भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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लोक ४२-४३ ]

  • साधक-संजीवनी *

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जड़में सुखी-दुःखी होना नहीं बनता। तात्पर्य यह है कि 'अहम्' में जो जड़-अंश है, उसके साथ तादात्म्य कर लेनेसे चेतन भी अपनेको 'मैं भोक्ता हूँ' ऐसा मान लेता है। परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार होते ही रसबुद्धि निवृत्त हो जाती है—'रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते' (गीता २।५९)। इसमें 'अस्य' पद भोक्ता बने हुए 'अहम्' का वाचक है और जो भोक्तापनसे निर्लिप्त तत्त्व है, उस परमात्माका वाचक 'परम' पद है। उसके ज्ञानसे रस अर्थात् 'काम' निवृत्त हो जाता है। कारण कि सुखके लिये ही कामना होती है और स्वरूप सहजसुखराशि है। इसलिये परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार होनेसे 'काम' (संयोगजन्य सुखकी इच्छा) सर्वदा और सर्वथा मिट जाता है।

मार्मिक बात

स्थूलशरीर 'विषय' है, इन्द्रियाँ 'बहिःकरण' हैं और मन-बुद्धि 'अन्तःकरण' हैं। स्थूलशरीरसे इन्द्रियाँ पर (श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक और सूक्ष्म) हैं तथा इन्द्रियोंसे बुद्धि पर है। बुद्धिसे भी पर 'अहम्' है, जो कर्ता है। उस 'अहम्'-(कर्ता-) में 'काम' अर्थात् लौकिक इच्छा रहती है।

अपनी सत्ता (होनापन) अर्थात् अपना स्वरूप चेतन, निर्विचार और सत्-चित्-आनन्दरूप है। जब वह जड़-(प्रकृतिजन्य शरीर-) के साथ तादात्म्य कर लेता है, तब 'अहम्' उत्पन्न होता है और स्वरूप 'कर्ता' बन जाता है। इस प्रकार कर्तामें एक जड़-अंश होता है और एक चेतन-अंश। जड़-अंशकी मुख्यतासे संसारकी तरफ और चेतन-अंशकी मुख्यतासे परमात्माकी तरफ आकर्षण होता है*। तात्पर्य यह है कि उसमें जड़-अंशकी प्रधानतासे लौकिक (संसारकी) इच्छाएँ रहती हैं और चेतन-अंशकी प्रधानतासे पारमार्थिक (परमात्माकी) इच्छा रहती है। जड़-अंश मिटनेवाला है, इसलिये लौकिक इच्छाएँ मिटनेवाली हैं और चेतन-अंश सदा रहनेवाला है, इसलिये पारमार्थिक इच्छा पूरी होनेवाली है। इसलिये लौकिक इच्छाओं-

(कामनाओं-) की निवृत्ति और पारमार्थिक इच्छा-(संसारसे छूटनेकी इच्छा, स्वरूपबोधकी जिज्ञासा और भगवत्प्रेमकी अभिलाषा-) की पूर्ति होती है। लौकिक इच्छाएँ उत्पन्न हो सकती हैं, पर टिक नहीं सकतीं। परन्तु पारमार्थिक इच्छा दब सकती है, पर मिट नहीं सकती। कारण कि लौकिक इच्छाएँ अवास्तविक और पारमार्थिक इच्छा वास्तविक है। इसलिये साधकको न तो लौकिक इच्छाओंकी पूर्तिकी आशा रखनी चाहिये और न पारमार्थिक इच्छाकी पूर्तिसे निराश ही होना चाहिये।

वस्तुतः मूलमें इच्छा एक ही है, जो अपने अंशी परमात्माकी है। परन्तु जड़के सम्बन्धसे इस इच्छाके दो भेद हो जाते हैं और मनुष्य अपनी वास्तविक इच्छाकी पूर्ति परिवर्तनशील जड़-(संसार-) के द्वारा करनेके लिये जड़-पदार्थोंकी इच्छाएँ करने लगता है, जो उसकी भूल है। कारण कि लौकिक इच्छाएँ 'परधर्म' और पारमार्थिक इच्छा 'स्वधर्म' है। परन्तु साधकमें लौकिक और पारमार्थिक—दोनों इच्छाएँ रहनेसे द्वन्द्व पैदा हो जाता है। द्वन्द्व होनेसे साधकमें भजन, ध्यान, सत्संग आदिके समय तो पारमार्थिक इच्छा जाग्रत् रहती है, पर अन्य समयमें उसकी पारमार्थिक इच्छा दब जाती है और लौकिक (भोग एवं संग्रहकी) इच्छाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। लौकिक इच्छाओंके रहते हुए साधकमें साधन करनेका एक निश्चय स्थिर नहीं रह सकता। पारमार्थिक इच्छा जाग्रत् हुए बिना साधककी उन्नति नहीं होती। जब साधकका एकमात्र परमात्मप्राप्ति करनेका दृढ़ उद्देश्य हो जाता है, तब यह द्वन्द्व मिट जाता है और साधकमें एक पारमार्थिक इच्छा ही प्रबल रह जाती है। एक ही पारमार्थिक इच्छा प्रबल रहनेसे साधक सुगमतापूर्वक परमात्मप्राप्ति कर लेता है (गीता—पाँचवें अध्यायका तीसरा श्लोक)। इसलिये लौकिक और पारमार्थिक इच्छाका द्वन्द्व मिटाना साधकके लिये बहुत आवश्यक है।

शुद्ध स्वरूपमें अपने अंशी परमात्माकी ओर स्वतः एक आकर्षण या रुचि विद्यमान रहती है, जिसको 'प्रेम' कहते

  • जड़-चेतनके तादात्म्य और आकर्षणको समझनेके लिये एक दृष्टान्त दिया जाता है। चार कोनोंवाले किसी लोहेका अगिन्से तादात्म्य अर्थात् सम्बन्ध होनेपर लोहेमें जलानेकी शक्ति न होनेपर भी वह जलानेवाला हो जाता है; और अगिन चार कोनोंवाली न होनेपर भी चार कोनोंवाली हो जाती है। अगिन्से तादात्म्य होनेपर भी चुम्बककी ओर लोहा ही आकर्षित होता है, अगिन नहीं; क्योंकि चुम्बकके साथ लोहेकी सजातीयता है। अगिन अपने सजातीय निराकार अगिन-तत्त्वकी ओर ही आकर्षित होती है, इसलिये वह स्वतः शान्त हो जाती है। इसी प्रकार जड़ और चेतनके तादात्म्यमें जड़-अंश संसारकी ओर एवं चेतन-अंश परमात्माकी ओर आकर्षित होता है। चेतन-अंशके परमात्माकी ओर आकृष्ट होनेपर जड़-अंश छूट जाता है; क्योंकि जड़ अनित्य है। परन्तु जड़-अंशके संसारकी ओर आकृष्ट होनेपर भी चेतन-अंश नहीं छूटता; क्योंकि चेतन नित्य है।