श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 186, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १०-११ ]
- साधक-संजीवनी *
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अतः 'करना' संसारके लिये ही है। अपने लिये करनेसे ही मनुष्य कर्मोसे बँधता है—'यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।'
विनाशी और परिवर्तनशील शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिके साथ अपने अविनाशी और अपरिवर्तनशील स्वरूपका कोई सम्बन्ध नहीं है, इसलिये अपना और अपने लिये कुछ भी नहीं है। शरीरदिकी सहायताके बिना हम कुछ नहीं कर
सकते, इसलिये अपने लिये कुछ भी नहीं करना है। अपने सत्-स्वरूपमें कभी कोई कमी नहीं आती और कमी आये बिना कोई इच्छा नहीं होती, इसलिये अपने लिये कुछ भी नहीं चाहिये। इस प्रकार जब क्रिया और पदार्थसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है (जो वास्तवमें है) तब यदि ज्ञानके संस्कार हैं तो स्वरूपका साक्षात्कार हो जाता है और यदि भक्तिके संस्कार हैं तो भगवान्में प्रेम हो जाता है।
परिशिष्ट भाव —मनुष्य कर्म करनेसे नहीं बँधता, प्रत्युत 'अन्यत्र कर्म' करनेसे अर्थात् अपने लिये कर्म करनेसे बँधता है (गीता—इसी अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। अतः 'यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः' पदोंका तात्पर्य है—अपने लिये कुछ नहीं करना है।
मनुष्य कर्म-बन्धनसे तभी मुक्त हो सकता है, जब वह संसारसे मिले हुए शरीर, वस्तु, योग्यता और सामर्थ्य (बल) संसारकी ही सेवामें लगा दे और बदलेमें कुछ न चाहे। कारण कि संसार हमें वह वस्तु दे ही नहीं सकता, जो हम वास्तवमें चाहते हैं। हम सुख चाहते हैं, अमरता चाहते हैं, निश्चिन्तता चाहते हैं, निर्भयता चाहते हैं, स्वाधीनता चाहते हैं। परन्तु यह सब हमें संसारसे नहीं मिलेगा, प्रत्युत संसारके सम्बन्ध-विच्छेदसे मिलेगा। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदके लिये यह आवश्यक है कि हमें संसारसे जो मिला है, उसको केवल संसारकी ही सेवामें समर्पित कर दें।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि यज्ञ-(कर्तव्य-कर्म-) के अतिरिक्त कर्म बन्धनकारक होते हैं। अतः इस बन्धनसे मुक्त होनेके लिये कर्मोंका स्वरूपसे त्याग न करके कर्तव्यबुद्धिसे कर्म करना आवश्यक है। अब कर्मोंकी अवश्यकर्तव्यताको पुष्ट करनेके लिये और भी हेतु बताते हैं।
**सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।**
**अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुकं ॥ १० ॥**
**देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।**
**परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥**
**प्रजापतिः** | = प्रजापति ब्रह्माजीने | **प्रसविष्यध्वम्** | = सबकी वृद्धि करो (और) | **भावयत** | = उन्नत करो (और)
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**पुरा** | = सृष्टिके आदिकालमें | **एषः** | = यह (कर्तव्य-कर्मरूप यज्ञ) | **ते** | = वे
**सहयज्ञाः** | = कर्तव्यकर्मोंके विधानसहित | **वः** | = तुमलोगोंको | **देवाः** | = देवतालोग (अपने कर्तव्यके द्वारा)
**प्रजाः** | = प्रजा (मनुष्य आदि) की | **इष्टकामधुकं** | = कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री | **वः** | = तुमलोगोंको
**सृष्ट्वा** | = रचना करके (उनसे, प्रधानतया मनुष्योंसे) | **अस्तु** | = हो। | **भावयन्तु** | = उन्नत करें। (इस प्रकार)
**उवाच** | = कहा कि (तुमलोग) | **अनेन** | = इस (अपने कर्तव्यकर्म) के द्वारा (तुमलोग) | **परस्परम्** | = एक-दूसरेको
**अनेन** | = इस कर्तव्यके द्वारा | **देवान्** | = देवताओंको | **भावयन्तः** | = उन्नत करते हुए (तुमलोग)
**व्याख्या** | —'सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजा-पतिः'—ब्रह्माजी प्रजा (सृष्टि) के रचयिता एवं उसके | | | **परम्** | = परम
| | | | **श्रेयः** | = कल्याणको
| | | | **अवाप्स्यथ** | = प्राप्त हो जाओगे।
स्वामी हैं; अतः अपने कर्तव्यका पालन करनेके साथ वे प्रजाकी रक्षा तथा उसके कल्याणका विचार करते रहते हैं।