श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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मार्मिक बात
यहाँ भगवान्ने दो निष्ठाएँ बतायी हैं—सांख्यनिष्ठा (ज्ञानयोग) और योगनिष्ठा (कर्मयोग)। जैसे लोकमें दो तरहकी निष्ठाएँ हैं—‘लोकैस्मिन्द्रिविधा निष्ठा’, ऐसे ही लोकमें दो तरहके पुरुष हैं ‘द्वारिमी पुरुषौ लोके’ (गीता १५।१६) वे हैं—श्वर (नाशवान् संसार) और अश्वर (अविनाशी स्वरूप)। श्वरकी सिद्धि-असिद्धि, प्राप्ति-अप्राप्तिमें सम रहना ‘कर्मयोग’ है और श्वरसे विमुख होकर अश्वरमें स्थित होना ‘ज्ञानयोग’ है। परन्तु श्वर और अश्वर—दोनोंसे उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा जाता है—‘उत्तमः पुरुषस्तव्यः परमात्मेत्युदाहृतः’ (१५।१७)। वह परमात्मा श्वरसे तो अतीत है और अश्वरसे उत्तम है; अतः शास्त्र और वेदमें वह ‘पुरुषोत्तम’ नामसे प्रसिद्ध है (पन्द्रहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। ऐसे परमात्माके सर्वथा सर्वभावसे शरण हो जाना ‘भगवनिष्ठा’ (भक्तियोग) है। इसलिये श्वरकी प्रधानतासे कर्मयोग, अश्वरकी प्रधानतासे ज्ञानयोग और परमात्माकी प्रधानतासे भक्तियोग चलता है*।
सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठा—ये दोनों साधकोंकी अपनी निष्ठाएँ हैं; परन्तु भगवनिष्ठा साधकोंकी अपनी निष्ठा नहीं है। कारण कि सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठामें साधकको ‘मैं हूँ’ और ‘संसार है’—इसका अनुभव होता है; अतः ज्ञानयोगी संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करके अपने स्वरूपमें स्थित होता है और कर्मयोगी संसारकी वस्तु- (शरीरादि- ) को संसारकी ही सेवामें लगाकर संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करता है। परन्तु भगवनिष्ठामें साधकको पहले ‘भगवान्’ हैं—इसका अनुभव नहीं होता; पर उसका विश्वास होता है कि स्वरूप और संसार—इन दोनोंसे भी विलक्षण कोई तत्त्व (भगवान्) है। अतः वह श्रद्धा-विश्वासपूर्वक भगवान्को मानकर अपने-आपको भगवान्के समर्पित कर देता है। इसलिये सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठामें तो ‘जानना’ (विवेक) मुख्य है और भगवनिष्ठामें ‘मानना’ (श्रद्धा-विश्वास) मुख्य है।
जानना और मानना—दोनोंमें कोई फर्क नहीं है। जैसे ‘जानना’ सन्देहरहित (दृढ़) होता है, ऐसे ही ‘मानना’ भी
सन्देहरहित होता है। मानी हुई बातमें विचारकी सम्भावना नहीं रहती। जैसे, ‘अमुक मेरी माँ है’—यह केवल माना हुआ है, पर इस माने हुएमें कभी सन्देह नहीं होता, कभी जिज्ञासा नहीं होती, कभी विचार नहीं करना पड़ता। इसलिये गीतामें भक्तियोगके प्रकरणमें जहाँ जाननेकी बात आयी है, उसको माननेके अर्थमें ही लेना चाहिये। इसी तरह ज्ञानयोग और कर्मयोगके प्रकरणमें जहाँ माननेकी बात आयी है, उसको जाननेके अर्थमें ही लेना चाहिये।
सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठा तो साधन-साध्य हैं और साधकपर निर्भर हैं, पर भगवनिष्ठा साधन-साध्य नहीं है। भगवनिष्ठामें साधक भगवान् और उनकी कृपापर निर्भर रहता है।
भगवनिष्ठाका वर्णन गीतामें जगह-जगह आया है; जैसे—इसी अध्यायमें पहले दो निष्ठाओंका वर्णन करके फिर तीसवें श्लोकमें ‘मयि सर्वाणि कर्माणि सन्यस्य’ पदोंसे भक्तिका वर्णन किया गया है; पाँचवें अध्यायमें भी दो निष्ठाओंका वर्णन करके दसवें श्लोकमें ‘ब्रह्मणयाधाय कर्माणि’ और अन्तमें ‘भोक्तारं यज्ञतपसाम् .....’ आदि पदोंसे भक्तिका वर्णन किया गया है, इत्यादि।
‘ज्ञानयोगेन सांख्यानाम्’—प्रकृतिसे उत्पन्न सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं, सम्पूर्ण क्रियाएँ गुणोंमें, इन्द्रियोंमें ही हो रही हैं (गीता—तीसरे अध्यायका अट्ठाईसवाँ श्लोक) और मेरा इनसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है—ऐसा समझकर समस्त क्रियाओंमें कर्तापनके अभिमानका सर्वथा त्याग कर देना ‘ज्ञानयोग’ है।
गीतोपदेशके आरम्भमें ही भगवान्ने सांख्ययोग- (ज्ञानयोग- ) का वर्णन करते हुए नाशवान् शरीर और अविनाशी शरीरीका विवेचन किया है, जिसे (गीता—दूसरे अध्यायके सोलहवें श्लोकमें) असत् और सत्के नामसे भी कहा गया है।
‘कर्मयोगेन योगिनाम्’—वर्ण, आश्रम, स्वभाव और परिस्थितिके अनुसार जो शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्म सामने आ जाय, उसको (उस कर्म तथा उसके फलमें) कामना, ममता और आसक्तिका सर्वथा त्याग करके करना तथा कर्मकी सिद्धि और असिद्धिमें सम रहना
- वास्तवमें भगवान्का सम्बन्ध कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों योगोंमें रहता है; क्योंकि इन दोनोंके विधायक भगवान् ही हैं। कर्मयोग और ज्ञानयोगसे कल्याण होनेका विधान तो भगवान्के द्वारा ही बना है। इसलिये कर्मयोगी और ज्ञानयोगी—दोनों भगवान्के मत- (सिद्धान्त- ) का ही पालन करते हैं। केवल इनमें भगवान्को परायणता नहीं होती।