श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः
अवतरणिका—
श्रीभगवान्ने दूसरे अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकमें अर्जुनसे कहा कि ज्ञानयोगमें अपने विवेकके अनुसार विचारपूर्वक चलनेसे जिस समबुद्धिकी प्राप्ति होती है, उसीको तु कर्मयोगके विषयमें सुन अर्थात् कर्मयोगमें निष्कामभावपूर्वक परिहातर्थ कर्तव्य-कर्म करनेसे यह समबुद्धि कैसे प्राप्त होती है, इसे सुन—‘एषा तेऽभिहिता साइष्ये बुद्धियोगे त्विमां शृणु।’ फिर कर्मयोगका वर्णन करते हुए प्रसंगानुसार अर्जुनके प्रश्न करनेपर स्थितप्रज्ञके लक्षण बताकर अध्यायका विषय समाप्त किया।
तीसरे अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने प्रश्न किया कि आपके मतमें जब बुद्धि श्रेष्ठ मान्य है, तो फिर आप मुझे घोर कर्म-(युद्ध-) में क्यों लगाते हैं? इसके उत्तरमें भगवान्ने चौथे श्लोकसे उन्तीसवें श्लोकतक विविध प्रकारसे कर्तव्य-कर्म करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन करते हुए सिद्ध किया कि कर्तव्य-कर्म करनेसे ही समबुद्धि प्राप्त होती है। फिर तीसवें श्लोकमें भगवन्निष्ठाके अनुसार कर्तव्य-कर्म करनेकी विशेष विधि बतायी कि विवेकपूर्वक सम्पूर्ण कर्मोंको मेरे अर्पण करके तथा निष्काम, निर्मम और निःसन्ताप होकर शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्मोंको करना चाहिये। कर्तव्य-कर्म करनेकी इस विधिको ‘अपना मत’ कहते हुए भगवान्ने इकतीसवें-बत्तीसवें श्लोकोंमें अन्वय और व्यतिरेक विधिसे अपने इस मतकी पुष्टि की तथा पैंतीसवें श्लोकमें इस विधिके पालनपर विशेष जोर देते हुए कहा कि अपने कर्तव्यका पालन करते हुए मरना भी श्रेयस्कर है—‘स्वधर्मं निधनं श्रेयः।’ इसपर अर्जुनने छत्तीसवें श्लोकमें प्रश्न किया कि मनुष्य न चाहते हुए भी किससे प्रेरित होकर पाप (अकर्तव्य) कर बैठता है? इसके उत्तरमें भगवान्ने ‘काम’ अर्थात् कामनाको ही सारे पापों, अनर्थोंका हेतु बताकर अन्तमें कामरूप शत्रुको मार डालनेकी आज्ञा दी।
यद्यपि तीसरे अध्यायके सैंतीसवें श्लोकसे भगवान् लगातार उपदेश दे रहे हैं, तथापि तैंतालीसवें श्लोकमें अर्जुनके प्रश्नका उत्तर समाप्त होनेपर महर्षि वेदव्यासजी तीसरे अध्यायकी समाप्ति कर देते हैं और नया (चौथा) अध्याय आरम्भ कर देते हैं। इससे ऐसा मालूम देता है कि अर्जुनके प्रश्नका उत्तर समाप्त होनेपर भगवान् कुछ समयके लिये रुक जाते हैं; फिर दूसरे अध्यायके सैंतालीसवें-अड़तालीसवें श्लोकोंसे जिस कर्मयोगका विषय चल रहा था, उसीको चौथे अध्यायके पहले श्लोकमें ‘इमम्’ पदसे पुनः आरम्भ करते हैं। अतः चौथा अध्याय तीसरे अध्यायका ही परिशिष्ट माना जाता है।
कर्मयोगमें दो बातें मुख्य हैं—१—कर्तव्य-कर्मोंका आचरण और २—कर्तव्य-कर्मोंके विषयमें विशेष जानकारी। अर्जुन कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करना चाहते हैं, इसीलिये तीसरे अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने कहते हैं कि आप मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं? अतः तीसरे अध्यायमें तो भगवान् अनेक प्रकारसे कर्तव्य-कर्मोंके आचरणकी आवश्यकतापर विशेष जोर देते हैं और साथ ही कर्मयोगको समझनेकी तात्त्विक बातें भी कहते हैं; परन्तु इस चौथे अध्यायमें कर्मयोगकी तात्त्विक बातोंको समझनेपर विशेष जोर देते हुए कर्तव्य-कर्मोंका पालन करना आवश्यक बताते हैं। तात्पर्य यह है कि तीसरे और चौथे—दोनों ही अध्यायोंमें उपर्युक्त दोनों बातें कही गयी हैं; किन्तु तीसरे अध्यायमें कर्तव्य-कर्मोंके आचरणकी बात मुख्य है और चौथे अध्यायमें कर्तव्य-कर्मोंके विषयमें समझ-(जानकारी-) की बात मुख्य है—‘तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्’ (४।१६)।
जो कर्मयोग अनादि होते हुए भी इस भूमण्डलपर जाननेवाले विशेष पुरुषके न रहनेसे बहुत कालसे लुप्तप्राय हो गया था, उसी कर्मयोगका वर्णन पुनः आरम्भ करते हुए भगवान् पहले तीन श्लोकोंमें कर्मयोगकी परम्परा बताकर उसकी अनादिता सिद्ध करते हैं।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
