न किये बिना= नहीं।

व्याख्या—‘आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्भूत’ —वर्षाकालमें नदियों और नदोंका जल बहुत बढ़ जाता है, कई नदियोंमें बाढ़ आ जाती है; परन्तु जब वह जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है, तब समुद्र बढ़ता नहीं, अपनी मर्यादामें ही रहता है। परन्तु जब गरमीके दिनोंमें नदियों और नदोंका जल बहुत कम हो जाता है, तब समुद्र घटता नहीं। तात्पर्य है कि नदी-नदोंका जल ज्यादा आनेसे अथवा कम आनेसे या न

आनेसे तथा बड़वानल (जलमें पैदा होनेवाली अग्नि) और सूर्यके द्वारा जलका शोषण होनेसे समुद्रमें कोई फर्क नहीं पड़ता, वह बढ़ता-घटता नहीं। उसको नदी-नदोंके जलकी अपेक्षा नहीं रहती। वह तो सदा-सर्वदा ज्यों-का-त्यों ही परिपूर्ण रहता है और अपनी मर्यादाका कभी त्याग नहीं करता।

‘तद्वत्कामा’* यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्ति-माप्नोति’—ऐसे ही संसारके सम्पूर्ण भोग उस परमात्म-

  • यहाँ ‘कामाः’ पद कामनाओंका वाचक नहीं है, प्रत्युत जिन पदार्थोंकी कामना की जाती है, उन भोग-पदार्थोंका वाचक है।

१६०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

तत्त्वको जाननेवाले संयमी मनुष्यको प्राप्त होते हैं, उसके सामने आते हैं, पर वे उसके कहे जानेवाले शरीर और अन्तःकरणमें सुख-दुःखरूप विकार पैदा नहीं कर सकते। अतः वह परमात्मतत्त्वके कारणसे है, भोग-पदार्थोंके कारणसे नहीं (गीता—दूसरे अध्यायका छियालीसवाँ श्लोक)।

यहाँ जो समुद्र और नदियोंके जलका दृष्टान्त दिया गया है, वह स्थितप्रज्ञ संयमी मनुष्यके विषयमें पूरा नहीं घटता। कारण कि समुद्र और नदियोंके जलमें तो सजातीयता है अर्थात् जो जल समुद्रमें भरा हुआ है, उसी जातिका जल नद-नदियोंसे आता है और नद-नदियोंसे जो जल आता है, उसी जातिका जल समुद्रमें भरा हुआ है। परन्तु स्थितप्रज्ञ और सांसारिक भोग-पदार्थोंमें इतना फर्क है कि इसको समझानेके लिये रात-दिन, आकाश-पातालका दृष्टान्त भी नहीं बैठ सकता! कारण कि स्थितप्रज्ञ मनुष्य जिस तत्त्वमें स्थित है, वह तत्त्व चेतन है, नित्य है, सत्य

परिशिष्ट भाव —अपनी कामनाके कारण ही यह संसार जड़ दीखता है, वास्तवमें तो यह चिन्मय परमात्मा ही है—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९), ‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९)। अतः जब मनुष्य कामनारहित हो जाता है, तब उससे सभी वस्तुएँ प्रसन्न हो जाती हैं। वस्तुओंके प्रसन्न होनेकी पहचान यह है कि उस निष्काम महापुरुषके पास आवश्यक वस्तुएँ अपने-आप आने लगती हैं। उसके पास आकर सफल होनेके लिये वस्तुएँ लालायित रहती हैं। परन्तु कामना न रहनेके कारण वस्तुओंके प्राप्त होनेपर अथवा न होनेपर भी उसके भीतर कोई विकार (हर्ष आदि) उत्पन्न नहीं होता। उसकी दृष्टिमें वस्तुओंका कोई मूल्य (महत्त्व) है ही नहीं। इसके विपरीत कामनावाले मनुष्यको वस्तुएँ प्राप्त हों अथवा न हों, उसके भीतर सदा अशान्ति बनी रहती है।

सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकमें ‘स्थितप्रज्ञ कैसे चलता है?’ इस प्रश्नके उत्तरका उपसंहार करते हैं।

विहाय कामान्यः सर्वाण्युमांश्चरति निःस्पृहः ।

निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥ ७१ ॥

यः= जोविहाय= त्याग करकेचरति= आचरण करता है,
पुमान्= मनुष्यनिःस्पृहः= स्पृहारहित,सः= वह
सर्वाण्= सम्पूर्णनिर्ममः= ममतरहित (और)शान्तिम्= शान्तिको
कामान्= कामनाओंकानिरहङ्कारः= अहंतरहित होकरअधिगच्छति= प्राप्त होता है।

व्याख्या —‘विहाय कामान्यः सर्वाण्युमांश्चरति निःस्पृहः’—अप्राप्त वस्तुकी इच्छाका नाम ‘कामना’ है। स्थितप्रज्ञ महापुरुष सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग कर देता है। कामनाओंका त्याग कर देनेपर भी शरीरके निर्वाहमात्रके लिये देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदिकी जो आवश्यकता दीखती है अर्थात् जीवन-निर्वाहके लिये प्राप्त और अप्राप्त वस्तु आदिकी जो जरूरत दीखती है, उसका

है, असीम है, अनन्त है और सांसारिक भोग-पदार्थ जड़ हैं, अनित्य हैं, असत् हैं, सीमित हैं, अन्तवाले हैं।

दूसरा अन्तर यह है कि समुद्रमें तो नदियोंका जल पहुँचता है, पर स्थितप्रज्ञ जिस तत्त्वमें स्थित है, वहाँ से सांसारिक भोग-पदार्थ पहुँचते ही नहीं, प्रत्युत केवल उसके कहे जानेवाले शरीर अन्तःकरणतक ही पहुँचते हैं। अतः समुद्रका दृष्टान्त केवल उसके कहे जानेवाले शरीर और अन्तःकरणकी स्थितिको बतानेके लिये ही दिया गया है। उसके वास्तविक स्वरूपको बतानेवाला कोई दृष्टान्त नहीं है।

‘न कामकामी’—जिनके मनमें भोग-पदार्थकी कामना है, जो पदार्थोंको ही महत्त्व देते हैं, जिनकी दृष्टि पदार्थोंकी तरफ ही है, उनको कितने ही सांसारिक भोगपदार्थ मिल जायें, तो भी उनकी तृप्ति नहीं हो सकती; उनकी कामना, जलन, सन्ताप नहीं मिट सकते; तो फिर उनको शान्ति कैसे मिल सकती है? कारण कि चेतन स्वरूपकी तृप्ति जड़ पदार्थोंसे हो ही नहीं सकती।

नाम ‘स्पृह’ है। स्थितप्रज्ञ पुरुष इस स्पृहाका भी त्याग कर देता है। कारण कि जिसके लिये शरीर मिला था और जिसकी आवश्यकता थी, उस तत्त्वकी प्राप्ति हो गयी, वह आवश्यकता पूरी हो गयी। अब शरीर रहे चाहे न रहे, शरीर-निर्वाह हो चाहे न हो—इस तरफ वह बेपरवाह रहता है। यही उसका निःस्पृह होना है।

निःस्पृह होनेका अर्थ यह नहीं है कि वह निर्वाहकी

श्लोक ७१ ] * साधक-संजीवनी * १६१

वस्तुओंका सेवन करता ही नहीं। वह निर्वाहकी वस्तुओंका

सेवन भी करता है, पथ्य-कुपथ्यका भी ध्यान रखता है

अर्थात् पहले साधनास्थामें शरीर आदिके साथ जैसा

व्यवहार करता था, वैसा ही व्यवहार अब भी करता है;

