भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक ६९ ]

  • साधक-संजीवनी *

१५७

तस्मात्= इसलियेइन्द्रियार्थभ्यः= इन्द्रियोंकेहुई हैं,
महाबाहो= हे महाबाहो !विषयोंसेतस्य
यस्य= जिस मनुष्यकीसर्वशः= सर्वथाप्रज्ञा
इन्द्रियाणि= इन्द्रियाँनिगृहीतानि= वशमें कीप्रतिष्ठिता

व्याख्या— 'तस्माद्यस्य ..... प्रज्ञा प्रतिष्ठिता'—साठवें श्लोकसे मन और इन्द्रियोंको वशमें करनेका जो विषय चला आ रहा है, उसका उपसंहार करते हुए 'तस्मात्' पदसे कहते हैं कि जिसके मन और इन्द्रियोंमें संसारका आकर्षण नहीं रहा है, उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है।

यहाँ 'सर्वशः' पद देनेका तात्पर्य है कि संसारके साथ व्यवहार करते हुए अथवा एकात्ममें चिन्तन करते हुए—किसी भी अवस्थामें उसकी इन्द्रियाँ भोगोंमें, विषयोंमें प्रवृत्त नहीं होतीं। व्यवहारकालमें कितने ही विषय उसके सम्पर्कमें क्यों न आ जायें, पर वे विषय उसको विचलित नहीं कर सकते। उसका मन भी इन्द्रियके साथ मिलकर उसकी बुद्धिको विचलित नहीं कर सकता। जैसे पहाड़को कोई डिंगा नहीं सकता, ऐसे ही उसकी बुद्धिमें इतनी दृढ़ता आ जाती है कि उसको मन किसी भी अवस्थामें डिंगा नहीं

सकता। कारण कि उसके मनमें विषयोंका महत्त्व नहीं रहा।

'निगृहीतानि' का तात्पर्य है कि इन्द्रियाँ विषयोंसे पूरी तरहसे वशमें की हुई हैं अर्थात् विषयोंमें उनका लेशमात्र भी राग, आसक्ति, खिंचाव नहीं रहा है। जैसे साँपके दाँत निकाल दिये जायें, तो फिर उसमें जहर नहीं रहता। वह किसीको काट भी लेता है तो उसका कोई असर नहीं होता। ऐसे ही इन्द्रियोंको राग-द्वेषसे रहित कर देना ही मानो उनके जहरीले दाँत निकाल देना है। फिर उन इन्द्रियोंमें यह ताकत नहीं रहती कि वे साधकको पतनके मार्गमें ले जायें।

इस श्लोकका तात्पर्य यह है कि साधकको दृढ़तासे यह निश्चय कर लेना चाहिये कि मेरा लक्ष्य परमात्माकी प्राप्ति करना है, भोग भोगना और संग्रह करना मेरा लक्ष्य नहीं है। अगर ऐसी सावधानी साधकमें निरन्तर बनी रहे, तो उसकी बुद्धि स्थिर हो जायगी।

सम्बन्ध—जिसकी इन्द्रियाँ सर्वथा वशमें हैं उसमें और साधारण मनुष्योंमें क्या अन्तर है—इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ ६९ ॥

सर्वभूतानाम्= सम्पूर्ण प्राणियोंकीजागर्ति= जागता हैरहते हैं),
या= जो(और)सा
निशा= रात (परमात्मासे विमुखता) है,यस्याम्= जिसमेंमुनेः
तस्याम्= उसमेंभूतानि= सब प्राणीपश्यतः
संयमी= संयमी मनुष्यजाग्रति= जागते हैं (भोग और संग्रहमें लगेनिशा

व्याख्या— 'या निशा सर्वभूतानाम्'—जिनकी इन्द्रियाँ और मन वशमें नहीं हैं, जो भोगोंमें आसक्त हैं, वे सब परमात्मतत्त्वकी तरफसे सोये हुए हैं। परमात्मा क्या है? तत्त्वज्ञान क्या है? हम दुःख क्यों पा रहे हैं? सन्ताप-जलन क्यों हो रही है? हम जो कुछ कर रहे हैं, उसका परिणाम क्या होगा?—इस तरफ बिलकुल न देखना ही उनकी रात है, उनके लिये बिलकुल अंधेरा है।

यहाँ 'भूतानाम्' कहनेका तात्पर्य है कि जैसे पशु-पक्षी आदि दिनभर खाने-पीनेमें ही लगे रहते हैं, ऐसे ही जो मनुष्य रात-दिन खाने-पीनेमें, सुख-आराममें, भोगों

और संग्रहमें, धन कमानेमें ही लगे हुए हैं, उन मनुष्योंकी गणना भी पशु-पक्षी आदिमें ही है। कारण कि परमात्मतत्त्वसे विमुख रहनेमें पशु-पक्षी आदिमें और मनुष्योंमें कोई अन्तर नहीं है। दोनों ही परमात्मतत्त्वकी तरफसे सोये हुए हैं। हाँ, अगर कोई अन्तर है तो वह इतना ही है कि पशु-पक्षी आदिमें विवेक-शक्ति इतनी जाग्रत् नहीं है, इसलिये वे खाने-पीने आदिमें ही लगे रहते हैं और मनुष्योंमें भगवान्की कृपासे वह विवेक-शक्ति जाग्रत् है, जिससे वह अपना कल्याण कर सकता है, प्राणिमात्रकी सेवा कर सकता है, परमात्माकी प्राप्ति कर सकता है। परन्तु उस

१५८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

विवेक-शक्तिका दुरुपयोग करके मनुष्य पदार्थोंका संग्रह करनेमें एवं उनका भोग करनेमें लग जाते हैं, जिससे वे संसारके लिये पशुओंसे भी अधिक दुःखदायी हो जाते हैं। कारण कि पशु-पक्षी तो बेचारे जितनेसे पेट भर जाय, उतना ही खाते हैं, संग्रह नहीं करते; परन्तु मनुष्यको कहीं भी जो कुछ पदार्थ आदि मिल जाता है, वह उसके काममें आये चाहे न आये, उसका तो वह संग्रह कर ही लेता है और दूसरोंके काममें आनेमें बाधा डाल देता है।

‘तस्यां जागर्ति संयमी’—मनुष्योंकी जो रात है अर्थात् परमात्माकी तरफसे, अपने कल्याणकी तरफसे जो विमुखता है, उसमें संयमी मनुष्य जागता है। जिसने इन्द्रियों और मनको वशमें किया है, जो भोग और संग्रहमें आसक्त नहीं है, जिसका ध्येय केवल परमात्मा है, वह संयमी मनुष्य है। परमात्मतत्वको, अपने स्वरूपको और संसारको यथार्थरूपसे जानना ही उसका रातमें जागना है।

‘यस्यां जागर्ति भूतानि’—जो भोग और संग्रहमें बड़े सावधान रहते हैं, एक-एक पैसेका हिसाब रखते हैं, जमीनके एक-एक इंचका खयाल रखते हैं; जितने रुपये अधिकारमें आ जायें वे चाहे न्यायपूर्वक हों अथवा अन्यायपूर्वक, उसमें वे बड़े खुश होते हैं कि इतनी पूँजी तो हमने ले ही ली है, इतना लाभ तो हमें हो ही गया है—इस तरह वे सांसारिक क्षणभंगुर भोगोंको बटरनेमें और आदर-सत्कार, मान-बड़ाई आदि प्राप्त करनेमें ही लगे रहते हैं, उनमें बड़े सावधान रहते हैं, यही उन लोगोंका जागना है।

‘सा निशा पश्यतो मुनेः’—जिन सांसारिक पदार्थोंका भोग और संग्रह करनेमें मनुष्य अपनेको बड़ा बुद्धिमान्, चतुर मानते हैं और उसीमें राजी होते हैं, संसार और परमात्मतत्वको जाननेवाले मननशील संयमी मनुष्यकी दृष्टिमें वह सब रातके समान है; बिलकुल अंधेरा है। जैसे, बच्चे खेलते हैं तो वे कंकड़-पत्थर, काँचके लाल-पीले टुकड़ोंको लेकर आपसमें लड़ते हैं। अगर वह मिल

परिशिष्ट भाव—सांसारिक मनुष्य रात-दिन भोग और संग्रहमें ही लगे रहते हैं, उनको ही महत्ता देते हैं, सांसारिक कार्योंमें बड़े सावधान और निपुण होते हैं, तरह-तरहके कला-कौशल सीखते हैं, तरह-तरहके आविष्कार करते हैं, लौकिक वस्तुओंकी प्राप्तिमें ही अपनी उन्नति मानते हैं, सांसारिक वस्तुओंकी बड़ी महिमा गाते हैं, सदा जीवित रहकर सुख भोगनेके लिये बड़ी-बड़ी तपस्या करते हैं, देवताओंकी उपासना करते हैं, मन्त्र-जप करते हैं आदि-आदि। परन्तु जीवनमुक्त, तत्त्वज्ञ महापुरुष तथा सच्चे साधकोंकी दृष्टिमें वह बिलकुल रात है, अन्धकार है, उसका किंचिन्मात्र भी महत्त्व नहीं है। कारण कि उनकी दृष्टिमें ब्रह्मलोकतक सम्पूर्ण संसार विद्यमान है ही नहीं—‘नासतो विद्यते भावः’ (गीता २।१६), ‘आब्रह्मभुवनल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन’ (गीता ८।१६)।

सांसारिक लोग तो संसारमें ही रचे-पचे रहते हैं और ऐसा मानते हैं कि जो कुछ है, वह यही है—‘नायदस्तीति

जाता है तो राजी होते हैं कि मैंने बहुत बड़ा लाभ उठा लिया और अगर वह नहीं मिलता तो दुःखी हो जाते हैं कि मेरी बड़ी भारी हानि हो गयी। परन्तु जिसके मनमें कंकड़-पत्थर आदिका महत्त्व नहीं है, ऐसा समझदार व्यक्ति समझता है कि इन कंकड़-पत्थरोंके मिलनेसे क्या लाभ हुआ और मिलनेसे क्या हानि हुई ? इन बच्चोंको अगर कंकड़-पत्थर मिल भी जायेंगे, तो ये कबतक उनके साथ रहेंगे ? इसी तरह भोग और संग्रहमें लगे हुए मनुष्य भोगोंके लिये लड़ाई-झगड़ा, झूठ-कपट, बेईमानी आदि करते हैं और उनको प्राप्त करके राजी होते हैं, खुशी मनाते हैं कि हमने बहुत लाभ ले लिया। परन्तु संसारको और परमात्मतत्वको जाननेवाला मननशील संयमी मनुष्य साफ देखता है कि भोग मिल गये, आदर-सत्कार हो गया, सुख-आराम हो गया, खा-पी लिया, खूब शृंगार कर लिया तो क्या हो गया ? इसमें मनुष्योंको क्या मिला ? इनमेंसे इनके साथ क्या चलेगा ? ये कबतक इन भोगोंको साथमें रखेंगे ? इन भोगोंसे होनेवाली वृत्ति कितने दिनतक ठहरेगी ? इस तरह उसकी दृष्टिमें प्राणियोंका जागना रातके समान है।

वह मननशील संयमी मनुष्य परमात्माको, अपने स्वरूपको और संसारके परिणामको तो जानता ही है, वह पदार्थोंको भी अच्छी तरहसे जानता है कि कौन-सा पदार्थ किसके हितमें लग सकता है, इससे दूसरोंको कितना लाभ होगा। वह पदार्थोंका अपनी-अपनी जगह ठीक तरहसे सदुपयोग करता है। उनको दूसरोंकी सेवामें लगाता है।

जैसे नेत्रोंमें दोष होनेपर जब हम आकाशको देखते हैं, तब उसमें जाले-से दीखते हैं और आँखें मीच लेनेपर भी मोर-पंखकी तरह वे जाले दीखते हैं; परन्तु उनके दीखनेपर भी हमारी बुद्धिमें यह अटल निश्चय रहता है कि आकाशमें जाले नहीं हैं। ऐसे ही इन्द्रियों और अन्तःकरणके द्वारा संसार दीखनेपर भी मननशील संयमी मनुष्यकी बुद्धिमें यह अटल निश्चय रहता है कि वास्तवमें संसार नहीं है, केवल प्रतीतिमात्र है।

श्लोक ७० ]

  • साधक-संजीवनी *

१५९

वादिनः (गीता २।४२)। ‘कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः’ (गीता १६।११)। पारमार्थिक विषयमें उनकी बुद्धि जाती ही नहीं। परन्तु पारमार्थिक साधक पारमार्थिक विषयके साथ-साथ संसारको भी जानते हैं, इसलिये उनके लिये ‘पश्यतः’ पद दिया है। संसारी लोग तो केवल रातको ही देखते हैं, दिनको देखते ही नहीं, पर योगी दिनको भी देखता है और रातको भी—यह दोनोंमें फर्क है। उदाहरणार्थ बालकने केवल बालकपना ही देखा है, जवानी नहीं, पर वृद्ध पुरुषने वृद्धावस्थाके साथ-साथ बालकपना भी देखा है और जवानी भी! रुपये रखनेवाला व्यक्ति रुपयोंके त्यागको नहीं जानता, पर रुपयोंका त्याग करनेवाला रुपयोंके संग्रहको भी जानता है और त्यागको भी जानता है। यह सिद्धान्त है कि संसारमें लगा हुआ मनुष्य संसारको नहीं जान सकता। संसारसे अलग होकर ही वह संसारको जान सकता है; क्योंकि वास्तवमें वह संसारसे अलग है। इसी तरह परमात्माके साथ एक होकर ही मनुष्य परमात्माको जान सकता है; क्योंकि वास्तवमें वह परमात्माके साथ एक है।

जो ‘है’ में स्थित है, वह ‘है’ और ‘नहीं’—दोनोंको जानता है, पर जो ‘नहीं’ में स्थित है, वह ‘नहीं’ को भी यथार्थरूपसे अर्थात् ‘नहीं’-रूपसे नहीं जान सकता, फिर वह ‘है’ को कैसे जानेगा ? नहीं जान सकता। उसमें जानेकी सामर्थ्य ही नहीं है। ‘है’ को जाननेवालेका तो ‘नहीं’ को माननेवालेके साथ विरोध नहीं होता, पर ‘नहीं’ को माननेवालेका ‘है’ को जाननेवालेके साथ विरोध होता है।