श्रीभगवानुवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥ १ ॥
श्रीभगवान् बोले—
| अहम् | = मैंने | विवस्वते | = सूर्यसे | प्राह | = कहा (और) |
|---|---|---|---|---|---|
| इमम् | = इस | प्रोक्तवान् | = कहा था। (फिर) | मनुः | = मनुने (अपने पुत्र) |
| अव्ययम् | = अविनाशी | विवस्वान् | = सूर्यने (अपने पुत्र) | इक्ष्वाकवे | = राजा इक्ष्वाकुसे |
| योगम् | = योग (कर्मयोग)-को | मनवे | = (वैवस्वत) मनुसे | अब्रवीत् | = कहा। |
व्याख्या—‘इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्’— भगवान्ने जिन सूर्य, मनु और इक्ष्वाकु राजाओंका उल्लेख किया है, वे सभी गृहस्थ थे और उन्होंने गृहस्थाश्रममें रहते हुए ही कर्मयोगके द्वारा परमसिद्धि प्राप्त की थी; अतः यहाँके ‘इमम्, अव्ययम्, योगम्’ पदीका तात्पर्य पूर्वप्रकरणके अनुसार तथा राजपरम्पराके अनुसार ‘कर्मयोग’ लेना ही उचित प्रतीत होता है।
यद्यपि पुराणोंमें और उपनिषदोंमें भी कर्मयोगका वर्णन आता है, तथापि वह गीतामें वर्णित कर्मयोगके समान सांगोपांग और विस्तृत नहीं है। गीतामें भगवान्ने विविध युक्तियोंसे कर्मयोगका सरल और सांगोपांग विवेचन किया है। कर्मयोगका इतना विशद वर्णन पुराणों और उपनिषदोंमें देखनेमें नहीं आता।
भगवान् नित्य हैं और उनका अंश जीवात्मा भी नित्य है तथा भगवान्के साथ जीवका सम्बन्ध भी नित्य है। अतः भगवत्प्राप्तिके सब मार्ग (योगमार्ग, ज्ञानमार्ग, भक्तिमार्ग आदि) भी नित्य हैं।* यहाँ ‘अव्ययम्’ पदसे भगवान् कर्मयोगकी नित्यताका प्रतिपादन करते हैं।
परमात्माके साथ जीवका स्वतःसिद्ध सम्बन्ध (नित्य-योग) है। जैसे पतिव्रता स्त्रीको पतिकी होनेके लिये करना कुछ नहीं पड़ता; क्योंकि वह पतिकी तो है ही, ऐसे ही साधकको परमात्माका होनेके लिये करना कुछ नहीं है, वह तो परमात्माका है ही; परन्तु अनित्य क्रिया, पदार्थ, घटना आदिके साथ जब वह अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब उसे ‘नित्ययोग’ अर्थात् परमात्माके साथ अपने नित्यसम्बन्धका अनुभव नहीं होता। अतः उस अनित्यके साथ माने हुए सम्बन्धको मिटानेके लिये कर्मयोगी शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि मिली हुई समस्त वस्तुओंको संसारकी ही
मानकर संसारकी सेवामें लगा देता है। वह मानता है कि जैसे धूलका छोटा-से-छोटा कण भी विशाल पृथ्वीका ही एक अंश है, ऐसे ही यह शरीर भी विशाल ब्रह्माण्डका ही एक अंश है। ऐसा माननेसे ‘कर्म’ तो संसारके लिये होंगे, पर ‘योग’ (नित्ययोग) अपने लिये होगा अर्थात् नित्य-योगका अनुभव हो जायगा।
भगवान् ‘विवस्वते प्रोक्तवान्’ पदोंसे साधकोंको मानो यह लक्ष्य कराते हैं कि जैसे सूर्य सदा चलते ही रहते हैं अर्थात् कर्म करते ही रहते हैं और सबको प्रकाशित करनेपर भी स्वयं निलिप्त रहते हैं, ऐसे ही साधकोंको भी प्राप्त परिस्थितिके अनुसार अपने कर्तव्य-कर्मोंका पालन स्वयं करते रहना चाहिये (गीता—तीसरे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक) और दूसरोंको भी कर्मयोगकी शिक्षा देकर लोकसंग्रह करते रहना चाहिये; पर स्वयं उनसे निलिप्त (निष्काम, निर्मम और अनासक्त) रहना चाहिये।
सृष्टिमें सूर्य सबके आदि हैं। सृष्टिकी रचनाके समय भी सूर्य जैसे पूर्वकल्पमें थे, वैसे ही प्रकट हुए—‘सूर्या-चन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्’। उन (सबके आदि) सूर्यको भगवान्ने अविनाशी कर्मयोगका उपदेश दिया। इससे सिद्ध हुआ कि भगवान् सबके आदिगुरु हैं और साथ ही कर्मयोग भी अनादि है। भगवान् अर्जुनसे मानो यह कहते हैं कि मैं तुम्हें जो कर्मयोगकी बात बता रहा हूँ, वह कोई आजकी नयी बात नहीं है। जो योग सृष्टिके आदिसे अर्थात् सदासे है, उसी योगकी बात मैं तुम्हें बता रहा हूँ।
प्रश्न— भगवान्ने सृष्टिके आदिकालमें सूर्यको कर्म-योगका उपदेश क्यों दिया?