परन्तु शरीर बना रहे तो अच्छा है, जीवन-निर्वाहकी वस्तुएँ

मिलती रहें तो अच्छा है—ऐसी उसके भीतर कोई परवाह

नहीं होती।

इसी अध्यायके पचपनवें श्लोकमें 'प्रजहाति यदा

कामान्सर्वान्' पदोंसे कामना-त्यागकी जो बात कही थी,

वही बात यहाँ 'विहाय कामान्यः सर्वान्' पदोंसे कही है।

इसका तात्पर्य है कि कर्मयोगमें सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग

किये बिना कोई स्थितप्रज्ञ नहीं हो सकता; क्योंकि

कामनाओंके कारण ही संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ा हुआ

है। कामनाओंका सर्वथा त्याग करनेपर संसारके साथ

सम्बन्ध रह ही नहीं सकता।

'निर्ममः'—स्थितप्रज्ञ महापुरुष ममताका सर्वथा त्याग

कर देता है। मनुष्य जिन वस्तुओंको अपनी मानता है, वे

वास्तवमें अपनी नहीं हैं, प्रत्युत संसारसे मिली हुई हैं। मिली

हुई वस्तुको अपनी मानना भूल है। यह भूल मिट जानेपर

स्थितप्रज्ञ वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, शरीर, इन्द्रियाँ आदिमें

ममतारहित हो जाता है।

'निरहङ्कारः'—यह शरीर मैं ही हूँ—इस तरह शरीरसे

तादात्म्य मानना अहंकार है। स्थितप्रज्ञमें यह अहंकार नहीं

रहता। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सभी किसी

प्रकाशमें दीखते हैं और जो 'मैं'-पन है, उसका भी किसी

प्रकाशमें भान होता है। अतः प्रकाशकी दृष्टिसे शरीर,

इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंता ('मैं'-पन)—ये सभी दृश्य हैं।

द्रष्टा दृश्यसे अलग होता है—यह नियम है। ऐसा अनुभव

हो जानेसे स्थितप्रज्ञ निरहंकार हो जाता है।

'स शान्तिमधिगच्छति'—स्थितप्रज्ञ शान्तिको प्राप्त

होता है। कामना, स्पृहा, ममता और अहंतासे रहित होनेपर

शान्ति आकर प्राप्त होती है—ऐसी बात नहीं है, प्रत्युत

शान्ति तो मनुष्यमात्रमें स्वतःसिद्ध है। केवल उत्पन्न एवं

नष्ट होनेवाली वस्तुओंसे सुख भोगनेकी कामना करनेसे,

उनसे ममताका सम्बन्ध रखनेसे ही अशान्ति होती है। जब

संसारकी कामना, स्पृहा, ममता और अहंता सर्वथा छूट

जाती है, तब स्वतःसिद्ध शान्तिका अनुभव हो जाता है।

इस श्लोकमें कामना, स्पृहा, ममता और अहंता—इन

चारोंमें अहंता ही मुख्य है। कारण कि एक अहंताके

निषेधसे सबका निषेध हो जाता है अर्थात् यदि 'मैं'-पन

ही नहीं रहेगा, तो फिर 'मेरा'-पन कैसे रहेगा और कामना

भी कौन करेगा और किसलिये करेगा?

जब 'निरहङ्कारः' कहनेमात्रसे कामना आदिका त्याग

उसके अन्तर्गत आ जाता था, तो फिर कामना आदिके

त्यागका वर्णन क्यों किया? इसका उत्तर यह है कि कामना,

स्पृहा, ममता और अहंता—इन चारोंमें कामना स्थूल है।

कामनासे सूक्ष्म स्पृहा, स्पृहासे सूक्ष्म ममता और ममतासे

सूक्ष्म अहंता है। अतः साधक पहले कामना, स्पृहा और

ममताका त्याग कर दे तो अहंताका त्याग करना उसके लिये

सुगम हो जायगा।

शास्त्रीय दृष्टिसे पहले कामनाका त्याग, फिर स्पृहा,

ममता और अहंकारका त्याग बताया जाता है। परन्तु

साधककी दृष्टिसे पहले ममताका त्याग, फिर कामना,

स्पृहा और अहंकारका त्याग करना ही ठीक है। ममता

प्राप्त वस्तुकी और कामना अप्राप्त वस्तुकी होती है। सबसे

पहले ममताका त्याग करना सुगम पड़ता है। मनुष्य पहले

ममतासे अर्थात् प्राप्त वस्तुके सम्बन्धसे ही फँसता है। पहले

ममताका त्याग करनेसे निष्काम होनेकी सामर्थ्य आ जाती

है, कामनाका त्याग करनेसे निःस्पृह होनेकी सामर्थ्य आ

जाती है और स्पृहाका त्याग करनेसे निरहंकार होनेकी

सामर्थ्य आ जाती है। शास्त्रीय दृष्टिके अनुसार चलनेसे

मनुष्य पण्डित हो जाता है और साधककी दृष्टिके अनुसार

चलनेसे मनुष्यको अनुभव हो जाता है।

अहंता-ममतासे रहित होनेका उपाय

कर्मयोगकी दृष्टिसे—'मेरा कुछ नहीं है'; क्योंकि मेरा

किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना, अवस्था आदिपर

स्वतन्त्र अधिकार नहीं है। जब मेरा कुछ नहीं है तो 'मेरेको

कुछ नहीं चाहिये'; क्योंकि अगर शरीर मेरा है तो मेरेको

अन्न, जल, वस्त्र आदिकी आवश्यकता है, पर जब शरीर

मेरा है ही नहीं, तो मेरेको किसीकी कुछ भी आवश्यकता

नहीं है। जब मेरा कुछ नहीं और मेरेको कुछ नहीं चाहिये,

तो फिर 'मैं' क्या रहा? क्योंकि 'मैं' तो किसी वस्तु,

शरीर, स्थिति आदिको पकड़नेसे ही होता है।

मेरे कहलानेवाले शरीर आदिका संसारके साथ

सर्वथा अभिन्न सम्बन्ध है। इसलिये अपने कहलानेवाले शरीर

आदिसे जो कुछ करना है, वह सब केवल संसारके हितके

लिये ही करना है; क्योंकि मेरेको कुछ चाहिये ही नहीं। ऐसा

भाव होनेपर 'मैं'-का एकदेशीयपना आप-से-आप मिट

१६२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

जाता है और कर्मयोगी अहंता-ममतासे रहित हो जाता है।

सांख्ययोगकी दृष्टिसे —प्राणिमात्रको 'मैं हूँ' इस प्रकार अपने स्वरूपकी स्वतःसिद्ध सत्ता-(होनापन-) का ज्ञान रहता है। इसमें 'मैं' तो प्रकृतिका अंश है और 'हूँ' सत्ता है। यह 'हूँ' वास्तवमें 'मैं' को लेकर है। अगर 'मैं' न रहे, तो 'हूँ' नहीं रहेगा, प्रत्युत 'है' रहेगा।

'मैं हूँ', 'तू है', 'यह है' और 'वह है'—ये चारों व्यक्ति और देश-कालको लेकर हैं। अगर इन चारोंको अर्थात् व्यक्ति और देश-कालको न पकड़ें तो केवल 'है' ही रहेगा—'है' में ही स्थिति रहेगी। 'है' में स्थिति होनेसे

परिशिष्ट भाव —पहले 'सोऽमृतत्वाय कल्पते' (२।१५) कहकर ज्ञानयोगकी सिद्धि (पूर्णता) बतायी थी, अब 'स शान्तिमधिगच्छति' कहकर कर्मयोगकी सिद्धि बताते हैं। तात्पर्य है कि चिन्मयता (स्वरूप) में स्थिति होनेसे अमृतकी प्राप्ति होती है और जड़ता (अहंता) के त्यागसे शान्तिकी प्राप्ति होती है।

