श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक १४-१५ ]
- साधक-संजीवनी *
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वास्तवमें शरीरसे संसारका ही काम होता है, अपना काम होता ही नहीं, क्योंकि शरीर हमारे लिये है ही नहीं। कुछ-न-कुछ काम करनेके लिये ही शरीरकी जरूरत होती है। अगर कुछ भी न करें तो शरीरकी क्या जरूरत? इसलिये शरीरके द्वारा अपने लिये कुछ करना ही दोष है। मिली हुई वस्तुके द्वारा हम अपने लिये कुछ नहीं कर सकते, प्रत्युत उसके द्वारा संसारकी सेवा कर सकते हैं। शरीर संसारका अंश है; अतः इससे जो कुछ होगा, संसारके लिये ही होगा। संसारसे आगे शरीर-इन्द्रियां-मन-बुद्धि जा सकते ही नहीं, इनको संसारसे अलग कर सकते ही नहीं। इसलिये अपने सुखके लिये कर्म करना मनुष्यपना नहीं है, प्रत्युत राक्षसपना है, असुरपना है! वास्तवमें मनुष्य वही है, जो दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है। अपने सुखके लिये कर्म करनेवाले पापका ही भक्षण करते हैं अर्थात् सदा दुःखी ही रहते हैं और दूसरेके हितके लिये कर्म करनेवाले सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं अर्थात् सदाके लिये सुखी हो जाते हैं—‘यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्’ (गीता ४।३१)।
सम्बन्ध—‘मुखे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं?’—अर्जुनके इस प्रश्नके उत्तरमें भगवान् अनेक हेतु देते हुए आगेके दो श्लोकोंमें सुष्ठि-चक्रकी सुरक्षाके लिये भी यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन करते हैं।
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादनसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥
| भूतानि | = सम्पूर्ण प्राणी | यज्ञः | = यज्ञ | हुआ (जान)। |
|---|---|---|---|---|
| अनात् | = अन्से | कर्मसमुद्भवः | = कर्मोंसे | तस्मात् |
| भवन्ति | = उत्पन्न होते हैं। | सम्पन्न होता है। | सर्वगतम् | |
| अनसम्भवः | = अन्की उत्पत्ति | कर्म | = कर्मोंको (तू) | ब्रह्म |
| पर्जन्यात् | = वर्षासे होती है। | ब्रह्मोद्भवम् | = वेदसे उत्पन्न | यज्ञे |
| पर्जन्यः | = वर्षा | विद्धि | = जान (और) | नित्यम् |
| यज्ञात् | = यज्ञसे | ब्रह्म | = वेदको | प्रतिष्ठितम् |
| भवति | = होती है। | अक्षरसमुद्भवम् | = अक्षर ब्रह्मसे प्रकट |
व्याख्या—‘अन्नाद्भवन्ति भूतानि’—प्राणोंको धारण करनेके लिये जो खाया जाता है, वह ‘अन्’ कहलाता है।
जिस प्राणीका जो खाद्य है, जिसे ग्रहण करनेसे उसके शरीरकी उत्पत्ति, भरण और पुष्टि होती है, उसे ही यहाँ ‘अन्’ नामसे कहा गया है; जैसे—मिट्टीका कोड़ा मिट्टी खाकर जीता है तो मिट्टी ही उसके लिये अन् है।
जरायुज (मनुष्य, पशु आदि), उद्भिद्वज्ज (वृक्षादि), अण्डज (पक्षी, सर्प, चींटी आदि) और स्वेदज (जू आदि)—ये चारों प्रकारके प्राणी अन्से ही उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न होकर अन्से ही जीवित रहते हैं।
‘पर्जन्यादनसम्भवः’—समस्त खाद्य पदार्थोंकी उत्पत्ति जलसे होती है। घास-फूस, अनाज आदि तो जलसे होते ही हैं, मिट्टीके उत्पन्न होनेमें भी जल ही कारण है। अन्न, जल, वस्त्र, मकान आदि शरीर-निर्वाहकी सभी सामग्री स्थूल या सूक्ष्मरूपसे जलसे सम्बन्ध रखती है और जलका आधार वर्षा है।
‘यज्ञाद्भवति पर्जन्यः’—‘यज्ञ’ शब्द मुख्यरूपसे आहुति देनेकी क्रियाका वाचक है। परन्तु गीताके सिद्धान्त और कर्मयोगके प्रस्तुत प्रकरणके अनुसार यहाँ ‘यज्ञ’ शब्द सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंका उपलक्षक है। यज्ञमें त्यागकी ही
१-‘अद भक्षणे’ धातुसे ‘क्त’ करनेपर ‘अदोऽनने’ (अष्टा० ३।२।६८) सूत्रके निपातनसे ‘अन्’ शब्द बनता है, अन्यथा ‘अदो जगिधत्त्यन्ति किति०’ (अष्टा० २।४।३६) से ‘जग्ध’ शब्द बनेगा।
२-अन्नाद्भवेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। अन्नेन जातानि जीवन्ति। (तैत्तिरीयोपनिषद् ३।२)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
मुख्यता होती है। आहुति देनेमें अन्न, घी आदि चीजोंका त्याग है, दान करनेमें वस्तुका त्याग है, तप करनेमें अपने सुख-भोगका त्याग है, कर्तव्य-कर्म करनेमें अपने स्वार्थ, आराम आदिका त्याग है। अतः 'यज्ञ' शब्द यज्ञ (हवन), दान, तप आदि सम्पूर्ण शास्त्रविहित क्रियाओंका उपलक्षक है।
बृहदारण्यक-उपनिषदमें एक कथा आती है। प्रजापति ब्रह्माजीने देवता, मनुष्य और असुर—इन तीनोंको रचकर उन्हें 'द' इस अक्षरका उपदेश दिया। देवताओंके पास भोग-सामग्रीकी अधिकता होनेके कारण उन्होंने 'द' का अर्थ 'दमन करो' समझा। मनुष्योंमें संग्रहकी प्रवृत्ति अधिक होनेके कारण उन्होंने 'द' का अर्थ 'दान करो' समझा। असुरोंमें हिंसा-(दूसरोंको कष्ट देने-) का भाव अधिक होनेके कारण उन्होंने 'द' का अर्थ 'दया करो' समझा। इस प्रकार देवता, मनुष्य और असुर—तीनोंको दिये गये उपदेशका तात्पर्य दूसरोंका हित करनेमें ही है। वर्षाके समय मेघ जो 'द द द……' की गर्जना करता है, वह आज भी ब्रह्माजीके उपदेश (दमन करो, दान करो, दया करो)—के रूपसे कर्तव्य-कर्मोंकी याद दिलाता है (बृहदारण्यक० पाँचवाँ अध्याय, द्वितीय ब्राह्मण, पहलेसे तीसरे मन्त्रतक)। अपने कर्तव्य-कर्मका पालन करनेसे वर्षा कैसे होगी? वचनकी अपेक्षा अपने आचरणका असर दूसरोंपर स्वाभाविक अधिक पड़ता है—'यद्यदाचरति श्रेष्ठस्ततदेवेतरो जनः' (गीता ३।२१)। मनुष्य अपने-अपने कर्तव्य-कर्मका पालन करेंगे तो उसका असर देवताओंपर भी पड़ेगा, जिससे वे भी अपने कर्तव्यका पालन करेंगे, वर्षा करेंगे। (गीता—तीसरे अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। इस विषयमें एक कहानी है। चार किसान-बालक थे। आषाढ़का महीना आनेपर भी वर्षा नहीं हुई तो उन्होंने विचार किया कि हल चलानेका समय आ गया है; वर्षा नहीं हुई तो न सही, हम तो समयपर अपने कर्तव्यका पालन कर दें। ऐसा सोचकर उन्होंने खेतमें जाकर हल चलाना शुरू कर दिया। मोरोंने उनको हल चलाते देखा तो सोचा कि बात क्या है? वर्षा तो अभी हुई नहीं, फिर ये हल क्यों चला रहे हैं? जब उनको पता लगा कि ये अपने कर्तव्यका पालन कर रहे हैं, तब उन्होंने विचार किया कि हम अपने कर्तव्यका
पालन करनेमें पीछे क्यों रहें? ऐसा सोचकर मोर भी बोलने लग गये। मोरोंकी आवाज सुनकर मेघोंने विचार किया कि आज हमारी गर्जना सुने बिना मोर कैसे बोल रहे हैं? सारी बात पता लगनेपर उन्होंने सोचा कि हम अपने कर्तव्यसे क्यों हटें? और उन्होंने भी गर्जना करनी शुरू कर दी। मेघोंकी गर्जना सुनकर इन्द्रने सोचा कि बात क्या है? जब उसको मालूम हुआ कि वे अपने कर्तव्यका पालन कर रहे हैं, तब उसने सोचा कि अपने कर्तव्यका पालन करनेमें मैं पीछे क्यों रहूँ? ऐसा सोचकर इन्द्रने भी मेघोंको वर्षा करनेकी आज्ञा दे दी।
'यज्ञः कर्मसमुद्भवः'—निष्कामभावपूर्वक किये जानेवाले लौकिक और शास्त्रीय सभी विहित कर्मोंका नाम 'यज्ञ' है। ब्रह्मचारीके लिये अग्निहोत्र करना 'यज्ञ' है। ऐसे ही स्त्रियोंके लिये रसोई बनाना 'यज्ञ' है*। आयुर्वेदका ज्ञाता केवल लोगोंके हितके लिये वैद्यक-कर्म करे तो उसके लिये वही 'यज्ञ' है। इसी तरह विद्यार्थी अपने अध्ययनको और व्यापारी अपने व्यापारको (यदि वह केवल दूसरोंके हितके लिये निष्कामभावसे किया जाय) 'यज्ञ' मान सकते हैं। इस प्रकार वर्ण, आश्रम, देश, कालकी मर्यादा रखकर निष्कामभावसे किये गये सभी शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्म 'यज्ञ'-रूप होते हैं। यज्ञ किसी भी प्रकारका हो, क्रियाजन्य ही होता है।
संखिया, भिलावा आदि विषोंको भी वैद्यलोग जब शुद्ध करके औषधरूपमें देते हैं, तब वे विष भी अमृतकी तरह होकर बड़े-बड़े रोगोंको दूर करनेवाले बन जाते हैं। इसी प्रकार कामना, ममता, आसक्ति, पक्षपात, विषमता, स्वार्थ, अभिमान आदि—ये सब कर्मोंमें विषके समान हैं। कर्मोंके इस विपैले भागको निकाल देनेपर वे कर्म अमृतमय होकर जन्म-मरणरूप महान् रोगको दूर करनेवाले बन जाते हैं। ऐसे अमृतमय कर्म ही 'यज्ञ' कहलाते हैं।
'कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि'—वेद कर्तव्य-कर्मोंको करनेकी विधि बताते हैं (गीता—चौथे अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक)। मनुष्यको कर्तव्य-कर्म करनेकी विधिका ज्ञान वेदसे होनेके कारण ही कर्मोंको वेदसे उत्पन्न कहा गया है।
'वेद' शब्दके अन्तर्गत ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदके साथ-साथ स्मृति, पुराण, इतिहास (रामायण,
- वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः। पतितेखा गुरो वासो गृहार्थोऽपिनपरिक्रिया ॥ (मनुस्मृति २।६७)
'स्त्रियोंके लिये वैवाहिक विधिका पालन ही वैदिक संस्कार (यज्ञोपवीत), पतिकी सेवा ही गुरुकुल-निवास (वेदाध्ययन) और गृहकार्य ही अग्निहोत्र (यज्ञ) कहा गया है।
श्लोक १६ ]
- साधक-संजीवनी *
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महाभारत) एवं भिन्न-भिन्न सम्प्रदायके आचार्यके अनुभव-वचन आदि समस्त वेदानुकूल सत्-शास्त्रोंको ग्रहण कर लेना चाहिये।
‘ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्’ —यहाँ ‘ब्रह्म’ पद वेदका वाचक है। वेद सच्चिदानन्दधन परमात्मासे ही प्रकट हुए हैं (गीता १७।२३)। इस प्रकार परमात्मा सबके मूल हुए।
परमात्मासे वेद प्रकट होते हैं। वेद कर्तव्य-पालनकी विधि बताते हैं। मनुष्य उस कर्तव्यका विधिपूर्वक पालन करते हैं। कर्तव्य-कर्मके पालनसे यज्ञ होता है और यज्ञसे वर्षा होती है। वर्षासे अन्न होता है, अन्नसे प्राणी होते हैं और उन्हीं प्राणियोंमेंसे मनुष्य कर्तव्य-कर्मके पालनसे यज्ञ करते हैं*। इस तरह यह सुष्ठि-चक्र चल रहा है।
‘तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्’ —यहाँ ‘ब्रह्म’ पद अक्षर-(सगुण-निराकार परमात्मा-) का वाचक है। अतः सर्वगत (सर्वव्यापी) परमात्मा हैं, वेद नहीं।
सर्वव्यापी होनेपर भी परमात्मा विशेषरूपसे ‘यज्ञ’ (कर्तव्य-कर्म) में सदा विद्यमान रहते हैं। तात्पर्य यह है कि जहाँ निष्कामभावसे कर्तव्य-कर्मका पालन किया जाता है, वहाँ परमात्मा रहते हैं। अतः परमात्मप्राप्ति चाहनेवाले मनुष्य अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा उन्हें सुगमतापूर्वक प्राप्त कर सकते हैं—‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति
मानवः’ (गीता १८।४६)।
शंका —परमात्मा जब सर्वव्यापी हैं, तब उन्हें केवल यज्ञमें नित्य प्रतिष्ठित क्यों कहा गया है? क्या वे दूसरी जगह नित्य प्रतिष्ठित नहीं हैं?