उत्तर—(१) सृष्टिके आरम्भमें भगवान्ने सूर्यको ही कर्मयोगका वास्तविक अधिकारी जानकर उन्हें सर्वप्रथम इस
- गीताके आठवें अध्यायमें भगवान्ने शुक्ल और कृष्ण—दोनों गतियोंको भी नित्य बताया है—शुक्लकृष्ण गती होते जगतः शाश्वते मते (गीता ८। २६)।
श्लोक १ ]
- साधक-संजीवनी *
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योगका उपदेश दिया।
(२) सृष्टिमें जो सर्वप्रथम उत्पन्न होता है, उसे ही उपदेश दिया जाता है; जैसे—ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिमें प्रजाओंको उपदेश दिया (गीता—तीसरे अध्यायका दसवाँ श्लोक)। उपदेश देनेका तात्पर्य है—कर्तव्यका ज्ञान कराना। सृष्टिमें सर्वप्रथम सूर्यकी उत्पत्ति हुई, फिर सूर्यसे समस्त लोक उत्पन्न हुए। सबको उत्पन्न करनेवाले सूर्यको सर्वप्रथम कर्मयोगका उपदेश देनेका अभिप्राय उनसे उत्पन्न सम्पूर्ण सृष्टिको परम्परासे कर्मयोग सुलभ करा देना था।
(३) सूर्य सम्पूर्ण जगत्के नेत्र हैं। उनसे ही सबको ज्ञान प्राप्त होता है एवं उनके उदित होनेपर प्रायः समस्त प्राणी जाग्रत् हो जाते हैं और अपने-अपने कर्मोंमें लग जाते हैं। सूर्यसे ही मनुष्योंमें कर्तव्य-परायणता आती है। सूर्यको सम्पूर्ण जगत्की आत्मा भी कहा गया है—‘सूर्य आत्मा जगतस्तथ्युपश्चत् ’।१ अतः सूर्यको जो उपदेश प्राप्त होगा, वह सम्पूर्ण प्राणियोंको भी स्वतः प्राप्त हो जायगा। इसलिये भगवान्ने सर्वप्रथम सूर्यको ही उपदेश दिया।
वास्तवमें नारायणके रूपमें उपदेश देना और सूर्यके रूपमें उपदेश ग्रहण करना जगन्नाट्यसूत्रधार भगवान्की एक लीला ही समझनी चाहिये, जो संसारके हितके लिये बहुत आवश्यक थी। जिस प्रकार अर्जुन महान् ज्ञानी नर-ऋषिके अवतार थे; परन्तु लोकसंग्रहके लिये उन्हें भी उपदेश लेनेकी आवश्यकता हुई, ठीक उसी प्रकार भगवान्ने स्वयं ज्ञानस्वरूप सूर्यको उपदेश दिया, जिसके फलस्वरूप संसारका महान् उपकार हुआ है, हो रहा है और होता रहेगा।
‘विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्षाकवेऽब्रवीत् ’—
१-शास्त्रोंमें सूर्यको ‘सविता’ कहा गया है, जिसका अर्थ है—उत्पन्न करनेवाला। पाश्चात्य विज्ञान भी सूर्यको सम्पूर्ण सृष्टिका कारण मानता है।
२-महाभारतमें सूर्यके प्रति कहा गया है—
त्वं भानो जगतश्चक्षुस्त्वमात्मा सर्वदेहिनाम्। त्वं योनिः सर्वभूतानां त्वमाचारः क्रियावताम्॥
त्वं गतिः सर्वसाङ्ख्यानां योगिनां त्वं परायणम्। अनावृतार्णलद्वां त्वं गतित्वं मुमुक्षताम्॥
त्वया संधार्यते लोकस्त्वया लोकः प्रकाश्यते। त्वया पवित्रीकृत्यते निर्व्याजं पाल्यते त्वया॥
( वनपर्व ३। ३६—३८ )
‘सूर्यदेव! आप सम्पूर्ण जगत्के नेत्र तथा समस्त प्राणियोंकी आत्मा हैं। आप ही सब जीवोंके उत्पत्ति-स्थान और कर्मानुष्ठानमें लगे हुए पुरुषोंके सदाचार (के प्रेरक) हैं।’
‘सम्पूर्ण सांख्ययोगियोंके प्राप्तव्य स्थान भी आप ही हैं। आप ही सब कर्मयोगियोंके आश्रय हैं। आप ही मोक्षके उन्मुख द्वार हैं और आप ही मुमुक्षुओंकी गति हैं।’
‘आप ही सम्पूर्ण जगत्को धारण करते हैं। आपसे ही यह लोक प्रकाशित होता है। आप ही इसे पवित्र करते हैं और आपके ही द्वारा निःस्वार्थ भावसे इसका पालन किया जाता है।’
कर्मयोग गृहस्थोंकी खास विद्या है। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास—इन चारों आश्रमोंमें गृहस्थ-आश्रम ही मुख्य है; क्योंकि गृहस्थ-आश्रमसे ही अन्य आश्रम बनते और पलते हैं। मनुष्य गृहस्थ-आश्रममें रहते हुए ही अपने कर्तव्य-कर्मोंका पालन करके सुगमतापूर्वक परमात्मप्राप्ति कर सकता है। उसे परमात्मप्राप्तिके लिये आश्रम बदलनेकी जरूरत नहीं है। भगवान्ने सूर्य, मनु, इक्ष्वाकु आदि राजाओंका नाम लेकर यह बताया है कि कल्पके आदिमें गृहस्थोंने ही कर्मयोगकी विद्याको जाना और गृहस्थाश्रममें रहते हुए ही उन्होंने कामनाओंका नाश करके परमात्म-तत्त्वको प्राप्त किया। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन भी गृहस्थ थे। इसलिये भगवान् अर्जुनके माध्यमसे मानो सम्पूर्ण गृहस्थोंको सावधान (उपदेश) करते हैं कि तुमलोग अपने घरकी विद्या ‘कर्मयोग’ का पालन करके घरमें रहते हुए ही परमात्माको प्राप्त कर सकते हो, तुम्हें दूसरी जगह जानेकी जरूरत नहीं है।