अहंता अपने स्वरूपमें मानी हुई है, वास्तवमें है नहीं। अगर यह वास्तवमें होती तो हम कभी निरहंकार नहीं हो सकते थे और भगवान् भी निरहंकार होनेकी बात नहीं कहते। परन्तु भगवान् 'निरहङ्कारः' कहते हैं, अतः हम अहंकाररहित हो सकते हैं। हमारा अनुभव भी है कि वास्तवमें स्वरूप अहंकाररहित है। सुषुप्तिके समय अहम्के अभावका और स्वयं (अपनी सत्ता) के भावका अनुभव सबको होता है, जिसका स्पष्ट बोध जगनेपर होता है। सुषुप्तिमें अहम् अविद्यामें लीन हो जाता है, पर स्वयं रहता है। इसलिये सुषुप्तिसे जगनेपर (उसकी स्मृतिसे) हम कहते हैं कि 'मैं ऐसे सुखसे सोया कि मेरेको कुछ पता नहीं था।' इस स्मृतिसे सिद्ध होता है कि सुखका अनुभव करनेवाला और 'कुछ पता नहीं था' यह कहनेवाला तो था ही! नहीं तो सुखका अनुभव किसको हुआ और 'कुछ पता नहीं था'—यह बात किसने जानी? अतः 'कुछ पता नहीं था'—यह अहम्का अभाव है और इसका ज्ञान जिसको है, वह अहंरहित स्वरूप है।

एक स्त्रीकी नथ कुर्पमें गिर गयी। उसको निकालनेके लिये एक आदमी कुर्पमें उतरा और जलके भीतर जाकर उस नथको ढूँढने लगा। ढूँढते-ढूँढते वह नथ उसके हाथ लग गयी तो उसको बड़ी प्रसन्नता हुई। परन्तु उस समय वह कुछ बोल नहीं सका; क्योंकि वाणी (अग्नि) और जलका आपसमें विरोध है। अतः जलसे बाहर आनेपर ही वह बोल सका कि 'नथ मिल गयी।' ऐसे ही सुषुप्तिमें अहम्के लीन होनेपर मनुष्य सुखका अनुभव तो करता है, पर उसको व्यक्त नहीं कर सकता; क्योंकि बोलनेका साधन नहीं रहा। सुषुप्तिसे जगनेपर ही उसको सुषुप्तिके सुखकी स्मृति होती है। स्मृति अनुभवजन्य होती है—'अनुभवजन्य ज्ञानं स्मृतिः'।

इस प्रकार सुषुप्तिमें अहम्के अभावका अनुभव तो सबको होता है, पर अपने अभावका अनुभव किसीको कभी नहीं होता। अहंकार हमारे बिना नहीं रह सकता, पर हम (स्वयं) अहंकारके बिना रह सकते हैं और रहते ही हैं। हमारा स्वरूप चिन्मय सत्तामात्र है। इस नित्य सत्ताको किसीकी अपेक्षा नहीं है, पर सत्ताकी अपेक्षा सबको है। अगर हम अहम्से अलग न होते, अहंकाररूप ही होते तो सुषुप्तिमें अहंकारके लीन होनेपर हम भी नहीं रहते। अतः अहंकारके बिना भी हमारा होनापन सिद्ध होता है। जाग्रत् और स्वप्नमें अहम् प्रकट रहता है और सुषुप्तिमें अहम् लीन हो जाता है, पर हम स्वयं निरन्तर रहते हैं। जो प्रकट और लीन नहीं होता, वही हमारा स्वरूप है।

कामनाका त्याग होनेपर भी शरीरनिर्वाहमात्रके लिये कुछ-न-कुछ वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदिकी आवश्यकता रह जाती है, जिसको 'सृष्टा' कहते हैं। स्थितप्रज्ञ महापुरुषमें शरीरनिर्वाहमात्रकी आवश्यकताका तो कहना ही क्या, शरीरकी भी आवश्यकता नहीं रहती। कारण कि शरीरकी आवश्यकता ही मनुष्यको पराधीन बनाती है। आवश्यकता तभी पैदा होती है, जब मनुष्य उस वस्तुको स्वीकार कर लेता है, जो अपनी नहीं है। कर्मयोगी किसी भी वस्तुको अपनी और अपने लिये नहीं मानता, प्रत्युत संसारकी और संसारके लिये ही मानता है। इसलिये उसको किसी भी वस्तुकी आवश्यकता नहीं रहती।

सांख्ययोगी अहंता-ममतासे रहित हो जाता है।

भक्तियोगकी दृष्टिसे —जिसको 'मैं' और 'मेरा' कहते हैं, वह सब प्रभुका ही है। कारण कि मेरी कहलानेवाली वस्तुपर मेरा किंचिन्मात्र भी अधिकार नहीं है; परन्तु प्रभुका उसपर पूरा अधिकार है। वे जिस तरह वस्तुको रखते हैं, जैसा रखना चाहते हैं वैसा ही होता है। अतः यह सब कुछ प्रभुका ही है। इसको प्रभुकी ही सेवामें लगाना है। मेरे पास जो शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि है, यह भी उन्हींकी है और मैं भी उन्हींका हूँ। ऐसा भाव होनेपर भक्तियोगी अहंता-ममतासे रहित हो जाता है।

श्लोक ७२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१६३

‘कामना’ और ‘स्मृहा’—दोनोंका त्याग करनेका तात्पर्य है कि वस्तुओंकी कामना भी न हो और निर्वाहमात्रकी कामना (शरीरकी आवश्यकता) भी न हो। कारण कि निर्वाहमात्रकी कामना भी सुखभोग ही है। इतना ही नहीं, शान्ति, मुक्ति, तत्त्वज्ञान आदिको प्राप्त करनेकी इच्छा भी कामना है। अतः निष्कामभावमें मुक्तितककी भी कामना नहीं होनी चाहिये।

इस श्लोकमें अपरा प्रकृतिका निषेध है। जीवने अहंकारके कारण अपरा प्रकृति (जगत्) को धारण किया है—‘ययेदं धारयते जगत्’ (गीता ७।५)। अतः निरहंकार होनेपर अपरा प्रकृतिका निषेध (सम्बन्ध-विच्छेद) हो जाता है और जीव जन्म-मरणरूप बन्धनसे मुक्त हो जाता है। सबका त्याग होनेपर भी अहंकार शेष रह जाता है, पर अहंकारका त्याग होनेपर सबका त्याग हो जाता है।

सम्बन्ध—कामना, स्मृहा, ममता और अहंतासे रहित होनेपर उसकी क्या स्थिति होती है—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हुए इस विषयका उपसंहार करते हैं।

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।

स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥

पार्थ= हे पृथानन्दन !कोई)अपि= भी
एषा= यहन, विमुह्यति= मोहित नहींस्थित्वा
ब्राह्मी= ब्राह्मीहोता ।(तो)
स्थितिः= स्थिति है ।अस्याम्= इस स्थितिमेंब्रह्मनिर्वाणम्
एनाम्= इसको(यदि)ब्रह्मकी
प्राप्य= प्राप्त होकर (कभीअन्तकाले= अन्तकालमेंऋच्छति

व्याख्या—‘एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ’— यह ब्राह्मी स्थिति है अर्थात् ब्रह्मको प्राप्त हुए मनुष्यकी स्थिति है। अहंकाररहित होनेसे जब व्यक्तित्व मिट जाता है, तब उसकी स्थिति स्वतः ही ब्रह्ममें होती है। कारण कि संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही व्यक्तित्व था। उस सम्बन्धको सर्वथा छोड़ देनेसे योगीकी अपनी कोई व्यक्तिगत स्थिति नहीं रहती।

अत्यन्त नजदीकका वाचक होनेसे यहाँ ‘एषा’ पद पूर्वश्लोकमें आये ‘विहाय कामान्’, ‘निःस्मृहः’, ‘निर्ममः’ और ‘निरहङ्कारः’ पदोंका लक्ष्य करता है।