समाधान —परमात्मा तो सभी जगह समानरूपसे नित्य विद्यमान हैं। वे अनित्य और एकदेशीय नहीं हैं। इसीलिये उन्हें यहाँ ‘सर्वगत’ कहा गया है। यज्ञ (कर्तव्य-कर्म)—में नित्य प्रतिष्ठित कहनेका तात्पर्य यह है कि यज्ञ उनका उपलब्धि-स्थान है। जमीनमें सर्वत्र जल रहनेपर भी वह कूर्प आदिसे ही उपलब्ध होता है, सब जगहसे नहीं। पाइपमें सर्वत्र जल रहनेपर भी जल वहाँसे प्राप्त होता है, जहाँ टॉटो या छिद्र होता है। ऐसे ही सर्वगत होनेपर भी परमात्मा यज्ञसे ही प्राप्त होते हैं।
अपने लिये कर्म करनेसे तथा जड़ता (शरीरादि)—के साथ अपना सम्बन्ध माननेसे सर्वव्यापी परमात्माकी प्राप्तिमें बाधा (आड़) आ जाती है। निष्कामभावपूर्वक केवल दूसरोंके हितके लिये अपने कर्तव्यका पालन करनेसे यह बाधा हट जाती है और नित्यप्राप्त परमात्माका स्वतः अनुभव हो जाता है। यही कारण है कि भगवान् अर्जुनको, जो कि अपने कर्तव्यसे हटना चाहते थे, अनेक युक्तियोंसे कर्तव्यका पालन करनेपर विशेष जोर दे रहे हैं।
सम्बन्ध—सुष्ठिचक्रके अनुसार चलने अर्थात् अपने कर्तव्यका पालन करनेकी जिम्मेवारी मनुष्यपर ही है। अतः जो मनुष्य अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता, उसकी ताड़ना भगवान् आगेके श्लोकमें करते हैं।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः। अद्यायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥ १६ ॥
| पार्थ | = हे पार्थ! | चक्रम् | = सुष्ठि-चक्रके | करनेवाला | |
|---|---|---|---|---|---|
| यः | = जो मनुष्य | न, अनुवर्तयति | = अनुसार नहीं | अद्यायुः | = अद्यायु (पापमय जीवन बितानेवाला) |
| इह | = इस लोकमें | चलता, | मनुष्य | ||
| एवम् | = इस प्रकार | सः | = वह | मोघम् | = (संसारमें) व्यर्थ ही |
| प्रवर्तितम् | = (परम्परासे) | इन्द्रियारामः | = इन्द्रियोंके द्वारा | जीवति | = जीता है। |
| प्रचलित | भोगोंमें रमण |
व्याख्या—‘पार्थ’ —नवें श्लोकमें प्रारम्भ किये हुए प्रकरणका उपसंहार करते हुए भगवान् यहाँ अर्जुनके लिये ‘पार्थ’ सम्बोधन देकर मानो यह कह रहे हैं कि तुम उसी पृथा-(कुन्ती-) के पुत्र हो, जिसने आजीवन कष्ट सहकर
भी अपने कर्तव्यका पालन किया था। अतः तुम्हारेसे भी अपने कर्तव्यकी अवहेलना नहीं होनी चाहिये। जिस युद्धको तू घोर कर्म कह रहा है, वह तरे लिये घोर कर्म नहीं, प्रत्युत यज्ञ (कर्तव्य) है। इसका पालन करना ही सुष्ठि-चक्रके
- मनुष्यसे इतर सभी स्थावर-जंगम प्राणियोंद्वारा स्वतः यज्ञ (रोपेपकार) होता रहता है, पर वे यज्ञका अनुष्ठान बुद्धिपूर्वक नहीं कर सकते। बुद्धिपूर्वक यज्ञका अनुष्ठान मनुष्य ही कर सकता है; क्योंकि इसकी योग्यता और अधिकार मनुष्यको ही है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
अनुसार बरतना है और इसका पालन न करना सृष्टि-चक्रके अनुसार न बरतना है।
‘एवं प्रवर्तितां चक्रं नानुवर्तयतीह यः’—जैसे रथके पहियेका छोटा-सा अंश भी टूट जानेपर रथके समस्त अंगोंको एवं उसपर बैठे रथी और सारथिको धक्का लगता है, ऐसे ही जो मनुष्य चौदहवें-पन्द्रहवें श्लोकोंमें वर्णित सृष्टि-चक्रके अनुसार नहीं चलता वह समष्टि सृष्टिके संचालनमें बाधा डालता है।
संसार और व्यक्ति दो (विजातीय) वस्तु नहीं हैं। जैसे शरीरका अंगोंके साथ और अंगोंका शरीरके साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है, ऐसे ही संसारका व्यक्तिके साथ और व्यक्तिका संसारके साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। जब व्यक्ति कामना, ममता, आसक्ति और अहंताका त्याग करके अपने कर्तव्यका पालन करता है, तब उससे सम्पूर्ण सृष्टिमें स्वतः सुख पहुँचता है।
‘इन्द्रियारामः’—‘जो मनुष्य कामना, ममता, आसक्ति आदिसे युक्त होकर इन्द्रियोंके द्वारा भोग भोगता है, उसे यहाँ भोगोंमें रमण करनेवाला कहा गया है। ऐसा मनुष्य पशुसे भी नीचा है; क्योंकि पशु नये पाप नहीं करता; प्रत्युत पहले किये गये पापोंका ही फल भोगकर निर्मलताकी ओर जाता है; परन्तु ‘इन्द्रियाराम’ मनुष्य नये-नये पाप करके पतनकी ओर जाता है और साथ ही सृष्टि-चक्रमें बाधा उत्पन्न करके सम्पूर्ण सृष्टिको दुःख पहुँचाता है।
‘अधायुः’—‘सृष्टि-चक्रके अनुसार न चलनेवाले मनुष्यकी आयु, उसका जीवन केवल पापमय है। कारण कि इन्द्रियोंके द्वारा भोगबुद्धिसे भोग भोगनेवाला मनुष्य हँसारूप पापसे बच ही नहीं सकता। स्वार्थी, अभिमानी और भोग तथा संग्रहको चाहनेवाले मनुष्यके द्वारा दूसरोंका अहित
परिशिष्ट भाव —नवें श्लोकसे लेकर यहाँतक जो वर्णन आया है, उसका तात्पर्य निःस्वार्थभावसे दूसरोंकी सेवा करनेमें ही है।
सम्बन्ध—संसारसे ‘सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये जो अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता, उस मनुष्यकी पूर्वश्लोकमें ताड़ना की गयी है। परन्तु जिसने अपने कर्तव्यका पालन करके संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया है, उस महापुरुषकी स्थितिका वर्णन भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।
यस्त्वात्मारतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १७ ॥
होता है; अतः ऐसे मनुष्यका जीवन पापमय होता है। गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी कहते हैं।
पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद ।
ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद ॥
(मानस ७।३९)
‘मोघं पार्थ स जीवति’—अपने कर्तव्यका पालन न करनेवाले मनुष्यकी सभ्य भाषामें निन्दा या ताड़ना करते हुए भगवान् कहते हैं कि ऐसा मनुष्य संसारमें व्यर्थ ही जीता है अर्थात् वह मर जाय तो अच्छा है! तात्पर्य यह है कि यदि वह अपने कर्तव्यका पालन करके सृष्टिको सुख नहीं पहुँचाता तो कम-से-कम दुःख तो न पहुँचाये। जैसे भगवान् श्रीरामके वनवासके समय अयोध्यावासियोंके चित्रकूट आनेपर कोल, किरात, भील आदि जंगली लोगोंने उनसे कहा था कि हम आपके वस्त्र और बर्तन नहीं चुरा लेंते, यही हमारी बहुत बड़ी सेवा है—यह हमारी अति बड़ी सेवाकाई। लेहिं न बासन बसन चोराई ॥ (मानस १।२५१।२), ऐसे ही अपने कर्तव्यका पालन न करने-वाले मनुष्य कम-से-कम सृष्टि-चक्रमें बाधा न डालें तो यह उनकी सेवा ही है।
सृष्टि-चक्रके अनुसार न चलनेवाले मनुष्यके लिये भगवान्ने पहले ‘स्तेन एव सः’ (३।१२) ‘वह चोर ही है’ और ‘भुञ्जते ते त्वधम्’ (३।१३) ‘वे तो पापको ही खाते हैं’—इस प्रकार कहा और अब इस श्लोकमें ‘अधायुरिन्द्रियारामः’—‘वह पापायु और इन्द्रियाराम है’—ऐसा कहकर उसके जीनेको भी व्यर्थ बताते हैं।
गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने भी कहा है—तेज कुसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा ॥ उदय केत सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके ॥
(मानस १।४।३)
श्लोक १७ ]
- साधक-संजीवनी *
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तु = परन्तु यः = जो मानवः = मनुष्य आत्मरतिः, एव = अपने-आपमें ही रमण करनेवाला
च = और आत्मतृप्तः = अपने-आपमें ही तृप्त च = तथा आत्मनि = अपने-आपमें एव = ही
सन्तुष्टः = सन्तुष्ट स्यात् = है, तस्य = उसके लिये कार्यम् = कोई कर्तव्य न = नहीं विद्यते = है।
व्याख्या—‘यस्त्वात्मरतिरेव....च सन्तुष्टस्तस्य’ —यहाँ ‘तु’ पद पूर्वश्लोकमें वर्णित अपने कर्तव्यका पालन न करनेवाले मनुष्यसे कर्तव्यकर्मके द्वारा सिद्धिको प्राप्त महापुरुषकी विलक्षणता बतानेके लिये प्रयुक्त हुआ है। जबतक मनुष्य अपना सम्बन्ध संसारसे मानता है, तबतक वह अपनी ‘रति’ (प्रीति) इन्द्रियोंके भोगोंसे एवं स्त्री, पुत्र, परिवार आदिसे, ‘तृप्ति’ भोजन (अन्न-जल)–से तथा ‘सन्तुष्टि’ धनसे मानता है। परन्तु इसमें उसकी प्रीति, तृप्ति और सन्तुष्टि न तो कभी पूर्ण ही होती है और न निरन्तर ही रहती है। कारण कि संसार प्रतिक्षण परिवर्तनशील, जड़ और नाशवान् है तथा ‘स्वयं’ सदा एकरस रहनेवाला, चेतन और अविनाशी है। तात्पर्य है कि ‘स्वयं’ का संसारके साथ लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं है। अतः ‘स्वयं’ की प्रीति, तृप्ति और सन्तुष्टि संसारसे कैसे हो सकती है?
किसी भी मनुष्यकी प्रीति संसारमें सदा नहीं रहती—यह सभीका अनुभव है। विवाहके समय स्त्री और पुरुषमें परस्पर जो प्रीति या आकर्षण प्रतीत होता है, वह एक-दो सन्तान होनेके बाद नहीं रहता। कहीं-कहीं तो स्त्रियाँ अपने बूढ़ पतिके लिये यहाँतक कह देती हैं कि ‘बुढ़ा मर जाय तो अच्छा है!’ भोजन करनेसे प्राप्त ‘तृप्ति’ भी कुछ ही समयके लिये प्रतीत होती है, मनुष्यको धन-प्राप्तिमें जो ‘सन्तुष्टि’ प्रतीत होती है, वह भी क्षणिक होती है; क्योंकि धनकी लालसा सदा उत्तरोत्तर बढ़ती ही रहती है। इसलिये कभी निरन्तर बनी रहती है। तात्पर्य यही है कि संसारमें प्रीति, तृप्ति और संतुष्टि कभी स्थायी नहीं रह सकती।
मनुष्यको सांसारिक वस्तुओंमें प्रीति, तृप्ति और संतुष्टिकी केवल प्रतीति होती है, वास्तवमें होती नहीं, अगर होती तो पुनः अरति, अतृप्ति एवं असंतुष्टि नहीं होती। स्वरूपसे प्रीति, तृप्ति और संतुष्टि स्वतःसिद्ध है। स्वरूप सत् है। सत्में कभी कोई अभाव नहीं होता—‘नाभावो विद्यते सतः ’ (गीता २।१६) और अभावके बिना कोई कामना पैदा नहीं होती। इसलिये स्वरूपमें निष्कामता स्वतःसिद्ध है। परन्तु जब जीव भूलसे संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता
है, तब वह प्रीति, तृप्ति और संतुष्टिको संसारमें ढूँढ़ने लगता है और इसके लिये सांसारिक वस्तुओंकी कामना करने लगता है। कामना करनेके बाद जब वह वस्तु (धनादि) मिलती है, तब मनमें स्थित कामनाके निकलनेके बाद (दूसरी कामनाके पैदा होनेसे पहले) उसकी अवस्था निष्काम हो जाती है और उसी निष्कामताका उसे सुख होता है; परन्तु उस सुखको मनुष्य भूलसे सांसारिक वस्तुकी प्राप्तिसे उत्पन्न हुआ मान लेता है तथा उस सुखको ही प्रीति, तृप्ति और संतुष्टिके नामसे कहता है। अगर वस्तुकी प्राप्तिसे वह सुख होता, तो उसके मिलनेके बाद उस वस्तुके रहते हुए सदा सुख रहता, दुःख कभी न होता और पुनः वस्तुकी कामना उत्पन्न न होती। परन्तु सांसारिक वस्तुओंसे कभी भी पूर्ण (सदाके लिये) प्रीति, तृप्ति और संतुष्टि प्राप्त न हो सकेनेके कारण तथा संसारसे ममताका सम्बन्ध बना रहनेके कारण वह पुनः नयी-नयी कामनाएँ करने लगता है। कामना उत्पन्न होनेपर अपनेमें अभावका तथा काम्य वस्तुके मिलनेपर अपनेमें पराधीनताका अनुभव होता है। अतः कामनावाला मनुष्य सदा दुःखी रहता है।
यहाँ यह बात ध्यान देनेकी है कि साधक तो उस सुखका मूल कारण निष्कामताको मानते हैं और दुःखोंका कारण कामनाको मानते हैं; परन्तु संसारमें आसक्त मनुष्य वस्तुओंकी प्राप्तिसे सुख मानते हैं और वस्तुओंकी अप्राप्तिसे दुःख मानते हैं। यदि आसक्त मनुष्य भी साधकके समान ही यथार्थ दृष्टिसे देखे तो उसको शीघ्र ही स्वतःसिद्ध निष्कामताका अनुभव हो सकता है।