गृहस्थ होनेपर भी अर्जुन प्राप्त कर्तव्य-कर्म-(युद्ध-) को छोड़कर भिक्षाके अन्नसे जीविका चलानेको श्रेष्ठ मानते हैं (गीता—दूसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) अर्थात् अपने कल्याणके लिये गृहस्थ-आश्रमकी अपेक्षा संन्यास-आश्रमको श्रेष्ठ समझते हैं। इसलिये उपर्युक्त पदोंसे भगवान् मानो यह बताते हैं कि तुम भी राजघरानेके श्रेष्ठ गृहस्थ हो, कर्मयोग तुम्हारे घरकी खास विद्या है, इसलिये इसीका पालन करना तुम्हारे लिये श्रेयस्कर है। संन्यासीके द्वारा जो परमात्मतत्त्व प्राप्त किया जाता है, वही तत्त्व कर्मयोगी गृहस्थाश्रममें रहकर भी स्वाधीनतापूर्वक प्राप्त कर सकता है। अतः कर्मयोग गृहस्थोंकी तो मुख्य विद्या है, पर संन्यास
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
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आदि अन्य आश्रमवाले भी इसका पालन करके परमात्म-तत्त्वको प्राप्त कर सकते हैं। प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग ही कर्मयोग है। अतः कर्मयोगका पालन किसी भी वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय, देश, काल आदिमें किया जा सकता है। किसी विद्यामें श्रेष्ठ और प्रभावशाली पुरुषोंका नाम लेनेसे उस विद्याकी महिमा प्रकट होती है, जिससे दूसरे लोग भी वैसा करनेके लिये उत्साहित होते हैं। जिन लोगोंके हृदयमें सांसारिक पदार्थोंका महत्त्व है, उनपर ऐश्वर्यशाली राजाओंका अधिक प्रभाव पड़ता है। इसलिये भगवान् सुष्टिके आदिमें होनेवाले सूर्यका तथा मनु आदि प्रभावशाली राजाओंके नाम लेकर कर्मयोगका पालन करनेकी प्रेरणा करते हैं।
विशेष बात
क्रियाओं और पदार्थोंमें राग होनेसे अर्थात् उनके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे कर्मयोग नहीं हो पाता। गृहस्थमें रहते हुए भी सांसारिक भोगोंसे अरुचि (उपरति अथवा कामनाका अभाव) होती है। किसी भी भोगको भोगें, अन्तमें उस भोगसे अरुचि अवश्य उत्पन्न होती है—यह नियम है। आरम्भमें भोगकी जितनी रुचि (कामना) रहती है, भोग भोगते समय वह उतनी नहीं रह जाती, प्रत्युत क्रमशः घटते-घटते समाप्त हो जाती है; जैसे—मिट्टाई खानेके आरम्भमें उसकी जो रुचि होती है, वह उसे खानेके साथ-साथ घटती चली जाती है और अन्तमें उससे अरुचि हो जाती है। परन्तु मनुष्य भूल यह करता है कि वह उस अरुचिको महत्त्व देकर उसे स्थायी नहीं बनाता। वह अरुचिको ही तृप्ति (फल) मान लेता है। परन्तु वास्तवमें अरुचिमें थकावट अर्थात् भोगनेकी शक्तिका अभाव ही होता है।
जिस रुचि या कामनाका किसी भी समय अभाव होता है, वह रुचि या कामना वास्तवमें स्वयंकी नहीं होती। जिससे कभी भी अरुचि होती है, उससे हमारा वास्तविक सम्बन्ध नहीं होता। जिससे हमारा वास्तविक सम्बन्ध है, उस सत्-स्वरूप परमात्मतत्त्वकी ओर चलनेमें कभी अरुचि नहीं होती, प्रत्युत रुचि बढ़ती ही जाती है—यहाँतक कि परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होनेपर भी 'प्रेम'के रूपमें वह रुचि बढ़ती ही रहती है। 'स्वयं' भी सत्-स्वरूप है, इसलिये अपने अभावकी रुचि भी किसीकी नहीं होती।
कर्म, करण (शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि) और
