श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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महाभारत) एवं भिन्न-भिन्न सम्प्रदायके आचार्यके अनुभव-वचन आदि समस्त वेदानुकूल सत्-शास्त्रोंको ग्रहण कर लेना चाहिये।
‘ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्’ —यहाँ ‘ब्रह्म’ पद वेदका वाचक है। वेद सच्चिदानन्दधन परमात्मासे ही प्रकट हुए हैं (गीता १७।२३)। इस प्रकार परमात्मा सबके मूल हुए।
परमात्मासे वेद प्रकट होते हैं। वेद कर्तव्य-पालनकी विधि बताते हैं। मनुष्य उस कर्तव्यका विधिपूर्वक पालन करते हैं। कर्तव्य-कर्मके पालनसे यज्ञ होता है और यज्ञसे वर्षा होती है। वर्षासे अन्न होता है, अन्नसे प्राणी होते हैं और उन्हीं प्राणियोंमेंसे मनुष्य कर्तव्य-कर्मके पालनसे यज्ञ करते हैं*। इस तरह यह सुष्ठि-चक्र चल रहा है।
‘तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्’ —यहाँ ‘ब्रह्म’ पद अक्षर-(सगुण-निराकार परमात्मा-) का वाचक है। अतः सर्वगत (सर्वव्यापी) परमात्मा हैं, वेद नहीं।
सर्वव्यापी होनेपर भी परमात्मा विशेषरूपसे ‘यज्ञ’ (कर्तव्य-कर्म) में सदा विद्यमान रहते हैं। तात्पर्य यह है कि जहाँ निष्कामभावसे कर्तव्य-कर्मका पालन किया जाता है, वहाँ परमात्मा रहते हैं। अतः परमात्मप्राप्ति चाहनेवाले मनुष्य अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा उन्हें सुगमतापूर्वक प्राप्त कर सकते हैं—‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति
मानवः’ (गीता १८।४६)।
शंका —परमात्मा जब सर्वव्यापी हैं, तब उन्हें केवल यज्ञमें नित्य प्रतिष्ठित क्यों कहा गया है? क्या वे दूसरी जगह नित्य प्रतिष्ठित नहीं हैं?
समाधान —परमात्मा तो सभी जगह समानरूपसे नित्य विद्यमान हैं। वे अनित्य और एकदेशीय नहीं हैं। इसीलिये उन्हें यहाँ ‘सर्वगत’ कहा गया है। यज्ञ (कर्तव्य-कर्म)—में नित्य प्रतिष्ठित कहनेका तात्पर्य यह है कि यज्ञ उनका उपलब्धि-स्थान है। जमीनमें सर्वत्र जल रहनेपर भी वह कूर्प आदिसे ही उपलब्ध होता है, सब जगहसे नहीं। पाइपमें सर्वत्र जल रहनेपर भी जल वहाँसे प्राप्त होता है, जहाँ टॉटो या छिद्र होता है। ऐसे ही सर्वगत होनेपर भी परमात्मा यज्ञसे ही प्राप्त होते हैं।
अपने लिये कर्म करनेसे तथा जड़ता (शरीरादि)—के साथ अपना सम्बन्ध माननेसे सर्वव्यापी परमात्माकी प्राप्तिमें बाधा (आड़) आ जाती है। निष्कामभावपूर्वक केवल दूसरोंके हितके लिये अपने कर्तव्यका पालन करनेसे यह बाधा हट जाती है और नित्यप्राप्त परमात्माका स्वतः अनुभव हो जाता है। यही कारण है कि भगवान् अर्जुनको, जो कि अपने कर्तव्यसे हटना चाहते थे, अनेक युक्तियोंसे कर्तव्यका पालन करनेपर विशेष जोर दे रहे हैं।
सम्बन्ध—सुष्ठिचक्रके अनुसार चलने अर्थात् अपने कर्तव्यका पालन करनेकी जिम्मेवारी मनुष्यपर ही है। अतः जो मनुष्य अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता, उसकी ताड़ना भगवान् आगेके श्लोकमें करते हैं।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः। अद्यायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥ १६ ॥
| पार्थ | = हे पार्थ! | चक्रम् | = सुष्ठि-चक्रके | करनेवाला | |
|---|---|---|---|---|---|
| यः | = जो मनुष्य | न, अनुवर्तयति | = अनुसार नहीं | अद्यायुः | = अद्यायु (पापमय जीवन बितानेवाला) |
| इह | = इस लोकमें | चलता, | मनुष्य | ||
| एवम् | = इस प्रकार | सः | = वह | मोघम् | = (संसारमें) व्यर्थ ही |
| प्रवर्तितम् | = (परम्परासे) | इन्द्रियारामः | = इन्द्रियोंके द्वारा | जीवति | = जीता है। |
| प्रचलित | भोगोंमें रमण |
व्याख्या—‘पार्थ’ —नवें श्लोकमें प्रारम्भ किये हुए प्रकरणका उपसंहार करते हुए भगवान् यहाँ अर्जुनके लिये ‘पार्थ’ सम्बोधन देकर मानो यह कह रहे हैं कि तुम उसी पृथा-(कुन्ती-) के पुत्र हो, जिसने आजीवन कष्ट सहकर
भी अपने कर्तव्यका पालन किया था। अतः तुम्हारेसे भी अपने कर्तव्यकी अवहेलना नहीं होनी चाहिये। जिस युद्धको तू घोर कर्म कह रहा है, वह तरे लिये घोर कर्म नहीं, प्रत्युत यज्ञ (कर्तव्य) है। इसका पालन करना ही सुष्ठि-चक्रके
- मनुष्यसे इतर सभी स्थावर-जंगम प्राणियोंद्वारा स्वतः यज्ञ (रोपेपकार) होता रहता है, पर वे यज्ञका अनुष्ठान बुद्धिपूर्वक नहीं कर सकते। बुद्धिपूर्वक यज्ञका अनुष्ठान मनुष्य ही कर सकता है; क्योंकि इसकी योग्यता और अधिकार मनुष्यको ही है।