भगवान्के मुखसे ‘तेरी बुद्धि जब मोहकलिल और श्रुतिविप्रतिपत्तिसे तर जायगी, तब तू योगको प्राप्त हो जायगा’—ऐसा सुनकर अर्जुनके मनमें यह जिज्ञासा हुई कि वह स्थिति क्या होगी ? इसपर अर्जुनने स्थितप्रज्ञके विषयमें चार प्रश्न किये। उन चारों प्रश्नोंका उत्तर देकर भगवान्ने यहाँ वह स्थिति बतायी कि वह ब्राह्मी स्थिति है। तात्पर्य है कि वह व्यक्तिगत स्थिति नहीं है अर्थात् उसमें व्यक्तित्व

नहीं रहता। वह नित्ययोगकी प्राप्ति है। उसमें एक ही तत्त्व रहता है। इस विषयकी तरफ लक्ष्य करनेके लिये ही यहाँ ‘पार्थ’ सम्बोधन दिया गया है।

‘नैनां प्राप्य विमुह्यति’— जबतक शरीरमें अहंकार रहता है, तभीतक मोहित होनेकी सम्भावना रहती है। परन्तु जब अहंकारका सर्वथा अभाव होकर ब्रह्ममें अपनी स्थितिका अनुभव हो जाता है, तब व्यक्तित्व टूटनेके कारण फिर कभी मोहित होनेकी सम्भावना नहीं रहती।

सत् और असत्को ठीक तरहसे न जानना ही मोह है। तात्पर्य है कि स्वयं सत् होते हुए भी असत्के साथ अपनी एकता मानते रहना ही मोह है। जब साधक असत्को ठीक तरहसे जान लेता है, तब असत्से उसका सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है* और सत्में अपनी वास्तविक स्थितिका अनुभव हो जाता है। इस स्थितिका अनुभव होनेपर फिर कभी मोह नहीं होता (गीता—चौथे अध्यायका पैंतीसवाँ श्लोक)।

‘स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति’— यह मनुष्य-शरीर केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है।

  • असत्को जाननेसे असत्को निवृत्ति हो जाती है; क्योंकि असत्की स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। सत्से ही असत्को सत्ता मिलती है। अगर असत्को जाननेसे असत्की निवृत्ति न हो तो वास्तवमें असत्को जाना ही नहीं है; प्रत्युत सीखा है। सीखे हुए ज्ञानसे असत्की निवृत्ति नहीं होती; क्योंकि मनमें असत्की सत्ता रहती है।

१६४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

इसलिये भगवान् यह मौका देते हैं कि साधारण-से-साधारण और पापी-से-पापी व्यक्ति ही क्यों न हो, अगर वह अन्तकालमें भी अपनी स्थिति परमात्मामें कर ले अर्थात् जड़तासे अपना सम्बन्ध-विच्छेद कर ले, तो उसे भी निर्वाण (शान्त) ब्रह्मकी प्राप्ति हो जायगी, वह जन्म-मरणसे मुक्त हो जायगा। ऐसी ही बात भगवान्ने सातवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें कही है कि 'अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ एक भगवान् ही हैं—ऐसा प्रयाणकालमें भी मेरेको जो जान लेते हैं, वे मेरेको यथार्थरूपसे जान लेते हैं अर्थात् मेरेको प्राप्त हो जाते हैं।' आठवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें कहा कि 'अन्तकालमें मेरा स्मरण करता हुआ कोई प्राण छोड़ता है, वह मेरेको ही प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है।'

दूसरी बात, उपर्युक्त पदोंसे भगवान् उस ब्राह्मी स्थितिकी महिमाका वर्णन करते हैं कि इसमें यदि अन्तकालमें भी कोई स्थित हो जाय, तो वह शान्त ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। जैसे समबुद्धिके विषयमें भगवान्ने कहा था कि इसका थोड़ा-सा भी अनुष्ठान महान् भयसे रक्षा कर लेता है (दूसरे अध्यायका चालीसवाँ श्लोक), ऐसे ही यहाँ कहते हैं कि अन्तकालमें भी ब्राह्मी स्थिति हो जाय, जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाय, तो निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। इस स्थितिका अनुभव होनेमें जड़ताका राग ही बाधक है। यह राग अन्तकालमें भी कोई छोड़ देता है तो उसको अपनी स्वतःसिद्ध वास्तविक स्थितिका अनुभव हो जाता है। यहाँ यह शंका हो सकती है कि जो अनुभव उभ्रभरमें नहीं हुआ, वह अन्तकालमें कैसे होगा? अर्थात् स्वस्थ अवस्थामें तो साधककी बुद्धि स्वस्थ होगी, विचार-शक्ति होगी, सावधानी होगी तो वह ब्राह्मी स्थितिका अनुभव कर लेगा; परन्तु अन्तकालमें प्राण छूटते समय बुद्धि विकल हो जाती है, सावधानी नहीं रहती—ऐसी अवस्थामें ब्राह्मी स्थितिका अनुभव कैसे होगा? इसका समाधान यह है कि मृत्युके समयमें जब प्राण छूटते हैं, तब शरीर आदिसे स्वतः ही सम्बन्ध-विच्छेद होता है। यदि उस समय उस स्वतःसिद्ध तत्त्वकी तरफ लक्ष्य हो जाय, तो उसका अनुभव सुगमतासे हो जाता है। कारण कि निर्विकल्प अवस्थाकी प्राप्तिमें तो बुद्धि, विवेक आदिकी आवश्यकता है, पर अवस्थातीत तत्त्वकी प्राप्तिमें केवल लक्ष्यकी आवश्यकता है।* वह लक्ष्य

चाहे पहलेके अभ्याससे हो जाय, चाहे किसी शुभ संस्कारसे हो जाय, चाहे भगवान् या सन्तकी अहेतुकी कृपासे हो जाय, लक्ष्य होनेपर उसकी प्राप्ति स्वतःसिद्ध है।

यहाँ 'अपि' पदका तात्पर्य है कि अन्तकालसे पहले अर्थात् जीवित-अवस्थामें यह स्थिति प्राप्त कर ले तो वह जीवन्मुक्त हो जाता है; परन्तु अगर अन्तकालमें भी यह स्थिति हो जाय अर्थात् निर्मम-निरहंकार हो जाय तो वह भी मुक्त हो जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि यह स्थिति तत्काल हो जाती है। स्थितिके लिये अभ्यास करने, ध्यान करने, समाधि लगानेकी किंचिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं है।

भगवान्ने यहाँ कर्मयोगके प्रकरणमें 'ब्रह्मनिर्वाणम्' पद दिया है। इसका तात्पर्य है कि जैसे सांख्ययोगीको निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति होती है (गीता—पाँचवें अध्यायके चौबीसवेंसे छठ्ठीसवें श्लोकतक), ऐसे ही कर्मयोगीको भी निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। इसी बातको पाँचवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें कहा है कि सांख्ययोगीद्वारा जो स्थान प्राप्त किया जाता है, वही स्थान कर्मयोगीद्वारा भी प्राप्त किया जाता है।

विशेष बात

जड़ और चेतन—ये दो पदार्थ हैं। प्राणिमात्रका स्वरूप चेतन है, पर उसने जड़का संग किया हुआ है। जड़की तरफ आकर्षण होना पतनकी तरफ जाना है और चिन्मय-तत्त्वकी तरफ आकर्षण होना उत्थानकी तरफ जाना है, अपना कल्याण करना है। जड़की तरफ जानेमें 'मोह' की मुख्यता होती है और परमात्मतत्त्वकी तरफ जानेमें 'विवेक' की मुख्यता होती है।

समझनेकी दृष्टिसे मोह और विवेकके दो-दो विभाग कर सकते हैं—(१) अहंता-ममतायुक्त मोह एवं कामनायुक्त मोह, (२) सत्-असत्का विवेक एवं कर्तव्य-अकर्तव्यका विवेक।

प्राप्त वस्तु, शरीरादिमें अहंता-ममता करना—यह अहंता-ममतायुक्त मोह है और अप्राप्त वस्तु, घटना, परिस्थिति आदिकी कामना करना—यह कामनायुक्त मोह है। शरीरी (शरीरमें रहनेवाला) अलग है और शरीर अलग है, शरीरी सत् है और शरीर असत् है, शरीरी चेतन