उपकरण (पदार्थ अर्थात् कर्म करनेमें उपयोगी सामग्री)—ये तीनों ही उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं, फिर इनसे मिलनेवाला फल कैसे नित्य होगा? वह तो नाशवान् ही होगा। अविनाशीकी प्राप्तिसे जो तृप्ति होती है, वह नाशवान् फलकी प्राप्तिसे कैसे हो सकती है? इसलिये साधकको कर्म, करण और उपकरण—तीनोंसे ही सम्बन्ध-विच्छेद करना है। इनसे सम्बन्ध-विच्छेद तभी होगा, जब साधक अपने लिये कुछ नहीं करेगा, अपने लिये कुछ नहीं चाहेगा और अपना कुछ नहीं मानेगा; प्रत्युत अपने कहलानेवाले कर्म, करण और उपकरण—इन तीनोंसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये इन्हें संसारका ही मानकर संसारकी ही सेवामें लगा देगा।
कर्म करते हुए भी कर्मयोगीकी कर्मोंमें कामना, ममता और आसक्ति नहीं होती, प्रत्युत उनमें प्रीति और तत्परता होती है। कामना, ममता तथा आसक्ति अपवित्रता करनेवाली हैं और प्रीति तथा तत्परता पवित्रता करनेवाली हैं। कामना, ममता तथा आसक्तिपूर्वक किसी भी कर्मको करनेसे अपना पतन और पदार्थोंका नाश होता है तथा उस कर्मकी बार-बार याद आती है अर्थात् उस कर्मसे सम्बन्ध बना रहता है। परन्तु प्रीति तथा तत्परतापूर्वक कर्म करनेसे अपनी उन्नति और पदार्थोंका सदुपयोग होता है, नाश नहीं; तथा उस कर्मकी पुनः याद भी नहीं आती अर्थात् उस कर्मसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। इस प्रकार कर्मसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होते ही नित्यप्राप्त स्वरूप अथवा परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है।
कोई भी मनुष्य क्यों न हो, वह सुगमतापूर्वक मान सकता है कि जो कुछ मेरे पास है, वह मेरा नहीं है, प्रत्युत किसीसे मिला हुआ है; जैसे—शरीर माता-पितासे मिला है, विद्या-योग्यता गुरुजनोंसे मिली है, इत्यादि। तात्पर्य यह कि एक-दूसरेकी सहायतासे ही सबका जीवन चलता है। धनी-से-धनी व्यक्तिका जीवन भी दूसरेकी सहायताके बिना नहीं चल सकता। हमने किसीसे लिया है तो किसीको देना, किसीकी सहायता करना, सेवा करना हमारा भी परम कर्तव्य है। इसीका नाम कर्मयोग है। इसका पालन मनुष्यमात्र कर सकता है और इसके पालनमें कभी लेशमात्र भी असमर्थता तथा पराधीनता नहीं है।
कर्तव्य उसे कहते हैं, जिसे सुखपूर्वक कर सकते हैं, जिसे अवश्य करना चाहिये अर्थात् जो करनेयोग्य है और
श्लोक २ ]
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जिसे करनेसे उद्देश्यकी सिद्धि अवश्य होती है। जो नहीं कर सकते, उसे करनेकी जिम्मेवारी किसीपर नहीं है और जिसे नहीं करना चाहिये, उसे करना ही नहीं है। जिसे नहीं करना चाहिये, उसे न करनेसे दो अवस्थाएँ स्वतः आती हैं—निर्विकल्प अवस्था अर्थात् कुछ न करना अथवा जिसे करना चाहिये, उसे करना।
कर्तव्य सदा निष्कामभावसे एवं परहितकी दृष्टिसे किया जाता है। सकामभावसे किया गया कर्म बन्धनकारक होता है, इसलिये उसे करना ही नहीं है। निष्कामभावसे किया जानेवाला कर्म फलकी कामनासे रहित होता है, उद्देश्यसे रहित नहीं। उद्देश्यरहित चेष्टा तो पागलकी होती है। फल और उद्देश्य—दोनोंमें अन्तर होता है। फल उत्पन्न और नष्ट होनेवाला होता है, पर उद्देश्य नित्य होता है। उद्देश्य नित्यप्राप्त परमात्माके अनुभवका होता है, जिसके लिये मनुष्यजन्म हुआ है। अपने कर्तव्यका पालन न करनेसे उस परमात्माका अनुभव नहीं होता। सकामभाव, प्रमाद, आलस्य आदि रहनेसे अपने कर्तव्यका पालन कठिन प्रतीत होता है।
वास्तवमें कर्तव्य-कर्मका पालन करनेमें परिश्रम नहीं है। कर्तव्य-कर्म सहज, स्वाभाविक होता है; क्योंकि यह स्वधर्म है। परिश्रम तब होता है, जब अहंता, आसक्ति, ममता, कामनासे युक्त होकर अर्थात् ‘अपने लिये’ कर्म करते हैं। इसलिये भगवान्ने राजस कर्मको परिश्रमयुक्त बताया है (गीता—अठारहवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)।