सम्बन्ध—मननशील संयमी मनुष्यको संसार रातकी तरह दीखता है। इसपर यह प्रश्न उठता है कि क्या वह सांसारिक पदार्थोंके सम्पर्कमें आता ही नहीं? अगर नहीं आता तो उसका जीवन-निर्वाह कैसे होता है? और अगर आता है तो उसकी स्थिति कैसे रहती है? इन बातोंका विवेचन करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्भूत।

तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ७० ॥

यद्भूत= जैसेअचलप्रतिष्ठम्= (समुद्र अपनी मर्यादामें) अचल स्थित रहता है,ही)प्रविशन्ति= प्राप्त होते हैं,
आपः= (सम्पूर्ण नदियोंका) जलतद्वत्= ऐसे हीसः= वही मनुष्य
आपूर्यमाणम्= चारों ओरसे जलद्वारासर्वे= सम्पूर्णशान्तिम्= परमशान्तिको
परिपूर्णकामाः= भोग-पदार्थआप्नोति= प्राप्त होता है,
समुद्रम्= समुद्रमेंयम्= जिस संयमीकामकामी= भोगोंकी कामनावाला
प्रविशन्ति= आकर मिलता है, (पर)मनुष्यको (विकार उत्पन्न किये बिना= नहीं।

व्याख्या—‘आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्भूत’ —वर्षाकालमें नदियों और नदोंका जल बहुत बढ़ जाता है, कई नदियोंमें बाढ़ आ जाती है; परन्तु जब वह जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है, तब समुद्र बढ़ता नहीं, अपनी मर्यादामें ही रहता है। परन्तु जब गरमीके दिनोंमें नदियों और नदोंका जल बहुत कम हो जाता है, तब समुद्र घटता नहीं। तात्पर्य है कि नदी-नदोंका जल ज्यादा आनेसे अथवा कम आनेसे या न

आनेसे तथा बड़वानल (जलमें पैदा होनेवाली अग्नि) और सूर्यके द्वारा जलका शोषण होनेसे समुद्रमें कोई फर्क नहीं पड़ता, वह बढ़ता-घटता नहीं। उसको नदी-नदोंके जलकी अपेक्षा नहीं रहती। वह तो सदा-सर्वदा ज्यों-का-त्यों ही परिपूर्ण रहता है और अपनी मर्यादाका कभी त्याग नहीं करता।

‘तद्वत्कामा’* यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्ति-माप्नोति’—ऐसे ही संसारके सम्पूर्ण भोग उस परमात्म-

  • यहाँ ‘कामाः’ पद कामनाओंका वाचक नहीं है, प्रत्युत जिन पदार्थोंकी कामना की जाती है, उन भोग-पदार्थोंका वाचक है।

१६०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

तत्त्वको जाननेवाले संयमी मनुष्यको प्राप्त होते हैं, उसके सामने आते हैं, पर वे उसके कहे जानेवाले शरीर और अन्तःकरणमें सुख-दुःखरूप विकार पैदा नहीं कर सकते। अतः वह परमात्मतत्त्वके कारणसे है, भोग-पदार्थोंके कारणसे नहीं (गीता—दूसरे अध्यायका छियालीसवाँ श्लोक)।

यहाँ जो समुद्र और नदियोंके जलका दृष्टान्त दिया गया है, वह स्थितप्रज्ञ संयमी मनुष्यके विषयमें पूरा नहीं घटता। कारण कि समुद्र और नदियोंके जलमें तो सजातीयता है अर्थात् जो जल समुद्रमें भरा हुआ है, उसी जातिका जल नद-नदियोंसे आता है और नद-नदियोंसे जो जल आता है, उसी जातिका जल समुद्रमें भरा हुआ है। परन्तु स्थितप्रज्ञ और सांसारिक भोग-पदार्थोंमें इतना फर्क है कि इसको समझानेके लिये रात-दिन, आकाश-पातालका दृष्टान्त भी नहीं बैठ सकता! कारण कि स्थितप्रज्ञ मनुष्य जिस तत्त्वमें स्थित है, वह तत्त्व चेतन है, नित्य है, सत्य

परिशिष्ट भाव —अपनी कामनाके कारण ही यह संसार जड़ दीखता है, वास्तवमें तो यह चिन्मय परमात्मा ही है—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९), ‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९)। अतः जब मनुष्य कामनारहित हो जाता है, तब उससे सभी वस्तुएँ प्रसन्न हो जाती हैं। वस्तुओंके प्रसन्न होनेकी पहचान यह है कि उस निष्काम महापुरुषके पास आवश्यक वस्तुएँ अपने-आप आने लगती हैं। उसके पास आकर सफल होनेके लिये वस्तुएँ लालायित रहती हैं। परन्तु कामना न रहनेके कारण वस्तुओंके प्राप्त होनेपर अथवा न होनेपर भी उसके भीतर कोई विकार (हर्ष आदि) उत्पन्न नहीं होता। उसकी दृष्टिमें वस्तुओंका कोई मूल्य (महत्त्व) है ही नहीं। इसके विपरीत कामनावाले मनुष्यको वस्तुएँ प्राप्त हों अथवा न हों, उसके भीतर सदा अशान्ति बनी रहती है।

सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकमें ‘स्थितप्रज्ञ कैसे चलता है?’ इस प्रश्नके उत्तरका उपसंहार करते हैं।

विहाय कामान्यः सर्वाण्युमांश्चरति निःस्पृहः ।

निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥ ७१ ॥

यः= जोविहाय= त्याग करकेचरति= आचरण करता है,
पुमान्= मनुष्यनिःस्पृहः= स्पृहारहित,सः= वह
सर्वाण्= सम्पूर्णनिर्ममः= ममतरहित (और)शान्तिम्= शान्तिको
कामान्= कामनाओंकानिरहङ्कारः= अहंतरहित होकरअधिगच्छति= प्राप्त होता है।

व्याख्या —‘विहाय कामान्यः सर्वाण्युमांश्चरति निःस्पृहः’—अप्राप्त वस्तुकी इच्छाका नाम ‘कामना’ है। स्थितप्रज्ञ महापुरुष सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग कर देता है। कामनाओंका त्याग कर देनेपर भी शरीरके निर्वाहमात्रके लिये देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदिकी जो आवश्यकता दीखती है अर्थात् जीवन-निर्वाहके लिये प्राप्त और अप्राप्त वस्तु आदिकी जो जरूरत दीखती है, उसका

है, असीम है, अनन्त है और सांसारिक भोग-पदार्थ जड़ हैं, अनित्य हैं, असत् हैं, सीमित हैं, अन्तवाले हैं।

दूसरा अन्तर यह है कि समुद्रमें तो नदियोंका जल पहुँचता है, पर स्थितप्रज्ञ जिस तत्त्वमें स्थित है, वहाँ से सांसारिक भोग-पदार्थ पहुँचते ही नहीं, प्रत्युत केवल उसके कहे जानेवाले शरीर अन्तःकरणतक ही पहुँचते हैं। अतः समुद्रका दृष्टान्त केवल उसके कहे जानेवाले शरीर और अन्तःकरणकी स्थितिको बतानेके लिये ही दिया गया है। उसके वास्तविक स्वरूपको बतानेवाला कोई दृष्टान्त नहीं है।

‘न कामकामी’—जिनके मनमें भोग-पदार्थकी कामना है, जो पदार्थोंको ही महत्त्व देते हैं, जिनकी दृष्टि पदार्थोंकी तरफ ही है, उनको कितने ही सांसारिक भोगपदार्थ मिल जायें, तो भी उनकी तृप्ति नहीं हो सकती; उनकी कामना, जलन, सन्ताप नहीं मिट सकते; तो फिर उनको शान्ति कैसे मिल सकती है? कारण कि चेतन स्वरूपकी तृप्ति जड़ पदार्थोंसे हो ही नहीं सकती।

नाम ‘स्पृह’ है। स्थितप्रज्ञ पुरुष इस स्पृहाका भी त्याग कर देता है। कारण कि जिसके लिये शरीर मिला था और जिसकी आवश्यकता थी, उस तत्त्वकी प्राप्ति हो गयी, वह आवश्यकता पूरी हो गयी। अब शरीर रहे चाहे न रहे, शरीर-निर्वाह हो चाहे न हो—इस तरफ वह बेपरवाह रहता है। यही उसका निःस्पृह होना है।

निःस्पृह होनेका अर्थ यह नहीं है कि वह निर्वाहकी

श्लोक ७१ ] * साधक-संजीवनी * १६१

वस्तुओंका सेवन करता ही नहीं। वह निर्वाहकी वस्तुओंका

सेवन भी करता है, पथ्य-कुपथ्यका भी ध्यान रखता है

अर्थात् पहले साधनास्थामें शरीर आदिके साथ जैसा

व्यवहार करता था, वैसा ही व्यवहार अब भी करता है;

परन्तु शरीर बना रहे तो अच्छा है, जीवन-निर्वाहकी वस्तुएँ

मिलती रहें तो अच्छा है—ऐसी उसके भीतर कोई परवाह

नहीं होती।

इसी अध्यायके पचपनवें श्लोकमें 'प्रजहाति यदा

कामान्सर्वान्' पदोंसे कामना-त्यागकी जो बात कही थी,

वही बात यहाँ 'विहाय कामान्यः सर्वान्' पदोंसे कही है।

इसका तात्पर्य है कि कर्मयोगमें सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग

किये बिना कोई स्थितप्रज्ञ नहीं हो सकता; क्योंकि

कामनाओंके कारण ही संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ा हुआ

है। कामनाओंका सर्वथा त्याग करनेपर संसारके साथ

सम्बन्ध रह ही नहीं सकता।

'निर्ममः'—स्थितप्रज्ञ महापुरुष ममताका सर्वथा त्याग

कर देता है। मनुष्य जिन वस्तुओंको अपनी मानता है, वे

वास्तवमें अपनी नहीं हैं, प्रत्युत संसारसे मिली हुई हैं। मिली

हुई वस्तुको अपनी मानना भूल है। यह भूल मिट जानेपर

स्थितप्रज्ञ वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, शरीर, इन्द्रियाँ आदिमें

ममतारहित हो जाता है।

'निरहङ्कारः'—यह शरीर मैं ही हूँ—इस तरह शरीरसे

तादात्म्य मानना अहंकार है। स्थितप्रज्ञमें यह अहंकार नहीं

रहता। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सभी किसी

प्रकाशमें दीखते हैं और जो 'मैं'-पन है, उसका भी किसी

प्रकाशमें भान होता है। अतः प्रकाशकी दृष्टिसे शरीर,

इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंता ('मैं'-पन)—ये सभी दृश्य हैं।

द्रष्टा दृश्यसे अलग होता है—यह नियम है। ऐसा अनुभव

हो जानेसे स्थितप्रज्ञ निरहंकार हो जाता है।

'स शान्तिमधिगच्छति'—स्थितप्रज्ञ शान्तिको प्राप्त

होता है। कामना, स्पृहा, ममता और अहंतासे रहित होनेपर

शान्ति आकर प्राप्त होती है—ऐसी बात नहीं है, प्रत्युत

शान्ति तो मनुष्यमात्रमें स्वतःसिद्ध है। केवल उत्पन्न एवं

नष्ट होनेवाली वस्तुओंसे सुख भोगनेकी कामना करनेसे,

उनसे ममताका सम्बन्ध रखनेसे ही अशान्ति होती है। जब

संसारकी कामना, स्पृहा, ममता और अहंता सर्वथा छूट

जाती है, तब स्वतःसिद्ध शान्तिका अनुभव हो जाता है।

इस श्लोकमें कामना, स्पृहा, ममता और अहंता—इन

चारोंमें अहंता ही मुख्य है। कारण कि एक अहंताके

निषेधसे सबका निषेध हो जाता है अर्थात् यदि 'मैं'-पन

ही नहीं रहेगा, तो फिर 'मेरा'-पन कैसे रहेगा और कामना

भी कौन करेगा और किसलिये करेगा?