सकाम मनुष्योंको कर्मयोगका अधिकारी कहा गया है—‘कर्मयोगस्तु कामिनाम् ’ (श्रीमद्भगवद्गीता ११।२०।७)। सकाम मनुष्योंकी प्रीति, तृप्ति और संतुष्टि संसारमें होती है। अतः कर्मयोगद्वारा सिद्ध निष्काम महापुरुषोंकी स्थितिका वर्णन करते हुए भगवान् कहते हैं कि उनकी प्रीति, तृप्ति और संतुष्टि सकाम मनुष्योंकी तरह संसारमें न होकर अपने-आप- (स्वरूप- में) ही हो जाती है (गीता—दूसरे अध्यायका पचपनवाँ श्लोक), जो स्वरूपतः पहलेसे ही है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
वास्तवमें प्रीति, तृप्ति और संतुष्टि—तीनों अलग-अलग न होते हुए भी संसारके सम्बन्धसे अलग-अलग प्रतीत होती हैं। इसीलिये संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर उस महापुरुषकी प्रीति, तृप्ति और संतुष्टि—तीनों एक ही तत्त्व-(स्वरूप-) में हो जाती है।
भगवान्ने इस श्लोकमें दो बार तथा आगेके (अठारहवें) श्लोकमें एक बार ‘एव’ और ‘च’ पदोंका प्रयोग किया है। इससे यह भाव प्रकट होता है कि कर्मयोगीकी प्रीति, तृप्ति और संतुष्टिमें किसी प्रकारकी कमी नहीं रहती एवं तत्त्वके अतिरिक्त अन्यकी आवश्यकता भी नहीं रहती (गीता—छठे अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)।
‘तस्य कार्यं न विद्यते’—मनुष्यके लिये जो भी कर्तव्य-कर्मका विधान किया गया है, उसका उद्देश्य परम कल्याणस्वरूप परमात्माको प्राप्त करना ही है। किसी भी साधन-(कर्मयोग, ज्ञानयोग अथवा भक्तियोग-) के द्वारा उद्देश्यकी सिद्धि हो जानेपर मनुष्यके लिये कुछ भी करना, जानना अथवा पाना शेष नहीं रहता, जो मनुष्य-जीवनकी परम सफलता है।
मनुष्यके वास्तविक स्वरूपमें किंचिन्मात्र अभाव न रहनेपर भी जबतक वह संसारके सम्बन्धके कारण अपनेमें अभाव समझकर और शरीरको ‘मैं’ तथा ‘मेरा’ मानकर ‘अपने लिये’ कर्म करता है, तबतक उसके लिये कर्तव्य शेष रहता ही है। परन्तु जब वह ‘अपने लिये’ कुछ भी न करके ‘दूसरोंके लिये’ अर्थात् शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राणोंके लिये; माता, पिता, स्त्री, पुत्र, परिवारके लिये;
परिशिष्ट भाव—कर्मयोगी निःस्वार्थभावसे संसारकी सेवाके लिये ही सम्पूर्ण कर्म करता है। जैसे गंगाजलसे गंगाका ही पूजन किया जाय, ऐसे ही संसारसे मिले शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहम्को संसारकी ही सेवामें लगा देनेसे चिन्मय स्वरूप शेष रह जाता है। इसलिये उसकी प्रीति, तृप्ति और सन्तुष्टि स्वरूपमें ही होती है।
सांसारिक विधि और निषेध—दोनों वास्तवमें निषेध ही हैं; क्योंकि ये दोनों ही नहीं रहनेवाले हैं। इसलिये संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर कर्मयोगीके लिये कोई विधि-निषेध रहता ही नहीं—‘तस्य कार्यं न विद्यते’।
**नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ १८ ॥**
तस्य | = उस (कर्मयोगसे) | कृतेन | = कर्म करनेसे | अकृतेन | = कर्म न करनेसे
---|---|---|---|---|---
सिद्ध हुए | | कश्चन | = कोई | एव | = ही (कोई प्रयोजन रहता है)
महापुरुष) का | | अर्थः | = प्रयोजन (रहता है और) | च | = तथा
इह | = इस संसारमें | न | = न | सर्वभूतेषु | = सम्पूर्ण प्राणियोंमें
न | = न तो | | | |
श्लोक १८ ] * साधक-संजीवनी * २०१
(किसी भी | अस्य = इसका | अर्थव्याश्रय: = स्वार्थका सम्बन्ध
प्राणीके साथ) | कश्चित् = किंचिन्मात्र भी | न = नहीं रहता।
व्याख्या-'नैव तस्य कृतेनार्थ:'-प्रत्येक मनुष्यकी | होता है। अतः उसका शरीरादिकी क्रियाओंसे अपना कोई
कुछ-न-कुछ करनेकी प्रवृत्ति होती है। जबतक यह करनेकी | प्रयोजन नहीं रहता। प्रयोजन न रहनेपर भी उस महापुरुषसे
प्रवृत्ति किसी सांसारिक वस्तुकी प्राप्तिके लिये होती है, | स्वाभाविक ही लोगोंके लिये आदर्शरूप उत्तम कर्म होते
तबतक उसका अपने लिये 'करना' शेष रहता ही है। अपने | हैं। जिसका कर्म करनेसे प्रयोजन रहता है, उससे आदर्श
लिये कुछ-न-कुछ पानेकी इच्छासे ही मनुष्य बँधता है। उस | कर्म नहीं होते-यह सिद्धान्त है।
इच्छाकी निवृत्तिके लिये कर्तव्य-कर्म करनेकी आवश्यकता है। | 'नाकृतेनेह कश्चन'-जो मनुष्य शरीर, इन्द्रियाँ,
कर्म दो प्रकारसे किये जाते हैं। कामना-पूर्तिके लिये | मन, बुद्धि आदिसे अपना सम्बन्ध मानता है और आलस्य,
और कामना-निवृत्तिके लिये। साधारण मनुष्य तो कामनापूर्तिके | प्रमाद आदिमें रुचि रखता है, वह कर्मोंको नहीं करना
लिये कर्म करते हैं, पर कर्मयोगी कामना-निवृत्तिके लिये | चाहता; क्योंकि उसका प्रयोजन प्रमाद, आलस्य, आराम
कर्म करता है। इसलिये कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषमें कोई | आदिसे उत्पन्न तामस-सुख रहता है (गीता-अठारहवें
भी कामना न रहनेके कारण उसका किसी भी कर्तव्यसे | अध्यायका उनतालीसवाँ श्लोक)। परन्तु यह महापुरुष, जो
किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता। उसके द्वारा निःस्वार्थ- | सात्त्विक सुखसे भी ऊँचा उठ चुका है, तामस सुखमें प्रवृत्त
भावसे समस्त सृष्टिके हितके लिये स्वतः कर्तव्य-कर्म | हो ही कैसे सकता है? क्योंकि इसका शरीरादिसे
होते हैं। | किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता, फिर आलस्य-आराम
कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषका कर्मोंसे अपने लिये | आदिमें रुचि रहनेका तो प्रश्न ही नहीं उठता।
(व्यक्तिगत सुख-आरामके लिये) कोई सम्बन्ध नहीं | मार्मिक बात
रहता। इस महापुरुषका यह अनुभव होता है कि पदार्थ, | प्रायः साधक कर्मोंके न करनेही महत्त्व देते हैं।
शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण आदि केवल संसारके हैं और | वे कर्मोंसे उपरत होकर समाधिमें स्थित होना चाहते हैं,
संसारसे मिले हैं, व्यक्तिगत नहीं हैं। अतः इनके द्वारा केवल | जिससे कोई भी चिन्तन बाकी न रहे। यह बात श्रेष्ठ और
संसारके लिये ही कर्म करना है, अपने लिये नहीं। कारण | लाभप्रद तो है, पर सिद्धान्त नहीं है। यद्यपि प्रवृत्ति-
यह है कि संसारकी सहायताके बिना कोई भी कर्म नहीं | (करना-) की अपेक्षा निवृत्ति (न करना) श्रेष्ठ है, तथापि
किया जा सकता। इसके अलावा मिली हुई कर्म-सामग्रीका | यह तत्त्व नहीं है।
सम्बन्ध भी समष्टि संसारके साथ ही है, अपने साथ नहीं। | प्रवृत्ति (करना) और निवृत्ति (न करना)-दोनों ही
इसलिये अपना कुछ नहीं है। व्यष्टिके लिये समष्टि हो ही | प्रकृतिके राज्यमें हैं। निर्विकल्प समाधित सब प्रकृतिका
नहीं सकती। मनुष्यकी यही गलती होती है कि वह अपने | राज्य है; क्योंकि निर्विकल्प समाधिसे भी व्युत्थान होता है।
लिये समष्टिका उपयोग करना चाहता है इसीसे उसे | क्रियामात्र प्रकृतिमें ही होती है-'प्रकर्षेण करणं ( भावे
अशान्ति होती है। अगर वह शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, | ल्युट् ) इति प्रकृतिः', और क्रिया हुए बिना व्युत्थानका
पदार्थ आदिका समष्टिके लिये उपयोग करे तो उसे महान् | होना सम्भव ही नहीं। इसलिये चलने, बोलने, देखने, सुनने
शान्ति प्राप्त हो सकती है। कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषमें यही | आदिकी तरह सोना, बैठना, खड़ा होना, मौन होना, मूर्च्छित
विशेषता रहती है कि उसके कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, | होना और समाधिस्थ होना भी क्रिया है*। वास्तविक
मन, बुद्धि, पदार्थ आदिका उपयोग मात्र संसारके लिये ही | तत्त्व-(चेतन स्वरूप-)में प्रवृत्ति और निवृत्ति-दोनों ही
- प्रकृति निरन्तर क्रियाशील है, इसलिये उससे सम्बन्ध रखते हुए कोई भी प्राणी किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी
कर्म किये बिना नहीं रह सकता (गीता ३।५; १८।११)। अतः जबतक प्रकृतिका सम्बन्ध है, तबतक समाधि भी कर्म
ही है, जिसमें समाधि और व्युत्थान-ये दो अवस्थाएँ होती हैं। परन्तु प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर दो अवस्थाएँ नहीं होतीं,
प्रत्युत 'सहज समाधि' अथवा 'सहजावस्था' होती है, जिससे कभी व्युत्थान नहीं होता। कारण कि अवस्थाभेद प्रकृतिमें है,
स्वरूपमें नहीं। इसलिये सहजावस्थाको सबसे उत्तम कहा गया है-
उत्तम सहजावस्था मध्यमा ध्यानधारणा। कनिष्ठा शास्त्रचिन्ता च तीर्थयात्राऽधमाऽधमा॥
२०२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
नहीं हैं। वह प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनोंका निर्लिप्त प्रकाशक है।
शरीरसे तादात्म्य होनेपर ही (शरीरको लेकर) 'करना' और 'न करना'—ये दो विभाग (द्वन्द्व) होते हैं। वास्तवमें 'करना' और 'न करना' दोनोंकी एक ही जाति है। शरीरसे सम्बन्ध रखकर 'न करना' भी वास्तवमें 'करना' ही है। जैसे 'गच्छति' (जाता है) क्रिया है, ऐसे ही 'तिष्ठति' (खड़ा है) भी क्रिया ही है। यद्यपि स्थूल दृष्टिसे 'गच्छति' में क्रिया स्पष्ट दिखायी देती है और 'तिष्ठति' में क्रिया नहीं दिखायी देती है, तथापि सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाय तो जिस शरीरमें 'जाने' की क्रिया थी, उसीमें अब 'खड़े रहने' की क्रिया है। इसी प्रकार किसी कामको 'करना' और 'न करना'—इन दोनोंमें ही क्रिया है। अतः जिस प्रकार क्रियाओंका स्थूलरूपसे दिखायी देना (प्रवृत्ति) प्रकृतिमें ही है, उसी प्रकार स्थूल दृष्टिसे क्रियाओंका दिखायी न देना (निवृत्ति) भी प्रकृतिमें ही है। जिसका प्रकृति एवं उसके कार्यसे भौतिक तथा आध्यात्मिक और लौकिक तथा पारलौकिक कोई प्रयोजन नहीं रहता, उस महापुरुषका करने एवं न करनेसे कोई स्वार्थ नहीं रहता।
जड़ताके साथ सम्बन्ध रहनेपर ही करने और न करनेका प्रश्न होता है; क्योंकि जड़ताके सम्बन्धके बिना कोई क्रिया होती ही नहीं। इस महापुरुषका जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और प्रवृत्ति एवं निवृत्ति—दोनोंसे अतीत सहज-निवृत्त-तत्त्वमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो जाता है। अतः साधकको जड़ता-(शरीरमें अहंता और ममता-) से सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी ही आवश्यकता है। तत्त्व तो सदा ज्यों-का-त्यों विद्यमान है ही।
'न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः'—शरीर तथा संसारसे किंचिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध न रहनेके कारण उस महापुरुषकी समस्त क्रियाएँ स्वतः दूसरोंके हितके लिये होती हैं। जैसे शरीरके सभी अंग स्वतः शरीरके हितमें लगे रहते हैं, ऐसे ही उस महापुरुषका अपना कहलानेवाला शरीर (जो संसारका एक छोटा-सा अंग है) स्वतः संसारके हितमें लगा रहता है। उसका भाव और उसकी सम्पूर्ण चेष्टाएँ संसारके हितके लिये ही होती हैं। जैसे अपने हाथोंसे अपना ही मुख धोनेपर अपनेमें स्वार्थ, प्रत्युपकार अथवा अभिमानका भाव नहीं आता, ऐसे ही अपने कहलानेवाले शरीरके द्वारा संसारका हित होनेपर