जैसे भगवान्के द्वारा प्राणिमात्रका हित होता है, ऐसे ही भगवान्की शक्ति भी प्राणिमात्रके हितमें निरन्तर लगी
हुई है। जिस प्रकार आकाशवाणी-केन्द्रके द्वारा प्रसारित विशेष शक्तियुक्त ध्वनि सब जगह फैल जाती है, पर रेडियोके द्वारा जिस नंबरपर उस ध्वनिसे एकता (सजातीयता) होती है, उस नंबरपर वह ध्वनि पकड़में आ जाती है। इसी प्रकार जब कर्मयोगी स्वार्थभावका त्याग करके केवल संसारमात्रके हितके भावसे ही समस्त कर्म करता है, तब भगवान्की सर्वव्यापी हितैषिणी शक्तिसे उसकी एकता हो जाती है और उसके कर्मोंमें विलक्षणता आ जाती है। भगवान्की शक्तिसे एकता होनेसे उसमें भगवान्की शक्ति ही काम करती है और उस शक्तिके द्वारा ही लोगोंका हित होता है। इसलिये कर्तव्य-कर्म करनेमें न तो कोई बाधा लगती है और न परिश्रमका अनुभव ही होता है।
कर्मयोगमें पराश्रयकी भी आवश्यकता नहीं है। जो परिस्थिति प्राप्त हो जाय, उसीमें कर्मयोगका पालन करना है। कर्मयोगके अनुसार किसीके कार्यमें आवश्यकता पड़नेपर सहायता कर देना ‘सेवा’ है; जैसे—किसीकी गाड़ी खराब हो गयी और वह उसे धक्का देनेकी कोशिश कर रहा है; अतः हम भी इस काममें उसकी सहायता करें, तो यह ‘सेवा’ है। जो जानबूझकर कार्यको खोज-खोजकर सेवा करता है, वह कर्म करता है, सेवा नहीं; क्योंकि ऐसा करनेसे उसका उद्देश्य पारमार्थिक न रहकर लौकिक हो जाता है। सेवा वह है, जो परिस्थितिके अनुरूप की जाय। कर्मयोगी न तो परिस्थिति बदलता है और न परिस्थिति दृढ़ता है। वह तो प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करता है। प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग ही कर्मयोग है।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥ २ ॥
परन्तप = हे परन्तप ! एवम् = इस तरह परम्पराप्राप्तम् = परम्परासे प्राप्त इमम् = इस कर्मयोगको
राजर्षयः = राजर्षियोंने विदुः = जाना (परन्तु) महता = बहुत कालेन = समय
सः = वह योगः = योग इह = इस मनुष्यलोकमें नष्टः = लुप्तप्राय हो गया।
व्याख्या—‘एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः’—सूर्य, मनु, इक्ष्वाकु आदि राजाओंने कर्मयोगको भलीभाँति जानकर उसका स्वयं भी आचरण किया और प्रजासे भी वैसा आचरण कराया। इस प्रकार राजर्षियोंमें इस कर्मयोगकी परम्परा चली। यह राजाओं-(क्षत्रियों-) की
खास (निजी) विद्या है, इसलिये प्रत्येक राजाको यह विद्या जाननी चाहिये। इसी प्रकार परिवार, समाज, गाँव आदिके जो मुख्य व्यक्ति हैं, उन्हें भी यह विद्या अवश्य जाननी चाहिये।
प्राचीनकालमें कर्मयोगको जाननेवाले राजालोग राज्यके
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[ अध्याय ४ ]
भोगोंमें आसक्त हुए बिना सुचारुरूपसे राज्यका संचालन करते थे। प्रजाके हितमें उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति रहती थी। सूर्यवंशी राजाओंके विषयमें महाकवि कालिदास लिखते हैं—
प्रजानामेव भूतर्थ स ताभ्यो बलिमग्रहीत। सहस्रगुणमुत्खट्टुमादते हि रसं रविः ॥
(रघुवंश १।१८)
‘वे राजालोग अपनी प्रजाके हितके लिये प्रजासे उसी प्रकार कर लिया करते थे, जिस प्रकार सहस्रगुण बनाकर बरसानेके लिये ही सूर्य पृथ्वीसे जल लिया करते हैं।’
