श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
उन्होंने अठारहवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भी कही है कि प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध मानते हुए कोई भी मनुष्य | कर्माका सम्पूर्णतासे त्याग नहीं कर सकता—‘न हि देहभूता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।’
परिशिष्ट भाव —क्रियामात्र केवल प्रकृतिमें ही होती है। परन्तु प्रकृतिके साथ अपना तादात्म्य स्वीकार करनेसे मनुष्य प्रकृतिजन्य गुणोंके अधीन हो जाता है—‘अवशः’ तथा उसका क्रियाके साथ सम्बन्ध हो जाता है। इसलिये प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध माननेवाला कोई भी मनुष्य जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, मूर्च्छा, समाधि तथा सर्ग-महासर्ग, प्रलय-महाप्रलय आदि किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता।
सुषुप्ति, मूर्च्छा तथा समाधि-अवस्थामें क्रिया कैसे होती है? मनुष्य सोता हो और कोई उसको बीचमें ही जगा दे तो वह कहता है कि मेरेको कच्ची नींदमें जगा दिया! इससे सिद्ध होता है कि सुषुप्तिके समय भी नींदके पकनेकी क्रिया हो रही थी। ऐसे ही मूर्च्छा और समाधिके समय भी क्रिया होती है। पातंजलयोगदर्शनमें इस क्रियाको ‘परिणाम’ नामसे कहा है। ‘परिणाम’ का अर्थ है—परिवर्तनकी धारा अर्थात् बदलनेका प्रवाह। तात्पर्य है कि समाधिके आरम्भसे लेकर व्युत्थान होनेतक क्रिया होती रहती है। अगर क्रिया न हो तो व्युत्थान हो ही नहीं सकता। समाधिके समय परिणाम होता है और समाधिके अन्तमें व्युत्थान होता है।
प्रकृतिकी सम्पूर्ण अवस्थाओंसे अतीत है—सहजावस्था अथवा सहज समाधि। सहजावस्था स्वरूपकी होती है, जिसमें किंचिन्मात्र भी कोई क्रिया नहीं है, क्रिया होनी सम्भव ही नहीं है। अतः सहजावस्थामें परिणाम तथा व्युत्थान कभी होता ही नहीं। कारण कि क्रियाएँ प्रकृति-विभागमें ही हैं, स्वरूप-विभागमें नहीं।
‘कार्यते हवशः कर्म’—कर्म करनेमें तो हम परतन्त्र हैं, पर उनमें राग-द्वेष करनेमें अथवा न करनेमें हम स्वतन्त्र हैं।
सम्बन्ध—पीछेके श्लोकमें यह कहा गया है कि कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रहता। इसपर यह शंका हो सकती है कि मनुष्य इन्द्रियोंकी क्रियाओंको हठपूर्वक रोककर भी तो अपनेको अक्रिय मान सकता है। इसका समाधान करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।
कर्मैन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ ६ ॥
| यः | = जो | मनसा | = मनसे | विमूढात्मा | = मूढ़ बुद्धिवाला |
|---|---|---|---|---|---|
| कर्मैन्द्रियाणि | = कर्मैन्द्रियों | इन्द्रियार्थान् | = इन्द्रियोंके | मिथ्याचारः | = मिथ्याचारी |
| (सम्पूर्ण इन्द्रियों) | विषयोंका | (मिथ्या आचरण) | |||
| को | स्मरन् | = चिन्तन करते हुए | करनेवाला) | ||
| संयम्य | = (हठपूर्वक) | आस्ते | = बैठता है, | ||
| रोककर | सः | = वह | उच्यते | = कहा जाता है। |
व्याख्या —‘कर्मैन्द्रियाणि संयम्य.....मिथ्याचारः स उच्यते’—यहाँ ‘कर्मैन्द्रियाणि’ पदका अभिप्राय पाँच कर्मैन्द्रियों (वाक्, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा) से ही नहीं है, प्रत्युत इनके साथ पाँच ज्ञानेन्द्रियों (श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और प्राण) से भी है; क्योंकि ज्ञानेन्द्रियोंके बिना केवल कर्मैन्द्रियोंसे कर्म नहीं हो सकते। इसके सिवाय केवल हाथ, पैर आदि
कर्मैन्द्रियोंको रोकनेसे तथा आँख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियोंको न रोकनेसे पूरा मिथ्याचार भी सिद्ध नहीं होता।
गीतामें कर्मैन्द्रियोंके अन्तर्गत ही ज्ञानेन्द्रियाँ मानी गयी हैं। इसलिये गीतामें ‘कर्मैन्द्रिय’ शब्द तो आता है, पर ‘ज्ञानेन्द्रिय’ शब्द कहीं नहीं आता। पाँचवें अध्यायके आठवें-नवें श्लोकोंमें देखना, सुनना, स्पर्श करना आदि
१-व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षणचिन्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥ ११ ॥ सर्वाश्रैतैकाग्रतयोः क्षयोदयो चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥ ११ ॥ ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणामः ॥ १२ ॥ (विभूतिपाद)
२-अथ कोऽयं परिणामः? अवस्थितस्य द्रव्यस्य पूर्वधर्मेनिवृत्तौ धर्मान्तरोत्पत्तिः परिणामः (योगदर्शन, विभूति- १३ का व्यास-भाष्य) ‘यह परिणाम क्या है? अवस्थित द्रव्यके पूर्व धर्मकी निवृत्ति होकर अन्य धर्मकी उत्पत्ति (अवस्थान्तर) ही परिणाम है।’