उस महापुरुषमें किंचित् भी स्वार्थ, प्रत्युपकार अथवा अभिमानका भाव नहीं आता।
पूर्वश्लोकमें भगवान्ने सिद्ध महापुरुषके लिये कहा कि उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है—'तस्य कार्यं न विद्यते'। उसका हेतु बताते हुए भगवान्ने इस श्लोकमें उस महापुरुषके लिये तीन बातें कही हैं—(१) कर्म करनेसे उसका कोई प्रयोजन नहीं रहता, (२) कर्म न करनेसे भी उसका कोई प्रयोजन नहीं रहता और (३) किसी भी प्राणी और पदार्थसे उसका किंचिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् कुछ पानेसे भी उसका कोई प्रयोजन नहीं रहता।
वस्तुतः स्वरूपमें करने अथवा न करनेका कोई प्रयोजन नहीं है और किसी व्यक्ति तथा वस्तुके साथ कोई सम्बन्ध भी नहीं है। कारण कि शुद्ध स्वरूपके द्वारा कोई क्रिया होती ही नहीं। जो भी क्रिया होती है, वह प्रकृति और प्रकृतिजन्य पदार्थके सम्बन्धसे ही होती है। इसलिये अपने लिये कुछ करनेका विधान ही नहीं है।
जबतक मनुष्यमें करनेका राग, पानेकी इच्छा, जीनेकी आशा और मरनेका भय रहता है, तबतक उसपर कर्तव्यका दायित्व रहता है। परन्तु जिसमें किसी भी क्रियाको करने अथवा न करनेका कोई राग नहीं है, संसारकी किसी भी वस्तु आदिको प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं है, जीवित रहनेकी कोई आशा नहीं है और मृत्युसे कोई भय नहीं है, उसे कर्तव्य करना नहीं पड़ता, प्रत्युत उससे स्वतः कर्तव्य-कर्म होते रहते हैं। जहाँ अकर्तव्य होनेकी सम्भावना हो, वहीं कर्तव्य पालनकी प्रेरणा रहती है।
विशेष बात
गीतामें भगवान्की ऐसी शैली रही है कि वे भिन्न-भिन्न साधनोंसे परमात्माकी ओर चलनेवाले साधकोंके भिन्न-भिन्न लक्षणोंके अनुसार ही परमात्माको प्राप्त सिद्ध महापुरुषोंके लक्षणोंका वर्णन करते हैं। यहाँ सत्रहवें-अठारहवें श्लोकोंमें भी इसी शैलीका प्रयोग किया गया है।
जो साधन जहाँसे प्रारम्भ होता है, अन्तमें वहाँ उसकी समाप्ति होती है। गीतामें कर्मयोगका प्रकरण यद्यपि दूसरे अध्यायके उन्नतलीसवें श्लोकसे प्रारम्भ होता है, तथापि कर्मयोगके मूल साधनका विवेचन दूसरे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें किया गया है। उस श्लोक (दूसरे अध्यायके सैंतालीसवें)-के चार चरणोंमें बताया गया है—
(१) कर्मण्येवाधिकारस्ते (तेरा कर्म करनेमें ही
श्लोक १९ ]
- साधक-संजीवनी *
२०३
अधिकार है।
(२) मा फलेषु कदाचन (कर्मफलोंमें तेरा कभी भी अधिकार नहीं है)।
(३) मा कर्मफलहेतुभूः (तू कर्मफलका हेतु मत बन)।
(४) मा ते सद्गुडस्वकर्मणि (तेरी कर्म न करनेमें आसक्ति न हो)।
प्रस्तुत (अठारहवें) श्लोकमें ठीक उपर्युक्त साधनाकी सिद्धिकी बात है। वहाँ (दूसरे अध्यायके सेंतालीसवें श्लोक) में दूसरे और तीसरे चरणमें साधकके लिये जो बात कही गयी है, वह प्रस्तुत श्लोकके उत्तरार्धमें सिद्ध महापुरुषके लिये कही गयी है कि उसका किसी प्राणी और पदार्थसे कोई स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता। वहाँ पहले और चौथे चरणमें साधकके लिये जो बात कही गयी है, वह प्रस्तुत श्लोकके पूर्वार्धमें सिद्ध महापुरुषके लिये कही गयी है कि उसका कर्म करने अथवा न करने—दोनोंसे ही कोई प्रयोजन नहीं रहता। इस प्रकार सत्रहवें-अठारहवें श्लोकोंमें ‘कर्मयोग’ से सिद्ध हुए महापुरुषके लक्षणोंका ही वर्णन किया गया है।
कर्मयोगके साधनकी दृष्टिसे वास्तवमें अठारहवाँ श्लोक पहले तथा सत्रहवाँ श्लोक बादमें आना चाहिये। कारण कि जब कर्मयोगसे सिद्ध हुए महापुरुषका कर्म करने अथवा न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं रहता तथा उसका किसी भी प्राणी-पदार्थसे किंचिन्मात्र भी स्वार्थका
परिशिष्ट भाव —संसारमें ‘करना’ और ‘न करना’—दोनों सापेक्ष हैं। इसलिये ‘मेरेको कुछ नहीं करना है’—यह भी ‘करना’ ही है। परन्तु परमात्मत्वमें ‘न करना’ निरपेक्ष है, स्वाभाविक है। कारण कि चिन्मय सत्ताका न तो क्रिया करनेके साथ सम्बन्ध है और न क्रिया न करनेके साथ सम्बन्ध है। इसलिये परमात्मत्वको प्राप्त हुए कर्मयोगी महापुरुषका न तो किसी वस्तु से कोई सम्बन्ध रहता है, न व्यक्तिसे कोई सम्बन्ध रहता है और न क्रियासे ही कोई सम्बन्ध रहता है—‘योऽवतिष्ठति नेङ्गते ’ (गीता १४।२३)। उसकी दृष्टिमें एक चिन्मय सत्ताके सिवाय कुछ नहीं रहता।
सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें वर्णित महापुरुषकी स्थितिको प्राप्त करनेके लिये साधकको क्या करना चाहिये—इसपर भगवान् आगेके श्लोकमें साधन बताते हैं।
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः ॥ १९ ॥
| तस्मात् | = इसलिये (तू) | कर्म | = कर्मका | कर्म | = कर्म |
|---|---|---|---|---|---|
| सततम् | = निरन्तर | समाचर | = भलीभाँति | आचरन् | = करता हुआ |
| असक्तः | = आसक्तिरहित | ||||
| (होकर) | आचरण कर; | पुरुषः | = मनुष्य | ||
| कार्यम् | = कर्तव्य | हि | = क्योंकि | परम् | = परमात्माको |
| असक्तः | = आसक्तिरहित (होकर) | आप्नोति | = प्राप्त हो जाता है। |
२०४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
व्याख्या—‘तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर’— पूर्वश्लोकोंसे इस श्लोकका सम्बन्ध बतानेके लिये यहाँ ‘तस्मात्’ पद आया है। पूर्वश्लोकोंमें भगवान्ने कहा कि अपने लिये कर्म करनेकी कोई आवश्यकता न रहनेपर भी सिद्ध महापुरुषके द्वारा लोक-संग्रहार्थ क्रियाएँ हुआ करती हैं। इसलिये अर्जुनको भी उसी तरह (निष्काम-भावसे) कर्तव्य-कर्म करते हुए परमात्माको प्राप्त करनेकी आज्ञा देनेके लिये भगवान्ने ‘तस्मात्’ पदका प्रयोग किया है। कारण कि अपने स्वरूप—‘स्व’ के लिये कर्म करने और न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं है। कर्म सदैव ‘पर’ —(दूसरों- ) के लिये होता है, ‘स्व’ के लिये नहीं। अतः दूसरोंके लिये कर्म करनेसे कर्म करनेका राग मिट जाता है और स्वरूपमें स्थिति हो जाती है।
अपने स्वरूपसे विजातीय (जड़) पदार्थोंके प्रति आकर्षणको ‘आसक्ति’ कहते हैं। आसक्तिरहित होनेके लिये आसक्तिके कारणको जानना आवश्यक है। ‘मैं शरीर हूँ’ और ‘शरीर मेरा है’ —ऐसा माननेसे शरीरादि नाशवान् पदार्थोंका महत्त्व अन्तःकरणमें अंकित हो जाता है। इसी कारण उन पदार्थोंमें आसक्ति हो जाती है।
आसक्ति ही पतन करनेवाली है, कर्म नहीं। आसक्तिके कारण ही मनुष्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि जड़ पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध मानकर अपने आराम, सुख-भोगके लिये तरह-तरहके कर्म करता है। इस प्रकार जड़तासे आसक्तिपूर्वक माना हुआ सम्बन्ध ही मनुष्यके बारम्बार जन्म-मरणका कारण होता है—‘कारणं गुणसद्वैजस्य सदसद्योजिनमसु’ (गीता १३।२१)। आसक्तिरहित होकर कर्म करनेसे जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है।
आसक्तिवाला मनुष्य दूसरोंका हित नहीं कर सकता, जबकि आसक्तिरहित मनुष्यसे स्वतः-स्वाभाविक प्राणि-मात्रका हित होता है। उसके सभी कर्म केवल दूसरोंके हितार्थ होते हैं।
संसारसे प्राप्त सामग्री-(शरीरादि- ) से हमने अभीतक अपने लिये ही कर्म किये हैं। उसको अपने ही सुखभोग और संग्रहमें लगाया है। इसलिये संसारका हमारेपर ऋण है, जिसे उतारनेके लिये केवल संसारके हितके लिये कर्म करना आवश्यक है। अपने लिये (फलकी कामना रखकर) कर्म करनेसे पुराना ऋण तो समाप्त होता नहीं, नया ऋण और उत्पन्न हो जाता है। ऋणसे मुक्त होनेके लिये बार-बार संसारमें आना पड़ता है। केवल दूसरोंके हितके लिये सब कर्म करनेसे पुराना ऋण समाप्त हो जाता
है और अपने लिये कुछ न करने तथा कुछ न चाहनेसे नया ऋण उत्पन्न नहीं होता। इस तरह जब पुराना ऋण समाप्त हो जाता है और नया ऋण उत्पन्न नहीं होता, तब बन्धनका कोई कारण न रहनेसे मनुष्य स्वतः मुक्त हो जाता है।
कोई भी कर्म निरन्तर नहीं रहता, पर आसक्ति (अन्तःकरणमें) निरन्तर रहा करती है, इसलिये भगवान् ‘सततम् असक्तः’ पदोंसे निरन्तर आसक्तिरहित होनेके लिये कहते हैं। ‘मेरेको कहीं भी आसक्त नहीं होना है’ —ऐसी जागृति साधकको निरन्तर रखनी चाहिये। निरन्तर आसक्तिरहित रहते हुए जो विहित-कर्म सामने आ जाय, उसे कर्तव्यमात्र समझकर कर देना चाहिये—ऐसा उपर्युक्त पदोंका भाव है।
वास्तवमें देखा जाय तो किसीके भी अन्तःकरणमें आसक्ति निरन्तर नहीं रहती। जब संसार निरन्तर नहीं रहता, प्रतिक्षण बदलता रहता है, तब उसकी आसक्ति निरन्तर कैसे रह सकती है? ऐसा होते हुए भी माने हुए ‘अहम्’ के साथ आसक्ति निरन्तर रहती हुई प्रतीत होती है।
‘कार्यम्’ अर्थात् कर्तव्य उसे कहते हैं, जिसको कर सकते हैं और जिसको अवश्य करना चाहिये। दूसरे शब्दोंमें कर्तव्यका अर्थ होता है—अपने स्वार्थका त्याग करके दूसरोंका हित करना अर्थात् दूसरोंकी उस शास्त्रविहित न्याययुक्त माँगको पूरा करना, जिसे पूरा करनेकी सामर्थ्य हमारेमें है। इस प्रकार कर्तव्यका सम्बन्ध परहितसे है।
कर्तव्यका पालन करनेमें सब स्वतन्त्र और समर्थ हैं, कोई पराधीन और असमर्थ नहीं है। हाँ, प्रमाद और आलस्यके कारण अकर्तव्य करनेका बुरा अध्यास (आदत) हो जानेसे तथा फलकी इच्छा रहनेसे ही वर्तमानमें कर्तव्य-पालन कठिन मालूम देता है, अन्यथा कर्तव्य-पालनके समान सुगम कुछ नहीं है। कर्तव्यका सम्बन्ध परिस्थितिके अनुसार होता है। मनुष्य प्रत्येक परिस्थितिमें स्वतन्त्रतापूर्वक कर्तव्यका पालन कर सकता है। कर्तव्यका पालन करनेसे ही आसक्ति मिटती है। अकर्तव्य करने तथा कर्तव्य न करनेसे आसक्ति और बढ़ती है। कर्तव्य अर्थात् दूसरोंके हितार्थ कर्म करनेसे वर्तमानकी आसक्ति और कुछ न चाहनेसे भविष्यकी आसक्ति मिट जाती है।
‘समाचर’ पदका तात्पर्य है कि कर्तव्य-कर्म बहुत सावधानी, उत्साह तथा तत्परतासे विधिपूर्वक करने चाहिये।
श्लोक ११ ]
- साधक-संजीवनी *
२०५
कर्तव्य-कर्म करनेमें थोड़ी भी असावधानी होनेपर कर्मयोगकी सिद्धिमें बाधा लग सकती है।
वर्ण, आश्रम, प्रकृति (स्वभाव) और परिस्थितिके अनुसार जिस मनुष्यके लिये जो शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्म बताया गया है, अवसर प्राप्त होनेपर उसके लिये वही 'सहज कर्म' है। सहज कर्ममें यदि कोई दोष दिखायी दे, तो भी उसका त्याग नहीं करना चाहिये (गीता—अठारहवें अध्यायका अड़तालीसवाँ श्लोक); क्योंकि सहज कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता (गीता—अठारहवें अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक) इसीलिये यहाँ भगवान् अर्जुनको मानो यह कह रहे हैं कि तू क्षत्रिय है; अतः युद्ध करना (घोर दीखनेपर भी) तेरा सहज कर्म है; घोर कर्म नहीं। अतः सामने आये हुए सहज कर्मको अनासक्त होकर कर देना चाहिये। अनासक्त होनेपर ही समता प्राप्त होती है।
विशेष बात