तात्पर्य यह कि वे राजालोग प्रजासे कर आदिके रूपमें लिये गये धनको प्रजाके ही हितमें लगा देते थे, अपने स्वार्थमें थोड़ा भी खर्च नहीं करते थे। अपने जीवन-निर्वाहके लिये वे अलग खेती आदि काम करवाते थे। कर्मयोगका पालन करनेके कारण उन राजाओंको विलक्षण ज्ञान और भक्ति स्वतः प्राप्त थी। यही कारण था कि प्राचीनकालमें बड़े-बड़े ऋषि भी ज्ञान प्राप्त करनेके लिये उन राजाओंके पास जाया करते थे। श्रीवेदव्यासजीके पुत्र शुक्रदेवजी भी ज्ञान-प्राप्तिके लिये राजर्षि जनकके पास गये थे। छान्दोग्योपनिषद्के पाँचवें अध्यायमें भी आता है कि ब्रह्मविद्या सीखनेके लिये छः ऋषि एक साथ महाराज अश्वपतिके पास गये थे*।
तीसरे अध्यायके बीसवें श्लोकमें जनक आदि राजाओंको और यहाँ सूर्य, मनु, इक्ष्वाकु आदि राजाओंको कर्मयोगी बताकर भगवान् अर्जुनको मानो यह लक्ष्य कराते हैं कि गृहस्थ और क्षत्रिय होनेके नाते तुम्हें भी अपने पूर्वजोंके (वंश-परम्पराके) अनुसार कर्मयोगका पालन अवश्य करना चाहिये (गीता—चौथे अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक)। इसके अलावा अपने वंशकी बात (कर्मयोगकी विद्या) अपनेमें आनी सुगम भी है, इसलिये आनी ही चाहिये।
‘स कालेनेह महता योगो नष्टः’—परमात्मा नित्य हैं और उनकी प्राप्तिके साधन—कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि भी परमात्माके द्वारा निश्चित किये होनेसे नित्य हैं। अतः इनका कभी अभाव नहीं होता—‘नाभावो विद्यते
सतः’ (गीता २।१६)। ये आचरणमें आते हुए न दीखनेपर भी नित्य रहते हैं। इसीलिये यहाँ आये ‘नष्टः’ पदका अर्थ लुप्त, अप्रकट होना ही है, अभाव होना नहीं।
पहले श्लोकमें कर्मयोगको ‘अव्ययम्’ अर्थात् अविनाशी कहा गया है। अतः यहाँ ‘नष्टः’ पदका अर्थ यदि कर्मयोगका अभाव माना जाय तो दोनों ओरसे विरोध उत्पन्न होगा कि यदि कर्मयोग अविनाशी है तो उसका अभाव कैसे हो गया? और यदि उसका अभाव हो गया तो वह अविनाशी कैसे? इसके सिवाय आगेके (तीसरे) श्लोकमें भगवान् कर्मयोगको पुनः प्रकट करनेकी बात कहते हैं। यदि उसका अभाव हो गया होता तो पुनः प्रकट नहीं होता। भगवान्के वचनोंमें विरोध भी नहीं आ सकता। इसलिये यहाँ ‘द्वह नष्टः’ पदोंका तात्पर्य यह है कि इस अविनाशी कर्मयोगके तत्त्वका वर्णन करनेवाले ग्रन्थोंका और इसके तत्त्वको जानेवाले तथा उसे आचरणमें लानेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंका इस लोकमें अभाव-सा हो गया है।
जहाँसे जो बात कही जाती है, वहाँसे वह परम्परासे जितनी दूर चली जाती है, उतना ही उसमें स्वतः अन्तर पड़ता चला जाता है—यह नियम है। भगवान् कहते हैं कि कल्पके आदिमें मैंने यह कर्मयोग सूर्यसे कहा था, फिर परम्परासे इसे राजर्षियोंने जाना। अतः इसमें अन्तर पड़ता ही गया और बहुत समय बीत जानेसे अब यह योग इस मनुष्यलोकमें लुप्तप्राय हो गया है। यही कारण है कि वर्तमानमें इस कर्मयोगकी बात सुनने तथा देखनेमें बहुत कम आती है।
कर्मयोगका आचरण लुप्तप्राय होनेपर भी उसका सिद्धान्त (अपने लिये कुछ न करना) सदैव रहता है; क्योंकि इस सिद्धान्तको अपनाये बिना किसी भी योग- (ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि—) का निरन्तर साधन नहीं हो सकता। कर्म तो मनुष्यमात्रको करने ही पड़ते हैं। हाँ, ज्ञानयोगी विवेकके द्वारा कर्मोंको नाशवान् मानकर कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करता है; और भक्तियोगी कर्मोंको भगवान्के अर्पण करके कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करता है।
- उस प्रसंगमें महाराज अश्वपतिके ये वचन ध्यान देने योग्य हैं—
न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः। नानाहिताग्निर्नाविद्वान् स्वैरी स्वैरिणी कृतः ॥
(छान्दोग्यो ५।११।५)
‘मेरे राज्यमें न तो कोई चोर है, न कोई कृपण है, न कोई मद्यप (मदिरा पीनेवाला) है, न कोई अनाहिताग्नि (अग्निहोत्र न करनेवाला) है, न कोई अविद्वान् है और न कोई परस्त्रीगामी ही है, फिर कुलटा स्त्री (वेश्या) तो होगी ही कैसे ?’
