श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 175, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
परिशिष्ट भाव —जो अपना है, अपनेमें है और अभी है, उस तत्त्वकी प्राप्ति कुछ करनेसे नहीं होती; क्योंकि उसकी अप्राप्ति कभी होती ही नहीं। हम कुछ करेंगे, तब प्राप्ति होगी—यह भाव देहाभिमानको पुष्ट करनेवाला है। प्रत्येक क्रियाका आरम्भ और अन्त होता है; अतः क्रिया करनेसे उसकी प्राप्ति होगी, जो विद्यमान नहीं है। परन्तु प्रकृतिके साथ सम्बन्ध होनेके कारण प्रत्येक प्राणीमें क्रियाका वेग रहता है, जो उसको क्रियारहित नहीं होने देता। क्रियाका वेग शान्त करनेके लिये यह आवश्यक है कि जो नहीं करना चाहिये, उसको न करें और जो करना चाहिये, उसको निर्मम तथा निष्काम होकर करें अर्थात् अपने लिये कुछ न करें, प्रत्युत केवल दूसरेके हितके लिये ही करें। अपने लिये करनेसे क्रियाका वेग कभी समाप्त नहीं होगा; क्योंकि अपना स्वरूप नित्य है और कर्म अनित्य हैं। अतः निष्कामभावसे दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे क्रियाका वेग शान्त होकर प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा और सब देश, काल आदिमें विद्यमान परमात्मतत्त्व प्रकट हो जायगा, उसका अनुभव हो जायगा।
## न हि कश्चितक्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृतम्।
### कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥
कश्चित् = कोई
हि = भी (मनुष्य)
जातु = किसी भी अवस्थामें
क्षणम् = क्षणमात्र
अपि = भी
अकर्मकृतम् = कर्म किये बिना
न = नहीं
तिष्ठति = रह सकता;
हि = क्योंकि
अवशः = (प्रकृतिके)
परवश हुए
सर्वः = सब प्राणियोंसे
प्रकृतिजैः = प्रकृतिजन्य
गुणैः = गुण
कर्म = कर्म
कार्यते = करवा लेते हैं।
**व्याख्या** —‘न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृतम्’—कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—किसी भी मार्गमें साधक कर्म किये बिना नहीं रह सकता। यहाँ ‘कश्चित्’, ‘क्षणम्’ और ‘जातु’—ये तीनों विलक्षण पद हैं। इनमें ‘कश्चित्’ पदका प्रयोग करके भगवान् कहते हैं कि कोई भी मनुष्य कर्म किये बिना नहीं रहता, चाहे वह ज्ञानी हो या अज्ञानी। यद्यपि ज्ञानीका अपने कहलानेवाले शरीरके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता, तथापि उसके कहलानेवाले शरीरसे भी हरदम क्रिया होती रहती है। ‘क्षणम्’ पदका प्रयोग करके भगवान् कहते हैं कि यद्यपि मनुष्य ‘मैं हरदम कर्म करता हूँ’ ऐसा नहीं मानता, तथापि जबतक वह शरीरके साथ अपना सम्बन्ध मानता है, तबतक वह एक क्षणके लिये भी कर्म किये बिना नहीं रहता। ‘जातु’ पदका प्रयोग करके भगवान् यह कहते हैं कि जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्त, मूर्च्छा आदि किसी भी अवस्थामें मनुष्य कर्म किये बिना नहीं रह सकता। इसका कारण भगवान् इसी श्लोकके उत्तरार्धमें ‘अवशः’ पदसे बताते हैं कि प्रकृतिके परवश होनेके कारण उसे कर्म करने ही पड़ते हैं। प्रकृति निरन्तर परिवर्तनशील है। साधकको अपने लिये कुछ नहीं करना है। जो विहित कर्म सामने आ जाय, उसे केवल दूसरोंके हितकी दृष्टिसे कर देना है। परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य
होनेसे साधक निषिद्ध-कर्म तो कर ही नहीं सकता।
बहुत-से मनुष्य केवल स्थूलशरीरकी क्रियाओंको कर्म मानते हैं, पर गीता मनकी क्रियाओंको भी कर्म मानती है। गीताने शारीरिक, वाचिक और मानसिक रूपसे की गयी मात्र क्रियाओंको कर्म माना है—
‘शरीरवाङ्मनोर्भिर्यत्कर्म प्रारभते नरः’ (गीता १८।१५)। जिन शारीरिक अथवा मानसिक क्रियाओंके साथ मनुष्य अपना सम्बन्ध मान लेता है, वे ही सब क्रियाएँ ‘कर्म’ बनकर उसे बाँधनेवाली होती हैं, अन्य क्रियाएँ नहीं।
मनुष्योंकी एक ऐसी धारणा बनी हुई है, जिसके अनुसार वे बच्चोंका पालन-पोषण तथा आजीविका—व्यापार, नौकरी, अध्यापन आदिको ही कर्म मानते हैं और इनके अतिरिक्त खाना-पीना, सोना, बैठना, चिन्तन करना आदिको कर्म नहीं मानते। इसी कारण कई मनुष्य व्यापार आदि कर्मोंको छोड़कर ऐसा मान लेते हैं कि मैं कर्म नहीं कर रहा हूँ। परन्तु यह उनकी भारी भूल है। शरीर-निर्वाह-सम्बन्धी स्थूलशरीरकी क्रियाएँ; नींद, चिन्तन आदि सूक्ष्म-शरीरकी क्रियाएँ और समाधि आदि कारण-शरीरकी क्रियाएँ—ये सब कर्म ही हैं। जबतक शरीरमें अहंता-ममता है, तबतक शरीरसे होनेवाली मात्र क्रियाएँ ‘कर्म’ हैं। कारण कि शरीर प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति कभी अक्रिय नहीं होती।