जब 'निरहङ्कारः' कहनेमात्रसे कामना आदिका त्याग

उसके अन्तर्गत आ जाता था, तो फिर कामना आदिके

त्यागका वर्णन क्यों किया? इसका उत्तर यह है कि कामना,

स्पृहा, ममता और अहंता—इन चारोंमें कामना स्थूल है।

कामनासे सूक्ष्म स्पृहा, स्पृहासे सूक्ष्म ममता और ममतासे

सूक्ष्म अहंता है। अतः साधक पहले कामना, स्पृहा और

ममताका त्याग कर दे तो अहंताका त्याग करना उसके लिये

सुगम हो जायगा।

शास्त्रीय दृष्टिसे पहले कामनाका त्याग, फिर स्पृहा,

ममता और अहंकारका त्याग बताया जाता है। परन्तु

साधककी दृष्टिसे पहले ममताका त्याग, फिर कामना,

स्पृहा और अहंकारका त्याग करना ही ठीक है। ममता

प्राप्त वस्तुकी और कामना अप्राप्त वस्तुकी होती है। सबसे

पहले ममताका त्याग करना सुगम पड़ता है। मनुष्य पहले

ममतासे अर्थात् प्राप्त वस्तुके सम्बन्धसे ही फँसता है। पहले

ममताका त्याग करनेसे निष्काम होनेकी सामर्थ्य आ जाती

है, कामनाका त्याग करनेसे निःस्पृह होनेकी सामर्थ्य आ

जाती है और स्पृहाका त्याग करनेसे निरहंकार होनेकी

सामर्थ्य आ जाती है। शास्त्रीय दृष्टिके अनुसार चलनेसे

मनुष्य पण्डित हो जाता है और साधककी दृष्टिके अनुसार

चलनेसे मनुष्यको अनुभव हो जाता है।

अहंता-ममतासे रहित होनेका उपाय

कर्मयोगकी दृष्टिसे—'मेरा कुछ नहीं है'; क्योंकि मेरा

किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना, अवस्था आदिपर

स्वतन्त्र अधिकार नहीं है। जब मेरा कुछ नहीं है तो 'मेरेको

कुछ नहीं चाहिये'; क्योंकि अगर शरीर मेरा है तो मेरेको

अन्न, जल, वस्त्र आदिकी आवश्यकता है, पर जब शरीर

मेरा है ही नहीं, तो मेरेको किसीकी कुछ भी आवश्यकता

नहीं है। जब मेरा कुछ नहीं और मेरेको कुछ नहीं चाहिये,

तो फिर 'मैं' क्या रहा? क्योंकि 'मैं' तो किसी वस्तु,

शरीर, स्थिति आदिको पकड़नेसे ही होता है।

मेरे कहलानेवाले शरीर आदिका संसारके साथ

सर्वथा अभिन्न सम्बन्ध है। इसलिये अपने कहलानेवाले शरीर

आदिसे जो कुछ करना है, वह सब केवल संसारके हितके

लिये ही करना है; क्योंकि मेरेको कुछ चाहिये ही नहीं। ऐसा

भाव होनेपर 'मैं'-का एकदेशीयपना आप-से-आप मिट

१६२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

जाता है और कर्मयोगी अहंता-ममतासे रहित हो जाता है।

सांख्ययोगकी दृष्टिसे —प्राणिमात्रको 'मैं हूँ' इस प्रकार अपने स्वरूपकी स्वतःसिद्ध सत्ता-(होनापन-) का ज्ञान रहता है। इसमें 'मैं' तो प्रकृतिका अंश है और 'हूँ' सत्ता है। यह 'हूँ' वास्तवमें 'मैं' को लेकर है। अगर 'मैं' न रहे, तो 'हूँ' नहीं रहेगा, प्रत्युत 'है' रहेगा।

'मैं हूँ', 'तू है', 'यह है' और 'वह है'—ये चारों व्यक्ति और देश-कालको लेकर हैं। अगर इन चारोंको अर्थात् व्यक्ति और देश-कालको न पकड़ें तो केवल 'है' ही रहेगा—'है' में ही स्थिति रहेगी। 'है' में स्थिति होनेसे

परिशिष्ट भाव —पहले 'सोऽमृतत्वाय कल्पते' (२।१५) कहकर ज्ञानयोगकी सिद्धि (पूर्णता) बतायी थी, अब 'स शान्तिमधिगच्छति' कहकर कर्मयोगकी सिद्धि बताते हैं। तात्पर्य है कि चिन्मयता (स्वरूप) में स्थिति होनेसे अमृतकी प्राप्ति होती है और जड़ता (अहंता) के त्यागसे शान्तिकी प्राप्ति होती है।

अहंता अपने स्वरूपमें मानी हुई है, वास्तवमें है नहीं। अगर यह वास्तवमें होती तो हम कभी निरहंकार नहीं हो सकते थे और भगवान् भी निरहंकार होनेकी बात नहीं कहते। परन्तु भगवान् 'निरहङ्कारः' कहते हैं, अतः हम अहंकाररहित हो सकते हैं। हमारा अनुभव भी है कि वास्तवमें स्वरूप अहंकाररहित है। सुषुप्तिके समय अहम्के अभावका और स्वयं (अपनी सत्ता) के भावका अनुभव सबको होता है, जिसका स्पष्ट बोध जगनेपर होता है। सुषुप्तिमें अहम् अविद्यामें लीन हो जाता है, पर स्वयं रहता है। इसलिये सुषुप्तिसे जगनेपर (उसकी स्मृतिसे) हम कहते हैं कि 'मैं ऐसे सुखसे सोया कि मेरेको कुछ पता नहीं था।' इस स्मृतिसे सिद्ध होता है कि सुखका अनुभव करनेवाला और 'कुछ पता नहीं था' यह कहनेवाला तो था ही! नहीं तो सुखका अनुभव किसको हुआ और 'कुछ पता नहीं था'—यह बात किसने जानी? अतः 'कुछ पता नहीं था'—यह अहम्का अभाव है और इसका ज्ञान जिसको है, वह अहंरहित स्वरूप है।

एक स्त्रीकी नथ कुर्पमें गिर गयी। उसको निकालनेके लिये एक आदमी कुर्पमें उतरा और जलके भीतर जाकर उस नथको ढूँढने लगा। ढूँढते-ढूँढते वह नथ उसके हाथ लग गयी तो उसको बड़ी प्रसन्नता हुई। परन्तु उस समय वह कुछ बोल नहीं सका; क्योंकि वाणी (अग्नि) और जलका आपसमें विरोध है। अतः जलसे बाहर आनेपर ही वह बोल सका कि 'नथ मिल गयी।' ऐसे ही सुषुप्तिमें अहम्के लीन होनेपर मनुष्य सुखका अनुभव तो करता है, पर उसको व्यक्त नहीं कर सकता; क्योंकि बोलनेका साधन नहीं रहा। सुषुप्तिसे जगनेपर ही उसको सुषुप्तिके सुखकी स्मृति होती है। स्मृति अनुभवजन्य होती है—'अनुभवजन्य ज्ञानं स्मृतिः'।

इस प्रकार सुषुप्तिमें अहम्के अभावका अनुभव तो सबको होता है, पर अपने अभावका अनुभव किसीको कभी नहीं होता। अहंकार हमारे बिना नहीं रह सकता, पर हम (स्वयं) अहंकारके बिना रह सकते हैं और रहते ही हैं। हमारा स्वरूप चिन्मय सत्तामात्र है। इस नित्य सत्ताको किसीकी अपेक्षा नहीं है, पर सत्ताकी अपेक्षा सबको है। अगर हम अहम्से अलग न होते, अहंकाररूप ही होते तो सुषुप्तिमें अहंकारके लीन होनेपर हम भी नहीं रहते। अतः अहंकारके बिना भी हमारा होनापन सिद्ध होता है। जाग्रत् और स्वप्नमें अहम् प्रकट रहता है और सुषुप्तिमें अहम् लीन हो जाता है, पर हम स्वयं निरन्तर रहते हैं। जो प्रकट और लीन नहीं होता, वही हमारा स्वरूप है।

कामनाका त्याग होनेपर भी शरीरनिर्वाहमात्रके लिये कुछ-न-कुछ वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदिकी आवश्यकता रह जाती है, जिसको 'सृष्टा' कहते हैं। स्थितप्रज्ञ महापुरुषमें शरीरनिर्वाहमात्रकी आवश्यकताका तो कहना ही क्या, शरीरकी भी आवश्यकता नहीं रहती। कारण कि शरीरकी आवश्यकता ही मनुष्यको पराधीन बनाती है। आवश्यकता तभी पैदा होती है, जब मनुष्य उस वस्तुको स्वीकार कर लेता है, जो अपनी नहीं है। कर्मयोगी किसी भी वस्तुको अपनी और अपने लिये नहीं मानता, प्रत्युत संसारकी और संसारके लिये ही मानता है। इसलिये उसको किसी भी वस्तुकी आवश्यकता नहीं रहती।

सांख्ययोगी अहंता-ममतासे रहित हो जाता है।

भक्तियोगकी दृष्टिसे —जिसको 'मैं' और 'मेरा' कहते हैं, वह सब प्रभुका ही है। कारण कि मेरी कहलानेवाली वस्तुपर मेरा किंचिन्मात्र भी अधिकार नहीं है; परन्तु प्रभुका उसपर पूरा अधिकार है। वे जिस तरह वस्तुको रखते हैं, जैसा रखना चाहते हैं वैसा ही होता है। अतः यह सब कुछ प्रभुका ही है। इसको प्रभुकी ही सेवामें लगाना है। मेरे पास जो शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि है, यह भी उन्हींकी है और मैं भी उन्हींका हूँ। ऐसा भाव होनेपर भक्तियोगी अहंता-ममतासे रहित हो जाता है।

श्लोक ७२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१६३

‘कामना’ और ‘स्मृहा’—दोनोंका त्याग करनेका तात्पर्य है कि वस्तुओंकी कामना भी न हो और निर्वाहमात्रकी कामना (शरीरकी आवश्यकता) भी न हो। कारण कि निर्वाहमात्रकी कामना भी सुखभोग ही है। इतना ही नहीं, शान्ति, मुक्ति, तत्त्वज्ञान आदिको प्राप्त करनेकी इच्छा भी कामना है। अतः निष्कामभावमें मुक्तितककी भी कामना नहीं होनी चाहिये।

इस श्लोकमें अपरा प्रकृतिका निषेध है। जीवने अहंकारके कारण अपरा प्रकृति (जगत्) को धारण किया है—‘ययेदं धारयते जगत्’ (गीता ७।५)। अतः निरहंकार होनेपर अपरा प्रकृतिका निषेध (सम्बन्ध-विच्छेद) हो जाता है और जीव जन्म-मरणरूप बन्धनसे मुक्त हो जाता है। सबका त्याग होनेपर भी अहंकार शेष रह जाता है, पर अहंकारका त्याग होनेपर सबका त्याग हो जाता है।

सम्बन्ध—कामना, स्मृहा, ममता और अहंतासे रहित होनेपर उसकी क्या स्थिति होती है—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हुए इस विषयका उपसंहार करते हैं।

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।

स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥

पार्थ= हे पृथानन्दन !कोई)अपि= भी
एषा= यहन, विमुह्यति= मोहित नहींस्थित्वा
ब्राह्मी= ब्राह्मीहोता ।(तो)
स्थितिः= स्थिति है ।अस्याम्= इस स्थितिमेंब्रह्मनिर्वाणम्
एनाम्= इसको(यदि)ब्रह्मकी
प्राप्य= प्राप्त होकर (कभीअन्तकाले= अन्तकालमेंऋच्छति

व्याख्या—‘एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ’— यह ब्राह्मी स्थिति है अर्थात् ब्रह्मको प्राप्त हुए मनुष्यकी स्थिति है। अहंकाररहित होनेसे जब व्यक्तित्व मिट जाता है, तब उसकी स्थिति स्वतः ही ब्रह्ममें होती है। कारण कि संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही व्यक्तित्व था। उस सम्बन्धको सर्वथा छोड़ देनेसे योगीकी अपनी कोई व्यक्तिगत स्थिति नहीं रहती।

अत्यन्त नजदीकका वाचक होनेसे यहाँ ‘एषा’ पद पूर्वश्लोकमें आये ‘विहाय कामान्’, ‘निःस्मृहः’, ‘निर्ममः’ और ‘निरहङ्कारः’ पदोंका लक्ष्य करता है।

भगवान्के मुखसे ‘तेरी बुद्धि जब मोहकलिल और श्रुतिविप्रतिपत्तिसे तर जायगी, तब तू योगको प्राप्त हो जायगा’—ऐसा सुनकर अर्जुनके मनमें यह जिज्ञासा हुई कि वह स्थिति क्या होगी ? इसपर अर्जुनने स्थितप्रज्ञके विषयमें चार प्रश्न किये। उन चारों प्रश्नोंका उत्तर देकर भगवान्ने यहाँ वह स्थिति बतायी कि वह ब्राह्मी स्थिति है। तात्पर्य है कि वह व्यक्तिगत स्थिति नहीं है अर्थात् उसमें व्यक्तित्व

नहीं रहता। वह नित्ययोगकी प्राप्ति है। उसमें एक ही तत्त्व रहता है। इस विषयकी तरफ लक्ष्य करनेके लिये ही यहाँ ‘पार्थ’ सम्बोधन दिया गया है।

‘नैनां प्राप्य विमुह्यति’— जबतक शरीरमें अहंकार रहता है, तभीतक मोहित होनेकी सम्भावना रहती है। परन्तु जब अहंकारका सर्वथा अभाव होकर ब्रह्ममें अपनी स्थितिका अनुभव हो जाता है, तब व्यक्तित्व टूटनेके कारण फिर कभी मोहित होनेकी सम्भावना नहीं रहती।

सत् और असत्को ठीक तरहसे न जानना ही मोह है। तात्पर्य है कि स्वयं सत् होते हुए भी असत्के साथ अपनी एकता मानते रहना ही मोह है। जब साधक असत्को ठीक तरहसे जान लेता है, तब असत्से उसका सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है* और सत्में अपनी वास्तविक स्थितिका अनुभव हो जाता है। इस स्थितिका अनुभव होनेपर फिर कभी मोह नहीं होता (गीता—चौथे अध्यायका पैंतीसवाँ श्लोक)।

‘स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति’— यह मनुष्य-शरीर केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है।

  • असत्को जाननेसे असत्को निवृत्ति हो जाती है; क्योंकि असत्की स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। सत्से ही असत्को सत्ता मिलती है। अगर असत्को जाननेसे असत्की निवृत्ति न हो तो वास्तवमें असत्को जाना ही नहीं है; प्रत्युत सीखा है। सीखे हुए ज्ञानसे असत्की निवृत्ति नहीं होती; क्योंकि मनमें असत्की सत्ता रहती है।

१६४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

इसलिये भगवान् यह मौका देते हैं कि साधारण-से-साधारण और पापी-से-पापी व्यक्ति ही क्यों न हो, अगर वह अन्तकालमें भी अपनी स्थिति परमात्मामें कर ले अर्थात् जड़तासे अपना सम्बन्ध-विच्छेद कर ले, तो उसे भी निर्वाण (शान्त) ब्रह्मकी प्राप्ति हो जायगी, वह जन्म-मरणसे मुक्त हो जायगा। ऐसी ही बात भगवान्ने सातवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें कही है कि 'अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ एक भगवान् ही हैं—ऐसा प्रयाणकालमें भी मेरेको जो जान लेते हैं, वे मेरेको यथार्थरूपसे जान लेते हैं अर्थात् मेरेको प्राप्त हो जाते हैं।' आठवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें कहा कि 'अन्तकालमें मेरा स्मरण करता हुआ कोई प्राण छोड़ता है, वह मेरेको ही प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है।'

