श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
श्रीमद्भगवद्गीता
(साधक-संजीवनी हिन्दी-टीकासहित)
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपिस्थजम्बूलकचारुभक्षणम्। उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्।१ ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा तन्निर्गुणं निष्क्रियं ज्योतिः किंचन योगिनो यदि परं पश्यन्ति पश्यन्तु ते। अस्माकं तु तदेव लोचनचमत्काराय भूयाच्चिरं कालिन्दीपुलिनोदरे किमपि यनीलं महो धावति।२ यावनिर्ऋजनमजं पुरुषं जरन्तं संचित्तयामि निखिले जगति स्फुरन्तम्। तावद् बलात् स्फुरति हन्त हृदन्तरे मे गोपस्य कोऽपि शिशुरऋजनपुञ्जमञ्जुः।३
१-जो गजके मुखवाले हैं, भूतगण आदिके द्वारा सेवित हैं, कैथ और जामुनके फलोंका बड़े सुन्दर ढंगसे भक्षण करनेवाले हैं, शोकका विनाश करनेवाले हैं और भगवती उमाके पुत्र हैं, उन विघ्नेश्वर गणेशजीके चरणकमलोंमें मैं प्रणाम करता हूँ।
२-योगीलोग ध्यानद्वारा वशीभूत मनसे किसी निर्गुण और निष्क्रिय परम ज्योतिको देखते हैं तो देखते रहें, पर हमारे लिये तो यमुनाके तटपर जो कोई नील तेज दौड़ रहा है, वही नेत्रोंमें चिरकालतक चकाचौंध पैदा करता रहे।
३-अहो! जब मैं सम्पूर्ण जगत्में स्फुरित होनेवाले निरंजन, अजन्मा और पुरातन पुरुषका चिन्तन करता हूँ, तब मेरे हृदयमें अंजनसमूहके समान काले वर्णवाला कोई गोपशिशु बलात् स्फुरित होने लगता है।