भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 176

श्लोक ५ ]

  • साधक-संजीवनी *

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अतः शरीरमें अहंता-ममता रहते हुए कोई भी मनुष्य किसी

भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता,

चाहे वह अवस्था प्रवृत्तिकी हो या निवृत्तिकी।

'कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः'-

प्रकृतिजन्य गुण (प्रकृतिके) परवश हुए प्राणियोंसे कर्म

कराते हैं। परवश होनेपर प्रकृतिके गुणोंद्वारा कर्म कराये

जाते हैं; क्योंकि प्रकृति एवं उसके गुण निरन्तर क्रियाशील

हैं (गीता-तीसरे अध्यायका सत्ताईसवाँ और तेरहवें

अध्यायका उनतीसवाँ श्लोक)। यद्यपि आत्मा स्वयं अक्रिय,

असंग, अविनाशी, निर्विकार तथा निर्लिप्त है, तथापि

जबतक वह प्रकृति एवं उसके कार्य-स्थूल, सूक्ष्म और

कारण-शरीरमें किसी भी शरीरके साथ अपना सम्बन्ध

मानकर उससे सुख चाहता है, तबतक वह प्रकृतिके परवश

रहता है (गीता-चौदहवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)।

इसी परवशताको यहाँ 'अवशः' पदसे कहा गया है। नवें

अध्यायके आठवें श्लोकमें और आठवें अध्यायके उन्नीसवें

श्लोकमें भी प्रकृतिके साथ सम्बन्ध माननेसे परवश हुए

जीवके द्वारा कर्म करनेकी बात कही गयी है।

स्वभाव बनता है वृत्तियोंसे, वृत्तियाँ बनती हैं गुणोंसे

और गुण पैदा होते हैं प्रकृतिसे। अतः चाहे स्वभावके

परवश कहो, चाहे गुणोंके परवश कहो और चाहे प्रकृतिके

परवश कहो, एक ही बात है। वास्तवमें सबके मूलमें

प्रकृतिजन्य पदार्थोंकी परवशता ही है। इसी परवशतासे

सभी परवशताएँ पैदा होती हैं। अतः प्रकृतिजन्य पदार्थोंकी

परवशताको ही कहीं कालकी, कहीं स्वभावकी, कहीं

कर्मकी और कहीं गुणोंकी परवशता कह दिया है। तात्पर्य

यह है कि यह जीव जबतक प्रकृति और उसके गुणोंसे

अतीत नहीं होता, परमात्माकी प्राप्ति नहीं कर लेता,

तबतक यह गुण, काल, स्वभाव आदिके अवश (परवश)

ही रहता है अर्थात् यह जीव जबतक प्रकृतिके साथ

अपना सम्बन्ध मानता है, प्रकृतिमें स्थित रहता है,

तबतक यह कभी गुणोंके, कभी कालके, कभी भोगोंके

और कभी स्वभावके परवश होता रहता है, कभी स्ववश

(स्वतन्त्र) नहीं रहता। इनके सिवाय यह परिस्थिति,

व्यक्ति, स्त्री, पुत्र, धन, मकान आदिके भी परवश होता

रहता है। परन्तु जब यह गुणोंसे अतीत अपने स्वरूपका

अथवा परमात्मतत्त्वका अनुभव कर लेता है, तो फिर

इसकी यह परवशता नहीं रहती और यह स्वतःसिद्ध

स्वतन्त्रताको प्राप्त हो जाता है।

विशेष बात

प्रकृतिकी सक्रिय (स्थूल) और अक्रिय (सूक्ष्म) दो

अवस्थाएँ होती हैं; जैसे कार्य करना सक्रिय अवस्था है

और कार्य न करना (निद्रा आदि) अक्रिय अवस्था।

वास्तवमें अक्रिय अवस्थामें भी प्रकृति अक्रिय नहीं रहती,

प्रत्युत उसमें सूक्ष्मरूपसे सक्रियता रहती है। जैसे किसी

सोये हुए मनुष्यको जागनेके समयसे पूर्व ही जगा देनेपर

वह कहता है कि मुझे कच्ची नींदमें जगा दिया। इससे यह

सिद्ध हुआ कि नींदकी अक्रिय अवस्थामें भी नींदके

पकनेकी क्रिया हो रही थी। जब पूरी नींद लेनेके बाद

मनुष्य जागता है, तब उपर्युक्त बात नहीं कहता; क्योंकि

नींदका पकना पूर्ण हो गया। इसी प्रकार समाधि, प्रलय,

महाप्रलय आदिकी अवस्थाओंमें भी सूक्ष्मरूपसे क्रिया

होती रहती है।

वास्तवमें देखा जाय तो प्रकृतिकी कभी अक्रिय

अवस्था होती ही नहीं; क्योंकि वह प्रतिक्षण बदलनेवाली

है। स्वयं आत्मामें कर्तापन नहीं है; परन्तु प्रकृतिके कार्य

शरीरादिके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे वह प्रकृतिके

परवश हो जाता है। इसी परवशताके कारण स्वयं अकर्ता

होते हुए भी वह अपनेको कर्ता मानता रहता है। वस्तुतः

आत्मामें कोई भी परिवर्तनरूप क्रिया नहीं होती। जैसे

प्रकृतिद्वारा समस्त सृष्टिकी क्रियाएँ स्वाभाविकरूपसे हो

रही हैं, ऐसे ही उसके द्वारा बालकपन, जवानी आदि

अवस्थाएँ और भोजनका पाचन, श्वासोंका आवागमन

आदि क्रियाएँ एवं इसी प्रकार देखना, सुनना आदि क्रियाएँ

भी स्वाभाविकरूपसे हो रही हैं। परन्तु जीवात्मा कुछ

क्रियाओंमें अपनेको कर्ता मानकर बँध जाता है।

प्रकृति निरन्तर परिवर्तनशील है, पर शुद्ध स्वरूपमें

कभी कोई परिवर्तन नहीं होता। वास्तवमें प्राकृतिक

पदार्थोंकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। प्रतिक्षण बदलते हुए

पुंजका नाम ही पदार्थ है। पदार्थोंके साथ अपना सम्बन्ध

माननेसे कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी

कर्म किये बिना नहीं रह सकता। अगर साधक ऐसा

वास्तविक अनुभव कर ले कि सम्पूर्ण क्रियाएँ पदार्थोंमें ही

हो रही हैं और पदार्थोंके साथ मेरा किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध

नहीं है तो वह परवशतासे मुक्त हो सकता है। कर्मयोगी

प्रतिक्षण परिवर्तनशील पदार्थोंकी कामना, ममता और

आसक्तिका त्याग करके इस परवशताको मिटा देता है।

भगवान्‌ने इस श्लोकमें जो बात कही है, वही बात

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