दूसरी बात, उपर्युक्त पदोंसे भगवान् उस ब्राह्मी स्थितिकी महिमाका वर्णन करते हैं कि इसमें यदि अन्तकालमें भी कोई स्थित हो जाय, तो वह शान्त ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। जैसे समबुद्धिके विषयमें भगवान्ने कहा था कि इसका थोड़ा-सा भी अनुष्ठान महान् भयसे रक्षा कर लेता है (दूसरे अध्यायका चालीसवाँ श्लोक), ऐसे ही यहाँ कहते हैं कि अन्तकालमें भी ब्राह्मी स्थिति हो जाय, जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाय, तो निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। इस स्थितिका अनुभव होनेमें जड़ताका राग ही बाधक है। यह राग अन्तकालमें भी कोई छोड़ देता है तो उसको अपनी स्वतःसिद्ध वास्तविक स्थितिका अनुभव हो जाता है। यहाँ यह शंका हो सकती है कि जो अनुभव उभ्रभरमें नहीं हुआ, वह अन्तकालमें कैसे होगा? अर्थात् स्वस्थ अवस्थामें तो साधककी बुद्धि स्वस्थ होगी, विचार-शक्ति होगी, सावधानी होगी तो वह ब्राह्मी स्थितिका अनुभव कर लेगा; परन्तु अन्तकालमें प्राण छूटते समय बुद्धि विकल हो जाती है, सावधानी नहीं रहती—ऐसी अवस्थामें ब्राह्मी स्थितिका अनुभव कैसे होगा? इसका समाधान यह है कि मृत्युके समयमें जब प्राण छूटते हैं, तब शरीर आदिसे स्वतः ही सम्बन्ध-विच्छेद होता है। यदि उस समय उस स्वतःसिद्ध तत्त्वकी तरफ लक्ष्य हो जाय, तो उसका अनुभव सुगमतासे हो जाता है। कारण कि निर्विकल्प अवस्थाकी प्राप्तिमें तो बुद्धि, विवेक आदिकी आवश्यकता है, पर अवस्थातीत तत्त्वकी प्राप्तिमें केवल लक्ष्यकी आवश्यकता है।* वह लक्ष्य

चाहे पहलेके अभ्याससे हो जाय, चाहे किसी शुभ संस्कारसे हो जाय, चाहे भगवान् या सन्तकी अहेतुकी कृपासे हो जाय, लक्ष्य होनेपर उसकी प्राप्ति स्वतःसिद्ध है।

यहाँ 'अपि' पदका तात्पर्य है कि अन्तकालसे पहले अर्थात् जीवित-अवस्थामें यह स्थिति प्राप्त कर ले तो वह जीवन्मुक्त हो जाता है; परन्तु अगर अन्तकालमें भी यह स्थिति हो जाय अर्थात् निर्मम-निरहंकार हो जाय तो वह भी मुक्त हो जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि यह स्थिति तत्काल हो जाती है। स्थितिके लिये अभ्यास करने, ध्यान करने, समाधि लगानेकी किंचिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं है।

भगवान्ने यहाँ कर्मयोगके प्रकरणमें 'ब्रह्मनिर्वाणम्' पद दिया है। इसका तात्पर्य है कि जैसे सांख्ययोगीको निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति होती है (गीता—पाँचवें अध्यायके चौबीसवेंसे छठ्ठीसवें श्लोकतक), ऐसे ही कर्मयोगीको भी निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। इसी बातको पाँचवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें कहा है कि सांख्ययोगीद्वारा जो स्थान प्राप्त किया जाता है, वही स्थान कर्मयोगीद्वारा भी प्राप्त किया जाता है।

विशेष बात

जड़ और चेतन—ये दो पदार्थ हैं। प्राणिमात्रका स्वरूप चेतन है, पर उसने जड़का संग किया हुआ है। जड़की तरफ आकर्षण होना पतनकी तरफ जाना है और चिन्मय-तत्त्वकी तरफ आकर्षण होना उत्थानकी तरफ जाना है, अपना कल्याण करना है। जड़की तरफ जानेमें 'मोह' की मुख्यता होती है और परमात्मतत्त्वकी तरफ जानेमें 'विवेक' की मुख्यता होती है।

समझनेकी दृष्टिसे मोह और विवेकके दो-दो विभाग कर सकते हैं—(१) अहंता-ममतायुक्त मोह एवं कामनायुक्त मोह, (२) सत्-असत्का विवेक एवं कर्तव्य-अकर्तव्यका विवेक।

प्राप्त वस्तु, शरीरादिमें अहंता-ममता करना—यह अहंता-ममतायुक्त मोह है और अप्राप्त वस्तु, घटना, परिस्थिति आदिकी कामना करना—यह कामनायुक्त मोह है। शरीरी (शरीरमें रहनेवाला) अलग है और शरीर अलग है, शरीरी सत् है और शरीर असत् है, शरीरी चेतन

  • निर्विकल्प-अवस्थाकी प्राप्तिमें ही अभ्यास, विचार, निदिध्यासन आदि काम करते हैं, पर निर्विकल्प बोध (अवस्थातीत ब्राह्मी स्थिति) की प्राप्तिमें बुद्धि काम नहीं करती। उसमें बुद्धि छूट जाती है। कारण कि निर्विकल्प बोध करण-निरपेक्ष है अर्थात् उसमें करणकी किंचिन्मात्र भी अपेक्षा नहीं है। उसकी प्राप्तिमें करणसे सम्बन्ध-विच्छेद ही कारण है।

श्लोक ७२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१६५

है और शरीर जड़ है—इसको ठीक तरहसे अलग-अलग जानना सत्-असत्का विवेक है और कर्तव्य क्या है, अकर्तव्य क्या है, धर्म क्या है, अधर्म क्या है—इसको ठीक तरहसे समझकर उसके अनुसार कर्तव्य करना और अकर्तव्यका त्याग करना कर्तव्य-अकर्तव्यका विवेक है।

पहले अध्यायमें अर्जुनको भी दो प्रकारका मोह हो गया था, जिसमें प्राणिमात्र फँसे हुए हैं। अहंताको लेकर 'हम दोनोंको जाननेवाले धर्मात्मा हैं' और ममताको लेकर 'ये कुटुम्बी मर जायेंगे'—यह अहंता-ममतायुक्त मोह हुआ। हमें पाप न लगे, कुलके नाशका दोष न लगे, मित्रद्रोहका पाप न लगे, नरकोंमें न जाना पड़े, हमारे पितरोंका पतन न हो—यह कामनायुक्त मोह हुआ।

उपर्युक्त दोनों प्रकारके मोहको दूर करनेके लिये भगवान्ने दूसरे अध्यायमें दो प्रकारका विवेक बताया है—शरीरी-शरीरका, सत्-असत्का विवेक (दूसरे अध्यायके ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक) और कर्तव्य-अकर्तव्यका विवेक (दूसरे अध्यायके इकतीसवेंसे तिरपनवें श्लोकतक)।

शरीरी-शरीरका विवेक बताते हुए भगवान्ने कहा कि मैं, तू और ये राजा लोग पहले नहीं थे—यह बात भी नहीं और आगे नहीं रहेंगे—यह बात भी नहीं अर्थात् हम सभी पहले भी थे और आगे भी रहेंगे तथा ये शरीर पहले

परिशिष्ट भाव —निर्मम और निरहंकार होनेसे साधकका असत्-विभागसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और सत्-विभागमें अर्थात् ब्रह्ममें अपनी स्वतः-स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो जाता है, जिसको 'ब्राह्मी स्थिति' कहते हैं। इस ब्राह्मी स्थितिको प्राप्त होनेपर शरीरका कोई मालिक नहीं रहता अर्थात् शरीरको मैं-मेरा कहनेवाला कोई नहीं रहता, व्यक्ति मिट जाता है। तात्पर्य यह हुआ कि हमारी स्थिति अहंकारके आश्रित नहीं है। अहंकारके मिटनेपर भी हमारी स्थिति रहती है, जो 'ब्राह्मी स्थिति' कहलाती है। एक बार इस ब्राह्मी स्थिति (नित्ययोग) का अनुभव होनेपर फिर कभी मोह नहीं होता (गीता—चौथे अध्यायका पैंतीसवाँ श्लोक)। अगर अन्तकालमें भी मनुष्य निर्मम-निरहंकार होकर ब्राह्मी स्थितिका अनुभव कर ले तो उसको तत्काल निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है।

निर्मम-निरहंकार होनेसे ब्रह्मकी प्राप्ति, तत्त्वज्ञान हो जाता है। फिर मनुष्य ममतारहित, कामनारहित और कर्तृत्वरहित हो जाता है। कारण कि जीवने अहमके कारण ही जगत्को धारण किया है—'अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते' (गीता ३।२७), 'जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्' (गीता ७।५)। यदि वह अहमका त्याग कर दे तो फिर जगत् नहीं रहेगा। ब्रह्मकी प्राप्ति होनेपर (अगर भक्तिके संस्कार हों तो) समग्र परमात्माकी प्राप्ति स्वतः हो जाती है, क्योंकि समग्र परमात्मा ब्रह्मकी प्रतिष्ठा हैं।

मेरा कुछ नहीं है—इसको स्वीकार करनेसे मनुष्य 'निर्मम' हो जाता है, मेरेको कुछ नहीं चाहिये—इसको स्वीकार करनेसे मनुष्य 'निष्काम' हो जाता है। मेरेको अपने लिये कुछ नहीं करना है—इसको स्वीकार करनेसे मनुष्य 'निरहंकार' हो जाता है।

भी नहीं थे और आगे भी नहीं रहेंगे तथा बीचमें भी प्रतिक्षण बदल रहे हैं। जैसे शरीरमें कुमार, युवा और वृद्धावस्था— ये अवस्थाएँ बदलती हैं और जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंको छोड़कर नये वस्त्र धारण करता है, ऐसे ही जीव पहले शरीरको छोड़कर दूसरा शरीर धारण करता है, यह तो अकाट्य नियम है। इसमें चिन्ताकी, शोककी बात ही क्या है ?

कर्तव्य-अकर्तव्यका विवेक बताते हुए भगवान्ने कहा कि क्षत्रियके लिये युद्धसे बढ़कर कोई धर्म नहीं है। अनायास प्राप्त हुआ युद्ध स्वर्गप्राप्तिका खुला दरवाजा है। तू युद्धरूप स्वधर्मका पालन नहीं करेगा तो तुझे पाप लगेगा। यदि तू जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान करके युद्ध करेगा तो तुझे पाप नहीं लगेगा। तेरा तो कर्तव्य-कर्म करनेमें ही अधिकार है, फलमें कभी नहीं। तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और कर्म न करनेमें भी तेरी आसक्ति न हो। इसलिये तू कर्मोंकी सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर और समतामें स्थित होकर कर्मोंको कर; क्योंकि समता ही योग है। जो मनुष्य समबुद्धिसे युक्त होकर कर्म करता है, वह जीवित-अवस्थामें ही पुण्य-पापसे रहित हो जाता है।

जब तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदलको और श्रुतिविप्रति-पत्तिको पार कर जायगी, तब तू योगको प्राप्त हो जायगा।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे साङ्ख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

१६६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ‘सांख्ययोग’ नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ।

कर्मयोग, सांख्ययोग, भक्तियोग आदि सभी साधनोंमें विवेककी बड़ी आवश्यकता है। सांख्ययोगमें इस विवेककी मुख्यता है और सांख्ययोगसे ही भगवान्ने अपना उपदेश आरम्भ किया है; अतः इस अध्यायका नाम ‘सांख्ययोग’ रखा गया है।

दूसरे अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

(१) इस अध्यायमें ‘अथ द्वितीयोऽध्यायः’ के तीन, ‘संजय उवाच’, ‘श्रीभगवानुवाच’ आदि पदोंके चौदह, श्लोकोंके नौ सौ सत्तावन और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग नौ सौ सत्तासी है।

(२) इस अध्यायमें ‘अथ द्वितीयोऽध्यायः’ के सात, ‘संजय उवाच’, ‘श्रीभगवानुवाच’ आदि पदोंके पैतालिस, श्लोकोंके दो हजार चार सौ तीन और पुष्पिकाके पैतालिस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग दो हजार पाँच सौ है। इस अध्यायके बहतर श्लोकोंमेंसे पाँचवाँ, सातवाँ, आठवाँ, बीसवाँ, बाईसवाँ और सत्तरवाँ—ये छः श्लोक चौवालीस अक्षरोंके, छठ श्लोक छियालीस अक्षरोंका और उन्तीसवाँ श्लोक पैतालिस अक्षरोंका है। शेष चौंसठ श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें सात उवाच हैं—दो ‘संजय उवाच’, तीन ‘श्रीभगवानुवाच’ और दो ‘अर्जुन उवाच’।

दूसरे अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायके बहतर श्लोकोंमेंसे पाँचवाँ, छठ, सातवाँ, आठवाँ, बीसवाँ, बाईसवाँ, उन्तीसवाँ और सत्तरवाँ—ये आठ श्लोक ‘उपजाति’ छन्दवाले हैं। दूसरे अध्यायमें बावनवाँ और सड़सठवाँ श्लोकके प्रथम चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘न-विपुला’; बारहवाँ, छब्बीसवाँ और बत्तीसवाँ श्लोकके प्रथम चरणमें तथा इकसठवाँ और तिरसठवाँ श्लोकके तृतीय चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘र-विपुला’; छत्तीसवाँ और छप्पनवाँ श्लोकके प्रथम चरणमें ‘भगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘भ-विपुला’; इकहत्तरवाँ श्लोकके प्रथम चरणमें और इकत्तीसवाँ श्लोकके तृतीय चरणमें ‘मगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘म-विपुला’; छियालीसवाँ श्लोकके प्रथम चरणमें ‘सगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘स-विपुला’; पैतीसवाँ श्लोकके प्रथम और तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘जातिपक्ष-विपुला’ और सैतालीसवाँ श्लोकके प्रथम चरणमें ‘भगण’ तथा तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘संकीर्ण-विपुला’ संज्ञावाले छन्द हैं। शेष उनचास श्लोक ठीक ‘पध्यावक्त्र’ अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

