श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 173, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
‘कर्मयोग’ है।
भगवान्ने कर्मयोगका वर्णन दूसरे अध्यायके सेंतालीसवें और अड़तालीसवें श्लोकमें मुख्यरूपसे किया है। इनमें भी
सेंतालीसवें श्लोकमें कर्मयोगका सिद्धान्त कहा गया है और अड़तालीसवें श्लोकमें कर्मयोगको अनुष्ठानमें लानेकी विधि कही गयी है।
परिशिष्ट भाव —कर्मयोग और ज्ञानयोग—ये दोनों ही निष्ठाएँ लोकमें होनेके कारण ‘लौकिक’ हैं—‘लोकेऽस्मिन्निविधा निष्ठा।’ कर्मयोगमें ‘क्षर’ (संसार) की प्रधानता है और ज्ञानयोगमें ‘अक्षर’ (जीवात्मा) की प्रधानता है। क्षर और अक्षर भी लोकमें ही हैं—‘द्वारविमो पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च’ (गीता १५।१६)। अतः कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों ही लौकिक निष्ठाएँ हैं।
जीव और जगत्को मुख्यता देनेसे ही ये दो निष्ठाएँ हुई हैं। अगर जीव और जगत्को मुख्यता न देकर केवल परमात्माको ही मुख्यता दें तो दो निष्ठाएँ नहीं होंगी, प्रत्युत केवल अलौकिक भगवन्निष्ठा (भक्ति) होगी।
लौकिक निष्ठा (कर्मयोग-ज्ञानयोग) में साधकका अपना उद्योग मुख्य होता है। वह साधनमें अपना पुरुषार्थ मानता है। परन्तु जब साधक भगवान्का आश्रय रखकर साधन करता है, अपना उद्योग मुख्य नहीं मानता, तब उसकी निष्ठा अलौकिक होती है। कारण कि भगवान्का सम्बन्ध होनेसे सब अलौकिक हो जाता है। जबतक भगवान्का सम्बन्ध नहीं होता, तबतक सब लौकिक ही होता है।
किसीको बुरा न समझे, किसीका बुरा न चाहे और किसीका बुरा न करे तो ‘कर्मयोग’ आरम्भ हो जाता है। मेरा कुछ नहीं है, मेरेको कुछ नहीं चाहिये और मेरेको अपने लिये कुछ नहीं करना है—इस सत्यको स्वीकार कर ले तो ‘ज्ञानयोग’ आरम्भ हो जाता है।
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न कर्मणामनारम्भानैष्कर्म्यं पुरुषोऽशनुते ।
न च सन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥
| पुरुषः | = मनुष्य | नैष्कर्म्यम् | = निष्कर्मताका | सन्यसनात् | = (कर्मोंके) |
|---|---|---|---|---|---|
| न | = न तो | अशनुते | = अनुभव | त्यागमात्रसे | |
| कर्मणाम् | = कर्मोंका | करता है | सिद्धिम् | = सिद्धिको | |
| अनारम्भात् | = आरम्भ | च | = और | एव | = ही |
| किये बिना | न | = न | समधिगच्छति | = प्राप्त होता है। |
व्याख्या —‘न कर्मणामनारम्भानैष्कर्म्यं पुरुषोऽशनुते’—कर्मयोगमें कर्म करना अत्यन्त आवश्यक है। कारण कि निष्कामभावसे कर्म करनेपर ही कर्मयोगकी सिद्धि होती है*। यह सिद्धि मनुष्यको कर्म किये बिना नहीं मिल सकती। मनुष्यके अन्तःकरणमें कर्म करनेका जो वेग विद्यमान रहता है, उसे शान्त करनेके लिये कामनाका त्याग करके कर्तव्य-कर्म करना आवश्यक है। कामना रखकर कर्म करनेपर यह वेग मिटता नहीं, प्रत्युत बढ़ता है।
‘नैष्कर्म्यम् अशनुते’ पदोंका आशय है कि कर्मयोगका आचरण करनेवाला मनुष्य कर्मोंको करते हुए ही निष्कर्मताको प्राप्त होता है। जिस स्थितिमें मनुष्यके कर्म अकर्म हो जाते
हैं अर्थात् बन्धनकारक नहीं होते, उस स्थितिको ‘निष्कर्मता’ कहते हैं।
कामनासे रहित होकर किये गये कर्मोंमें फल देनेकी शक्तिका उसी प्रकार सर्वथा अभाव हो जाता है, जिस प्रकार बीजको भूनेने या उबालनेपर उसमें पुनः अंकुर देनेकी शक्ति सर्वथा नष्ट हो जाती है। अतः निष्काम मनुष्यके कर्मोंमें पुनः जन्म-मरणके चक्रमें घुमानेकी शक्ति नहीं रहती।
कामनाका त्याग तभी हो सकता है, जब सभी कर्म दूसरोंकी सेवाके लिये किये जायँ, अपने लिये नहीं। कारण कि कर्ममात्रका सम्बन्ध संसारसे है और अपना (स्वरूपका) सम्बन्ध परमात्मासे है। अपने साथ कर्मका सम्बन्ध है ही
- जो योगपर आरूढ़ होना चाहता है, अपनेमें समता लाना चाहता है, उसके लिये (कर्मयोगकी दृष्टिसे) निष्कामभावसे कर्म करना आवश्यक है—‘आरुरुक्षोमुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते’ (गीता ६।३)। अगर वह कर्म करेगा ही नहीं तो उसको यह कैसे पता लगेगा कि मैं सिद्धि-असिद्धिमें सम रहा या विचलित हो गया?