जब जीव मनुष्ययोनियें जन्म लेता है, तब उसको शरीर, धन, जमीन, मकान आदि सब सामग्री मिलती है; और जब वह यहाँसे जाता है, तब सब सामग्री यहाँ छूट जाती है। इस सीधी-सादी बातसे यह सहज ही सिद्ध होता है कि शरीरादि सब सामग्री मिली हुई है, अपनी नहीं है। जैसे मनुष्य काम करनेके लिये किसी कार्यालय (ऑफिस)-में जाता है तो उसे कुर्सी, मेज, कागज आदि सब सामग्री कार्यालयका काम करनेके लिये ही मिलती है, अपनी मानकर घर ले जानेके लिये नहीं। ऐसे ही मनुष्यको संसारमें शरीरादि सब सामग्री संसारका काम (सेवा) करनेके लिये ही मिली है, अपनी माननेके लिये नहीं। मनुष्य तत्परता और उत्साहपूर्वक कार्यालयका काम करता है तो उस कामके बदलेमें उसे वेतन मिलता है। काम कार्यालयके लिये होता है और वेतन अपने लिये। इसी प्रकार संसारके लिये ही सब काम करनेसे संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और योग (परमात्माके साथ अपने नित्य सम्बन्ध)-का अनुभव हो जाता है। 'कर्म' और 'योग' दोनों मिलकर कर्मयोग कहलाता है। कर्म संसारके लिये होता है और योग अपने लिये। यह योग ही मानो वेतन है।
संसार साधनका क्षेत्र है। यहाँ प्रत्येक सामग्री साधनके लिये मिलती है, भोग और संग्रहके लिये कदापि नहीं।
सांसारिक सामग्री अपनी और अपने लिये है ही नहीं। अपनी वस्तु—परमात्म-तत्त्व मिलनेपर फिर अन्य किसी वस्तुको पानेकी इच्छा नहीं रहती (गीता—छठे अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। परन्तु सांसारिक वस्तुएँ चाहे जितनी प्राप्त हो जायँ, पर उन्हें पानेकी इच्छा कभी मिटती नहीं, प्रत्युत और बढ़ती है।
जब मनुष्य मिली हुई वस्तुको अपनी और अपने लिये मान लेता है, तब वह अपनी इस भूलके कारण बँध जाता है। इस भूलको मिटानेके लिये कर्मयोगका अनुष्ठान ही सुगम और श्रेष्ठ उपाय है। कर्मयोगी किसी भी वस्तुको अपनी और अपने लिये न मानते हुए उसे दूसरोंकी सेवामें (उन्हींकी मानकर) लगाता है। अतः वह सुगमतापूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
कर्म तो सभी प्राणी किया करते हैं, पर साधारण प्राणी और कर्मयोगीद्वारा किये गये कर्ममें बड़ा भारी अन्तर होता है। साधारण मनुष्य (कर्म) आसक्ति, ममता, कामना आदिको साथ रखते हुए कर्म करता है, और कर्मयोगी आसक्ति, ममता, कामना आदिको छोड़कर कर्म करता है। कर्मके कर्मोंका प्रवाह अपनी तरफ होता है और कर्मयोगीके कर्मोंका प्रवाह संसारकी तरफ। इसलिये कर्म बँधता है और कर्मयोगी मुक्त होता है।
'असक्तो ह्याचरकर्म'—मनुष्य ही आसक्तिपूर्वक संसारसे अपना सम्बन्ध जोड़ता है, संसार नहीं। अतः मनुष्यका कर्तव्य है कि वह संसारके हितके लिये ही सब कर्म करे और बदलेमें उनका कोई फल न चाहे। इस प्रकार आसक्तिरहित होकर अर्थात् मुझे किसीसे कुछ नहीं चाहिये, इस भावसे संसारके लिये कर्म करनेसे संसारसे स्वतः सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है।
कर्मयोगी संसारकी सेवा करनेसे वर्तमानकी वस्तुओंसे और कुछ न चाहनेसे भविष्यकी वस्तुओंसे सम्बन्ध-विच्छेद करता है।
मेलेमें स्वयंसेवक अपना कर्तव्य समझकर दिनभर यात्रियोंकी सेवा करते हैं और बदलेमें किसीसे कुछ नहीं चाहते; अतः रात्रिमें सोते समय उन्हें किसीकी याद नहीं आती। कारण कि सेवा करते समय उन्होंने किसीसे कुछ चाहा नहीं। इसी प्रकार जो सेवाभावसे दूसरोंके लिये ही सब कर्म करता है और किसीसे मान, बड़ाई आदि कुछ नहीं चाहता, उसे संसारकी याद नहीं आती। वह सुगमतापूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
२०६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
कर्म तो सभी किया करते हैं, पर कर्मयोग तभी होता है, जब आसक्तिरहित होकर दूसरोंके लिये कर्म किये जाते हैं। आसक्ति शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्म करनेसे ही मिट सकती है—‘धर्मं तं विरति’ (मानस ३।१६।१)। शास्त्र-निषिद्ध कर्म करनेसे आसक्ति कभी नहीं मिट सकती।
‘परमाप्नोति पूरुषः’—जैसे तेरहवें अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने ‘परम्’ पदसे सांख्ययोगीके परमात्माको प्राप्त होनेकी बात कही, ऐसे ही यहाँ ‘परम्’ पदसे कर्मयोगीके परमात्माको प्राप्त होनेकी बात कहते हैं। तात्पर्य यह है कि साधक (रुचि, विश्वास और योग्यताके अनुसार) किसी भी मार्ग—कर्मयोग, ज्ञानयोग या भक्तियोगपर क्यों न चले, उसके द्वारा प्राप्तव्य वस्तु एक परमात्मा ही है (गीता—पाँचवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक)। प्राप्तव्य तत्त्व वही हो सकता है, जिसकी प्राप्तिमें विकल्प, सन्देह और निराशा न हो तथा जो सदा हो, सब देशमें हो, सब कालमें हो, सभीके लिये हो, सबका अपना हो और जिस तत्त्वसे कोई कभी किसी अवस्थामें किंचिन्मात्र भी अलग न हो सके अर्थात् जो सबको सदा अभिन्नरूपसे स्वतः प्राप्त हो।
शंका—कर्म करते हुए कर्मयोगीका कर्तृत्वाभिमान कैसे मिट सकता है? क्योंकि कर्तृत्वाभिमान मिटे बिना परमात्मतत्त्वका अनुभव नहीं हो सकता।
समाधान—साधारण मनुष्य सभी कर्म अपने लिये करता है। अपने लिये कर्म करनेसे मनुष्यमें कर्तृत्वाभिमान रहता है। कर्मयोगी कोई भी क्रिया अपने लिये नहीं करता। वह ऐसा मानता है कि संसारसे शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ, रुपये आदि जो कुछ सामग्री मिली है, वह सब संसारकी ही है, अपनी नहीं। जब कभी अवसर मिलता है, तभी वह सामग्री, समय, सामर्थ्य आदिको संसारकी सेवामें लगा देता है, उनको संसारकी सेवामें लगाते हुए कर्मयोगी ऐसा मानता है कि संसारकी वस्तु ही संसारकी सेवामें लगा रहा हूँ अर्थात् सामग्री, समय, सामर्थ्य आदि उन्हींके हैं, जिनकी सेवा हो रही है। ऐसा माननेसे कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता।
कर्तृत्वमें कारण है—भोक्तृत्व। कर्मयोगी भोगकी आशा रखकर कर्म करता ही नहीं। भोगकी आशावाला मनुष्य कर्मयोगी नहीं होता। जैसे अपने हाथोंसे अपना ही मुख धोनेपर यह भाव नहीं आता कि मैंने बड़ा उपकार किया है; क्योंकि मनुष्य हाथ और मुख दोनोंको अपने ही अंग मानता है, ऐसे ही कर्मयोगी भी शरीरको संसारका
ही अंग मानता है। अतः यदि अंगने अंगीकी ही सेवा की है तो उसमें कर्तृत्वाभिमान कैसा?
यह नियम है कि मनुष्य जिस उद्देश्यको लेकर कर्ममें प्रवृत्त होता है, कर्मके समाप्त होते ही वह उसी लक्ष्यमें तल्लीन हो जाता है। जैसे व्यापारी धनके उद्देश्यसे ही व्यापार करता है, तो दूकान बंद करते ही उसका ध्यान स्वतः रुप्योंकी ओर जाता है और वह रुपये गिनने लगता है। उसका ध्यान इस ओर नहीं जाता कि आज कौन-कौन ग्राहक आये? किस-किस जातिके आये? आदि-आदि। कारण कि ग्राहकोंसे उसका कोई प्रयोजन नहीं। संसारका उद्देश्य रखकर कर्म करनेवाला मनुष्य संसारमें कितना ही तल्लीन क्यों न हो जाय, पर उसकी संसारसे एकता नहीं हो सकती; क्योंकि वास्तवमें संसारसे एकता है ही नहीं। संसार प्रतिक्षण परिवर्तनशील और जड़ है, जबकि ‘स्वयं’ (अपना स्वरूप) अचल और चेतन है। परन्तु परमात्माका उद्देश्य रखकर कर्म करनेवालेकी परमात्मासे एकता हो ही जाती है (चाहे साधकको इसका अनुभव हो या न हो); क्योंकि ‘स्वयं’ की परमात्माके साथ स्वतःसिद्ध (तात्त्विक) एकता है। इस प्रकार जब कर्ता ‘कर्तव्य’ बनकर अपने उद्देश्य- (परमात्मतत्त्व-) के साथ एक हो जाता है, तब कर्तृत्वाभिमानका प्रश्न ही नहीं रहता।
कर्मयोगी जिस उद्देश्य—परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये सब कर्म करता है, उस-(परमात्मतत्त्व-) में कर्तृत्वाभिमान अथवा कर्तृत्व (कर्तापन) नहीं है। अतः प्रत्येक क्रियाके आदि और अन्तमें उस उद्देश्यके साथ एकताका अनुभव होनेके कारण कर्मयोगीमें कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता।
प्राणिमात्रके द्वारा किये हुए प्रत्येक कर्मका आरम्भ और अन्त होता है। कोई भी कर्म निरन्तर नहीं रहता। अतः किसीका भी कर्तृत्व निरन्तर नहीं रहता, प्रत्युत कर्मका अन्त होनेके साथ ही कर्तृत्वका भी अन्त हो जाता है। परन्तु मनुष्यसे भूल यह होती है कि जब वह कोई क्रिया करता है, तब तो अपनेको उस क्रियाका कर्ता मानता ही है, पर जब उस क्रियाको नहीं करता, तब भी अपनेको वैसा ही कर्ता मानता रहता है। इस प्रकार अपनेको निरन्तर कर्ता मानते रहनेसे उसका कर्तृत्वाभिमान मिटता नहीं, प्रत्युत दृढ़ होता है। जैसे, कोई पुरुष व्याख्यान देते समय तो वक्ता (व्याख्यानदाता) होता है, पर जब दूसरे समयमें भी वह अपनेको वक्ता मानता रहता है, तब उसका कर्तृत्वाभिमान
श्लोक ११ ]
- साधक-संजीवनी *
२०७
नहीं मिटता। अपनेको निरन्तर व्याख्यानदाता माननेसे ही उसके मनमें यह भाव आता है कि 'श्रोता मेरी सेवा करें, मेरा आदर करें, मेरी आवश्यकताओंकी पूर्ति करें' और 'मैं इन साधारण आदमियोंके पास कैसे बैठ सकता हूँ, मैं यह साधारण काम कैसे कर सकता हूँ' आदि। इस प्रकार उसका व्याख्यानरूप कर्मके साथ निरन्तर सम्बन्ध बना रहता है। इसका कारण है—व्याख्यानरूप कर्मसे धन, मान, बड़ाई, आराम आदि कुछ-न-कुछ पानेका भाव होना। यदि अपने लिये कुछ भी पानेका भाव न रहे तो कर्तापन केवल कर्म करनेतक ही सीमित रहता है और कर्म समाप्त होते ही कर्तापन अपने उद्देश्यमें लीन हो जाता है।
जैसे मनुष्य भोजन करते समय ही अपनेको उसका भोक्ता अर्थात् भोजन करनेवाला मानता है, भोजन करनेके बाद नहीं, ऐसे ही कर्मयोगी किसी क्रियाको करते समय ही अपनेको उस क्रियाका कर्ता मानता है, अन्य समय नहीं। जैसे, कर्मयोगी व्याख्यानदाता है और लोगोंमें उसकी बहुत प्रतिष्ठा है। परन्तु कभी व्याख्यान सुननेका काम पड़ जाय तो वह कहीं भी बैठकर सुगमतापूर्वक व्याख्यान सुन सकता है। उस समय उसे न आदरकी आवश्यकता है, न ऊँचे आसनकी; क्योंकि तब वह अपनेको श्रोता मानता है, व्याख्यानदाता नहीं। कभी व्याख्यान देनेके बाद उसे कोई कमरा साफ करनेका काम प्राप्त हो जाय तो वह उस कामको वैसी ही तत्परतासे करता है, जैसी तत्परतासे वह व्याख्यान देनेका कार्य करता है। उसके मनमें थोड़ा भी यह भाव नहीं आता कि 'इतना बड़ा व्याख्यानदाता होकर मैं यह कमरा-सफाईका तुच्छ काम कैसे कर सकता हूँ! लोग क्या कहेंगे! मेरी इज्जत धूलमें मिल जायगी' इत्यादि। वह अपनेको व्याख्यान देते समय व्याख्यानदाता, कथा-श्रवणके समय श्रोता और कमरा साफ करते समय कमरा साफ करनेवाला मानता है। अतः उसका कर्तृत्वाभिमान निरन्तर नहीं रहता। जो वस्तु निरन्तर नहीं रहती, अपितु बदलती रहती है, वह वास्तवमें नहीं होती और उसका सम्बन्ध भी निरन्तर नहीं रहता—यह सिद्धान्त है। इस सिद्धान्तपर दृष्टि जाते ही साधकको वास्तविकता-(कर्तृत्वाभिमानसे रहित स्वरूप-) का अनुभव हो जाता है।
कर्मयोगी सब क्रियाएँ उसी भावसे करता है, जिस भावसे नाटकमें एक स्वोंगधारी पात्र करता है। जैसे नाटकमें हरिश्चन्द्रका स्वोंग नाटक-(खेल-) के लिये ही होता है, और नाटक समाप्त होते ही हरिश्चन्द्ररूप स्वोंगका स्वोंगके
