श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
है। जब वह संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब वह 'प्रेम' दब जाता है और 'काम' उत्पन्न हो जाता है। जबतक 'काम' रहता है, तबतक 'प्रेम' जाग्रत् नहीं होता। जबतक 'प्रेम' जाग्रत् नहीं होता, तबतक 'काम' का सर्वथा नाश नहीं होता। जड-अंशकी मुख्यतासे जिसमें सांसारिक भोगोंकी इच्छा (काम) रहती है, उसीमें चेतन-अंशकी मुख्यतासे परमात्माकी इच्छा भी रहती है। अतः वास्तवमें 'काम' का निवास जड-अंशमें ही है, पर वह भी चेतनके सम्बन्धसे ही है। चेतनका सम्बन्ध छूटते ही 'काम' का नाश हो जाता है। तात्पर्य यह हुआ कि चेतनद्वारा जडसे सम्बन्ध-विच्छेद करते ही जड-चेतनके तादात्म्यरूप 'अहम्' का नाश हो जाता है और 'अहम्' का नाश होते ही 'काम' भी नष्ट हो जाता है।
'अहम्'में जो जड-अंश है, उसमें 'काम' रहता है—इसकी प्रबल युक्ति यह है कि दृश्यरूपसे दीखनेवाला संसार, उसे देखनेवाली इन्द्रियाँ तथा बुद्धि और उसे देखनेवाला स्वयं भोक्ता—इन तीनोंमें जातीय (धातुगत) एकताके बिना भोक्ताका भोग्यकी ओर आकर्षण हो ही नहीं सकता। कारण कि आकर्षण सजातीयतामें ही होता है, विजातीयतामें नहीं; जैसे—नेत्रोंका रूपके प्रति ही आकर्षण होता है, शब्दके प्रति नहीं। यही बात सब इन्द्रियोंमें लागू होती है। बुद्धिका भी समझनेके विषय-(विवेक-विचार-) में आकर्षण होता है, शब्दादि विषयोंमें नहीं (यदि होता है तो इन्द्रियोंको साथमें लेनेसे ही होता है)। ऐसे ही स्वयं-(चेतन-) की परमात्मासे तात्त्विक एकता है, इसलिये 'स्वयं' का परमात्माकी ओर आकर्षण होता है। यह तात्त्विक एकता जड-अंशका सर्वथा त्याग करनेसे अर्थात् जडसे माने हुए सम्बन्धका सर्वथा विच्छेद करनेसे ही अनुभवमें आती है। अनुभवमें आते ही 'प्रेम' जाग्रत् हो जाता है। प्रेममें जडता-(असत्-) का अंश भी शेष नहीं रहता अर्थात् जडताका अत्यन्त अभाव हो जाता है।
प्रकृतिके कार्य महत्त्व-(समष्टि बुद्धि-) का अत्यन्त सूक्ष्म अंश 'कारणशरीर' ही 'अहम्' का जड-अंश है। इस कारणशरीरमें ही 'काम' रहता है। कारणशरीरके तादात्म्यसे 'काम' स्वयंमें दीखता है। तादात्म्य मिटनेपर जिसमें 'काम' का लेश भी नहीं है, ऐसे अपने शुद्ध स्वरूपका अनुभव हो जाता है। स्वरूपका अनुभव हो जानेपर 'काम' सर्वथा निवृत्त हो जाता है।
'एवं बुद्धेः परं बुद्ध्या'—पहले शरीरसे पर इन्द्रियाँ,
इन्द्रियोंसे पर मन, मनसे पर बुद्धि और बुद्धिसे पर 'काम' को बताया गया। अब उपर्युक्त पदोंमें बुद्धिसे पर 'काम' को जाननेके लिये कहनेका अभिप्राय यह है कि यह 'काम' 'अहम्'में रहता है। अपने वास्तविक स्वरूपमें 'काम' नहीं है। यदि स्वरूपमें 'काम' होता तो कभी मिटता नहीं। नाशवान् जडके साथ तादात्म्य कर लेनेसे ही 'काम' उत्पन्न होता है। तादात्म्यमें भी 'काम' रहता तो जडमें ही है, पर दीखता है स्वरूपमें। इसलिये बुद्धिसे पर रहनेवाले इस 'काम'को जानकर उसका नाश कर देना चाहिये।
'संतस्थात्मानमात्मना'—बुद्धिसे पर 'अहम्' में रहनेवाले 'काम'को मारनेका उपाय है—अपने द्वारा अपने-आपको वशमें करना अर्थात् अपना सम्बन्ध केवल अपने शुद्ध स्वरूपके साथ अथवा अपने अंशी भगवान्के साथ रखना, जो वास्तवमें है। छठे अध्यायके पाँचवें श्लोकमें 'उद्धरेदात्मनात्मानम्' पदसे और छठे श्लोकमें 'येनात्यैवात्मना जितः' पदोंसे भी यही बात कही गयी है।
स्वरूप (स्वयं) साक्षात् परमात्माका अंश है और शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि संसारके अंश हैं। जब स्वरूप अपने अंशी परमात्मासे विमुख होकर प्रकृति-(संसार-) के सम्मुख हो जाता है, तब उसमें कामनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। कामनाएँ अभावसे उत्पन्न होती हैं और अभाव संसारके सम्बन्धसे होता है; क्योंकि संसार अभावरूप ही है—'नासतो विद्यते भावः' (गीता २।१६)। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होते ही कामनाओंका नाश हो जाता है; क्योंकि स्वरूपमें अभाव नहीं है—'नाभावो विद्यते सतः' (गीता २।१६)।
परमात्मासे विमुख होकर संसारसे अपना सम्बन्ध माननेपर भी जीवकी वास्तविक इच्छा (आवश्यकता या भूख) अपने अंशी परमात्माको प्राप्त करनेकी ही होती है। 'मैं सदा जीता रहूँ; मैं सब कुछ जान जाऊँ; मैं सदाके लिये सुखी हो जाऊँ'—इस रूपमें वह वास्तवमें सत्-चित्-आनन्द-स्वरूप परमात्माकी ही इच्छा करता है, पर संसारसे सम्बन्ध माननेके कारण वह भूलसे इन इच्छाओंको संसारसे ही पूरी करना चाहता है—यही 'काम' है। इस 'काम'की पूर्ति तो कभी हो ही नहीं सकती। इसलिये इस 'काम'का नाश तो करना ही पड़ेगा।
जिसने संसारसे अपना सम्बन्ध जोड़ा है, वही उसे तोड़ भी सकता है। इसलिये भगवान्ने अपने द्वारा ही संसारसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद करके 'काम' को मारनेकी आज्ञा दी है।