भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक १४-१५ ]

  • साधक-संजीवनी *

११५

वास्तवमें शरीरसे संसारका ही काम होता है, अपना काम होता ही नहीं, क्योंकि शरीर हमारे लिये है ही नहीं। कुछ-न-कुछ काम करनेके लिये ही शरीरकी जरूरत होती है। अगर कुछ भी न करें तो शरीरकी क्या जरूरत? इसलिये शरीरके द्वारा अपने लिये कुछ करना ही दोष है। मिली हुई वस्तुके द्वारा हम अपने लिये कुछ नहीं कर सकते, प्रत्युत उसके द्वारा संसारकी सेवा कर सकते हैं। शरीर संसारका अंश है; अतः इससे जो कुछ होगा, संसारके लिये ही होगा। संसारसे आगे शरीर-इन्द्रियां-मन-बुद्धि जा सकते ही नहीं, इनको संसारसे अलग कर सकते ही नहीं। इसलिये अपने सुखके लिये कर्म करना मनुष्यपना नहीं है, प्रत्युत राक्षसपना है, असुरपना है! वास्तवमें मनुष्य वही है, जो दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है। अपने सुखके लिये कर्म करनेवाले पापका ही भक्षण करते हैं अर्थात् सदा दुःखी ही रहते हैं और दूसरेके हितके लिये कर्म करनेवाले सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं अर्थात् सदाके लिये सुखी हो जाते हैं—‘यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्’ (गीता ४।३१)।

सम्बन्ध—‘मुखे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं?’—अर्जुनके इस प्रश्नके उत्तरमें भगवान् अनेक हेतु देते हुए आगेके दो श्लोकोंमें सुष्ठि-चक्रकी सुरक्षाके लिये भी यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन करते हैं।

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादनसम्भवः।

यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।

तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥

भूतानि= सम्पूर्ण प्राणीयज्ञः= यज्ञहुआ (जान)।
अनात्= अन्सेकर्मसमुद्भवः= कर्मोंसेतस्मात्
भवन्ति= उत्पन्न होते हैं।सम्पन्न होता है।सर्वगतम्
अनसम्भवः= अन्की उत्पत्तिकर्म= कर्मोंको (तू)ब्रह्म
पर्जन्यात्= वर्षासे होती है।ब्रह्मोद्भवम्= वेदसे उत्पन्नयज्ञे
पर्जन्यः= वर्षाविद्धि= जान (और)नित्यम्
यज्ञात्= यज्ञसेब्रह्म= वेदकोप्रतिष्ठितम्
भवति= होती है।अक्षरसमुद्भवम्= अक्षर ब्रह्मसे प्रकट

व्याख्या—‘अन्नाद्भवन्ति भूतानि’—प्राणोंको धारण करनेके लिये जो खाया जाता है, वह ‘अन्’ कहलाता है।

जिस प्राणीका जो खाद्य है, जिसे ग्रहण करनेसे उसके शरीरकी उत्पत्ति, भरण और पुष्टि होती है, उसे ही यहाँ ‘अन्’ नामसे कहा गया है; जैसे—मिट्टीका कोड़ा मिट्टी खाकर जीता है तो मिट्टी ही उसके लिये अन् है।

जरायुज (मनुष्य, पशु आदि), उद्भिद्वज्ज (वृक्षादि), अण्डज (पक्षी, सर्प, चींटी आदि) और स्वेदज (जू आदि)—ये चारों प्रकारके प्राणी अन्से ही उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न होकर अन्से ही जीवित रहते हैं।

‘पर्जन्यादनसम्भवः’—समस्त खाद्य पदार्थोंकी उत्पत्ति जलसे होती है। घास-फूस, अनाज आदि तो जलसे होते ही हैं, मिट्टीके उत्पन्न होनेमें भी जल ही कारण है। अन्न, जल, वस्त्र, मकान आदि शरीर-निर्वाहकी सभी सामग्री स्थूल या सूक्ष्मरूपसे जलसे सम्बन्ध रखती है और जलका आधार वर्षा है।

‘यज्ञाद्भवति पर्जन्यः’—‘यज्ञ’ शब्द मुख्यरूपसे आहुति देनेकी क्रियाका वाचक है। परन्तु गीताके सिद्धान्त और कर्मयोगके प्रस्तुत प्रकरणके अनुसार यहाँ ‘यज्ञ’ शब्द सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंका उपलक्षक है। यज्ञमें त्यागकी ही

१-‘अद भक्षणे’ धातुसे ‘क्त’ करनेपर ‘अदोऽनने’ (अष्टा० ३।२।६८) सूत्रके निपातनसे ‘अन्’ शब्द बनता है, अन्यथा ‘अदो जगिधत्त्यन्ति किति०’ (अष्टा० २।४।३६) से ‘जग्ध’ शब्द बनेगा।

२-अन्नाद्भवेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। अन्नेन जातानि जीवन्ति। (तैत्तिरीयोपनिषद् ३।२)