श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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भी बाधा नहीं लगेगी। कहीं-कहीं सिद्धान्तोंके विवेचनमें भी फरक पड़ा है; परन्तु कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—ये तीनों स्वतन्त्रतापूर्वक परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति करानेवाले हैं—इसमें कोई फरक नहीं पड़ा है। टीका लिखवाते समय ‘साधकोंको शीघ्र लाभ कैसे हो’—ऐसा भाव रहा है। इस कारण टीकाकी भाषा, शैली आदिमें परिवर्तन होता रहा है।
इस टीकामें बहुत-से श्लोकोंका विवेचन दूसरी टीकाओंके विपरीत पड़ता है। परन्तु इसका तात्पर्य दूसरी टीकाओंको गलत बतानेमें किंचिन्मात्र भी नहीं है, प्रत्युत मेरेको जैसा निर्विवादरूपसे उचित, प्रकरण-संगत, युक्ति-युक्त, संतोषजनक और प्रिय मालूम दिया, वैसा ही विवेचन मैंने किया है। मेरा किसीके खण्डनका और किसीके मण्डनका भाव बिलकुल नहीं रहा है।
श्रीमद्भगवद्गीताका अर्थ बहुत ही गम्भीर है। इसका पठन-पाठन, मनन-चिन्तन और विचार करनेसे बड़े ही विचित्र और नये-नये भाव स्फुरित होते रहते हैं, जिससे मन-बुद्धि चकित होकर तृप्त हो जाते हैं। टीका लिखवाते समय जब इन भावोंको लिखवानेका विचार होता, तब एक ऐसी विचित्र बाढ़ आ जाती कि कौन-कौन-से भाव लिखवाऊँ और कैसे लिखवाऊँ—इस विषयमें अपनेको बिलकुल ही अयोग्य पाता। फिर भी मेरे जो साथी हैं, आदरणीय मित्र हैं, उनके आग्रहसे कुछ लिखवा देता। वे उन भावोंको लिख लेते और संशोधित करके उनको पुस्तकरूपसे प्रकाशित करवा देते। फिर कभी उन पुस्तकोंको देखनेका काम पड़ता तो उनमें कई जगह कर्मियाँ मालूम देतीं और ऐसा मालूम देता कि पूरी बातें नहीं आयीं हैं, बहुत-सी बातें छूट गयीं हैं! इसलिये उनमें बार-बार संशोधन-परिवर्धन किया जाता रहा। अतः पाठकोंसे प्रार्थना है कि वे पहले लिखे गये विषयकी अपेक्षा बादमें लिखे गये विषयको ही महत्त्व दें और उसीको स्वीकार करें।
पूरी गीताकी टीकाके अलग-अलग कई खण्ड रहनेसे
उनके पुनर्मूद्रणमें और उन सबके एक साथ प्राप्त होनेमें कठिनाई रहती है—ऐसा सोचकर अब पूरी गीताकी टीकाको एक जिल्दमें प्रस्तुत ग्रन्थके रूपमें प्रकाशित किया गया है। ऐसा करनेसे पहले पूर्व-प्रकाशित सम्पूर्ण टीकाको एक बार पुनः देखा है और उसमें आवश्यक संशोधन, परिवर्तन और परिवर्धन भी किया है। तेरहवें और चौदहवें अध्यायकी व्याख्या भी दुबारा लिखवायी गयी है। भाषा और शैलीको भी लगभग एक समान बनानेकी चेष्टा की गयी है। कई बातोंको अनावश्यक समझकर हटा दिया है, कई नयी बातें जोड़ दी हैं और कई बातोंको एक स्थानसे हटाकर दूसरे यथोचित स्थानपर दे दिया है। जिन बातोंकी ज्यादा पुनरुक्तियाँ हुई हैं, उनको यथासम्भव हटा दिया है, पर सर्वथा नहीं। विशेष ध्यान देनेयोग्य बातोंकी पुनरुक्तियोंको साधकोंके लिये उपयोगी समझकर नहीं हटाया है। इस कार्यमें बहुत-सी भूलें भी हो सकती हैं, जिसके लिये मेरी पाठकोंसे करबद्ध क्षमा-याचना है। साथ ही पाठकोंसे यह प्रार्थना है कि उनको जो भूलें दिखायी दें, उनको वे सूचित करनेकी कृपा करें। इससे आगेके संस्करणमें उनका सुधार करनेमें सुविधा रहेगी।
गीतासे सम्बन्धित कई नये-नये विषयोंका, खोजपूर्ण निबन्धोंका एक संग्रह अलगसे तैयार किया गया है, जिसको ‘गीता-दर्पण’ नामसे प्रकाशित किया गया है।
गीताका मनन-विचार करनेसे और गीताकी टीका लिखवानेसे मुझे बहुत आध्यात्मिक लाभ हुआ है और गीताके विषयका बहुत स्पष्ट बोध भी हुआ है। दूसरे भाई-बहन भी यदि इसका मनन करेंगे, तो उनको भी आध्यात्मिक लाभ अवश्य होगा—ऐसी मेरी व्यक्तिगत धारणा है। गीताका मनन-विचार करनेसे लाभ होता है—इसमें मुझे कभी किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है।
कृष्णानुग्रहदायिका सकरुणा गीता समाराधिता
कर्मज्ञानविरागभक्तिरसिका मर्मार्थसंदर्शिका।
सोल्कण्ठ किल साधकैरनुदिनं पेपीयमाना सदा
कल्याणं परदेवतेव दिशती संजीवनी वर्धताम्॥*
विनीत—
स्वामी रामसुखदास
- कर्म, ज्ञान, वैराग्य और भक्तिके रससे परिपूर्ण इस करुणामयी गीताकी भलीभाँति उपासना की जाय (मनन किया जाय, अर्थको गहराईसे समझा जाय) तो यह भगवान् श्रीकृष्णकी कृपा प्रदान करनेवाली है। साधकोंके द्वारा उल्कण्ठापूर्वक सदा बार-बार पान की जानेवाली, गीताके पदोंका मार्मिक अर्थ दिखानेवाली और इष्टदेवके समान कल्याण प्रदान करनेवाली यह ‘साधक-संजीवनी’ निरन्तर वृद्धिको प्राप्त हो।