अथ तृतीयोऽध्यायः

अवतरणिका—

श्रीमद्भगवद्गीताका उपदेश मनुष्यमात्रके अनुभवपर आधारित है। इसका दिव्य उपदेश (दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकसे) आरम्भ करनेपर सबसे पहले भगवान् यह स्पष्ट करते हैं कि शरीर और शरीरी एक-दूसरेसे सर्वथा भिन्न हैं। शरीर अनित्य, असत्, एकदेशीय और नाशवान् है तथा शरीरी नित्य, सत्, सर्वव्यापी और अविनाशी है। अतः नाशवान् वस्तुका विनाश देखकर दुःखी नहीं होना और अविनाशी वस्तुको अविनाशिता देखकर उसे बनाये रखनेकी इच्छा नहीं करना 'विवेक' कहा जाता है। कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों ही योगमार्गोंमें विवेककी बड़ी आवश्यकता है। 'मैं शरीरसे सर्वथा भिन्न हूँ'—ऐसा विवेक होनेपर ही मुक्तिकी अभिलाषा जाग्रत् होती है। मुक्तिकी बात तो दूर रही, स्वर्गादिकी प्राप्तिकी कामना भी अपनेको शरीरसे अलग माननेपर ही उत्पन्न होती है। इसीलिये भगवान्ने अपने उपदेशका आरम्भ करते ही सबसे पहले विवेकका ही वर्णन किया है।

गीताका उपर्युक्त विवेक-प्रकरण दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकसे प्रारम्भ होकर तीसवें श्लोकपर समाप्त होता है। विवेकके इस प्रकरणमें भगवान्ने आत्मा, अनात्मा, प्रकृति, पुरुष, ब्रह्म, अविद्या, ईश्वर, जीव, जगत्, माया आदि किसी भी दार्शनिक शब्दका प्रयोग नहीं किया है, प्रत्युत सभी मनुष्य सरलतासे समझ सकें, ऐसे ढंगसे भगवान्ने उसका विवेचन किया है। इसका तात्पर्य यह है कि मात्र मनुष्य परमात्मप्राप्तिके अधिकारी हैं; क्योंकि मनुष्यशरीर परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। अतः उपर्युक्त विवेकको महत्त्व देकर मात्र मनुष्य परमात्मप्राप्ति कर सकते हैं।

इस प्रकरणमें भगवान्ने 'बुद्धि' शब्दका प्रयोग भी नहीं किया है। वास्तवमें नित्य और अनित्य, सत् और असत्, अविनाशी और विनाशी, शरीरी और शरीरको अलग-अलग समझनेके लिये 'विवेक' की ही आवश्यकता है 'बुद्धि' की नहीं। विवेक बुद्धिसे परे है। जैसे प्रकृति और पुरुष अनादि हैं (गीता—तेरहवें अध्यायका उन्नीसवें श्लोक), ऐसे ही उनकी भिन्नताको प्रकट करनेवाला विवेक भी अनादि है। यही विवेक बुद्धिमें प्रकट होता है। यह भगवत्प्रदत्त विवेक मात्र प्राणियोंको नित्यप्राप्त है। पशु-पक्षी भी खाद्य-अखाद्य पदार्थोंकी भिन्नताको जानते हैं। लता-वृक्षमें भी सरदी-गरमी, अनुकूलता-प्रतिकूलताकी भिन्नताका ज्ञान रहता है। बुद्धिप्रधान होनेके कारण मनुष्यको यह विवेक विशेषरूपसे प्राप्त है। पशु-पक्षी आदिमें तो जीवन-निर्वाहमात्रके लिये जड़-पदार्थोंका विवेक रहता है, पर मनुष्य अपने विवेकसे सदाके लिये जन्म-मरणरूप बन्धनसे मुक्त होकर शाश्वत शान्ति प्राप्त कर सकता है। यही मनुष्यके विवेककी विशेषता है।

विवेक जाग्रत् होनेपर अर्थात् शरीर और शरीरीकी भिन्नताका अनुभव होनेपर अपने कहलानेवाले शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसहित संसारका सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, जो कि वास्तवमें है और बुद्धि शुद्ध तथा सम हो जाती है अर्थात् बुद्धिका विषमभाव मिट जाता है।

कर्मयोगमें बुद्धिके एक निश्चयकी प्रधानता है—'व्यवसायात्मिका बुद्धिरुकेह' (गीता २।४१)*। मनुष्यका जब अपने कल्याण अथवा परमात्मप्राप्तिका ही एक निश्चय हो जाता है, तब उसे अनुकूलता और प्रतिकूलता बाधा नहीं पहुँचाती और इस प्रकार बिना कुछ किये ही उसकी बुद्धि स्वतः सम होने लगती है। बुद्धिको सम करनेके लिये तभीतक कहा जाता है, जबतक बुद्धिमें संसारका महत्त्व, आकर्षण, खिंचाव रहता है। एक निश्चयात्मिका बुद्धि हो

  • सांख्ययोगमें विवेककी, भक्तियोगमें श्रद्धा-विश्वासकी एवं कर्मयोगमें निश्चयात्मिका बुद्धिकी प्रधानता रहती है। कर्मयोगमें विवेक तथा श्रद्धा-विश्वास न होते हैं—ऐसा नहीं है, पर मुख्यता एक निश्चयात्मिका बुद्धिकी रहती है। ऐसे ही सांख्ययोग एवं भक्तियोगमें भी एक निश्चयात्मिका बुद्धि रहती है।

१६८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ३ ]

जानेपर संसारका महत्त्व, आकर्षण, खिंचाव स्वतः मिटने लग जाता है। ऐसी निश्चयात्मिका बुद्धि होनेमें भोग और संग्रहकी आसक्तिको महान् बाधक बताया गया है (गीता—दूसरे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक)।

इस तरह कर्मयोगमें निश्चयात्मिका बुद्धिकी अत्यन्त आवश्यकता बतानेके बाद भगवान् अर्जुनको समभावपूर्वक कर्तव्यकर्म करनेके लिये विशेषरूपसे कहते हैं; जैसे—‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ (२। ४७), ‘योगस्थः कुरु कर्माणि’ (२। ४८) ‘तेरा कर्म करनेमें ही अधिकार है’, ‘समतामें स्थित हुआ तू कर्मोंको कर’। इसके साथ यह भी कहते हैं कि ‘दूरेण ह्यवर्ं कर्म बुद्धियोगात्’ (२। ४९) ‘बुद्धियोग-(समता-) से सकामकर्म अत्यन्त तुच्छ है’, आगे कहते हैं—‘बुद्धौ शरणमन्विच्छ’ (२। ४९), ‘बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥’ (२। ५०) ‘तू समबुद्धिका आश्रय ग्रहण कर’ ‘समतापूर्वक कर्म करनेवाला पुरुष पाप और पुण्य—दोनोंका यहाँ जीवित-अवस्थामें ही त्याग कर देता है, इसलिये तू समताकी प्राप्तिके लिये ही प्रयत्न कर; क्योंकि समता ही कर्मोंमें चतुरता है।’

अर्जुनके मनमें युद्ध न करनेका आग्रह पहलेसे ही था। पहले अध्यायके इकतीसवाँ श्लोकमें अर्जुन कहते हैं—‘युद्धमें अपने कुलको मारकर मैं अपना हित नहीं देखता’—‘न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे।’ फिर पैतालीसवाँ श्लोकमें वे कहते हैं—‘अहो! शोक है कि हमलोग बुद्धिमान् होकर भी युद्धरूप महान् पाप करनेको तैयार हो गये हैं’—‘अहो बत महत्यापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।’ आगे दूसरे अध्यायके पाँचवाँ श्लोकमें अर्जुन कहते हैं—‘मैं भिक्षाका अन्न खाना श्रेष्ठ समझता हूँ, पर युद्ध करना नहीं’—‘श्रेयो भोक्तुं श्वेक्ष्यमपीह लोके’ और नवाँ श्लोकमें तो भगवान्की आज्ञा ‘उत्तिष्ठ परन्तप’ (२। ३) के विरुद्ध अपना निर्णय ही सुना देते हैं कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’—‘न योत्ये’ (गीता २। ९)।

यह नियम है कि अपना आग्रह रखनेसे श्रोता वक्ताकी बातोंका आशय अच्छी तरहसे नहीं समझ सकता। यही कारण है कि अपना (युद्ध न करनेका) आग्रह रखनेसे अर्जुन भी उपर्युक्त प्रकरणमें भगवान्के वचनोंका आशय अच्छी तरहसे नहीं समझ सके। अतः अर्जुनको भगवान्के वचन मिले हुए—से जान पड़ने लगे। इसलिये भगवान्का अभिप्राय क्या है ? वे मेरे कल्याणके लिये कौन-सा साधन श्रेष्ठ समझते हैं— इसका खुलासा करानेके लिये अर्जुन आगेके दो श्लोकोंमें भगवान्से प्रश्न करते हैं।

अर्जुन उवाच

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं कर्माणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥ व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे। तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाजुयाम् ॥ २ ॥

अर्जुन बोले—

जनार्दन= हे जनार्दन!तत्= तो फिरव्यामिश्रेण, इव = (आप अपने)
चेत्= अगरकेशव= हे केशव!मिले हुए—से
ते= आपमाम्= मुझेवाक्येन = वचनोंसे
कर्मणः= कर्मसेघोरे= घोरमे = मेरी
बुद्धिः= बुद्धि (ज्ञान) कोकर्माणि= कर्ममेंबुद्धिम् = बुद्धिको
ज्यायसी= श्रेष्ठकिम्= क्योंमोहयसि, इव = मोहित-सी कर
मता= मानते हैं,नियोजयसि= लगाते हैं ?रहे हैं।

श्लोक १-२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१६१

(अतः आप)

एकम्

= एक बातको

अहम्

= मैं

निश्चित्य

= निश्चय करके

वद

= कहिये,

श्रेयः

= कल्याणको

तत्

= उस

येन

= जिससे

आप्नुयाम्

= प्राप्त हो जाऊँ।

व्याख्या—'जनार्दन'—इस पदसे अर्जुन मानो यह भाव

प्रकट करते हैं कि हे श्रीकृष्ण ! आप सभीकी याचना पूरी

करनेवाले हैं; अतः मेरी याचना तो अवश्य ही पूरी करेंगे।

'ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते ............ नियोजयसि केशव'—

मनुष्यके अन्तःकरणमें एक कमजोरी रहती है कि वह प्रश्न

करके उत्तरके रूपमें भी वक्तासे अपनी बात अथवा

सिद्धान्तका ही समर्थन चाहता है। इसे कमजोरी इसलिये

कहा गया है कि वक्ताके निर्देशका चाहे वह मनोऽनुकूल

हो या सर्वथा प्रतिकूल, पालन करनेका निश्चय ही

शूरवीरता है, शेष सब कमजोरी या कायरता ही कही

जायगी। इस कमजोरीके कारण ही मनुष्यको प्रतिकूलता

सहनेमें कठिनाईका अनुभव होता है। जब वह प्रतिकूलताको

सह नहीं सकता, तब वह अच्छाईका चोला पहन लेता है

अर्थात् तब भलाईके वेशमें बुराई आती है। जो बुराई

भलाईके वेशमें आती है, उसका त्याग करना बड़ा कठिन

होता है। यहाँ अर्जुनमें भी हिंसा-त्यागरूप भलाईके वेशमें

कर्तव्य-त्यागरूप बुराई आयी है। अतः वे कर्तव्य-कर्मसे

ज्ञानको श्रेष्ठ मान रहे हैं। इसी कारण वे यहाँ प्रश्न करते

हैं कि यदि आप कर्मसे ज्ञानको श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर

मुझे युद्धरूप घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं?

भगवान्‌ने दूसरे अध्यायके उनतालीसवें श्लोकमें 'बुद्धियोगे'

पदसे समबुद्धि-(समता-) की ही बात कही थी; परन्तु

अर्जुनने उसको ज्ञान समझ लिया। अतः वे भगवान्‌से कहते

हैं कि हे जनार्दन ! आपने पहले कहा कि 'मैंने सांख्यमें

यह बुद्धि कह दी, इसीको तुम योगके विषयमें सुनो। इस

बुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मबन्धनको छोड़ देगा।' परन्तु

कर्मबन्धन तभी छूटेगा, जब ज्ञान होगा। आपने यह भी कह

दिया कि 'बुद्धियोग अर्थात् ज्ञानसे कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं'

(दूसरे अध्यायका उनचासवाँ श्लोक)। अगर आपकी

मान्यतामें कर्मसे ज्ञान श्रेष्ठ है, उत्तम है, तो फिर मेरेको

शास्त्रविहित यज्ञ, दान, तप आदि शुभ कर्मोंमें भी नहीं

लगाना चाहिये, केवल ज्ञानमें ही लगाना चाहिये। परन्तु

इसके विपरीत आप मेरेको युद्ध-जैसे अत्यन्त क्रूर कर्ममें,

जिसमें दिनभर मनुष्योंकी हत्या करनी पड़े, क्यों लगा रहे हैं?

पहले अर्जुनके मनमें युद्ध करनेका जोश आया हुआ

था और उन्होंने उसी जोशमें भरकर भगवान्‌से कहा कि

'हे अच्युत ! दोनों सेनाओंके बीचमें मेरे रथको खड़ा कर

दीजिये, जिससे मैं यह देख लूँ कि यहाँ मेरे साथ दो हाथ

करनेवाला कौन है।' परन्तु भगवान्‌ने जब दोनों सेनाओंके

बीचमें भीष्म और द्रोणके सामने तथा राजाओंके सामने रथ

खड़ा करके कहा कि 'तू इन कुरुवंशियोंको देख', तब

अर्जुनका कौटुम्बिक मोह जाग्रत् हो गया। मोह जाग्रत्

होनेसे उनकी वृत्ति युद्धसे, कर्मसे उपरत होकर ज्ञानकी

तरफ हो गयी; क्योंकि ज्ञानमें युद्ध-जैसे घोर कर्म नहीं

करने पड़ते। अतः अर्जुन कहते हैं कि आप मेरेको घोर

कर्ममें क्यों लगाते हैं?

