श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 236, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ३२ ]
- साधक-संजीवनी *
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स्वामी मानते हुए साधकको संसारमें सेवककी तरह रहना चाहिये। सेवक अपने स्वामीके समस्त कार्य करते हुए भी अपनेको कभी स्वामी नहीं मानता। अतः साधकको शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ आदिको अपना न मानकर केवल भगवान्का मानते हुए अपने कर्तव्यका पालन कर देना चाहिये; कर्म करनेमें निमित्तमात्र बन जाना चाहिये। अपनेमें स्वामीपनेका अभिमान नहीं करना चाहिये।
सर्वस्व भगवदर्पण करनेके बाद लाभ-हानि, मान-अपमान, सुख-दुःख आदि जो कुछ आये, उनको भी साधक भगवान्का ही माने और उनसे अपना कोई प्रयोजन न रखे। कर्तव्यमात्र प्राप्त परिस्थितिके अनुरूप होता है। परिस्थितिके अनुरूप प्रसन्नतापूर्वक अपने
परिशिष्ट भाव —भगवान्का मत ही वास्तविक और सर्वोपरि 'सिद्धान्त' है, जिसके अन्तर्गत सभी मत-मतान्तर आ जाते हैं। परन्तु भगवान् अभिमान न करके बड़ी सरलतासे, नम्रतासे अपने सिद्धान्तको 'मत' नामसे कहते हैं। तात्पर्य है कि भगवान्ने अपने अथवा दूसरे किसीके भी मतका आग्रह नहीं रखा है, प्रत्युत निष्पक्ष होकर अपनी बात सामने रखी है।
मत सर्वोपरि नहीं होता, प्रत्युत व्यक्तिगत होता है। हरेक व्यक्ति अपना-अपना मत प्रकट कर सकता है; परन्तु सिद्धान्त सर्वोपरि होता है, जो सबको मानना पड़ता है। इसलिये गुरु-शिष्यमें भी मतभेद तो हो सकता है, पर सिद्धान्तभेद नहीं हो सकता। ऋषि-मुनि, दार्शनिक अपने-अपने मतको भी 'सिद्धान्त' नामसे कहते हैं; परन्तु गीतामें भगवान् अपने सिद्धान्तको भी 'मत' नामसे कहते हैं। ऋषि-मुनि, दार्शनिक, आचार्य आदिके मतोंमें तो भेद (मतभेद) रहता है, पर भगवान्के मत अर्थात् सिद्धान्तमें कोई मतभेद नहीं है।
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३२ ॥
| तु | = परन्तु | हुए | अचेतसः | = (और) अविवेकी |
|---|---|---|---|---|
| ये | = जो मनुष्य | न, अनुतिष्ठन्ति | = (इसका) अनुष्ठान | मनुष्योंको |
| मे | = मेरे | नहीं करते, | नष्टान् | = नष्ट हुए (ही) |
| एतद् | = इस | तान् | = उन | विद्धि |
| मतम् | = मतमें | सर्वज्ञानविमूढान् | = सम्पूर्ण ज्ञानोंमें | उनका पतन ही |
| अभ्यसूयन्तः | = दोष-दृष्टि करते | मोहित | होता है। |
व्याख्या —'ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्'—तीसवें श्लोकमें वर्णित सिद्धान्तके अनुसार चलनेवालोंके लाभका वर्णन इकतीसवें श्लोकमें करनेके बाद इस सिद्धान्तके अनुसार न चलनेवालोंकी पृथक्ता करनेहेतु यहाँ 'तु' पदका प्रयोग हुआ है।
जैसे संसारमें सभी स्वार्थी मनुष्य चाहते हैं कि हमें ही सब पदार्थ मिलें, हमें ही लाभ हो, ऐसे ही भगवान् भी चाहते हैं कि समस्त कर्मोंको मेरे ही अर्पण किया जाय, मेरेको ही स्वामी माना जाय—इस प्रकार मानना 'भगवान्' पर दोषारोपण करना है।
कर्तव्यका पालन करता रहे। यही भगवान्के मतका सदा अनुसरण करना है।
'मुच्यन्ते तेषपि कर्मभिः' —भगवान् अर्जुनसे मानो यह कहते हैं कि मैं तुम्हें तो सर्वस्व मेरे अर्पण करके कर्तव्य-कर्म करनेकी स्पष्ट आज्ञा दे रहा हूँ, अतः मेरी आज्ञाका पालन करनेसे तुम्हारे मुक्त होनेमें कोई सन्देह नहीं है; परन्तु जिनको मैं इस प्रकार स्पष्ट आज्ञा नहीं देता हूँ, वे भी अगर इस मत-(मिले हुएको अपना न मानकर कर्तव्य-कर्मका पालन करना) के अनुसार चलेंगे, तो वे भी मुक्त हो जायेंगे। कारण कि यह मत ही ऐसा है कि चाहे मुझे माने या न माने, केवल इस मतका पालन करनेसे ही मनुष्य मुक्त हो जाता है।
कामनाके बिना संसारका कार्य कैसे चलेगा? ममताका सर्वथा त्याग तो हो ही नहीं सकता; राग-द्वेषादि विकारोंसे रहित होना असम्भव है—इस प्रकार मानना भगवान्के 'मत' पर दोषारोपण करना है।
भोग और संग्रहकी इच्छावाले जो मनुष्य शरीरादि पदार्थोंको अपने और अपने लिये मानते हैं और समस्त कर्म अपने लिये ही करते हैं, वे भगवान्के मतके अनुसार नहीं चलते।
'सर्वज्ञानविमूढान् तान्' —जो मनुष्य भगवान्के मतका अनुसरण नहीं करते, वे सब प्रकारके सांसारिक
कामनाके बिना संसारका कार्य कैसे चलेगा? ममताका
सर्वथा त्याग तो हो ही नहीं सकता; राग-द्वेषादि विकारोंसे
रहित होना असम्भव है—इस प्रकार मानना भगवान्के
'मत' पर दोषारोपण करना है।
भोग और संग्रहकी इच्छावाले जो मनुष्य शरीरादि
पदार्थोंको अपने और अपने लिये मानते हैं और समस्त
कर्म अपने लिये ही करते हैं, वे भगवान्के मतके अनुसार
नहीं चलते।
'सर्वज्ञानविमूढान् तान्' —जो मनुष्य भगवान्के
मतका अनुसरण नहीं करते, वे सब प्रकारके सांसारिक