श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 171, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें१७०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
श्रद्धाका द्योतन हो रहा है। श्रद्धाके कारण अर्जुन भगवान् के वचनोंको ठीक मान रहे हैं और यह भी समझ रहे हैं कि भगवान् मेरी बुद्धिको मोहित नहीं कर रहे हैं। परन्तु भगवान् के वचनोंको ठीक-ठीक न समझनेके कारण अर्जुनको भगवान् के वचन मिले हुए-से लग रहे हैं और उनको ऐसा दीख रहा है कि भगवान् अपने वचनोंसे मेरी बुद्धिको मोहित-सी कर रहे हैं। अगर भगवान् अर्जुनकी बुद्धिको मोहित करते तो फिर अर्जुनके मोहको दूर करता।
परिशिष्ट भाव —जबतक संसारकी सत्ता मानते हैं, तभीतक कर्म घोर या सौम्य दीखता है। कारण कि संसारकी सत्ता माननेसे कर्मकी तरफ दृष्टि रहती है, अपने कर्तव्यकी तरफ नहीं। अपने कर्तव्यकी तरफ दृष्टि रहनेसे कर्म घोर या सौम्य नहीं दीखता।
सम्बन्ध—अब आगेके तीन (तीसरे, चौथे और पाँचवें) श्लोकोंमें भगवान् अर्जुनके ‘व्यामिश्रेणैव वाक्येन’ (मिले हुए-से वचनों) पदोंका उत्तर देते हैं।
श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन्द्रिविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥
श्रीभगवान् बोले—
| अनघ | = हे निष्पाप अर्जुन ! | निष्ठा | = निष्ठा | साङ्ख्यानाम् | = ज्ञानियोंकी (निष्ठा) |
|---|---|---|---|---|---|
| अस्मिन् | = इस | मया | = मेरे द्वारा | ज्ञानयोगेन | = ज्ञानयोगसे (और) |
| लोके | = मनुष्यलोकमें | पुरा | = पहले | योगिनाम् | = योगियोंकी (निष्ठा) |
| द्विविधा | = दो प्रकारसे | प्रोक्ता | = कही गयी है। | कर्मयोगेन | = कर्मयोगसे |
| होनेवाली | (उनमें) | (होती है)। |
व्याख्या —[अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहते थे, अतः उन्होंने समतावाचक ‘बुद्धि’ शब्दका अर्थ ‘ज्ञान’ समझ लिया। परन्तु भगवान्ने पहले ‘बुद्धि’ और ‘बुद्धियोग’ शब्दसे समताका वर्णन किया था (दूसरे अध्यायका उन्नतालीसवों, उन्चासवों आदि); अतः यहाँ भी भगवान् ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनोंके द्वारा प्रापणीय समताका वर्णन कर रहे हैं।]
‘अनघ’ —अर्जुनके द्वारा अपने श्रेय-(कल्याण-) की बात पूछी जानी ही उनकी निष्पापता है; क्योंकि अपने कल्याणकी तीव्र इच्छा होनेपर साधकके पाप नष्ट हो जाते हैं।
‘लोकेऽस्मिन्द्रिविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मया’ —‘यहाँ ‘लोके’ पदका अर्थ मनुष्य-शरीर समझना चाहिये; क्योंकि ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनों प्रकारके साधनोंको करनेका अधिकार अथवा साधक बननेका अधिकार मनुष्य-शरीरमें ही है।
ही कौन ?
‘तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्’ —मेरा कल्याण कर्म करनेसे होगा या ज्ञानसे होगा—इनमेंसे आप निश्चित करके मेरे लिये एक बात कहिये, जिससे मेरा कल्याण हो जाय। मैंने पहले भी कहा था कि जिससे मेरा निश्चित कल्याण हो वह बात मेरे लिये कहिये—‘यच्छ्रेयः स्यानिश्चितं ब्रूहि तन्मे ’ (२।७) और अब भी मैं वही बात कह रहा हूँ।
‘निष्ठा’ —अर्थात् समभावमें स्थिति एक ही है, जिसे दो प्रकारसे प्राप्त किया जा सकता है—ज्ञानयोगसे और कर्मयोगसे। इन दोनों योगोंका अलग-अलग विभाग करनेके लिये भगवान्ने दूसरे अध्यायके उन्नतालीसवें श्लोकमें कहा है कि इस समबुद्धिको मैंने सांख्ययोगके विषयमें (ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक) कह दिया है, अब इसे कर्मयोगके विषयमें (उन्नतालीसवेंसे तिरपनवें श्लोकतक) सुनो—
‘एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धियोगे त्विमां शृणु।’
‘पुरा’ पदका अर्थ ‘अनादिकाल’ भी होता है और ‘अभीसे कुछ पहले’ भी होता है। यहाँ इस पदका अर्थ है—अभीसे कुछ पहले अर्थात् पिछला अध्याय, जिसपर अर्जुनकी शंका है। यद्यपि दोनों निष्ठाएँ पिछले अध्यायमें अलग-अलग कही जा चुकी हैं, तथापि किसी भी निष्ठामें कर्मत्यागकी बात नहीं कही गयी है।