साथ ही त्याग हो जाता है, ऐसे ही कर्मयोगीका कर्तापन भी स्वोंगके समान केवल क्रिया करनेतक ही सीमित रहता है। जैसे नाटकमें हरिश्चन्द्र बना हुआ व्यक्ति हरिश्चन्द्रकी सब क्रियाएँ करते हुए भी वास्तवमें अपनेको उन क्रियाओंका कर्ता (वास्तविक हरिश्चन्द्र) नहीं मानता, ऐसे ही कर्मयोगी शास्त्रविहित सम्पूर्ण कर्मोंको करते हुए भी वास्तवमें अपनेको उन क्रियाओंका कर्ता नहीं मानता। कर्मयोगी शरीरादि सब पदार्थोंको स्वोंगकी तरह अपना और अपने लिये न मानकर उन्हें (संसारका मानते हुए) संसारकी ही सेवामें लगाता है। अतः किसी भी अवस्थामें कर्मयोगीमें किंचिन्मात्र भी कर्तृत्वाभिमान नहीं रह सकता।
कर्मयोगी जैसे कर्तृत्वको अपनेमें निरन्तर नहीं मानता, ऐसे ही माता-पिता, स्त्री-पुत्र, भाई-भौजाई आदिके साथ अपना सम्बन्ध भी निरन्तर नहीं मानता। केवल सेवा करते समय ही उनके साथ अपना सम्बन्ध (सेवा करनेके लिये ही) मानता है। जैसे, यदि कोई पति है तो पत्नीके लिये पति है अर्थात् पत्नी कर्कशा हो, कुरूपा हो, कलह करनेवाली हो, पर उसे पत्नीरूपमें स्वीकार कर लिया तो अपनी योग्यता, सामर्थ्यके अनुसार उसका भरण-पोषण करना पतिका कर्तव्य है। पतिके नाते उसके सुधारकी बात कह देनी है, चाहे वह माने या न माने। हर समय अपनेको पति नहीं मानना है; क्योंकि इस जन्मसे पहले वह पत्नी थी, इसका क्या पता? और मरनेके बाद भी वह पत्नी रहेगी, इसका भी क्या निश्चय? तथा वर्तमानमें भी वह किसीकी माँ है, किसीकी पुत्री है, किसीकी बहन है, किसीकी भाभी है, किसीकी ननद है, आदि-आदि। वह सदा पत्नी ही तो है नहीं। ऐसा माननेसे उससे सुख लेनेकी इच्छा स्वतः मिटती है और 'केवल भरण-पोषण (सेवा) करनेके लिये ही पत्नी है', यह मान्यता दृढ़ होती है। इस प्रकार कर्मयोगीको संसारमें पिता, पुत्र, पति, भाई आदिके रूपमें जो स्वोंग मिला है, उसे वह ठीक-ठीक निभाता है। दूसरा अपने कर्तव्यका पालन करता है या नहीं, उसकी ओर वह नहीं देखता। अपनेमें कर्तृत्वाभिमान होनेसे ही दूसरोंके कर्तव्यपर दृष्टि जाती है और दूसरोंके कर्तव्यपर दृष्टि जाते ही मनुष्य अपने कर्तव्यसे गिर जाता है; क्योंकि दूसरेका कर्तव्य देखना अपना कर्तव्य नहीं है।
जिस प्रकार कर्मयोगी संसारके प्राणियोंके साथ अपना सम्बन्ध निरन्तर नहीं मानता, उसी प्रकार वर्ण, आश्रम, जाति, सम्प्रदाय, घटना, परिस्थिति आदिके साथ भी अपना
२०८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
सम्बन्ध निरन्तर नहीं मानता। जो वस्तु निरन्तर नहीं है, उसका अभाव स्वतः है। अतः कर्मयोगीका कर्तृत्वाभिमान स्वतः मिट जाता है।
मार्मिक बात
जिसमें कर्तृत्व नहीं है, उस परमात्माके साथ प्राणिमात्रकी स्वतःसिद्ध एकता है। साधकसे भूल यह होती है कि वह इस वास्तविकताकी तरफ ध्यान नहीं देता।
जिस प्रकार झूला कितनी ही तेजीसे आगे-पीछे क्यों न जाय, हर बार वह समता (सम स्थिति)-में आता ही है अर्थात् जहाँसे झूलेकी रस्सी बँधी है, उसकी सीधमें (आगे-पीछे जाते समय) एक बार आता ही है, उसी प्रकार प्रत्येक क्रियाके बाद अक्रिय अवस्था (समता) आती ही है। दूसरे शब्दोंमें, पहली क्रियाके अन्त तथा दूसरी क्रियाके आरम्भके बीच और प्रत्येक संकल्प तथा विकल्पके बीच समता रहती ही है।
दूसरी बात, यदि वास्तविक दृष्टिसे देखा जाय तो झूला चलते हुए (विषम दीखनेपर) भी निरन्तर समतामें ही रहता है अर्थात् झूला आगे-पीछे जाते समय भी निरन्तर (जहाँसे झूलेकी रस्सी बँधी है, उसकी) सीधमें ही रहता है। इसी प्रकार जीव भी प्रत्येक क्रियामें समतामें ही स्थित रहता है। परमात्मासे उसकी एकता निरन्तर रहती है। क्रिया करते समय समतामें स्थिति न दीखनेपर भी वास्तवमें समता रहती ही है, जिसका कोई अनुभव करना चाहे तो क्रिया समाप्त होते ही (उस समताका) अनुभव हो जाता है। यदि साधक इस विषयमें निरन्तर सावधान रहे तो उसे निरन्तर रहनेवाली समता या परमात्मासे अपनी एकताका अनुभव हो जाता है, जहाँ कर्तृत्व नहीं है।
माने हुए कर्तृत्वाभिमानको मिटानेके लिये प्रतीति और प्राप्तका भेद समझ लेना आवश्यक है। जो दीखता है, पर मिलता नहीं, उसे प्रतीति कहते हैं और जो मिलता
है, पर दीखता नहीं, उसे 'प्राप्त' कहते हैं। देखने-सुनने आदिमें आनेवाला प्रतिक्षण परिवर्तनशील संसार 'प्रतीति' है, और सर्वत्र नित्य परिपूर्ण परमात्मतत्त्व 'प्राप्त' है। परमात्मतत्त्व ब्रह्मासे चींटी-पर्यन्त सबको समानरूपसे स्वतः प्राप्त है।
इदंतासे दीखनेवाली प्रतीतिका प्रतिक्षण अभाव हो रहा है। दृश्यमात्र प्रतिक्षण अदृश्यमें जा रहा है। जिनसे प्रतीति होती है, वे इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि भी प्रतीति ही हैं। नित्य अचल रहनेवाले 'स्वयं' को प्रतीतिकी प्राप्ति नहीं होती। सदा सबमें रहनेवाला परमात्मतत्त्व 'स्वयं' को नित्यप्राप्त है। इसलिये 'प्रतीति' अभावरूप और 'प्राप्त' भावरूप है—'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः' (गीता २।१६)।
यावन्मात्र पदार्थ और क्रिया 'प्रतीति' है। क्रियामात्र अक्रियतामें लीन होती है। प्रत्येक क्रियाके आदि और अन्तमें सहज (स्वतःसिद्ध) अक्रिय तत्त्व विद्यमान रहता है। जो आदि और अन्तमें होता है, वही मध्यमें भी होता है— यह सिद्धान्त है। अतः क्रियाके समय भी अखण्ड और सहज अक्रिय तत्त्व ज्यों-का-त्यों विद्यमान रहता है। वह सहज अक्रिय तत्त्व (चेतन स्वरूप अथवा परमात्म-तत्त्व) अक्रिय और सक्रिय—दोनों अवस्थाओंको प्रकाशित करनेवाला है अर्थात् वह प्रवृत्ति और निवृत्ति (करने और न करने) दोनोंसे परे है।
प्रतीति—(देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, क्रिया आदि—) से माने हुए सम्बन्ध अर्थात् आसक्तिके कारण ही नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अनुभव नहीं होता। आसक्तिका नाश होते ही नित्यप्राप्त परमात्म-तत्त्वका अनुभव हो जाता है। अतः आसक्तिरहित होकर प्रतीति (अपने कहलानेवाले शरीरादि पदार्थों—को प्रतीति—(संसारमात्र—)की सेवामें लगा देनेसे प्रतीति—(शरीरादि पदार्थों—) का प्रवाह प्रतीति—(संसार—) की तरफ ही हो जाता है और स्वतः प्राप्त परमात्मतत्त्व शेष रह जाता है।
सम्बन्ध—आसक्तिरहित होकर कर्म करने अर्थात् अपने लिये कोई कर्म न करनेसे क्या कोई परमात्माको प्राप्त हो चुका है? इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
कर्मणैव हि संसिद्धिमारिथता जनकादयः । लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥ २० ॥
श्लोक २० ]
- साधक-संजीवनी *
२०९
जनकादयः | = राजा जनक-जैसे अनेक महापुरुष | संसिद्धिम् | = परमसिद्धिको | कर्तुम् | = (निष्कामभावसे ) कर्म करनेके ---|---|---|---|---|--- हि | = भी | आस्थिताः | = प्राप्त हुए थे। (इसलिये) | एव | = ही कर्मणा | = कर्म (कर्मयोग)-के द्वारा | लोकसङ्ग्रहम् | = लोकसंग्रहको | अर्हसि | = योग्य है अर्थात् अवश्य करना एव | = ही | सम्पश्यन् | = देखते हुए | | चाहिये। | | अपि | = भी (तू) | |
व्याख्या —‘कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ’—‘आदि’ पद ‘प्रभृति’ (आरम्भ) तथा ‘प्रकार’ दोनोंका वाचक माना जाता है। यदि यहाँ आये ‘आदि’ पदको ‘प्रभृति’ का वाचक माना जाय तो ‘जनकादयः ’ पदका अर्थ होगा—जिनके आदि- (आरम्भ-) में राजा जनक हैं अर्थात् राजा जनक तथा उनके बादमें होनेवाले महापुरुष। परन्तु यहाँ ऐसा अर्थ मानना ठीक नहीं प्रतीत होता; क्योंकि राजा जनकसे पहले भी अनेक महापुरुष कर्मके द्वारा परमसिद्धिको प्राप्त हो चुके थे; जैसे सूर्य, वैवस्वत मनु, राजा इक्ष्वाकु आदि (गीता—चौथे अध्यायका पहला-दूसरा श्लोक)। इसलिये यहाँ ‘आदि’ पदको ‘प्रकार’ का वाचक मानना ही उचित है, जिसके अनुसार ‘जनकादयः ’ पदका अर्थ है—राजा जनक-जैसे गृहस्थाश्रममें रहकर निष्कामभावसे सब कर्म करते हुए परमसिद्धिको प्राप्त हुए महापुरुष, जो राजा जनकसे पहले तथा बादमें (आजतक) हो चुके हैं।
कर्मयोग बहुत पुरातन योग है, जिसके द्वारा राजा जनक-जैसे अनेक महापुरुष परमात्माको प्राप्त हो चुके हैं। अतः वर्तमानमें तथा भविष्यमें भी यदि कोई कर्मयोगके द्वारा परमात्माको प्राप्त करना चाहे तो उसे चाहिये कि वह मिली हुई प्राकृत वस्तुओं-(शरीरादि-) को कभी अपनी और अपने लिये न माने। कारण कि वास्तवमें वे अपनी और अपने लिये हैं ही नहीं, प्रत्युत संसारकी और संसारके लिये ही हैं। इस वास्तविकताको मानकर संसारसे मिली वस्तुओंको संसारकी ही सेवामें लगा देनेसे सुगमतापूर्वक संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होकर परमात्मप्राप्ति हो जाती है। इसलिये कर्मयोग परमात्मप्राप्तिका सुगम, श्रेष्ठ और स्वतन्त्र साधन है—इसमें कोई सन्देह नहीं।
यहाँ ‘कर्मणा एव ’ पदोंका सम्बन्ध पूर्वश्लोकके ‘असक्तो ह्याचरन्कर्म ’ पदोंसे अर्थात् आसक्तिरहित होकर कर्म करनेसे है; क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करनेसे ही मनुष्य कर्मबन्धनसे मुक्त होता है, केवल कर्म करनेसे नहीं। केवल कर्म करनेसे तो प्राणी बँधता है—‘कर्मणा
बध्यते जन्तुः ’ (महा० शान्ति० २४१।७)।
गीताकी यह शैली है कि भगवान् पीछेके श्लोकमें वर्णित विषयकी मुख्य बातको (जो साधकोंके लिये विशेष उपयोगी होती है) संक्षेपसे आगेके श्लोकमें पुनः कह देते हैं; जैसे पीछेके (उन्नीसवें) श्लोकमें आसक्तिरहित होकर कर्म करनेकी आज्ञा देकर इस बीसवें श्लोकमें उसी बातको संक्षेपसे ‘कर्मणा एव ’ पदोंसे कहते हैं। इसी प्रकार आगे बारहवें अध्यायके छठे श्लोकमें वर्णित विषयकी मुख्य बातको सातवें श्लोकमें संक्षेपसे ‘मव्यावेशितचेतसाम् ’ (मुझमें चित्त लगानेवाले भक्त) पदसे पुनः कहेंगे।
यहाँ भगवान् ‘कर्मणा एव ’ के स्थानपर ‘योगेन एव ’ भी कह सकते थे। परन्तु अर्जुनका आग्रह कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेका होने तथा (आसक्तिरहित होकर किये जानेवाले) कर्मका ही प्रसंग चलनेके कारण ‘कर्मणा एव ’ पदोंका प्रयोग किया गया है। अतः यहाँ इन पदोंका अभिप्राय (पूर्वश्लोकके अनुसार) आसक्तिरहित होकर किये गये कर्मयोगसे ही है।
वास्तवमें चिन्मय परमात्माकी प्राप्ति जड़ कर्मोंसे नहीं होती। नित्यप्राप्त परमात्माका अनुभव होनेमें जो बाधाएँ हैं, वे आसक्तिरहित होकर कर्म करनेसे दूर हो जाती हैं। फिर सर्वत्र परिपूर्ण स्वतःसिद्ध परमात्माका अनुभव हो जाता है। इस प्रकार परमात्मतत्त्वके अनुभवमें आनेवाली बाधाओंको दूर करनेके कारण यहाँ कर्मके द्वारा परमसिद्धि-(परमात्मतत्त्व-) की प्राप्तिकी बात कही गयी है।
परमात्मप्राप्ति-सम्बन्धी मार्मिक बात
मनुष्य सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्तिकी तरह परमात्माकी प्राप्तिको भी कर्मजन्य मान लेते हैं। वे ऐसा विचार करते हैं कि जब किसी बड़े (उच्चपदाधिकारी) मनुष्यसे मिलनेमें भी इतना परिश्रम करना पड़ता है, तब अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक परमात्मासे मिलनेमें तो बहुत ही परिश्रम (तप, व्रत आदि) करना पड़ेगा। वस्तुतः यही साधककी सबसे बड़ी भूल है।
