श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 274, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः
अवतरणिका—
श्रीभगवान्ने दूसरे अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकमें अर्जुनसे कहा कि ज्ञानयोगमें अपने विवेकके अनुसार विचारपूर्वक चलनेसे जिस समबुद्धिकी प्राप्ति होती है, उसीको तु कर्मयोगके विषयमें सुन अर्थात् कर्मयोगमें निष्कामभावपूर्वक परिहातर्थ कर्तव्य-कर्म करनेसे यह समबुद्धि कैसे प्राप्त होती है, इसे सुन—‘एषा तेऽभिहिता साइष्ये बुद्धियोगे त्विमां शृणु।’ फिर कर्मयोगका वर्णन करते हुए प्रसंगानुसार अर्जुनके प्रश्न करनेपर स्थितप्रज्ञके लक्षण बताकर अध्यायका विषय समाप्त किया।
तीसरे अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने प्रश्न किया कि आपके मतमें जब बुद्धि श्रेष्ठ मान्य है, तो फिर आप मुझे घोर कर्म-(युद्ध-) में क्यों लगाते हैं? इसके उत्तरमें भगवान्ने चौथे श्लोकसे उन्तीसवें श्लोकतक विविध प्रकारसे कर्तव्य-कर्म करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन करते हुए सिद्ध किया कि कर्तव्य-कर्म करनेसे ही समबुद्धि प्राप्त होती है। फिर तीसवें श्लोकमें भगवन्निष्ठाके अनुसार कर्तव्य-कर्म करनेकी विशेष विधि बतायी कि विवेकपूर्वक सम्पूर्ण कर्मोंको मेरे अर्पण करके तथा निष्काम, निर्मम और निःसन्ताप होकर शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्मोंको करना चाहिये। कर्तव्य-कर्म करनेकी इस विधिको ‘अपना मत’ कहते हुए भगवान्ने इकतीसवें-बत्तीसवें श्लोकोंमें अन्वय और व्यतिरेक विधिसे अपने इस मतकी पुष्टि की तथा पैंतीसवें श्लोकमें इस विधिके पालनपर विशेष जोर देते हुए कहा कि अपने कर्तव्यका पालन करते हुए मरना भी श्रेयस्कर है—‘स्वधर्मं निधनं श्रेयः।’ इसपर अर्जुनने छत्तीसवें श्लोकमें प्रश्न किया कि मनुष्य न चाहते हुए भी किससे प्रेरित होकर पाप (अकर्तव्य) कर बैठता है? इसके उत्तरमें भगवान्ने ‘काम’ अर्थात् कामनाको ही सारे पापों, अनर्थोंका हेतु बताकर अन्तमें कामरूप शत्रुको मार डालनेकी आज्ञा दी।
यद्यपि तीसरे अध्यायके सैंतीसवें श्लोकसे भगवान् लगातार उपदेश दे रहे हैं, तथापि तैंतालीसवें श्लोकमें अर्जुनके प्रश्नका उत्तर समाप्त होनेपर महर्षि वेदव्यासजी तीसरे अध्यायकी समाप्ति कर देते हैं और नया (चौथा) अध्याय आरम्भ कर देते हैं। इससे ऐसा मालूम देता है कि अर्जुनके प्रश्नका उत्तर समाप्त होनेपर भगवान् कुछ समयके लिये रुक जाते हैं; फिर दूसरे अध्यायके सैंतालीसवें-अड़तालीसवें श्लोकोंसे जिस कर्मयोगका विषय चल रहा था, उसीको चौथे अध्यायके पहले श्लोकमें ‘इमम्’ पदसे पुनः आरम्भ करते हैं। अतः चौथा अध्याय तीसरे अध्यायका ही परिशिष्ट माना जाता है।
कर्मयोगमें दो बातें मुख्य हैं—१—कर्तव्य-कर्मोंका आचरण और २—कर्तव्य-कर्मोंके विषयमें विशेष जानकारी। अर्जुन कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करना चाहते हैं, इसीलिये तीसरे अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने कहते हैं कि आप मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं? अतः तीसरे अध्यायमें तो भगवान् अनेक प्रकारसे कर्तव्य-कर्मोंके आचरणकी आवश्यकतापर विशेष जोर देते हैं और साथ ही कर्मयोगको समझनेकी तात्त्विक बातें भी कहते हैं; परन्तु इस चौथे अध्यायमें कर्मयोगकी तात्त्विक बातोंको समझनेपर विशेष जोर देते हुए कर्तव्य-कर्मोंका पालन करना आवश्यक बताते हैं। तात्पर्य यह है कि तीसरे और चौथे—दोनों ही अध्यायोंमें उपर्युक्त दोनों बातें कही गयी हैं; किन्तु तीसरे अध्यायमें कर्तव्य-कर्मोंके आचरणकी बात मुख्य है और चौथे अध्यायमें कर्तव्य-कर्मोंके विषयमें समझ-(जानकारी-) की बात मुख्य है—‘तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्’ (४।१६)।
जो कर्मयोग अनादि होते हुए भी इस भूमण्डलपर जाननेवाले विशेष पुरुषके न रहनेसे बहुत कालसे लुप्तप्राय हो गया था, उसी कर्मयोगका वर्णन पुनः आरम्भ करते हुए भगवान् पहले तीन श्लोकोंमें कर्मयोगकी परम्परा बताकर उसकी अनादिता सिद्ध करते हैं।