भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ३ ]

अनुसार बरतना है और इसका पालन न करना सृष्टि-चक्रके अनुसार न बरतना है।

‘एवं प्रवर्तितां चक्रं नानुवर्तयतीह यः’—जैसे रथके पहियेका छोटा-सा अंश भी टूट जानेपर रथके समस्त अंगोंको एवं उसपर बैठे रथी और सारथिको धक्का लगता है, ऐसे ही जो मनुष्य चौदहवें-पन्द्रहवें श्लोकोंमें वर्णित सृष्टि-चक्रके अनुसार नहीं चलता वह समष्टि सृष्टिके संचालनमें बाधा डालता है।

संसार और व्यक्ति दो (विजातीय) वस्तु नहीं हैं। जैसे शरीरका अंगोंके साथ और अंगोंका शरीरके साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है, ऐसे ही संसारका व्यक्तिके साथ और व्यक्तिका संसारके साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। जब व्यक्ति कामना, ममता, आसक्ति और अहंताका त्याग करके अपने कर्तव्यका पालन करता है, तब उससे सम्पूर्ण सृष्टिमें स्वतः सुख पहुँचता है।

‘इन्द्रियारामः’—‘जो मनुष्य कामना, ममता, आसक्ति आदिसे युक्त होकर इन्द्रियोंके द्वारा भोग भोगता है, उसे यहाँ भोगोंमें रमण करनेवाला कहा गया है। ऐसा मनुष्य पशुसे भी नीचा है; क्योंकि पशु नये पाप नहीं करता; प्रत्युत पहले किये गये पापोंका ही फल भोगकर निर्मलताकी ओर जाता है; परन्तु ‘इन्द्रियाराम’ मनुष्य नये-नये पाप करके पतनकी ओर जाता है और साथ ही सृष्टि-चक्रमें बाधा उत्पन्न करके सम्पूर्ण सृष्टिको दुःख पहुँचाता है।

‘अधायुः’—‘सृष्टि-चक्रके अनुसार न चलनेवाले मनुष्यकी आयु, उसका जीवन केवल पापमय है। कारण कि इन्द्रियोंके द्वारा भोगबुद्धिसे भोग भोगनेवाला मनुष्य हँसारूप पापसे बच ही नहीं सकता। स्वार्थी, अभिमानी और भोग तथा संग्रहको चाहनेवाले मनुष्यके द्वारा दूसरोंका अहित

परिशिष्ट भाव —नवें श्लोकसे लेकर यहाँतक जो वर्णन आया है, उसका तात्पर्य निःस्वार्थभावसे दूसरोंकी सेवा करनेमें ही है।

सम्बन्ध—संसारसे ‘सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये जो अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता, उस मनुष्यकी पूर्वश्लोकमें ताड़ना की गयी है। परन्तु जिसने अपने कर्तव्यका पालन करके संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया है, उस महापुरुषकी स्थितिका वर्णन भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

यस्त्वात्मारतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १७ ॥

होता है; अतः ऐसे मनुष्यका जीवन पापमय होता है। गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी कहते हैं।

पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद ।

ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद ॥

(मानस ७।३९)

‘मोघं पार्थ स जीवति’—अपने कर्तव्यका पालन न करनेवाले मनुष्यकी सभ्य भाषामें निन्दा या ताड़ना करते हुए भगवान् कहते हैं कि ऐसा मनुष्य संसारमें व्यर्थ ही जीता है अर्थात् वह मर जाय तो अच्छा है! तात्पर्य यह है कि यदि वह अपने कर्तव्यका पालन करके सृष्टिको सुख नहीं पहुँचाता तो कम-से-कम दुःख तो न पहुँचाये। जैसे भगवान् श्रीरामके वनवासके समय अयोध्यावासियोंके चित्रकूट आनेपर कोल, किरात, भील आदि जंगली लोगोंने उनसे कहा था कि हम आपके वस्त्र और बर्तन नहीं चुरा लेंते, यही हमारी बहुत बड़ी सेवा है—यह हमारी अति बड़ी सेवाकाई। लेहिं न बासन बसन चोराई ॥ (मानस १।२५१।२), ऐसे ही अपने कर्तव्यका पालन न करने-वाले मनुष्य कम-से-कम सृष्टि-चक्रमें बाधा न डालें तो यह उनकी सेवा ही है।

सृष्टि-चक्रके अनुसार न चलनेवाले मनुष्यके लिये भगवान्ने पहले ‘स्तेन एव सः’ (३।१२) ‘वह चोर ही है’ और ‘भुञ्जते ते त्वधम्’ (३।१३) ‘वे तो पापको ही खाते हैं’—इस प्रकार कहा और अब इस श्लोकमें ‘अधायुरिन्द्रियारामः’—‘वह पापायु और इन्द्रियाराम है’—ऐसा कहकर उसके जीनेको भी व्यर्थ बताते हैं।

गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने भी कहा है—तेज कुसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा ॥ उदय केत सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके ॥

(मानस १।४।३)