यहाँ 'बुद्धिः' पदका अर्थ 'ज्ञान' लिया गया है। अगर

यहाँ 'बुद्धिः' पदका अर्थ 'समबुद्धि' (समता) लिया जाय

तो व्यामिश्र वचन सिद्ध नहीं होगा। कारण कि दूसरे अध्यायके

अड़तालीसवें श्लोकमें भगवान्‌ने अर्जुनको योग-(समता-)

में स्थित होकर कर्म करनेकी आज्ञा दी है। व्यामिश्र वचन

तभी सिद्ध होगा, जब अर्जुनकी मान्यतामें दो बातें हों और

तभी यह प्रश्न बनेगा कि अगर आपकी मान्यतामें कर्मसे

ज्ञान श्रेष्ठ है, तो फिर मेरेको घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं?

दूसरी बात, भगवान्‌ने आगे अर्जुनके प्रश्नके उत्तरमें दो

निष्ठाएँ कही हैं—ज्ञानियोंकी निष्ठा ज्ञानयोगसे और

योगियोंकी निष्ठा कर्मयोगसे। इससे भी अर्जुनके प्रश्नोंमें

'बुद्धिः' पदका अर्थ 'ज्ञान' लेना युक्तिसंगत बैठता है।

कोई भी साधक श्रद्धापूर्वक पूछनेपर ही अपने प्रश्नका

सही उत्तर प्राप्त कर सकता है। आक्षेपपूर्वक शंका करनेसे

सही उत्तर प्राप्त कर पाना सम्भव नहीं। अर्जुनकी

भगवान्‌पर पूर्ण श्रद्धा है; अतः भगवान्‌के कहनेपर अर्जुन

अपने कल्याणके लिये युद्ध-जैसे घोर कर्ममें भी प्रवृत्त हो

सकते हैं—ऐसा भाव उपर्युक्त प्रश्नसे प्रकट होता है।

'व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे'—इन

पदोंमें अर्जुनका भाव है कि कभी तो आप कहते हैं कि कर्म

करो 'कुरु कर्माणि' (२। ४८) और कभी आप कहते हैं

कि ज्ञानका आश्रय लो—'बुद्धौ शरणमन्विच्छ' (२। ४९)।

आपके इन मिले हुए वचनोंसे मेरी बुद्धि मोहित-सी हो रही

है अर्थात् मैं यह स्पष्ट नहीं समझ पा रहा हूँ कि मेरेको कर्म

करने चाहिये या ज्ञानकी शरण लेनी चाहिये।

यहाँ दो बार 'इव' पदके प्रयोगसे भगवान्‌पर अर्जुनकी

१७०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ३ ]

श्रद्धाका द्योतन हो रहा है। श्रद्धाके कारण अर्जुन भगवान् के वचनोंको ठीक मान रहे हैं और यह भी समझ रहे हैं कि भगवान् मेरी बुद्धिको मोहित नहीं कर रहे हैं। परन्तु भगवान् के वचनोंको ठीक-ठीक न समझनेके कारण अर्जुनको भगवान् के वचन मिले हुए-से लग रहे हैं और उनको ऐसा दीख रहा है कि भगवान् अपने वचनोंसे मेरी बुद्धिको मोहित-सी कर रहे हैं। अगर भगवान् अर्जुनकी बुद्धिको मोहित करते तो फिर अर्जुनके मोहको दूर करता।

परिशिष्ट भाव —जबतक संसारकी सत्ता मानते हैं, तभीतक कर्म घोर या सौम्य दीखता है। कारण कि संसारकी सत्ता माननेसे कर्मकी तरफ दृष्टि रहती है, अपने कर्तव्यकी तरफ नहीं। अपने कर्तव्यकी तरफ दृष्टि रहनेसे कर्म घोर या सौम्य नहीं दीखता।

सम्बन्ध—अब आगेके तीन (तीसरे, चौथे और पाँचवें) श्लोकोंमें भगवान् अर्जुनके ‘व्यामिश्रेणैव वाक्येन’ (मिले हुए-से वचनों) पदोंका उत्तर देते हैं।

श्रीभगवानुवाच

लोकेऽस्मिन्द्रिविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥

श्रीभगवान् बोले—

अनघ= हे निष्पाप अर्जुन !निष्ठा= निष्ठासाङ्ख्यानाम्= ज्ञानियोंकी (निष्ठा)
अस्मिन्= इसमया= मेरे द्वाराज्ञानयोगेन= ज्ञानयोगसे (और)
लोके= मनुष्यलोकमेंपुरा= पहलेयोगिनाम्= योगियोंकी (निष्ठा)
द्विविधा= दो प्रकारसेप्रोक्ता= कही गयी है।कर्मयोगेन= कर्मयोगसे
होनेवाली(उनमें)(होती है)।

व्याख्या —[अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहते थे, अतः उन्होंने समतावाचक ‘बुद्धि’ शब्दका अर्थ ‘ज्ञान’ समझ लिया। परन्तु भगवान्ने पहले ‘बुद्धि’ और ‘बुद्धियोग’ शब्दसे समताका वर्णन किया था (दूसरे अध्यायका उन्नतालीसवों, उन्चासवों आदि); अतः यहाँ भी भगवान् ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनोंके द्वारा प्रापणीय समताका वर्णन कर रहे हैं।]

‘अनघ’ —अर्जुनके द्वारा अपने श्रेय-(कल्याण-) की बात पूछी जानी ही उनकी निष्पापता है; क्योंकि अपने कल्याणकी तीव्र इच्छा होनेपर साधकके पाप नष्ट हो जाते हैं।

‘लोकेऽस्मिन्द्रिविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मया’ —‘यहाँ ‘लोके’ पदका अर्थ मनुष्य-शरीर समझना चाहिये; क्योंकि ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनों प्रकारके साधनोंको करनेका अधिकार अथवा साधक बननेका अधिकार मनुष्य-शरीरमें ही है।

ही कौन ?

‘तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्’ —मेरा कल्याण कर्म करनेसे होगा या ज्ञानसे होगा—इनमेंसे आप निश्चित करके मेरे लिये एक बात कहिये, जिससे मेरा कल्याण हो जाय। मैंने पहले भी कहा था कि जिससे मेरा निश्चित कल्याण हो वह बात मेरे लिये कहिये—‘यच्छ्रेयः स्यानिश्चितं ब्रूहि तन्मे ’ (२।७) और अब भी मैं वही बात कह रहा हूँ।

‘निष्ठा’ —अर्थात् समभावमें स्थिति एक ही है, जिसे दो प्रकारसे प्राप्त किया जा सकता है—ज्ञानयोगसे और कर्मयोगसे। इन दोनों योगोंका अलग-अलग विभाग करनेके लिये भगवान्ने दूसरे अध्यायके उन्नतालीसवें श्लोकमें कहा है कि इस समबुद्धिको मैंने सांख्ययोगके विषयमें (ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक) कह दिया है, अब इसे कर्मयोगके विषयमें (उन्नतालीसवेंसे तिरपनवें श्लोकतक) सुनो—

‘एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धियोगे त्विमां शृणु।’

‘पुरा’ पदका अर्थ ‘अनादिकाल’ भी होता है और ‘अभीसे कुछ पहले’ भी होता है। यहाँ इस पदका अर्थ है—अभीसे कुछ पहले अर्थात् पिछला अध्याय, जिसपर अर्जुनकी शंका है। यद्यपि दोनों निष्ठाएँ पिछले अध्यायमें अलग-अलग कही जा चुकी हैं, तथापि किसी भी निष्ठामें कर्मत्यागकी बात नहीं कही गयी है।

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१७९

मार्मिक बात

यहाँ भगवान्ने दो निष्ठाएँ बतायी हैं—सांख्यनिष्ठा (ज्ञानयोग) और योगनिष्ठा (कर्मयोग)। जैसे लोकमें दो तरहकी निष्ठाएँ हैं—‘लोकैस्मिन्द्रिविधा निष्ठा’, ऐसे ही लोकमें दो तरहके पुरुष हैं ‘द्वारिमी पुरुषौ लोके’ (गीता १५।१६) वे हैं—श्वर (नाशवान् संसार) और अश्वर (अविनाशी स्वरूप)। श्वरकी सिद्धि-असिद्धि, प्राप्ति-अप्राप्तिमें सम रहना ‘कर्मयोग’ है और श्वरसे विमुख होकर अश्वरमें स्थित होना ‘ज्ञानयोग’ है। परन्तु श्वर और अश्वर—दोनोंसे उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा जाता है—‘उत्तमः पुरुषस्तव्यः परमात्मेत्युदाहृतः’ (१५।१७)। वह परमात्मा श्वरसे तो अतीत है और अश्वरसे उत्तम है; अतः शास्त्र और वेदमें वह ‘पुरुषोत्तम’ नामसे प्रसिद्ध है (पन्द्रहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। ऐसे परमात्माके सर्वथा सर्वभावसे शरण हो जाना ‘भगवनिष्ठा’ (भक्तियोग) है। इसलिये श्वरकी प्रधानतासे कर्मयोग, अश्वरकी प्रधानतासे ज्ञानयोग और परमात्माकी प्रधानतासे भक्तियोग चलता है*।

सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठा—ये दोनों साधकोंकी अपनी निष्ठाएँ हैं; परन्तु भगवनिष्ठा साधकोंकी अपनी निष्ठा नहीं है। कारण कि सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठामें साधकको ‘मैं हूँ’ और ‘संसार है’—इसका अनुभव होता है; अतः ज्ञानयोगी संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करके अपने स्वरूपमें स्थित होता है और कर्मयोगी संसारकी वस्तु- (शरीरादि- ) को संसारकी ही सेवामें लगाकर संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करता है। परन्तु भगवनिष्ठामें साधकको पहले ‘भगवान्’ हैं—इसका अनुभव नहीं होता; पर उसका विश्वास होता है कि स्वरूप और संसार—इन दोनोंसे भी विलक्षण कोई तत्त्व (भगवान्) है। अतः वह श्रद्धा-विश्वासपूर्वक भगवान्को मानकर अपने-आपको भगवान्के समर्पित कर देता है। इसलिये सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठामें तो ‘जानना’ (विवेक) मुख्य है और भगवनिष्ठामें ‘मानना’ (श्रद्धा-विश्वास) मुख्य है।

जानना और मानना—दोनोंमें कोई फर्क नहीं है। जैसे ‘जानना’ सन्देहरहित (दृढ़) होता है, ऐसे ही ‘मानना’ भी

सन्देहरहित होता है। मानी हुई बातमें विचारकी सम्भावना नहीं रहती। जैसे, ‘अमुक मेरी माँ है’—यह केवल माना हुआ है, पर इस माने हुएमें कभी सन्देह नहीं होता, कभी जिज्ञासा नहीं होती, कभी विचार नहीं करना पड़ता। इसलिये गीतामें भक्तियोगके प्रकरणमें जहाँ जाननेकी बात आयी है, उसको माननेके अर्थमें ही लेना चाहिये। इसी तरह ज्ञानयोग और कर्मयोगके प्रकरणमें जहाँ माननेकी बात आयी है, उसको जाननेके अर्थमें ही लेना चाहिये।

सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठा तो साधन-साध्य हैं और साधकपर निर्भर हैं, पर भगवनिष्ठा साधन-साध्य नहीं है। भगवनिष्ठामें साधक भगवान् और उनकी कृपापर निर्भर रहता है।

भगवनिष्ठाका वर्णन गीतामें जगह-जगह आया है; जैसे—इसी अध्यायमें पहले दो निष्ठाओंका वर्णन करके फिर तीसवें श्लोकमें ‘मयि सर्वाणि कर्माणि सन्यस्य’ पदोंसे भक्तिका वर्णन किया गया है; पाँचवें अध्यायमें भी दो निष्ठाओंका वर्णन करके दसवें श्लोकमें ‘ब्रह्मणयाधाय कर्माणि’ और अन्तमें ‘भोक्तारं यज्ञतपसाम् .....’ आदि पदोंसे भक्तिका वर्णन किया गया है, इत्यादि।

‘ज्ञानयोगेन सांख्यानाम्’—प्रकृतिसे उत्पन्न सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं, सम्पूर्ण क्रियाएँ गुणोंमें, इन्द्रियोंमें ही हो रही हैं (गीता—तीसरे अध्यायका अट्ठाईसवाँ श्लोक) और मेरा इनसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है—ऐसा समझकर समस्त क्रियाओंमें कर्तापनके अभिमानका सर्वथा त्याग कर देना ‘ज्ञानयोग’ है।

गीतोपदेशके आरम्भमें ही भगवान्ने सांख्ययोग- (ज्ञानयोग- ) का वर्णन करते हुए नाशवान् शरीर और अविनाशी शरीरीका विवेचन किया है, जिसे (गीता—दूसरे अध्यायके सोलहवें श्लोकमें) असत् और सत्के नामसे भी कहा गया है।

‘कर्मयोगेन योगिनाम्’—वर्ण, आश्रम, स्वभाव और परिस्थितिके अनुसार जो शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्म सामने आ जाय, उसको (उस कर्म तथा उसके फलमें) कामना, ममता और आसक्तिका सर्वथा त्याग करके करना तथा कर्मकी सिद्धि और असिद्धिमें सम रहना

  • वास्तवमें भगवान्का सम्बन्ध कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों योगोंमें रहता है; क्योंकि इन दोनोंके विधायक भगवान् ही हैं। कर्मयोग और ज्ञानयोगसे कल्याण होनेका विधान तो भगवान्के द्वारा ही बना है। इसलिये कर्मयोगी और ज्ञानयोगी—दोनों भगवान्के मत- (सिद्धान्त- ) का ही पालन करते हैं। केवल इनमें भगवान्को परायणता नहीं होती।

१७२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ३ ]

‘कर्मयोग’ है।

भगवान्ने कर्मयोगका वर्णन दूसरे अध्यायके सेंतालीसवें और अड़तालीसवें श्लोकमें मुख्यरूपसे किया है। इनमें भी

सेंतालीसवें श्लोकमें कर्मयोगका सिद्धान्त कहा गया है और अड़तालीसवें श्लोकमें कर्मयोगको अनुष्ठानमें लानेकी विधि कही गयी है।