२१०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
मनुष्ययोनिका कर्मोंसे घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसलिये मनुष्ययोनिको 'कर्मसंगी' अर्थात् 'कर्मोंमें आसक्तिवाली' कहा गया है—'रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसंगिषु जायते' (गीता १४।१५)। यही कारण है कि कर्मोंमें मनुष्यकी विशेष प्रवृत्ति रहती है और वह कर्मोंके द्वारा ही अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त करना चाहता है। प्रारब्धका साथ रहनेपर वह कर्मोंके द्वारा ही अभीष्ट सांसारिक वस्तुओंको प्राप्त भी कर लेता है, जिससे उसकी यह धारणा पुष्ट हो जाती है कि प्रत्येक वस्तु कर्म करनेसे ही मिलती है और मिल सकती है। परमात्माके विषयमें भी उसका यही भाव रहता है और वह चेतन परमात्माको भी जड़ कर्मोंके ही द्वारा प्राप्त करनेकी चेष्टा करता है। परन्तु वास्तविकता यही है कि परमात्माकी प्राप्ति कर्मोंके द्वारा नहीं होती। इस विषयको बहुत गम्भीरतापूर्वक समझना चाहिये।
कर्मोंसे नाशवान् वस्तु—(संसार—) की प्राप्ति होती है, अविनाशी वस्तु—(परमात्मा—) की नहीं; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म नाशवान् (शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि) के सम्बन्धसे ही होते हैं, जबकि परमात्माकी प्राप्ति नाशवान्से सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर होती है।
प्रत्येक कर्मका आरम्भ और अन्त होता है, इसलिये कर्मके फलरूप प्राप्त होनेवाली वस्तु भी उत्पन्न और नष्ट होनेवाली होती है। कर्मोंके द्वारा उसी वस्तुकी प्राप्ति होती है, जो देश-काल आदिकी दृष्टिसे दूर (अप्राप्त) हो। सांसारिक वस्तु एक देश, काल आदिमें रहनेवाली, उत्पन्न और नष्ट होनेवाली एवं प्रतिक्षण बदलनेवाली है। अतः उसकी प्राप्ति कर्म-साध्य है। परन्तु परमात्मा सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें परिपूर्ण (नित्यप्राप्त)* एवं उत्पत्ति-विनाश और परिवर्तनसे सर्वथा रहित है। अतः उनकी प्राप्ति स्वतःसिद्ध है, कर्म-साध्य नहीं। यही कारण है कि सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्ति चिन्तनसे नहीं होती, जबकि परमात्माकी प्राप्तिमें चिन्तन मुख्य है। चिन्तनसे वही वस्तु प्राप्त हो सकती है, जो समीप-से-समीप हो। वास्तवमें देखा जाय तो परमात्माकी प्राप्ति चिन्तनरूप क्रियासे भी नहीं होती। परमात्माका चिन्तन करनेकी सार्थकता दूसरे (संसारके) चिन्तनका त्याग करानेमें ही है। संसारका चिन्तन सर्वथा छूटते ही नित्यप्राप्त परमात्माका अनुभव हो जाता है।
सर्वव्यापी परमात्माकी हमसे दूरी है ही नहीं और हो सकती भी नहीं। जिससे हम अपनी दूरी नहीं मानते, उस
'मैं'-पनसे भी परमात्मा अत्यन्त समीप हैं। 'मैं'-पन तो परिच्छिन्न (एकदेशीय) है, पर परमात्मा परिच्छिन्न नहीं हैं। ऐसे अत्यन्त समीपस्थ, नित्यप्राप्त परमात्माका अनुभव करनेके लिये सांसारिक वस्तुओंकी प्राप्तिके समान तर्क तथा युक्तियाँ लगाना अपने-आपको धोखा देना ही है।
सांसारिक वस्तुकी प्राप्ति इच्छामात्रसे नहीं होती; परन्तु परमात्माकी प्राप्ति उत्कट अभिलाषामात्रसे हो जाती है। इस उत्कट अभिलाषाके जाग्रत् होनेमें सांसारिक भोग और संग्रहकी इच्छा ही बाधक है, दूसरा कोई बाधक है ही नहीं। यदि परमात्मप्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा अभी जाग्रत् हो जाय, तो अभी ही परमात्माका अनुभव हो जाय।
मनुष्यजीवनका उद्देश्य कर्म करना और उसका फल भोगना नहीं है। सांसारिक भोग और संग्रहकी इच्छाके त्यागपूर्वक परमात्मप्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा तभी जाग्रत् हो सकती है, जब साधकके जीवनभरका एक ही उद्देश्य—परमात्मप्राप्ति करना हो जाय। परमात्माको प्राप्त करनेके अतिरिक्त अन्य किसी भी कार्यका कोई महत्त्व न रहे। वास्तवमें परमात्मप्राप्तिके अतिरिक्त मनुष्यजीवनका अन्य कोई प्रयोजन है ही नहीं। जरूरत केवल इस प्रयोजन या उद्देश्यको पहचान कर इसे पूरा करनेकी ही है।
यहाँ उद्देश्य और फलेच्छा—दोनोंमें भेद समझ लेना आवश्यक है। नित्य परमात्मतत्त्वको प्राप्त करनेका 'उद्देश्य' होता है, और अनित्य (उत्पत्ति-विनाशशील) पदार्थोंको प्राप्त करनेकी 'फलेच्छा' होती है। उद्देश्य तो पूरा होता है, पर फलेच्छा मिटनेवाली होती है। स्वरूपबोध और भगवत्प्राप्ति—ये दोनों उद्देश्य हैं, फल नहीं। उद्देश्यकी प्राप्तिके लिये किया गया कर्म सकाम नहीं कहलाता। इसलिये निष्काम पुरुष—(कर्मयोगी—) के सभी कर्म उद्देश्यको लेकर होते हैं, फलेच्छाको लेकर नहीं।
कर्मयोगमें कर्म—(जडता—) से सम्बन्ध-विच्छेदका उद्देश्य रखकर शास्त्रविहित शुभ-कर्म किये जाते हैं। सकाम पुरुष फलकी इच्छा रखकर अपने लिये कर्म करता है और कर्मयोगी फलकी इच्छाका त्याग करके दूसरोंके लिये कर्म (सेवा) करता है। कर्म ही फलरूपसे परिणत होता है। अतः फलका सम्बन्ध कर्मसे होता है। उद्देश्यका सम्बन्ध कर्मसे नहीं होता। निष्कामभावपूर्वक केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे 'परमात्मा दूर है' यह धारणा दूर हो जाती है।
- देस काल दिसि बिदिसिहू माहीं। कहहू सो कहँ जहाँ प्रभु नाहीं॥ (मानस १।१८५।३)
श्लोक २१ ]
- साधक-संजीवनी *
२११
‘लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि’—‘लोक’ शब्दके तीन अर्थ होते हैं—(१) मनुष्यलोक आदि लोक, (२) उन लोकोंमें रहनेवाले प्राणी और (३) शास्त्र (वेदोंके अतिरिक्त सब शास्त्र)। मनुष्यलोककी, उसमें रहनेवाले प्राणियोंकी और शास्त्रोंकी मर्यादाके अनुसार समस्त आचरणों (जीवनचर्यामात्र) का होना ‘लोकसंग्रह’ है। लोकसंग्रहका तात्पर्य है—लोकमर्यादा सुरक्षित रखनेके लिये, लोगोंको असत्से विमुख करके सत्के सम्मुख करनेके लिये निःस्वार्थभावपूर्वक कर्म करना। इसको गीतामें ‘यज्ञार्थ कर्म’ के नामसे भी कहा गया है। अपने आचरणों एवं वचनोंसे लोगोंको असत्से विमुख करके सत्के सम्मुख कर देना बहुत बड़ी सेवा है; क्योंकि सत्के सम्मुख होनेसे लोगोंका सुधार एवं उद्धार हो जाता है। लोगोंको दिखानेके लिये अपने कर्तव्यका पालन करना लोक-संग्रह नहीं है। कोई देखे या न देखे, लोक-मर्यादाके अनुसार अपने-अपने (वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिके अनुसार) कर्तव्यका पालन करनेसे लोकसंग्रह स्वतः होता है।
कोई भी कर्तव्य-कर्म छोटा या बड़ा नहीं होता। छोटे-से-छोटा और बड़े-से-बड़ा कर्म कर्तव्यमात्र समझकर (सेवाभावसे) करनेपर समान ही है। देश, काल, परिस्थिति,
परिशिष्ट भाव —यहाँ आये ‘कर्मणैव ही संसिद्धिमास्थिताः’ पदोंसे सिद्ध होता है कि कर्मयोग मुक्तिका स्वतन्त्र साधन है। जनकादि राजाओंने भी कर्मयोगके द्वारा ही परमसिद्धि प्राप्त की; क्योंकि उन्होंने केवल दूसरोंकी सेवाके लिये, उनको सुख पहुँचानेके लिये ही राज्य किया, अपने लिये राज्य नहीं किया।
‘लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि’ पदोंका तात्पर्य है कि तेरेको लोगोंमें कर्मयोगका यह आदर्श स्थापित करना चाहिये कि कर्मयोगका पालन करनेसे परमसिद्धिकी प्राप्ति हो जाती है।
सम्बन्ध-कर्म करनेसे लोकसंग्रह कैसे होता है—इसका विवेचन भगवान् आगेके श्लोकमें करते हैं।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥
| श्रेष्ठः | = श्रेष्ठ मनुष्य | तत्, तत् | = वैसा-वैसा | कुरुते | = कर देता है, |
|---|---|---|---|---|---|
| यत्, यत् | = जो-जो | एव | = ही (आचरण करते हैं)। | लोकः | = दूसरे मनुष्य |
| आचरति | = आचरण करता है, | सः | = वह | तत् | = उसीके |
| इतरः | = दूसरे | यत् | = जो कुछ | अनुवर्तते | = अनुसार आचरण |
| जनः | = मनुष्य | प्रमाणम् | = प्रमाण | करते हैं। |
- उदाहरणार्थ—कर्मके स्वरूपकी दृष्टिसे झाड़ू लगाना छोटा कर्म और व्याख्यान देना बड़ा कर्म प्रतीत होता है, एवं कर्म-फलकी दृष्टिसे कम दान करनेका कम पुण्य और अधिक दान करनेका अधिक पुण्य प्रतीत होता है।
११२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
व्याख्या—‘यद्यदाचरति श्रेष्ठस्ततदेवेतरो जनः’— श्रेष्ठ पुरुष वही है, जो संसार-(शरीरादि पदार्थों-) को और ‘स्वयं’-(अपने स्वरूप-) को तत्त्वसे जानता है। उसका यह स्वाभाविक अनुभव होता है कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, धन, कुटुम्ब, जमीन आदि पदार्थ संसारके हैं, अपने नहीं। इतना ही नहीं, वह श्रेष्ठ पुरुष त्याग, वैराग्य, प्रेम, ज्ञान, सदगुण आदिको भी अपना नहीं मानता; क्योंकि उन्हें भी अपना माननेसे व्यक्तित्व पुष्ट होता है, जो तत्त्वप्राप्तिमें बाधक है। ‘मैं त्यागी हूँ’, ‘मैं वैरागी हूँ’, ‘मैं सेवक हूँ’, ‘मैं भक्त हूँ’ आदि भाव भी व्यक्तित्वको पुष्ट करनेवाले होनेके कारण तत्त्वप्राप्तिमें बाधक होते हैं। श्रेष्ठ पुरुषमें (जड़ताके सम्बन्धसे होनेवाला) ‘व्यष्टि अहंकार’ तो होता ही नहीं, और ‘समष्टि अहंकार’ व्यवहारमात्रके लिये होता है, जो संसारकी सेवामें लगा रहता है; क्योंकि अहंकार भी संसारका ही है (गीता—सातवें अध्यायका चौथा और तेरहवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)।
संसारसे मिले हुए शरीर, धन, परिवार, पद, योग्यता, अधिकार आदि सब पदार्थ सदुपयोग करने अर्थात् दूसरोंकी सेवामें लगानेके लिये ही मिले हैं; उपभोग करने अथवा अपना अधिकार जमानेके लिये नहीं। जो इन्हें अपना और अपने लिये मानकर इनका उपभोग करता है, उसको भगवान् चोर कहते हैं—‘यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ’ (गीता ३। १२)। ये सब पदार्थ समष्टिके ही हैं, व्यष्टिके कभी किसी प्रकार नहीं। वास्तवमें इन पदार्थोंसे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। श्रेष्ठ पुरुषके अपने कहलानेवाले शरीरादि पदार्थ (संसारके होनेसे) स्वतः—स्वाभाविक संसारकी सेवामें लगते हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है।
‘देने’ के भावसे समाजमें एकता, प्रेम उत्पन्न होता है और ‘लेने’ के भावसे संघर्ष उत्पन्न होता है। ‘देने’ का भाव उद्धार करनेवाला और ‘लेने’ का भाव पतन करनेवाला होता है। शरीरको ‘मैं’, ‘मेरा’ अथवा ‘मेरे लिये’ माननेसे ही ‘लेने’ का भाव उत्पन्न होता है। शरीरसे अपना कोई सम्बन्ध न माननेके कारण श्रेष्ठ पुरुषमें ‘लेने’ का भाव किंचिन्मात्र भी नहीं होता। अतः उसकी प्रत्येक क्रिया दूसरोंका हित करनेवाली ही होती है। ऐसे श्रेष्ठ पुरुषके दर्शन, स्पर्श, वार्तालाप, चिन्तन आदिसे स्वतः लोगोंका हित होता है। इतना ही नहीं, उसके शरीरको स्पर्श करके बहनेवाली वायुतकसे लोगोंका हित होता है।
