श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 158, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ६९ ]
- साधक-संजीवनी *
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| तस्मात् | = इसलिये | इन्द्रियार्थभ्यः | = इन्द्रियोंके | हुई हैं, |
|---|---|---|---|---|
| महाबाहो | = हे महाबाहो ! | विषयोंसे | तस्य | |
| यस्य | = जिस मनुष्यकी | सर्वशः | = सर्वथा | प्रज्ञा |
| इन्द्रियाणि | = इन्द्रियाँ | निगृहीतानि | = वशमें की | प्रतिष्ठिता |
व्याख्या— 'तस्माद्यस्य ..... प्रज्ञा प्रतिष्ठिता'—साठवें श्लोकसे मन और इन्द्रियोंको वशमें करनेका जो विषय चला आ रहा है, उसका उपसंहार करते हुए 'तस्मात्' पदसे कहते हैं कि जिसके मन और इन्द्रियोंमें संसारका आकर्षण नहीं रहा है, उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है।
यहाँ 'सर्वशः' पद देनेका तात्पर्य है कि संसारके साथ व्यवहार करते हुए अथवा एकात्ममें चिन्तन करते हुए—किसी भी अवस्थामें उसकी इन्द्रियाँ भोगोंमें, विषयोंमें प्रवृत्त नहीं होतीं। व्यवहारकालमें कितने ही विषय उसके सम्पर्कमें क्यों न आ जायें, पर वे विषय उसको विचलित नहीं कर सकते। उसका मन भी इन्द्रियके साथ मिलकर उसकी बुद्धिको विचलित नहीं कर सकता। जैसे पहाड़को कोई डिंगा नहीं सकता, ऐसे ही उसकी बुद्धिमें इतनी दृढ़ता आ जाती है कि उसको मन किसी भी अवस्थामें डिंगा नहीं
सकता। कारण कि उसके मनमें विषयोंका महत्त्व नहीं रहा।
'निगृहीतानि' का तात्पर्य है कि इन्द्रियाँ विषयोंसे पूरी तरहसे वशमें की हुई हैं अर्थात् विषयोंमें उनका लेशमात्र भी राग, आसक्ति, खिंचाव नहीं रहा है। जैसे साँपके दाँत निकाल दिये जायें, तो फिर उसमें जहर नहीं रहता। वह किसीको काट भी लेता है तो उसका कोई असर नहीं होता। ऐसे ही इन्द्रियोंको राग-द्वेषसे रहित कर देना ही मानो उनके जहरीले दाँत निकाल देना है। फिर उन इन्द्रियोंमें यह ताकत नहीं रहती कि वे साधकको पतनके मार्गमें ले जायें।
इस श्लोकका तात्पर्य यह है कि साधकको दृढ़तासे यह निश्चय कर लेना चाहिये कि मेरा लक्ष्य परमात्माकी प्राप्ति करना है, भोग भोगना और संग्रह करना मेरा लक्ष्य नहीं है। अगर ऐसी सावधानी साधकमें निरन्तर बनी रहे, तो उसकी बुद्धि स्थिर हो जायगी।
सम्बन्ध—जिसकी इन्द्रियाँ सर्वथा वशमें हैं उसमें और साधारण मनुष्योंमें क्या अन्तर है—इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ ६९ ॥
| सर्वभूतानाम् | = सम्पूर्ण प्राणियोंकी | जागर्ति | = जागता है | रहते हैं), |
|---|---|---|---|---|
| या | = जो | (और) | सा | |
| निशा | = रात (परमात्मासे विमुखता) है, | यस्याम् | = जिसमें | मुनेः |
| तस्याम् | = उसमें | भूतानि | = सब प्राणी | पश्यतः |
| संयमी | = संयमी मनुष्य | जाग्रति | = जागते हैं (भोग और संग्रहमें लगे | निशा |
व्याख्या— 'या निशा सर्वभूतानाम्'—जिनकी इन्द्रियाँ और मन वशमें नहीं हैं, जो भोगोंमें आसक्त हैं, वे सब परमात्मतत्त्वकी तरफसे सोये हुए हैं। परमात्मा क्या है? तत्त्वज्ञान क्या है? हम दुःख क्यों पा रहे हैं? सन्ताप-जलन क्यों हो रही है? हम जो कुछ कर रहे हैं, उसका परिणाम क्या होगा?—इस तरफ बिलकुल न देखना ही उनकी रात है, उनके लिये बिलकुल अंधेरा है।
यहाँ 'भूतानाम्' कहनेका तात्पर्य है कि जैसे पशु-पक्षी आदि दिनभर खाने-पीनेमें ही लगे रहते हैं, ऐसे ही जो मनुष्य रात-दिन खाने-पीनेमें, सुख-आराममें, भोगों
और संग्रहमें, धन कमानेमें ही लगे हुए हैं, उन मनुष्योंकी गणना भी पशु-पक्षी आदिमें ही है। कारण कि परमात्मतत्त्वसे विमुख रहनेमें पशु-पक्षी आदिमें और मनुष्योंमें कोई अन्तर नहीं है। दोनों ही परमात्मतत्त्वकी तरफसे सोये हुए हैं। हाँ, अगर कोई अन्तर है तो वह इतना ही है कि पशु-पक्षी आदिमें विवेक-शक्ति इतनी जाग्रत् नहीं है, इसलिये वे खाने-पीने आदिमें ही लगे रहते हैं और मनुष्योंमें भगवान्की कृपासे वह विवेक-शक्ति जाग्रत् है, जिससे वह अपना कल्याण कर सकता है, प्राणिमात्रकी सेवा कर सकता है, परमात्माकी प्राप्ति कर सकता है। परन्तु उस