परिशिष्ट भाव —कर्मयोग और ज्ञानयोग—ये दोनों ही निष्ठाएँ लोकमें होनेके कारण ‘लौकिक’ हैं—‘लोकेऽस्मिन्निविधा निष्ठा।’ कर्मयोगमें ‘क्षर’ (संसार) की प्रधानता है और ज्ञानयोगमें ‘अक्षर’ (जीवात्मा) की प्रधानता है। क्षर और अक्षर भी लोकमें ही हैं—‘द्वारविमो पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च’ (गीता १५।१६)। अतः कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों ही लौकिक निष्ठाएँ हैं।

जीव और जगत्को मुख्यता देनेसे ही ये दो निष्ठाएँ हुई हैं। अगर जीव और जगत्को मुख्यता न देकर केवल परमात्माको ही मुख्यता दें तो दो निष्ठाएँ नहीं होंगी, प्रत्युत केवल अलौकिक भगवन्निष्ठा (भक्ति) होगी।

लौकिक निष्ठा (कर्मयोग-ज्ञानयोग) में साधकका अपना उद्योग मुख्य होता है। वह साधनमें अपना पुरुषार्थ मानता है। परन्तु जब साधक भगवान्का आश्रय रखकर साधन करता है, अपना उद्योग मुख्य नहीं मानता, तब उसकी निष्ठा अलौकिक होती है। कारण कि भगवान्का सम्बन्ध होनेसे सब अलौकिक हो जाता है। जबतक भगवान्का सम्बन्ध नहीं होता, तबतक सब लौकिक ही होता है।

किसीको बुरा न समझे, किसीका बुरा न चाहे और किसीका बुरा न करे तो ‘कर्मयोग’ आरम्भ हो जाता है। मेरा कुछ नहीं है, मेरेको कुछ नहीं चाहिये और मेरेको अपने लिये कुछ नहीं करना है—इस सत्यको स्वीकार कर ले तो ‘ज्ञानयोग’ आरम्भ हो जाता है।

*

न कर्मणामनारम्भानैष्कर्म्यं पुरुषोऽशनुते ।

न च सन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥

पुरुषः= मनुष्यनैष्कर्म्यम्= निष्कर्मताकासन्यसनात्= (कर्मोंके)
= न तोअशनुते= अनुभवत्यागमात्रसे
कर्मणाम्= कर्मोंकाकरता हैसिद्धिम्= सिद्धिको
अनारम्भात्= आरम्भ= औरएव= ही
किये बिना= नसमधिगच्छति= प्राप्त होता है।

व्याख्या —‘न कर्मणामनारम्भानैष्कर्म्यं पुरुषोऽशनुते’—कर्मयोगमें कर्म करना अत्यन्त आवश्यक है। कारण कि निष्कामभावसे कर्म करनेपर ही कर्मयोगकी सिद्धि होती है*। यह सिद्धि मनुष्यको कर्म किये बिना नहीं मिल सकती। मनुष्यके अन्तःकरणमें कर्म करनेका जो वेग विद्यमान रहता है, उसे शान्त करनेके लिये कामनाका त्याग करके कर्तव्य-कर्म करना आवश्यक है। कामना रखकर कर्म करनेपर यह वेग मिटता नहीं, प्रत्युत बढ़ता है।

‘नैष्कर्म्यम् अशनुते’ पदोंका आशय है कि कर्मयोगका आचरण करनेवाला मनुष्य कर्मोंको करते हुए ही निष्कर्मताको प्राप्त होता है। जिस स्थितिमें मनुष्यके कर्म अकर्म हो जाते

हैं अर्थात् बन्धनकारक नहीं होते, उस स्थितिको ‘निष्कर्मता’ कहते हैं।

कामनासे रहित होकर किये गये कर्मोंमें फल देनेकी शक्तिका उसी प्रकार सर्वथा अभाव हो जाता है, जिस प्रकार बीजको भूनेने या उबालनेपर उसमें पुनः अंकुर देनेकी शक्ति सर्वथा नष्ट हो जाती है। अतः निष्काम मनुष्यके कर्मोंमें पुनः जन्म-मरणके चक्रमें घुमानेकी शक्ति नहीं रहती।

कामनाका त्याग तभी हो सकता है, जब सभी कर्म दूसरोंकी सेवाके लिये किये जायँ, अपने लिये नहीं। कारण कि कर्ममात्रका सम्बन्ध संसारसे है और अपना (स्वरूपका) सम्बन्ध परमात्मासे है। अपने साथ कर्मका सम्बन्ध है ही

  • जो योगपर आरूढ़ होना चाहता है, अपनेमें समता लाना चाहता है, उसके लिये (कर्मयोगकी दृष्टिसे) निष्कामभावसे कर्म करना आवश्यक है—‘आरुरुक्षोमुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते’ (गीता ६।३)। अगर वह कर्म करेगा ही नहीं तो उसको यह कैसे पता लगेगा कि मैं सिद्धि-असिद्धिमें सम रहा या विचलित हो गया?

श्लोक ४ ]

  • साधक-संजीवनी *

१७३

नहीं। इसलिये जबतक अपने लिये कर्म करेंगे, तबतक कामनाका त्याग नहीं होगा और जबतक कामनाका त्याग नहीं होगा, तबतक निष्कर्मताकी प्राप्ति नहीं होगी।

‘न च सन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति’ —इस श्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने कर्मयोगकी दृष्टिसे कहा कि कर्मोंका आरम्भ किये बिना कर्मयोगीको निष्कर्मताकी प्राप्ति नहीं होती। अब श्लोकके उत्तरार्धमें सांख्ययोगकी दृष्टिसे कहते हैं कि केवल कर्मोंका स्वरूपसे त्याग कर देनेसे सांख्ययोगीको सिद्धि अर्थात् निष्कर्मताकी प्राप्ति नहीं होती। सिद्धिकी प्राप्तिके लिये उसे कर्तापन-(अहंता-) का त्याग करना आवश्यक है। अतः सांख्ययोगीके लिये कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करना मुख्य नहीं है, प्रत्युत अहंताका त्याग ही मुख्य है।

सांख्ययोगमें कर्म किये भी जा सकते हैं और किसी सीमातक कर्मोंका त्याग भी किया जा सकता है; परन्तु कर्मयोगमें सिद्धि-प्राप्तिके लिये कर्म करना आवश्यक होता है (गीता ६।३)।

मार्मिक बात

श्रीमद्भगवद्गीता मनुष्यको व्यवहारमें परमार्थ-सिद्धिकी कला सिखाती है। उसका आशय कर्तव्य-कर्म करानेमें है, लुढ़ानेमें नहीं। इसलिये भगवान् कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों ही साधनोंमें कर्म करनेकी बात कहते हैं।

यह एक स्वाभाविक बात है कि जब साधक अपना कल्याण चाहता है, तब वह सांसारिक कर्मोंसे उकताने लगता है और उन्हें छोड़ना चाहता है। इसी कारण अर्जुन भी कर्मोंसे उकताकर भगवान्से पूछते हैं कि जब कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों प्रकारके साधनोंका तात्पर्य समतासे है, तो फिर कर्म करनेकी बात आप क्यों कहते हैं? मुझे युद्ध-जैसे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं? परन्तु भगवान्ने दोनों ही प्रकारके साधनोंमें अर्जुनको कर्म करनेकी आज्ञा दी है; जैसे—कर्मयोगमें ‘योगस्थः कुरु कर्माणि’ (गीता २।४८) और सांख्ययोगमें ‘तस्माद्युध्यस्व भारत’ (गीता २।१८)। इससे सिद्ध होता है कि भगवान्का अभिप्राय कर्मोंको स्वरूपसे लुढ़ानेमें नहीं, प्रत्युत कर्म करानेमें है। हाँ, भगवान् कर्मोंमें जो जहरीला अंश—कामना, ममता और आसक्ति है, उसका त्याग करके ही कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।

कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेकी अपेक्षा साधकको उनसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद करना चाहिये। कर्मयोगी

निःस्वार्थभावसे कर्म करते हुए शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ आदिको संसारकी वस्तु मानकर संसारकी सेवामें लगाता है और कर्मों तथा पदार्थोंके साथ अपना कोई सम्बन्ध नहीं मानता (गीता—पाँचवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। ज्ञानयोगमें सत्-असत्के विवेककी प्रधानता रहती है। अतएव ज्ञानयोगी ऐसा मानता है कि गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं अर्थात् शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिसे ही कर्म हो रहे हैं। मेरा कर्मोंके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है (गीता—तीसरे अध्यायका अठ्ठाईसवाँ और पाँचवें अध्यायका आठवाँ-नवाँ श्लोक)।

प्रायः सभी साधकोंके अनुभवकी बात है कि कल्याणकी उत्कट अभिलाषा जाग्रत् होते ही कर्म, पदार्थ और व्यक्ति-(परिवार-) से उनकी अरुचि होने लगती है। परन्तु वास्तवमें देहके साथ घनिष्ठ सम्बन्ध होनेसे यह आराम-विश्रामकी इच्छा ही है, जो साधककी उन्नतिमें बाधक है। साधकोंके मनमें ऐसा भाव रहता है कि कर्म, पदार्थ और व्यक्तिका स्वरूपसे त्याग करनेपर ही हम परमार्थमार्गमें आगे बढ़ सकते हैं। परन्तु वास्तवमें इनका स्वरूपसे त्याग न करके इनमें आसक्तिका त्याग करना ही आवश्यक है। सांख्ययोगमें उत्कट वैराग्यके बिना आसक्तिका त्याग करना कठिन होता है। परन्तु कर्मयोगमें वैराग्यकी कमी होनेपर भी केवल दूसरोंके लिये कर्म करनेसे आसक्तिका त्याग सुगमतापूर्वक हो जाता है।

गीताने एकांतमें रहकर साधन करनेका भी आदर किया है; परन्तु एकांतमें सात्त्विक पुरुष तो साधन-भजनमें अपना समय बिताता है, पर राजस पुरुष संकल्प-विकल्पमें, तामस पुरुष निद्रा-आलस्य-प्रमादमें अपना समय बिताता है, जो पतन करनेवाला है। इसलिये साधककी रुचि तो एकांतकी ही रहनी चाहिये अर्थात् सांसारिक कर्मोंका त्याग करके परमार्थिक कार्य करनेमें ही उसकी प्रवृत्ति रहनी चाहिये, परन्तु कर्तव्यरूपसे जो कर्म सामने आ जाय, उसको वह तत्परतापूर्वक करे। उस कर्ममें उसका राग नहीं होना चाहिये। राग न तो जन-समुदायमें होना चाहिये और न अकर्मण्यतामें ही। कहीं भी राग न रहनेसे साधकका बहुत जल्दी कल्याण हो जाता है। वास्तवमें शरीरको एकांतमें ले जानेको ही एकांत मान लेना भूल है; क्योंकि शरीर संसारका ही एक अंश है। अतः शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद होना अर्थात् उसमें अहंता-ममता न रहना ही वास्तविक एकांत है।

१७४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ३ ]

परिशिष्ट भाव —जो अपना है, अपनेमें है और अभी है, उस तत्त्वकी प्राप्ति कुछ करनेसे नहीं होती; क्योंकि उसकी अप्राप्ति कभी होती ही नहीं। हम कुछ करेंगे, तब प्राप्ति होगी—यह भाव देहाभिमानको पुष्ट करनेवाला है। प्रत्येक क्रियाका आरम्भ और अन्त होता है; अतः क्रिया करनेसे उसकी प्राप्ति होगी, जो विद्यमान नहीं है। परन्तु प्रकृतिके साथ सम्बन्ध होनेके कारण प्रत्येक प्राणीमें क्रियाका वेग रहता है, जो उसको क्रियारहित नहीं होने देता। क्रियाका वेग शान्त करनेके लिये यह आवश्यक है कि जो नहीं करना चाहिये, उसको न करें और जो करना चाहिये, उसको निर्मम तथा निष्काम होकर करें अर्थात् अपने लिये कुछ न करें, प्रत्युत केवल दूसरेके हितके लिये ही करें। अपने लिये करनेसे क्रियाका वेग कभी समाप्त नहीं होगा; क्योंकि अपना स्वरूप नित्य है और कर्म अनित्य हैं। अतः निष्कामभावसे दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे क्रियाका वेग शान्त होकर प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा और सब देश, काल आदिमें विद्यमान परमात्मतत्त्व प्रकट हो जायगा, उसका अनुभव हो जायगा।


## न हि कश्चितक्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृतम्।

### कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥

कश्चित् = कोई
हि = भी (मनुष्य)
जातु = किसी भी अवस्थामें
क्षणम् = क्षणमात्र
अपि = भी

अकर्मकृतम् = कर्म किये बिना
न = नहीं
तिष्ठति = रह सकता;
हि = क्योंकि
अवशः = (प्रकृतिके)
परवश हुए

सर्वः = सब प्राणियोंसे
प्रकृतिजैः = प्रकृतिजन्य
गुणैः = गुण
कर्म = कर्म
कार्यते = करवा लेते हैं।

**व्याख्या** —‘न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृतम्’—कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—किसी भी मार्गमें साधक कर्म किये बिना नहीं रह सकता। यहाँ ‘कश्चित्’, ‘क्षणम्’ और ‘जातु’—ये तीनों विलक्षण पद हैं। इनमें ‘कश्चित्’ पदका प्रयोग करके भगवान् कहते हैं कि कोई भी मनुष्य कर्म किये बिना नहीं रहता, चाहे वह ज्ञानी हो या अज्ञानी। यद्यपि ज्ञानीका अपने कहलानेवाले शरीरके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता, तथापि उसके कहलानेवाले शरीरसे भी हरदम क्रिया होती रहती है। ‘क्षणम्’ पदका प्रयोग करके भगवान् कहते हैं कि यद्यपि मनुष्य ‘मैं हरदम कर्म करता हूँ’ ऐसा नहीं मानता, तथापि जबतक वह शरीरके साथ अपना सम्बन्ध मानता है, तबतक वह एक क्षणके लिये भी कर्म किये बिना नहीं रहता। ‘जातु’ पदका प्रयोग करके भगवान् यह कहते हैं कि जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्त, मूर्च्छा आदि किसी भी अवस्थामें मनुष्य कर्म किये बिना नहीं रह सकता। इसका कारण भगवान् इसी श्लोकके उत्तरार्धमें ‘अवशः’ पदसे बताते हैं कि प्रकृतिके परवश होनेके कारण उसे कर्म करने ही पड़ते हैं। प्रकृति निरन्तर परिवर्तनशील है। साधकको अपने लिये कुछ नहीं करना है। जो विहित कर्म सामने आ जाय, उसे केवल दूसरोंके हितकी दृष्टिसे कर देना है। परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य

