श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
ज्ञानों-(विद्याओं, कलाओं आदि-) में मोहित रहते हैं। वे मोटर, हवाई जहाज, रेडियो, टेलीविजन आदि आविष्कारोंमें, उनके कला-कौशलको जाननेमें तथा नये-नये आविष्कार करनेमें ही रचे-पचे रहते हैं। जलपर तैरने, मकान आदि बनाने, चित्रकारी करने आदि शिल्प-कलाओंमें; मन्त्र, तन्त्र, यन्त्र आदिकी जानकारी प्राप्त करनेमें तथा उनके द्वारा विलक्षण-विलक्षण चमत्कार दिखानेमें, देश-विदेशकी भाषाओं, लिपियों, रीति-रिवाजों, खान-पान आदिकी जानकारी प्राप्त करनेमें ही वे लगे रहते हैं। जो कुछ है, वह यही है—ऐसा उनका निश्चय होता है (गीता—सोलहवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। ऐसे लोगोंको यहाँ सम्पूर्ण ज्ञानोंमें मोहित कहा गया है।
‘अचेतसः’ —भगवान्के मतका अनुसरण न करने-वाले मनुष्योंमें सत्-असत्, सार-असार, धर्म-अधर्म, बन्धन-मोक्ष आदि पारमार्थिक बातोंका भी ज्ञान (विवेक) नहीं होता। उनमें चेतनता नहीं होती, वे पशुकी तरह बेहोश रहते हैं। वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञानवाले विश्विप्ताचित मूढ़ पुरुष होते हैं—‘मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः’ (गीता ९।१२)।
‘विद्धि नष्टान्’ —मनुष्य-शरीरको पाकर भी जो भगवान्के मतके अनुसार नहीं चलते, उन मनुष्योंको नष्ट हुए ही समझना चाहिये। तात्पर्य है कि वे मनुष्य जन्म-मरणके चक्रमें ही पड़े रहेंगे।
मनुष्यजीवनमें अन्तकालतक मुक्तिकी सम्भावना रहती है (गीता—आठवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। अतः जो मनुष्य वर्तमानमें भगवान्के मतका अनुसरण नहीं करते, वे भी भविष्यमें सत्संग आदिके प्रभावसे भगवान्के मतका अनुसरण कर सकते हैं, जिससे उनकी मुक्ति हो सकती है।
परन्तु यदि उन मनुष्योंका भाव जैसा वर्तमानमें है, वैसा ही भविष्यमें भी बना रहा तो उन्हें (भगवत्प्राप्तिसे वंचित रह जानेके कारण) नष्ट हुए ही समझना चाहिये। इसी कारण भगवान्ने ऐसे मनुष्योंके लिये ‘नष्टान् विद्धि’ पदोंका प्रयोग किया है।
भगवान्के मतका अनुसरण न करनेवाला मनुष्य समस्त कर्म राग अथवा द्वेषपूर्वक करता है। राग और द्वेष—दोनों ही मनुष्यके महान् शत्रु हैं—‘तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ’ (गीता ३।३४)। नाशवान् होनेके कारण पदार्थ और कर्म तो सदा साथ नहीं रहते, पर राग-द्वेषपूर्वक कर्म करनेसे मनुष्य तादात्म्य, ममता और कामनासे आबद्ध होकर बार-बार नीच योनियों और नरकोंको प्राप्त होता रहता है। इसीलिये भगवान्ने ऐसे मनुष्योंको नष्ट हुए ही समझनेकी बात कही है।
इकतीसवें और बत्तीसवें—दोनों श्लोकोंमें भगवान्ने कहा है कि मेरे सिद्धान्तके अनुसार चलनेवाले मनुष्य कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं और न चलनेवाले मनुष्योंका पतन हो जाता है। इससे यह तात्पर्य निकलता है कि मनुष्य भगवान्को माने या न माने, इसमें भगवान्का कोई आग्रह नहीं है; परन्तु उसे भगवान्के मत-(सिद्धान्त-) का पालन अवश्य करना चाहिये—इसमें भगवान्की आज्ञा है। अगर वह ऐसा नहीं करेगा तो उसका पतन अवश्य हो जायगा। हाँ, यदि साधक भगवान्को मानकर उनके मतका अनुष्ठान करे तो भगवान् उसे अपने-आपको दे देंगे। परन्तु यदि भगवान्को न मानकर केवल उनके मतका अनुष्ठान करे तो भगवान् उसका उद्धार कर देंगे। तात्पर्य यह है कि भगवान्को माननेवालेको ‘प्रेम’की प्राप्ति और भगवान्का मत माननेवालेको ‘मुक्ति’की प्राप्ति होती है।
सम्बन्ध—भगवान्के मतके अनुसार कर्म न करनेसे मनुष्यका पतन हो जाता है—ऐसा क्यों है? इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि। प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३३ ॥
| भूतानि | = सम्पूर्ण प्राणी | स्वस्याः | = अपनी | निग्रहः | = (फिर इसमें |
|---|---|---|---|---|---|
| प्रकृतिम् | = प्रकृतिको | प्रकृतेः | = प्रकृतिके | किसीका) | |
| यान्ति | = प्राप्त होते हैं। | सदृशम् | = अनुसार | हठ | |
| ज्ञानवान् | = ज्ञानी महापुरुष | चेष्टते | = चेष्टा करता | किम् | = क्या |
| अपि | = भी | है। | करिष्यति | = करेगा ? |