  • निर्विकल्प-अवस्थाकी प्राप्तिमें ही अभ्यास, विचार, निदिध्यासन आदि काम करते हैं, पर निर्विकल्प बोध (अवस्थातीत ब्राह्मी स्थिति) की प्राप्तिमें बुद्धि काम नहीं करती। उसमें बुद्धि छूट जाती है। कारण कि निर्विकल्प बोध करण-निरपेक्ष है अर्थात् उसमें करणकी किंचिन्मात्र भी अपेक्षा नहीं है। उसकी प्राप्तिमें करणसे सम्बन्ध-विच्छेद ही कारण है।

श्लोक ७२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१६५

है और शरीर जड़ है—इसको ठीक तरहसे अलग-अलग जानना सत्-असत्का विवेक है और कर्तव्य क्या है, अकर्तव्य क्या है, धर्म क्या है, अधर्म क्या है—इसको ठीक तरहसे समझकर उसके अनुसार कर्तव्य करना और अकर्तव्यका त्याग करना कर्तव्य-अकर्तव्यका विवेक है।

पहले अध्यायमें अर्जुनको भी दो प्रकारका मोह हो गया था, जिसमें प्राणिमात्र फँसे हुए हैं। अहंताको लेकर 'हम दोनोंको जाननेवाले धर्मात्मा हैं' और ममताको लेकर 'ये कुटुम्बी मर जायेंगे'—यह अहंता-ममतायुक्त मोह हुआ। हमें पाप न लगे, कुलके नाशका दोष न लगे, मित्रद्रोहका पाप न लगे, नरकोंमें न जाना पड़े, हमारे पितरोंका पतन न हो—यह कामनायुक्त मोह हुआ।

उपर्युक्त दोनों प्रकारके मोहको दूर करनेके लिये भगवान्ने दूसरे अध्यायमें दो प्रकारका विवेक बताया है—शरीरी-शरीरका, सत्-असत्का विवेक (दूसरे अध्यायके ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक) और कर्तव्य-अकर्तव्यका विवेक (दूसरे अध्यायके इकतीसवेंसे तिरपनवें श्लोकतक)।

शरीरी-शरीरका विवेक बताते हुए भगवान्ने कहा कि मैं, तू और ये राजा लोग पहले नहीं थे—यह बात भी नहीं और आगे नहीं रहेंगे—यह बात भी नहीं अर्थात् हम सभी पहले भी थे और आगे भी रहेंगे तथा ये शरीर पहले

परिशिष्ट भाव —निर्मम और निरहंकार होनेसे साधकका असत्-विभागसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और सत्-विभागमें अर्थात् ब्रह्ममें अपनी स्वतः-स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो जाता है, जिसको 'ब्राह्मी स्थिति' कहते हैं। इस ब्राह्मी स्थितिको प्राप्त होनेपर शरीरका कोई मालिक नहीं रहता अर्थात् शरीरको मैं-मेरा कहनेवाला कोई नहीं रहता, व्यक्ति मिट जाता है। तात्पर्य यह हुआ कि हमारी स्थिति अहंकारके आश्रित नहीं है। अहंकारके मिटनेपर भी हमारी स्थिति रहती है, जो 'ब्राह्मी स्थिति' कहलाती है। एक बार इस ब्राह्मी स्थिति (नित्ययोग) का अनुभव होनेपर फिर कभी मोह नहीं होता (गीता—चौथे अध्यायका पैंतीसवाँ श्लोक)। अगर अन्तकालमें भी मनुष्य निर्मम-निरहंकार होकर ब्राह्मी स्थितिका अनुभव कर ले तो उसको तत्काल निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है।

निर्मम-निरहंकार होनेसे ब्रह्मकी प्राप्ति, तत्त्वज्ञान हो जाता है। फिर मनुष्य ममतारहित, कामनारहित और कर्तृत्वरहित हो जाता है। कारण कि जीवने अहमके कारण ही जगत्को धारण किया है—'अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते' (गीता ३।२७), 'जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्' (गीता ७।५)। यदि वह अहमका त्याग कर दे तो फिर जगत् नहीं रहेगा। ब्रह्मकी प्राप्ति होनेपर (अगर भक्तिके संस्कार हों तो) समग्र परमात्माकी प्राप्ति स्वतः हो जाती है, क्योंकि समग्र परमात्मा ब्रह्मकी प्रतिष्ठा हैं।

मेरा कुछ नहीं है—इसको स्वीकार करनेसे मनुष्य 'निर्मम' हो जाता है, मेरेको कुछ नहीं चाहिये—इसको स्वीकार करनेसे मनुष्य 'निष्काम' हो जाता है। मेरेको अपने लिये कुछ नहीं करना है—इसको स्वीकार करनेसे मनुष्य 'निरहंकार' हो जाता है।

भी नहीं थे और आगे भी नहीं रहेंगे तथा बीचमें भी प्रतिक्षण बदल रहे हैं। जैसे शरीरमें कुमार, युवा और वृद्धावस्था— ये अवस्थाएँ बदलती हैं और जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंको छोड़कर नये वस्त्र धारण करता है, ऐसे ही जीव पहले शरीरको छोड़कर दूसरा शरीर धारण करता है, यह तो अकाट्य नियम है। इसमें चिन्ताकी, शोककी बात ही क्या है ?

कर्तव्य-अकर्तव्यका विवेक बताते हुए भगवान्ने कहा कि क्षत्रियके लिये युद्धसे बढ़कर कोई धर्म नहीं है। अनायास प्राप्त हुआ युद्ध स्वर्गप्राप्तिका खुला दरवाजा है। तू युद्धरूप स्वधर्मका पालन नहीं करेगा तो तुझे पाप लगेगा। यदि तू जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान करके युद्ध करेगा तो तुझे पाप नहीं लगेगा। तेरा तो कर्तव्य-कर्म करनेमें ही अधिकार है, फलमें कभी नहीं। तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और कर्म न करनेमें भी तेरी आसक्ति न हो। इसलिये तू कर्मोंकी सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर और समतामें स्थित होकर कर्मोंको कर; क्योंकि समता ही योग है। जो मनुष्य समबुद्धिसे युक्त होकर कर्म करता है, वह जीवित-अवस्थामें ही पुण्य-पापसे रहित हो जाता है।

जब तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदलको और श्रुतिविप्रति-पत्तिको पार कर जायगी, तब तू योगको प्राप्त हो जायगा।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे साङ्ख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

१६६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ‘सांख्ययोग’ नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ।

कर्मयोग, सांख्ययोग, भक्तियोग आदि सभी साधनोंमें विवेककी बड़ी आवश्यकता है। सांख्ययोगमें इस विवेककी मुख्यता है और सांख्ययोगसे ही भगवान्ने अपना उपदेश आरम्भ किया है; अतः इस अध्यायका नाम ‘सांख्ययोग’ रखा गया है।

दूसरे अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

(१) इस अध्यायमें ‘अथ द्वितीयोऽध्यायः’ के तीन, ‘संजय उवाच’, ‘श्रीभगवानुवाच’ आदि पदोंके चौदह, श्लोकोंके नौ सौ सत्तावन और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग नौ सौ सत्तासी है।

(२) इस अध्यायमें ‘अथ द्वितीयोऽध्यायः’ के सात, ‘संजय उवाच’, ‘श्रीभगवानुवाच’ आदि पदोंके पैतालिस, श्लोकोंके दो हजार चार सौ तीन और पुष्पिकाके पैतालिस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग दो हजार पाँच सौ है। इस अध्यायके बहतर श्लोकोंमेंसे पाँचवाँ, सातवाँ, आठवाँ, बीसवाँ, बाईसवाँ और सत्तरवाँ—ये छः श्लोक चौवालीस अक्षरोंके, छठ श्लोक छियालीस अक्षरोंका और उन्तीसवाँ श्लोक पैतालिस अक्षरोंका है। शेष चौंसठ श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें सात उवाच हैं—दो ‘संजय उवाच’, तीन ‘श्रीभगवानुवाच’ और दो ‘अर्जुन उवाच’।