होनेसे साधक निषिद्ध-कर्म तो कर ही नहीं सकता।

बहुत-से मनुष्य केवल स्थूलशरीरकी क्रियाओंको कर्म मानते हैं, पर गीता मनकी क्रियाओंको भी कर्म मानती है। गीताने शारीरिक, वाचिक और मानसिक रूपसे की गयी मात्र क्रियाओंको कर्म माना है—

‘शरीरवाङ्मनोर्भिर्यत्कर्म प्रारभते नरः’ (गीता १८।१५)। जिन शारीरिक अथवा मानसिक क्रियाओंके साथ मनुष्य अपना सम्बन्ध मान लेता है, वे ही सब क्रियाएँ ‘कर्म’ बनकर उसे बाँधनेवाली होती हैं, अन्य क्रियाएँ नहीं।

मनुष्योंकी एक ऐसी धारणा बनी हुई है, जिसके अनुसार वे बच्चोंका पालन-पोषण तथा आजीविका—व्यापार, नौकरी, अध्यापन आदिको ही कर्म मानते हैं और इनके अतिरिक्त खाना-पीना, सोना, बैठना, चिन्तन करना आदिको कर्म नहीं मानते। इसी कारण कई मनुष्य व्यापार आदि कर्मोंको छोड़कर ऐसा मान लेते हैं कि मैं कर्म नहीं कर रहा हूँ। परन्तु यह उनकी भारी भूल है। शरीर-निर्वाह-सम्बन्धी स्थूलशरीरकी क्रियाएँ; नींद, चिन्तन आदि सूक्ष्म-शरीरकी क्रियाएँ और समाधि आदि कारण-शरीरकी क्रियाएँ—ये सब कर्म ही हैं। जबतक शरीरमें अहंता-ममता है, तबतक शरीरसे होनेवाली मात्र क्रियाएँ ‘कर्म’ हैं। कारण कि शरीर प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति कभी अक्रिय नहीं होती।

श्लोक ५ ]

  • साधक-संजीवनी *

१७५

अतः शरीरमें अहंता-ममता रहते हुए कोई भी मनुष्य किसी

भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता,

चाहे वह अवस्था प्रवृत्तिकी हो या निवृत्तिकी।

'कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः'-

प्रकृतिजन्य गुण (प्रकृतिके) परवश हुए प्राणियोंसे कर्म

कराते हैं। परवश होनेपर प्रकृतिके गुणोंद्वारा कर्म कराये

जाते हैं; क्योंकि प्रकृति एवं उसके गुण निरन्तर क्रियाशील

हैं (गीता-तीसरे अध्यायका सत्ताईसवाँ और तेरहवें

अध्यायका उनतीसवाँ श्लोक)। यद्यपि आत्मा स्वयं अक्रिय,

असंग, अविनाशी, निर्विकार तथा निर्लिप्त है, तथापि

जबतक वह प्रकृति एवं उसके कार्य-स्थूल, सूक्ष्म और

कारण-शरीरमें किसी भी शरीरके साथ अपना सम्बन्ध

मानकर उससे सुख चाहता है, तबतक वह प्रकृतिके परवश

रहता है (गीता-चौदहवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)।

इसी परवशताको यहाँ 'अवशः' पदसे कहा गया है। नवें

अध्यायके आठवें श्लोकमें और आठवें अध्यायके उन्नीसवें

श्लोकमें भी प्रकृतिके साथ सम्बन्ध माननेसे परवश हुए

जीवके द्वारा कर्म करनेकी बात कही गयी है।

स्वभाव बनता है वृत्तियोंसे, वृत्तियाँ बनती हैं गुणोंसे

और गुण पैदा होते हैं प्रकृतिसे। अतः चाहे स्वभावके

परवश कहो, चाहे गुणोंके परवश कहो और चाहे प्रकृतिके

परवश कहो, एक ही बात है। वास्तवमें सबके मूलमें

प्रकृतिजन्य पदार्थोंकी परवशता ही है। इसी परवशतासे

सभी परवशताएँ पैदा होती हैं। अतः प्रकृतिजन्य पदार्थोंकी

परवशताको ही कहीं कालकी, कहीं स्वभावकी, कहीं

कर्मकी और कहीं गुणोंकी परवशता कह दिया है। तात्पर्य

यह है कि यह जीव जबतक प्रकृति और उसके गुणोंसे

अतीत नहीं होता, परमात्माकी प्राप्ति नहीं कर लेता,

तबतक यह गुण, काल, स्वभाव आदिके अवश (परवश)

ही रहता है अर्थात् यह जीव जबतक प्रकृतिके साथ

अपना सम्बन्ध मानता है, प्रकृतिमें स्थित रहता है,

तबतक यह कभी गुणोंके, कभी कालके, कभी भोगोंके

और कभी स्वभावके परवश होता रहता है, कभी स्ववश

(स्वतन्त्र) नहीं रहता। इनके सिवाय यह परिस्थिति,

व्यक्ति, स्त्री, पुत्र, धन, मकान आदिके भी परवश होता

रहता है। परन्तु जब यह गुणोंसे अतीत अपने स्वरूपका

अथवा परमात्मतत्त्वका अनुभव कर लेता है, तो फिर

इसकी यह परवशता नहीं रहती और यह स्वतःसिद्ध

स्वतन्त्रताको प्राप्त हो जाता है।

विशेष बात

प्रकृतिकी सक्रिय (स्थूल) और अक्रिय (सूक्ष्म) दो

अवस्थाएँ होती हैं; जैसे कार्य करना सक्रिय अवस्था है

और कार्य न करना (निद्रा आदि) अक्रिय अवस्था।

वास्तवमें अक्रिय अवस्थामें भी प्रकृति अक्रिय नहीं रहती,

प्रत्युत उसमें सूक्ष्मरूपसे सक्रियता रहती है। जैसे किसी

सोये हुए मनुष्यको जागनेके समयसे पूर्व ही जगा देनेपर

वह कहता है कि मुझे कच्ची नींदमें जगा दिया। इससे यह

सिद्ध हुआ कि नींदकी अक्रिय अवस्थामें भी नींदके

पकनेकी क्रिया हो रही थी। जब पूरी नींद लेनेके बाद

मनुष्य जागता है, तब उपर्युक्त बात नहीं कहता; क्योंकि

नींदका पकना पूर्ण हो गया। इसी प्रकार समाधि, प्रलय,

महाप्रलय आदिकी अवस्थाओंमें भी सूक्ष्मरूपसे क्रिया

होती रहती है।

वास्तवमें देखा जाय तो प्रकृतिकी कभी अक्रिय

अवस्था होती ही नहीं; क्योंकि वह प्रतिक्षण बदलनेवाली

है। स्वयं आत्मामें कर्तापन नहीं है; परन्तु प्रकृतिके कार्य

शरीरादिके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे वह प्रकृतिके

परवश हो जाता है। इसी परवशताके कारण स्वयं अकर्ता

होते हुए भी वह अपनेको कर्ता मानता रहता है। वस्तुतः

आत्मामें कोई भी परिवर्तनरूप क्रिया नहीं होती। जैसे

प्रकृतिद्वारा समस्त सृष्टिकी क्रियाएँ स्वाभाविकरूपसे हो

रही हैं, ऐसे ही उसके द्वारा बालकपन, जवानी आदि

अवस्थाएँ और भोजनका पाचन, श्वासोंका आवागमन

आदि क्रियाएँ एवं इसी प्रकार देखना, सुनना आदि क्रियाएँ

भी स्वाभाविकरूपसे हो रही हैं। परन्तु जीवात्मा कुछ

क्रियाओंमें अपनेको कर्ता मानकर बँध जाता है।

प्रकृति निरन्तर परिवर्तनशील है, पर शुद्ध स्वरूपमें

कभी कोई परिवर्तन नहीं होता। वास्तवमें प्राकृतिक

पदार्थोंकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। प्रतिक्षण बदलते हुए

पुंजका नाम ही पदार्थ है। पदार्थोंके साथ अपना सम्बन्ध

माननेसे कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी

कर्म किये बिना नहीं रह सकता। अगर साधक ऐसा

वास्तविक अनुभव कर ले कि सम्पूर्ण क्रियाएँ पदार्थोंमें ही

हो रही हैं और पदार्थोंके साथ मेरा किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध

नहीं है तो वह परवशतासे मुक्त हो सकता है। कर्मयोगी

प्रतिक्षण परिवर्तनशील पदार्थोंकी कामना, ममता और

आसक्तिका त्याग करके इस परवशताको मिटा देता है।

भगवान्‌ने इस श्लोकमें जो बात कही है, वही बात

१७६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ३ ]

उन्होंने अठारहवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भी कही है कि प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध मानते हुए कोई भी मनुष्य | कर्माका सम्पूर्णतासे त्याग नहीं कर सकता—‘न हि देहभूता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।’

परिशिष्ट भाव —क्रियामात्र केवल प्रकृतिमें ही होती है। परन्तु प्रकृतिके साथ अपना तादात्म्य स्वीकार करनेसे मनुष्य प्रकृतिजन्य गुणोंके अधीन हो जाता है—‘अवशः’ तथा उसका क्रियाके साथ सम्बन्ध हो जाता है। इसलिये प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध माननेवाला कोई भी मनुष्य जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, मूर्च्छा, समाधि तथा सर्ग-महासर्ग, प्रलय-महाप्रलय आदि किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता।

सुषुप्ति, मूर्च्छा तथा समाधि-अवस्थामें क्रिया कैसे होती है? मनुष्य सोता हो और कोई उसको बीचमें ही जगा दे तो वह कहता है कि मेरेको कच्ची नींदमें जगा दिया! इससे सिद्ध होता है कि सुषुप्तिके समय भी नींदके पकनेकी क्रिया हो रही थी। ऐसे ही मूर्च्छा और समाधिके समय भी क्रिया होती है। पातंजलयोगदर्शनमें इस क्रियाको ‘परिणाम’ नामसे कहा है। ‘परिणाम’ का अर्थ है—परिवर्तनकी धारा अर्थात् बदलनेका प्रवाह। तात्पर्य है कि समाधिके आरम्भसे लेकर व्युत्थान होनेतक क्रिया होती रहती है। अगर क्रिया न हो तो व्युत्थान हो ही नहीं सकता। समाधिके समय परिणाम होता है और समाधिके अन्तमें व्युत्थान होता है।

प्रकृतिकी सम्पूर्ण अवस्थाओंसे अतीत है—सहजावस्था अथवा सहज समाधि। सहजावस्था स्वरूपकी होती है, जिसमें किंचिन्मात्र भी कोई क्रिया नहीं है, क्रिया होनी सम्भव ही नहीं है। अतः सहजावस्थामें परिणाम तथा व्युत्थान कभी होता ही नहीं। कारण कि क्रियाएँ प्रकृति-विभागमें ही हैं, स्वरूप-विभागमें नहीं।

‘कार्यते हवशः कर्म’—कर्म करनेमें तो हम परतन्त्र हैं, पर उनमें राग-द्वेष करनेमें अथवा न करनेमें हम स्वतन्त्र हैं।

सम्बन्ध—पीछेके श्लोकमें यह कहा गया है कि कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रहता। इसपर यह शंका हो सकती है कि मनुष्य इन्द्रियोंकी क्रियाओंको हठपूर्वक रोककर भी तो अपनेको अक्रिय मान सकता है। इसका समाधान करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।

कर्मैन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।

इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ ६ ॥

यः= जोमनसा= मनसेविमूढात्मा= मूढ़ बुद्धिवाला
कर्मैन्द्रियाणि= कर्मैन्द्रियोंइन्द्रियार्थान्= इन्द्रियोंकेमिथ्याचारः= मिथ्याचारी
(सम्पूर्ण इन्द्रियों)विषयोंका(मिथ्या आचरण)
कोस्मरन्= चिन्तन करते हुएकरनेवाला)
संयम्य= (हठपूर्वक)आस्ते= बैठता है,
रोककरसः= वहउच्यते= कहा जाता है।

व्याख्या —‘कर्मैन्द्रियाणि संयम्य.....मिथ्याचारः स उच्यते’—यहाँ ‘कर्मैन्द्रियाणि’ पदका अभिप्राय पाँच कर्मैन्द्रियों (वाक्, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा) से ही नहीं है, प्रत्युत इनके साथ पाँच ज्ञानेन्द्रियों (श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और प्राण) से भी है; क्योंकि ज्ञानेन्द्रियोंके बिना केवल कर्मैन्द्रियोंसे कर्म नहीं हो सकते। इसके सिवाय केवल हाथ, पैर आदि

कर्मैन्द्रियोंको रोकनेसे तथा आँख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियोंको न रोकनेसे पूरा मिथ्याचार भी सिद्ध नहीं होता।

गीतामें कर्मैन्द्रियोंके अन्तर्गत ही ज्ञानेन्द्रियाँ मानी गयी हैं। इसलिये गीतामें ‘कर्मैन्द्रिय’ शब्द तो आता है, पर ‘ज्ञानेन्द्रिय’ शब्द कहीं नहीं आता। पाँचवें अध्यायके आठवें-नवें श्लोकोंमें देखना, सुनना, स्पर्श करना आदि

१-व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षणचिन्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥ ११ ॥ सर्वाश्रैतैकाग्रतयोः क्षयोदयो चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥ ११ ॥ ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणामः ॥ १२ ॥ (विभूतिपाद)

२-अथ कोऽयं परिणामः? अवस्थितस्य द्रव्यस्य पूर्वधर्मेनिवृत्तौ धर्मान्तरोत्पत्तिः परिणामः (योगदर्शन, विभूति- १३ का व्यास-भाष्य) ‘यह परिणाम क्या है? अवस्थित द्रव्यके पूर्व धर्मकी निवृत्ति होकर अन्य धर्मकी उत्पत्ति (अवस्थान्तर) ही परिणाम है।’