ऐसे श्रेष्ठ पुरुष दो प्रकारके होते हैं—(१) अवधूत कोटिके और (२) आचार्य कोटिके। अवधूत कोटिके श्रेष्ठ पुरुष अवधूतोंके लिये ही आदर्श होते हैं, साधारण जनताके लिये नहीं। परन्तु आचार्य कोटिके श्रेष्ठ पुरुष मनुष्यमात्रके लिये आदर्श होते हैं। यहाँ आचार्य कोटिके श्रेष्ठ पुरुषोंका वर्णन किया गया है, जिनके आचरण सदा शास्त्रमर्यादाके अनुकूल ही होते हैं। कोई देखे या न देखे, अहंता-ममता न रहनेके कारण उनके द्वारा स्वाभाविक ही कर्तव्यका पालन होता है। जैसे, जंगलमें कोई पुष्प खिला और कुछ समयके बाद मुरझा गया और सूखकर गिर गया। उसे किसीने देखा नहीं, फिर भी उसने (चारों ओर) अपनी सुगन्ध फैलाकर दुर्गन्धका नाश किया ही है। इसी तरह श्रेष्ठ पुरुषसे (परहितका असीम भाव होनेके कारण) संसारमात्रका स्वाभाविक ही बहुत उपकार हुआ करता है, चाहे कोई समझे या न समझे। कारण यह है कि व्यक्तित्व (अहंता-ममता) मिट जानेके कारण भगवान्की उस पालन-शक्तिके साथ उसकी एकता हो जाती है, जिसके द्वारा संसारमात्रका हित हो रहा है।
जैसे एक ही शरीरके सब अंग भिन्न-भिन्न होनेपर भी एक ही हैं (जैसे—किसी भी अंगमें पीड़ा होनेपर मनुष्य उसे अपनी पीड़ा मानता है), ऐसे ही संसारके सब प्राणी भिन्न-भिन्न होनेपर भी एक ही हैं। जैसे शरीरका कोई भी पीड़ित (रोगी) अंग ठीक हो जानेपर सम्पूर्ण शरीरका हित होता है, ऐसे ही मर्यादामें रहकर प्राप्त वस्तु, समय, परिस्थिति आदिके अनुसार अपने कर्तव्यका पालन करनेवाले मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण संसारका स्वतः हित होता है।
श्रेष्ठ पुरुषके आचरणों और वचनोंका प्रभाव (स्थूल-शरीरसे होनेके कारण) स्थूलरीतिसे पड़ता है, जो सीमित होता है। परन्तु उसके भावोंका प्रभाव सूक्ष्मरीतिसे पड़ता है, जो असीम होता है। कारण यह है कि ‘क्रिया’ तो सीमित होती है, पर ‘भाव’ असीम होता है।
श्रेष्ठ पुरुष जिन भावोंको अपने आचरणोंमें लाता है, उन भावोंका दूसरे मनुष्योंपर बहुत प्रभाव पड़ता है। अपने वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिके आचरणोंका अच्छी तरहसे पालन करनेके कारण उसके द्वारा कहे हुए वचनोंका दूसरे वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिके लोगोंपर भी बहुत प्रभाव पड़ता है।
यद्यपि श्रेष्ठ मनुष्य अपने लिये कोई आचरण नहीं करता और उसमें कर्तृत्वाभिमान भी नहीं होता, तथापि लोगोंकी
श्लोक २१ ]
- साधक-संजीवनी *
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दृष्टिमें वह आचरण करता हुआ दीखनेके कारण यहाँ ‘आचरति’ क्रियाका प्रयोग हुआ है। उसके द्वारा सबके उपकारके लिये स्वतः-स्वाभाविक क्रियाएँ होती हैं। अपना कोई स्वार्थ न रहनेके कारण उसकी छोटी-बड़ी प्रत्येक क्रिया लोगोंका स्वतः हित करनेवाली होती है। यद्यपि उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है—‘तस्य कार्यं न विद्यते’ (गीता ३।१७) और उसमें करनेका अभिमान भी नहीं है—‘निर्ममो निरहङ्कारः’ (गीता २।७१), तथापि उसके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक सुचारुरूपसे कर्तव्यका पालन होता है। इस प्रकार उसके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक लोकसंग्रह होता है।
विशेष बात
प्रायः देखा जाता है कि जिस समाज, सम्प्रदाय, जाति, वर्ण, आश्रम आदिमें जो श्रेष्ठ मनुष्य कहलाते हैं और जिनको लोग श्रेष्ठ मानकर आदरकी दृष्टिसे देखते हैं, वे जैसा आचरण करते हैं, उस समाज, सम्प्रदाय, जाति आदिके लोग भी वैसा ही आचरण करने लग जाते हैं।
अन्तःकरणमें धन और पदका महत्त्व एवं लोभ रहनेके कारण लोग अधिक धनवाले (लखपति, करोड़पति) तथा ऊँचे पदवाले (नेता, मन्त्री आदि) पुरुषोंको श्रेष्ठ मान लेते हैं और उन्हें बहुत आदरकी दृष्टिसे देखते हैं। जिनके अन्तःकरणमें जड़ वस्तुओं—(धन, पद आदि—) का महत्त्व है, वे मनुष्य वास्तवमें न तो स्वयं श्रेष्ठ होते हैं और न श्रेष्ठ व्यक्तिको समझ ही सकते हैं। जिसको वे श्रेष्ठ समझते हैं, वह भी वास्तवमें श्रेष्ठ नहीं होता। यदि उनके हृदयमें धनका अधिक आदर है तो उनपर अधिक धनवालोंका ही प्रभाव पड़ता है; जैसे—चोरपर चोरोंके सरदारका ही प्रभाव पड़ता है। वास्तवमें श्रेष्ठ न होनेपर भी लोगोंके द्वारा श्रेष्ठ मान लिये जानेके कारण उन धनी तथा उच्च पदाधिकारी पुरुषोंके आचरणोंका समाजमें स्वतः प्रचार हो जाता है। जैसे, धनके कारण जो श्रेष्ठ माने जाते हैं, वे पुरुष जिन-जिन उपायोंसे धन कमाते और जमा करते हैं, उन-उन उपायोंका लोगोंमें स्वतः प्रचार हो जाता है, चाहे वे उपाय कितने ही गुप्त क्यों न हों। यही कारण है कि वर्तमानमें झूठ, कपट, बेईमानी, धोखा, चोरी आदि बुराइयोंका समाजमें, किसी पाठशालामें पढ़ाये बिना ही स्वतः प्रचार होता चला जा रहा है।
यह दुःख और आश्चर्यकी बात है कि वर्तमानमें लोग
लखपतिको तो श्रेष्ठ मान लेते हैं, पर प्रतिदिन भगवन्नामका लाख जप करनेवालेको श्रेष्ठ नहीं मानते। वे यह विचार ही नहीं करते कि लखपतिके मरनेपर एक कौड़ी भी साथ नहीं जायगी, जबकि भगवन्नामका जप करनेवालेके मरनेपर पूरा-का-पूरा भगवन्नामरूप धन उसके साथ जायगा, एक भी भगवन्नाम पीछे नहीं रहेगा!
अपने-अपने स्थान या क्षेत्रमें जो पुरुष मुख्य कहलाते हैं, उन अध्यापक, व्याख्यानदाता, आचार्य, गुरु, नेता, शासक, महन्त, कथावाचक, पुजारी आदि सभीको अपने आचरणोंमें विशेष सावधानी रखनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है, जिससे दूसरोंपर उनका अच्छा प्रभाव पड़े। इसी प्रकार परिवारके मुख्य व्यक्ति—(मुखिया—) को भी अपने आचरणोंमें पूरी सावधानी रखनेकी आवश्यकता है। कारण कि मुख्य व्यक्तिकी ओर सबकी दृष्टि रहती है। रेलगाड़ीके चालकके समान मुख्य व्यक्तिपर विशेष जिम्मेवारी रहती है। रेलगाड़ीमें बैठे अन्य व्यक्ति सोये भी रह सकते हैं, पर चालकको सदा जाग्रत रहना पड़ता है। उसकी थोड़ी भी असावधानीसे दुर्घटना हो जानेकी सम्भावना रहती है। इसलिये संसारमें अपने-अपने क्षेत्रमें श्रेष्ठ माने जानेवाले सभी पुरुषोंको अपने आचरणोंपर विशेष ध्यान रखनेकी बहुत आवश्यकता है।
‘स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते’—जिसके अन्तःकरणमें कामना, ममता, आसक्ति, स्वार्थ, पक्षपात आदि दोष नहीं हैं और नाशवान् पदार्थोंका महत्त्व या कुछ भी लेनेका भाव नहीं है, ऐसे मनुष्यके द्वारा कहे हुए वचनोंका प्रभाव दूसरोंपर स्वतः पड़ता है और वे उसके वचनानुसार स्वयं आचरण करने भी लग जाते हैं।
यहाँ यह शंका हो सकती है कि जब आचरणकी बात कह दी, तब प्रमाणके कहनेकी क्या आवश्यकता है और प्रमाणकी बात कहनेपर आचरणके कहनेकी क्या आवश्यकता है? इसका समाधान यह है कि यद्यपि आचरण मुख्य होता है, तथापि एक ही मनुष्यके द्वारा सभी वर्णों, आश्रमों, सम्प्रदायों आदिके भावोंका आचरण करना सम्भव नहीं है। अतः श्रेष्ठ मनुष्य स्वयं जिस वर्ण, आश्रम आदिमें है, उसके अनुसार तो वह सांगोपांग आचरण करता ही है और अन्य वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिके लोगोंके लिये भी वह अपने वचनोंसे शास्त्र, इतिहास आदिके प्रमाणसे यह शिक्षा देता है कि अपने लिये कुछ न करके,
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
सम्पूर्ण प्राणियोंके हितके भावसे अपने-अपने ( वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिके अनुसार) कर्तव्यका पालन करना कल्याणका सुगम और श्रेष्ठ साधन है (गीता—अठारहवें अध्यायका पैतालीसवाँ श्लोक)। उसके वचनोंसे प्रभावित होकर दूसरे वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिके लोग उसके कहे अनुसार अपने-अपने कर्तव्योंका पालन करने लग जाते हैं। यद्यपि आचरणका क्षेत्र सीमित और प्रमाण- (वचनों- ) का क्षेत्र विस्तृत होता है, तथापि भगवान् के द्वारा श्रेष्ठ पुरुषके आचरणमें पाँच पद—‘यत्’, ‘यत्’, ‘तत्’, ‘तत्’ और (विशेषरूपसे) ‘एव’ देनेका अभिप्राय है कि उसके आचरणका प्रभाव समाजपर पाँच गुना (अधिक) पड़ता है और प्रमाणमें दो पद—‘यत्’ और ‘तत्’ देनेका अभिप्राय है कि प्रमाणका प्रभाव समाजपर केवल दो गुना (अपेक्षाकृत कम) पड़ता है। इसीलिये भगवान् ने बीसवें श्लोकमें लोकसंग्रहके लिये अपने कर्तव्यकर्माका पालन करनेपर ही विशेषरूपसे जोर दिया है।
यदि श्रेष्ठ मनुष्य स्वयं अपने वर्ण, आश्रम आदिके अनुसार आचरण न करके केवल प्रमाण दे, तो उसका लोगोंपर विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा। उसमें लोगोंका ऐसा भाव हो सकता है कि ये बातें तो केवल कहने- सुननेकी हैं; क्योंकि कहनेवाला स्वयं भी तो अपने कर्तव्य- कर्माका पालन नहीं कर रहा है। ऐसा भाव होनेपर लोगोंमें अपने कर्तव्यके प्रति अश्रद्धा और अरुचि होनेकी सम्भावना रहती है।
इसलिये श्रेष्ठ पुरुष स्वयं आचरण करके और प्रमाण देकर—दोनों ही प्रकारसे लोगोंको अपने-अपने कर्तव्य- पालनमें लगाकर उनका हित करता है।
श्रेष्ठ पुरुषके आचरणोंका अनुवर्तन (अनुसरण) वे ही लोग करते हैं, जो उसे श्रेष्ठ मानते हैं। अतः वास्तवमें श्रेष्ठ होनेपर भी अगर कोई मनुष्य उसे श्रेष्ठ नहीं मानता, तो वह उस श्रेष्ठ पुरुषके आचरणों और वचनोंके अनुसार आचरण नहीं कर सकेगा।
वर्तमानमें पारमार्थिक (भगवत्सम्बन्धी) भावोंका प्रचार करनेवाले बहुत-से पुरुषोंके होनेपर भी लोगोंपर उन भावोंका प्रभाव बहुत कम दिखायी देता है। इसका कारण यही है कि प्रायः वक्ता जैसा कहता है, वैसा स्वयं पूरा आचरण नहीं करता। स्वयं आचरण करके कही गयी बात गोलीसे भरी बन्दूकके समान है, जो गोलीके छूटनेपर आवाजके साथ-साथ मार भी करती है। इसके विपरीत आचरणमें लाये बिना कही गयी बात केवल बारूदसे भरी बन्दूकके समान है, जो केवल आवाज करके ही शान्त हो जाती है। हाँ, पारमार्थिक बातें ऐसे ही खत्म नहीं हो जातीं, प्रत्युत कुछ-न-कुछ प्रभाव डालती ही हैं। भगवच्चर्चा, कथा-कीर्तन आदिका कुछ-न-कुछ प्रभाव सबपर पड़ता ही है। अगर सुननेवालोंमें श्रद्धा है और वे साधन करते हैं अथवा करना चाहते हैं, तो उनपर (अपनी श्रद्धा और साधनकी रुचिके कारण) वचनोंका प्रभाव अधिक पड़ता है।
सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें अपना उदाहरण देकर लोकसंग्रहकी पुष्टि करते हैं।
न मे पार्थार्सितं कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ २२ ॥
| पार्थ | = हे पार्थ ! | कर्तव्यम् | = कर्तव्य | अनवाप्तम् | = अप्राप्त है, |
|---|---|---|---|---|---|
| मे | = मुझे | अस्ति | = है | कर्मणि | = (फिर भी मैं) |
| त्रिषु | = तीनों | च | = और | कर्तव्यकर्ममें | |
| लोकेषु | = लोकोंमें | न | = न (कोई) | एव | = ही |
| न | = न तो | अवाप्तव्यम् | = प्राप्त करनेयोग्य | वर्त | = लगा |
| किञ्चन | = कुछ | (वस्तु) | रहता हूँ। |
व्याख्या—‘न मे पार्थारसितं ..... नानवाप्तमवाप्तव्यम्’— भगवान् किसी एक लोकमें सीमित नहीं हैं। इसलिये वे तीनों लोकोंमें अपना कोई कर्तव्य न होनेकी बात कह रहे हैं।
भगवान् के लिये त्रिलोकीमें कोई भी कर्तव्य शेष नहीं है; क्योंकि उनके लिये कुछ भी पाना शेष नहीं है। कुछ-न-कुछ पानेके लिये ही सब (मनुष्य, पशु, पक्षी आदि) कर्म करते हैं। भगवान् उपर्युक्त पदोंमें बहुत विलक्षण बात कह रहे हैं