दूसरे अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायके बहतर श्लोकोंमेंसे पाँचवाँ, छठ, सातवाँ, आठवाँ, बीसवाँ, बाईसवाँ, उन्तीसवाँ और सत्तरवाँ—ये आठ श्लोक ‘उपजाति’ छन्दवाले हैं। दूसरे अध्यायमें बावनवाँ और सड़सठवाँ श्लोकके प्रथम चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘न-विपुला’; बारहवाँ, छब्बीसवाँ और बत्तीसवाँ श्लोकके प्रथम चरणमें तथा इकसठवाँ और तिरसठवाँ श्लोकके तृतीय चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘र-विपुला’; छत्तीसवाँ और छप्पनवाँ श्लोकके प्रथम चरणमें ‘भगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘भ-विपुला’; इकहत्तरवाँ श्लोकके प्रथम चरणमें और इकत्तीसवाँ श्लोकके तृतीय चरणमें ‘मगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘म-विपुला’; छियालीसवाँ श्लोकके प्रथम चरणमें ‘सगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘स-विपुला’; पैतीसवाँ श्लोकके प्रथम और तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘जातिपक्ष-विपुला’ और सैतालीसवाँ श्लोकके प्रथम चरणमें ‘भगण’ तथा तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘संकीर्ण-विपुला’ संज्ञावाले छन्द हैं। शेष उनचास श्लोक ठीक ‘पध्यावक्त्र’ अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

अथ तृतीयोऽध्यायः

अवतरणिका—

श्रीमद्भगवद्गीताका उपदेश मनुष्यमात्रके अनुभवपर आधारित है। इसका दिव्य उपदेश (दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकसे) आरम्भ करनेपर सबसे पहले भगवान् यह स्पष्ट करते हैं कि शरीर और शरीरी एक-दूसरेसे सर्वथा भिन्न हैं। शरीर अनित्य, असत्, एकदेशीय और नाशवान् है तथा शरीरी नित्य, सत्, सर्वव्यापी और अविनाशी है। अतः नाशवान् वस्तुका विनाश देखकर दुःखी नहीं होना और अविनाशी वस्तुको अविनाशिता देखकर उसे बनाये रखनेकी इच्छा नहीं करना 'विवेक' कहा जाता है। कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों ही योगमार्गोंमें विवेककी बड़ी आवश्यकता है। 'मैं शरीरसे सर्वथा भिन्न हूँ'—ऐसा विवेक होनेपर ही मुक्तिकी अभिलाषा जाग्रत् होती है। मुक्तिकी बात तो दूर रही, स्वर्गादिकी प्राप्तिकी कामना भी अपनेको शरीरसे अलग माननेपर ही उत्पन्न होती है। इसीलिये भगवान्ने अपने उपदेशका आरम्भ करते ही सबसे पहले विवेकका ही वर्णन किया है।

गीताका उपर्युक्त विवेक-प्रकरण दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकसे प्रारम्भ होकर तीसवें श्लोकपर समाप्त होता है। विवेकके इस प्रकरणमें भगवान्ने आत्मा, अनात्मा, प्रकृति, पुरुष, ब्रह्म, अविद्या, ईश्वर, जीव, जगत्, माया आदि किसी भी दार्शनिक शब्दका प्रयोग नहीं किया है, प्रत्युत सभी मनुष्य सरलतासे समझ सकें, ऐसे ढंगसे भगवान्ने उसका विवेचन किया है। इसका तात्पर्य यह है कि मात्र मनुष्य परमात्मप्राप्तिके अधिकारी हैं; क्योंकि मनुष्यशरीर परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। अतः उपर्युक्त विवेकको महत्त्व देकर मात्र मनुष्य परमात्मप्राप्ति कर सकते हैं।

इस प्रकरणमें भगवान्ने 'बुद्धि' शब्दका प्रयोग भी नहीं किया है। वास्तवमें नित्य और अनित्य, सत् और असत्, अविनाशी और विनाशी, शरीरी और शरीरको अलग-अलग समझनेके लिये 'विवेक' की ही आवश्यकता है 'बुद्धि' की नहीं। विवेक बुद्धिसे परे है। जैसे प्रकृति और पुरुष अनादि हैं (गीता—तेरहवें अध्यायका उन्नीसवें श्लोक), ऐसे ही उनकी भिन्नताको प्रकट करनेवाला विवेक भी अनादि है। यही विवेक बुद्धिमें प्रकट होता है। यह भगवत्प्रदत्त विवेक मात्र प्राणियोंको नित्यप्राप्त है। पशु-पक्षी भी खाद्य-अखाद्य पदार्थोंकी भिन्नताको जानते हैं। लता-वृक्षमें भी सरदी-गरमी, अनुकूलता-प्रतिकूलताकी भिन्नताका ज्ञान रहता है। बुद्धिप्रधान होनेके कारण मनुष्यको यह विवेक विशेषरूपसे प्राप्त है। पशु-पक्षी आदिमें तो जीवन-निर्वाहमात्रके लिये जड़-पदार्थोंका विवेक रहता है, पर मनुष्य अपने विवेकसे सदाके लिये जन्म-मरणरूप बन्धनसे मुक्त होकर शाश्वत शान्ति प्राप्त कर सकता है। यही मनुष्यके विवेककी विशेषता है।

विवेक जाग्रत् होनेपर अर्थात् शरीर और शरीरीकी भिन्नताका अनुभव होनेपर अपने कहलानेवाले शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसहित संसारका सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, जो कि वास्तवमें है और बुद्धि शुद्ध तथा सम हो जाती है अर्थात् बुद्धिका विषमभाव मिट जाता है।

कर्मयोगमें बुद्धिके एक निश्चयकी प्रधानता है—'व्यवसायात्मिका बुद्धिरुकेह' (गीता २।४१)*। मनुष्यका जब अपने कल्याण अथवा परमात्मप्राप्तिका ही एक निश्चय हो जाता है, तब उसे अनुकूलता और प्रतिकूलता बाधा नहीं पहुँचाती और इस प्रकार बिना कुछ किये ही उसकी बुद्धि स्वतः सम होने लगती है। बुद्धिको सम करनेके लिये तभीतक कहा जाता है, जबतक बुद्धिमें संसारका महत्त्व, आकर्षण, खिंचाव रहता है। एक निश्चयात्मिका बुद्धि हो

  • सांख्ययोगमें विवेककी, भक्तियोगमें श्रद्धा-विश्वासकी एवं कर्मयोगमें निश्चयात्मिका बुद्धिकी प्रधानता रहती है। कर्मयोगमें विवेक तथा श्रद्धा-विश्वास न होते हैं—ऐसा नहीं है, पर मुख्यता एक निश्चयात्मिका बुद्धिकी रहती है। ऐसे ही सांख्ययोग एवं भक्तियोगमें भी एक निश्चयात्मिका बुद्धि रहती है।

१६८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ३ ]

जानेपर संसारका महत्त्व, आकर्षण, खिंचाव स्वतः मिटने लग जाता है। ऐसी निश्चयात्मिका बुद्धि होनेमें भोग और संग्रहकी आसक्तिको महान् बाधक बताया गया है (गीता—दूसरे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक)।

