श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
सातवों श्लोक), जिसका फल मूहता अर्थात् मूहयोनियोंकी प्राप्ति है—‘अज्ञानं तमसः फलम्’ (गीता १४।१६)। कर्मोंको दुःखरूप समझकर उनका त्याग करना ‘राजस त्याग’ कहलाता है (गीता—अठारहवें अध्यायका आठवों श्लोक), जिसका फल दुःखोंकी प्राप्ति है—‘राजसस्तु फलं दुःखम्’ (गीता १४।१६)। इसलिये यहाँ भगवान् अर्जुनको कर्मोंका त्याग करनेके लिये नहीं कहते, प्रत्युत स्वार्थ, ममता, फलासक्ति, कामना, वासना, पक्षपात आदिसे रहित होकर शास्त्रविधिके अनुसार सुचारूपसे उत्साहपूर्वक कर्तव्य-कर्मोंको करनेकी आज्ञा देते हैं, जो ‘सात्विक त्याग’ कहलाता है (गीता—अठारहवें अध्यायका नवों श्लोक)। स्वयं भगवान् भी आगे चलकर कहते हैं कि मेरे लिये कुछ भी करना शेष नहीं है, फिर भी मैं सावधानीपूर्वक कर्म करता हूँ (तीसरे अध्यायका बाईसवों-तेईसवों श्लोक)।
कर्तव्य-कर्मोंका अच्छी तरह आचरण करनेमें दो कारणोंसे शिथिलता आती है—(१) मनुष्यका स्वभाव है कि वह पहले फलकी कामना करके ही कर्ममें प्रवृत्त होता है। जब वह देखता है कि कर्मयोगके अनुसार फलकी कामना नहीं रखनी है, तब वह विचार करता है कि कर्म ही क्यों कर्हू? (२) कर्म आरम्भ करनेके बाद जब अन्तमें उसे पता लग जाय कि इसका फल विपरीत होगा, तब वह विचार करता है कि मैं कर्म तो अच्छा-से-अच्छा कर्हूँ, पर फल विपरीत मिले तो फिर कर्म कर्हूँ ही क्यों? कर्मयोगी न तो कोई कामना करता है और न कोई नाशवान् फल ही चाहता है, वह तो मात्र संसारका हित सामने रखकर ही कर्तव्य-कर्म करता है। अतः उपर्युक्त दोनों कारणोंसे उसके कर्तव्य-कर्ममें शिथिलता नहीं आ सकती।
मार्मिक बात
मनुष्यका प्रायः ऐसा स्वभाव हो गया है कि जिसमें उसको अपना स्वार्थ दिखायी देता है, उसी कर्मको वह बड़ी तत्परतासे करता है। परन्तु वही कर्म उसके लिये बन्धनकारक हो जाता है। अतः इस बन्धनसे छूटनेके लिये उसे कर्मयोगके
अनुसार आचरण करनेकी बड़ी आवश्यकता है।
कर्मयोगमें सभी कर्म केवल दूसरोंके लिये किये जाते हैं, अपने लिये कदापि नहीं। दूसरे कौन-कौन हैं? इसे समझना भी बहुत जरूरी है। अपने शरीरके सिवाय दूसरे प्राणी-पदार्थ तो दूसरे हैं ही, पर ये अपने कहलानेवाले स्थूल-शरीर, सूक्ष्म-शरीर (इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण) और कारण-शरीर (जिसमें माना हुआ ‘अहम्’ है) भी स्वयंसे दूसरे ही हैं*। कारण कि स्वयं (जीवात्मा) चेतन परमात्माका अंश है और ये शरीर आदि पदार्थ जड़ प्रकृतिके अंश हैं। समस्त क्रियाएँ जड़में और जड़के लिये ही होती हैं। चेतनमें और चेतनके लिये कभी कोई क्रिया नहीं होती। अतः ‘करना’ अपने लिये है ही नहीं, कभी हुआ नहीं और हो सकता भी नहीं। हाँ, संसारसे मिले हुए इन शरीर आदि जड़ पदार्थोंको चेतन जितने अंशमें ‘मैं’, ‘मेरा’ और ‘मेरे लिये’ मान लेता है, उतने अंशमें उसका स्वभाव ‘अपने लिये’ करनेका हो जाता है। अतः दूसरोंके लिये कर्म करनेसे ममता-आसक्ति सुगमतासे मिट जाती है।
शरीरकी अवस्थाएँ (बचपन, जवानी आदि) बदलनेपर भी ‘मैं वही हूँ’—इस रूपमें अपनी एक निरन्तर रहनेवाली सत्ताका प्राणिमात्रको अनुभव होता है। इस अपरिवर्तनशील सत्ता (अपने होनेपन) की परमात्मतत्त्वेके साथ स्वतः एकता है और परिवर्तनशील शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिकी संसारके साथ स्वतः एकता है। हमारे द्वारा जो भी क्रिया की जाती है, वह शरीर, इन्द्रियों आदिके द्वारा ही की जाती है; क्योंकि क्रियामात्रका सम्बन्ध प्रकृति और प्रकृतिजन्य पदार्थोंके साथ है, स्वयं (अपने स्वरूप) के साथ नहीं। इसलिये शरीरके सम्बन्धके बिना हम कोई भी क्रिया नहीं कर सकते। इससे यह बात निश्चितरूपसे सिद्ध होती है कि हमें अपने लिये कुछ भी नहीं करना है; जो कुछ करना है, संसारके लिये ही करना है। कारण कि ‘करना’ उसीपर लागू होता है, जो स्वयं कर सकता है। जो स्वयं कुछ कर ही नहीं सकता, उसके लिये ‘करने’ का विधान है ही नहीं। जो कुछ किया जाता है, संसारकी सहायतासे ही किया जाता है।
- जैसे संसार ‘पर’ है, ऐसे ही शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि भी ‘पर’ अर्थात् दूसरे ही हैं, अतः कर्मयोगी इनको अपना न मानकर इनकी भी सेवा करता है। शरीरको निद्रालु, आलसी, प्रमादी, निकम्मा और भोगी न बनने देना ‘शरीर’ की सेवा है। इन्द्रियोंको सांसारिक भोगोंमें न लगने देना ‘इन्द्रियों’ की सेवा है। मनको किसीका अहित सोचनेमें, विषयोंके चिन्तनमें तथा व्यर्थ चिन्तनमें न लगने देना ‘मन’ की सेवा है। बुद्धिको दूसरोंके कर्तव्यपर विचार न करने देना, दूसरा क्या करता है, क्या नहीं—यह न सोचने देना ‘बुद्धि’ की सेवा है। वास्तवमें शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिमें ममता-आसक्ति न रखना ही इनकी सबसे बड़ी सेवा है।