इस तरह कर्मयोगमें निश्चयात्मिका बुद्धिकी अत्यन्त आवश्यकता बतानेके बाद भगवान् अर्जुनको समभावपूर्वक कर्तव्यकर्म करनेके लिये विशेषरूपसे कहते हैं; जैसे—‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ (२। ४७), ‘योगस्थः कुरु कर्माणि’ (२। ४८) ‘तेरा कर्म करनेमें ही अधिकार है’, ‘समतामें स्थित हुआ तू कर्मोंको कर’। इसके साथ यह भी कहते हैं कि ‘दूरेण ह्यवर्ं कर्म बुद्धियोगात्’ (२। ४९) ‘बुद्धियोग-(समता-) से सकामकर्म अत्यन्त तुच्छ है’, आगे कहते हैं—‘बुद्धौ शरणमन्विच्छ’ (२। ४९), ‘बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥’ (२। ५०) ‘तू समबुद्धिका आश्रय ग्रहण कर’ ‘समतापूर्वक कर्म करनेवाला पुरुष पाप और पुण्य—दोनोंका यहाँ जीवित-अवस्थामें ही त्याग कर देता है, इसलिये तू समताकी प्राप्तिके लिये ही प्रयत्न कर; क्योंकि समता ही कर्मोंमें चतुरता है।’

अर्जुनके मनमें युद्ध न करनेका आग्रह पहलेसे ही था। पहले अध्यायके इकतीसवाँ श्लोकमें अर्जुन कहते हैं—‘युद्धमें अपने कुलको मारकर मैं अपना हित नहीं देखता’—‘न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे।’ फिर पैतालीसवाँ श्लोकमें वे कहते हैं—‘अहो! शोक है कि हमलोग बुद्धिमान् होकर भी युद्धरूप महान् पाप करनेको तैयार हो गये हैं’—‘अहो बत महत्यापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।’ आगे दूसरे अध्यायके पाँचवाँ श्लोकमें अर्जुन कहते हैं—‘मैं भिक्षाका अन्न खाना श्रेष्ठ समझता हूँ, पर युद्ध करना नहीं’—‘श्रेयो भोक्तुं श्वेक्ष्यमपीह लोके’ और नवाँ श्लोकमें तो भगवान्की आज्ञा ‘उत्तिष्ठ परन्तप’ (२। ३) के विरुद्ध अपना निर्णय ही सुना देते हैं कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’—‘न योत्ये’ (गीता २। ९)।

यह नियम है कि अपना आग्रह रखनेसे श्रोता वक्ताकी बातोंका आशय अच्छी तरहसे नहीं समझ सकता। यही कारण है कि अपना (युद्ध न करनेका) आग्रह रखनेसे अर्जुन भी उपर्युक्त प्रकरणमें भगवान्के वचनोंका आशय अच्छी तरहसे नहीं समझ सके। अतः अर्जुनको भगवान्के वचन मिले हुए—से जान पड़ने लगे। इसलिये भगवान्का अभिप्राय क्या है ? वे मेरे कल्याणके लिये कौन-सा साधन श्रेष्ठ समझते हैं— इसका खुलासा करानेके लिये अर्जुन आगेके दो श्लोकोंमें भगवान्से प्रश्न करते हैं।

अर्जुन उवाच

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं कर्माणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥ व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे। तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाजुयाम् ॥ २ ॥

अर्जुन बोले—

जनार्दन= हे जनार्दन!तत्= तो फिरव्यामिश्रेण, इव = (आप अपने)
चेत्= अगरकेशव= हे केशव!मिले हुए—से
ते= आपमाम्= मुझेवाक्येन = वचनोंसे
कर्मणः= कर्मसेघोरे= घोरमे = मेरी
बुद्धिः= बुद्धि (ज्ञान) कोकर्माणि= कर्ममेंबुद्धिम् = बुद्धिको
ज्यायसी= श्रेष्ठकिम्= क्योंमोहयसि, इव = मोहित-सी कर
मता= मानते हैं,नियोजयसि= लगाते हैं ?रहे हैं।

श्लोक १-२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१६१

(अतः आप)

एकम्

= एक बातको

अहम्

= मैं

निश्चित्य

= निश्चय करके

वद

= कहिये,

श्रेयः

= कल्याणको

तत्

= उस

येन

= जिससे

आप्नुयाम्

= प्राप्त हो जाऊँ।

व्याख्या—'जनार्दन'—इस पदसे अर्जुन मानो यह भाव

प्रकट करते हैं कि हे श्रीकृष्ण ! आप सभीकी याचना पूरी

करनेवाले हैं; अतः मेरी याचना तो अवश्य ही पूरी करेंगे।

'ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते ............ नियोजयसि केशव'—

मनुष्यके अन्तःकरणमें एक कमजोरी रहती है कि वह प्रश्न

करके उत्तरके रूपमें भी वक्तासे अपनी बात अथवा

सिद्धान्तका ही समर्थन चाहता है। इसे कमजोरी इसलिये

कहा गया है कि वक्ताके निर्देशका चाहे वह मनोऽनुकूल

हो या सर्वथा प्रतिकूल, पालन करनेका निश्चय ही

शूरवीरता है, शेष सब कमजोरी या कायरता ही कही

जायगी। इस कमजोरीके कारण ही मनुष्यको प्रतिकूलता

सहनेमें कठिनाईका अनुभव होता है। जब वह प्रतिकूलताको

सह नहीं सकता, तब वह अच्छाईका चोला पहन लेता है

अर्थात् तब भलाईके वेशमें बुराई आती है। जो बुराई

भलाईके वेशमें आती है, उसका त्याग करना बड़ा कठिन

होता है। यहाँ अर्जुनमें भी हिंसा-त्यागरूप भलाईके वेशमें

कर्तव्य-त्यागरूप बुराई आयी है। अतः वे कर्तव्य-कर्मसे

ज्ञानको श्रेष्ठ मान रहे हैं। इसी कारण वे यहाँ प्रश्न करते

हैं कि यदि आप कर्मसे ज्ञानको श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर

मुझे युद्धरूप घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं?

भगवान्‌ने दूसरे अध्यायके उनतालीसवें श्लोकमें 'बुद्धियोगे'

पदसे समबुद्धि-(समता-) की ही बात कही थी; परन्तु

अर्जुनने उसको ज्ञान समझ लिया। अतः वे भगवान्‌से कहते

हैं कि हे जनार्दन ! आपने पहले कहा कि 'मैंने सांख्यमें

यह बुद्धि कह दी, इसीको तुम योगके विषयमें सुनो। इस

बुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मबन्धनको छोड़ देगा।' परन्तु

कर्मबन्धन तभी छूटेगा, जब ज्ञान होगा। आपने यह भी कह

दिया कि 'बुद्धियोग अर्थात् ज्ञानसे कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं'

(दूसरे अध्यायका उनचासवाँ श्लोक)। अगर आपकी

मान्यतामें कर्मसे ज्ञान श्रेष्ठ है, उत्तम है, तो फिर मेरेको

शास्त्रविहित यज्ञ, दान, तप आदि शुभ कर्मोंमें भी नहीं

लगाना चाहिये, केवल ज्ञानमें ही लगाना चाहिये। परन्तु

इसके विपरीत आप मेरेको युद्ध-जैसे अत्यन्त क्रूर कर्ममें,

जिसमें दिनभर मनुष्योंकी हत्या करनी पड़े, क्यों लगा रहे हैं?

पहले अर्जुनके मनमें युद्ध करनेका जोश आया हुआ

था और उन्होंने उसी जोशमें भरकर भगवान्‌से कहा कि

'हे अच्युत ! दोनों सेनाओंके बीचमें मेरे रथको खड़ा कर

दीजिये, जिससे मैं यह देख लूँ कि यहाँ मेरे साथ दो हाथ

करनेवाला कौन है।' परन्तु भगवान्‌ने जब दोनों सेनाओंके

बीचमें भीष्म और द्रोणके सामने तथा राजाओंके सामने रथ

खड़ा करके कहा कि 'तू इन कुरुवंशियोंको देख', तब

अर्जुनका कौटुम्बिक मोह जाग्रत् हो गया। मोह जाग्रत्

होनेसे उनकी वृत्ति युद्धसे, कर्मसे उपरत होकर ज्ञानकी

तरफ हो गयी; क्योंकि ज्ञानमें युद्ध-जैसे घोर कर्म नहीं

करने पड़ते। अतः अर्जुन कहते हैं कि आप मेरेको घोर

कर्ममें क्यों लगाते हैं?

यहाँ 'बुद्धिः' पदका अर्थ 'ज्ञान' लिया गया है। अगर

यहाँ 'बुद्धिः' पदका अर्थ 'समबुद्धि' (समता) लिया जाय

तो व्यामिश्र वचन सिद्ध नहीं होगा। कारण कि दूसरे अध्यायके

अड़तालीसवें श्लोकमें भगवान्‌ने अर्जुनको योग-(समता-)

में स्थित होकर कर्म करनेकी आज्ञा दी है। व्यामिश्र वचन

तभी सिद्ध होगा, जब अर्जुनकी मान्यतामें दो बातें हों और

तभी यह प्रश्न बनेगा कि अगर आपकी मान्यतामें कर्मसे

ज्ञान श्रेष्ठ है, तो फिर मेरेको घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं?

दूसरी बात, भगवान्‌ने आगे अर्जुनके प्रश्नके उत्तरमें दो

निष्ठाएँ कही हैं—ज्ञानियोंकी निष्ठा ज्ञानयोगसे और

योगियोंकी निष्ठा कर्मयोगसे। इससे भी अर्जुनके प्रश्नोंमें

'बुद्धिः' पदका अर्थ 'ज्ञान' लेना युक्तिसंगत बैठता है।

कोई भी साधक श्रद्धापूर्वक पूछनेपर ही अपने प्रश्नका

सही उत्तर प्राप्त कर सकता है। आक्षेपपूर्वक शंका करनेसे

सही उत्तर प्राप्त कर पाना सम्भव नहीं। अर्जुनकी

भगवान्‌पर पूर्ण श्रद्धा है; अतः भगवान्‌के कहनेपर अर्जुन

अपने कल्याणके लिये युद्ध-जैसे घोर कर्ममें भी प्रवृत्त हो

सकते हैं—ऐसा भाव उपर्युक्त प्रश्नसे प्रकट होता है।

'व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे'—इन

पदोंमें अर्जुनका भाव है कि कभी तो आप कहते हैं कि कर्म

करो 'कुरु कर्माणि' (२। ४८) और कभी आप कहते हैं

कि ज्ञानका आश्रय लो—'बुद्धौ शरणमन्विच्छ' (२। ४९)।

आपके इन मिले हुए वचनोंसे मेरी बुद्धि मोहित-सी हो रही

है अर्थात् मैं यह स्पष्ट नहीं समझ पा रहा हूँ कि मेरेको कर्म

करने चाहिये या ज्ञानकी शरण लेनी चाहिये।

यहाँ दो बार 'इव' पदके प्रयोगसे भगवान्‌पर अर्जुनकी

१७०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ३ ]

श्रद्धाका द्योतन हो रहा है। श्रद्धाके कारण अर्जुन भगवान् के वचनोंको ठीक मान रहे हैं और यह भी समझ रहे हैं कि भगवान् मेरी बुद्धिको मोहित नहीं कर रहे हैं। परन्तु भगवान् के वचनोंको ठीक-ठीक न समझनेके कारण अर्जुनको भगवान् के वचन मिले हुए-से लग रहे हैं और उनको ऐसा दीख रहा है कि भगवान् अपने वचनोंसे मेरी बुद्धिको मोहित-सी कर रहे हैं। अगर भगवान् अर्जुनकी बुद्धिको मोहित करते तो फिर अर्जुनके मोहको दूर करता।

परिशिष्ट भाव —जबतक संसारकी सत्ता मानते हैं, तभीतक कर्म घोर या सौम्य दीखता है। कारण कि संसारकी सत्ता माननेसे कर्मकी तरफ दृष्टि रहती है, अपने कर्तव्यकी तरफ नहीं। अपने कर्तव्यकी तरफ दृष्टि रहनेसे कर्म घोर या सौम्य नहीं दीखता।

सम्बन्ध—अब आगेके तीन (तीसरे, चौथे और पाँचवें) श्लोकोंमें भगवान् अर्जुनके ‘व्यामिश्रेणैव वाक्येन’ (मिले हुए-से वचनों) पदोंका उत्तर देते हैं।

श्रीभगवानुवाच

लोकेऽस्मिन्द्रिविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥

श्रीभगवान् बोले—

अनघ= हे निष्पाप अर्जुन !निष्ठा= निष्ठासाङ्ख्यानाम्= ज्ञानियोंकी (निष्ठा)
अस्मिन्= इसमया= मेरे द्वाराज्ञानयोगेन= ज्ञानयोगसे (और)
लोके= मनुष्यलोकमेंपुरा= पहलेयोगिनाम्= योगियोंकी (निष्ठा)
द्विविधा= दो प्रकारसेप्रोक्ता= कही गयी है।कर्मयोगेन= कर्मयोगसे
होनेवाली(उनमें)(होती है)।

व्याख्या —[अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहते थे, अतः उन्होंने समतावाचक ‘बुद्धि’ शब्दका अर्थ ‘ज्ञान’ समझ लिया। परन्तु भगवान्ने पहले ‘बुद्धि’ और ‘बुद्धियोग’ शब्दसे समताका वर्णन किया था (दूसरे अध्यायका उन्नतालीसवों, उन्चासवों आदि); अतः यहाँ भी भगवान् ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनोंके द्वारा प्रापणीय समताका वर्णन कर रहे हैं।]

‘अनघ’ —अर्जुनके द्वारा अपने श्रेय-(कल्याण-) की बात पूछी जानी ही उनकी निष्पापता है; क्योंकि अपने कल्याणकी तीव्र इच्छा होनेपर साधकके पाप नष्ट हो जाते हैं।

‘लोकेऽस्मिन्द्रिविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मया’ —‘यहाँ ‘लोके’ पदका अर्थ मनुष्य-शरीर समझना चाहिये; क्योंकि ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनों प्रकारके साधनोंको करनेका अधिकार अथवा साधक बननेका अधिकार मनुष्य-शरीरमें ही है।

ही कौन ?

‘तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्’ —मेरा कल्याण कर्म करनेसे होगा या ज्ञानसे होगा—इनमेंसे आप निश्चित करके मेरे लिये एक बात कहिये, जिससे मेरा कल्याण हो जाय। मैंने पहले भी कहा था कि जिससे मेरा निश्चित कल्याण हो वह बात मेरे लिये कहिये—‘यच्छ्रेयः स्यानिश्चितं ब्रूहि तन्मे ’ (२।७) और अब भी मैं वही बात कह रहा हूँ।

‘निष्ठा’ —अर्थात् समभावमें स्थिति एक ही है, जिसे दो प्रकारसे प्राप्त किया जा सकता है—ज्ञानयोगसे और कर्मयोगसे। इन दोनों योगोंका अलग-अलग विभाग करनेके लिये भगवान्ने दूसरे अध्यायके उन्नतालीसवें श्लोकमें कहा है कि इस समबुद्धिको मैंने सांख्ययोगके विषयमें (ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक) कह दिया है, अब इसे कर्मयोगके विषयमें (उन्नतालीसवेंसे तिरपनवें श्लोकतक) सुनो—

‘एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धियोगे त्विमां शृणु।’

‘पुरा’ पदका अर्थ ‘अनादिकाल’ भी होता है और ‘अभीसे कुछ पहले’ भी होता है। यहाँ इस पदका अर्थ है—अभीसे कुछ पहले अर्थात् पिछला अध्याय, जिसपर अर्जुनकी शंका है। यद्यपि दोनों निष्ठाएँ पिछले अध्यायमें अलग-अलग कही जा चुकी हैं, तथापि किसी भी निष्ठामें कर्मत्यागकी बात नहीं कही गयी है।