श्लोक ३ ]
- साधक-संजीवनी *
२७९
अतः ज्ञानयोगी और भक्तियोगीको कर्मयोगका सिद्धान्त तो अपनाना ही पड़ेगा; भले ही वे कर्मयोगका अनुष्ठान न करें। तात्पर्य यह कि वर्तमानमें कर्मयोग लुप्तप्राय होनेपर भी सिद्धान्तके रूपमें विद्यमान ही है।
वास्तवमें देखा जाय तो कर्मयोगमें 'कर्म' लुप्त नहीं हुए हैं, प्रत्युत (कर्मोंका प्रवाह अपनी ओर होनेसे) 'योग' ही लुप्त हुआ है। तात्पर्य यह है कि जैसे संसारके पदार्थ कर्म करनेसे मिलते हैं, ऐसे ही परमात्मा भी कर्म करनेसे मिलेंगे—यह बात साधकोंके अन्तःकरणमें इतनी दृढ़तासे बैठ गयी है कि 'परमात्मा नित्यप्राप्त है'—इस वास्तविकताकी ओर उनका ध्यान ही नहीं जा रहा है। 'कर्म' सदैव संसारके लिये होते हैं और 'योग' सदैव अपने लिये होता है। 'योग' के लिये कर्म करना नहीं होता, वह तो स्वतःसिद्ध है। अतः 'योग' के लिये यह मान लेना कि वह कर्म
करनेसे होगा—यही 'योग'का लुप्त होना है।
मनुष्य-शरीर कर्मयोगका पालन करनेके लिये अर्थात् दूसरोंकी निःस्वार्थ सेवा करनेके लिये ही मिला है। परन्तु आज मनुष्य रात-दिन अपनी सुख-सुविधा, सम्मान आदिकी प्राप्तिमें ही लगा हुआ है। स्वार्थके अधिक बढ़ जानेके कारण दूसरोंकी सेवाकी तरफ उसका ध्यान ही नहीं है। इस प्रकार जिसके लिये मनुष्य-शरीर मिला है, उसे भूल जाना ही कर्मयोगका लुप्त होना है।
मनुष्य सेवाके द्वारा पशु-पक्षीसे लेकर मनुष्य, देवता, पितर, ऋषि, सन्त-महात्मा और भगवान्तकको अपने वशमें कर सकता है। परन्तु सेवाभावको भूलकर मनुष्य स्वयं भोगोंके वशमें हो गया, जिसका परिणाम नरकोंमें तथा चौरासी लाख योनियोंमें पड़ जाना है। यही कर्मयोगका छिपना है।
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥ ३ ॥
| मे | = (तू) मेरा | सः, एव | = वही |
|---|---|---|---|
| भक्तः | = भक्त | अयम् | = यह |
| च | = और | पुरातनः | = पुरातन |
| सखा | = (प्रिय) सखा | योगः | = योग |
| असि | = है, | अद्य | = आज |
| इति | = इसलिये | मया | = मैंने |
व्याख्या —'भक्तोऽसि मे सखा चेति'—अर्जुन भगवान्को अपना प्रिय सखा पहलेसे ही मानते थे (गीता—ग्यारहवें अध्यायका इकतालीसवाँ-बयालीसवाँ श्लोक), पर भक्त अभी (गीता—दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें) हुए हैं अर्थात् अर्जुन सखा भक्त तो पुराने हैं, पर दास्य भक्त नये हैं। आदेश या उपदेश दास अथवा शिष्यको ही दिया जाता है, सखाको नहीं। अर्जुन जब भगवान्के शरण हुए, तभी भगवान्का उपदेश आरम्भ हुआ।
जो बात सखासे भी नहीं कही जाती, वह बात भी
शरणागत शिष्यके सामने प्रकट कर दी जाती है। अर्जुन भगवान्से कहते हैं कि 'मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिये आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिये।' इसलिये भगवान् अर्जुनके सामने अपने-आपको प्रकट कर देते हैं, रहस्यको खोल देते हैं।
अर्जुनका भगवान्के प्रति बहुत विशेष भाव था, तभी तो उन्होंने वैभव और अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित 'नारायणी सेना' का त्याग करके निःशस्त्र भगवान्को अपने 'सारथि' के रूपमें स्वीकार किया।
१-लोकहितार्थ अपने कर्तव्य-(स्वधर्म- ) का पालन करनेसे 'योग' सिद्ध होता है; अतः यह 'करना' भी वास्तवमें न करनेके लिये अर्थात् 'करना' समाप्त करनेके लिये ही है—'आरुरुक्षोमुनेर्यां कर्म कारणमुच्यते' (गीता ६।३)। 'करनेका वेग' निकालनेके लिये ही केवल सेवा-भावसे कर्तव्य-कर्म करने चाहिये। सकामभावसे अर्थात् अपने लिये कर्म करनेसे 'करनेका वेग' बढ़ता है, और दूसरोंके लिये कर्म करनेसे 'करनेका वेग' समाप्त होता है। तात्पर्य यह कि दूसरोंके लिये करनेसे ही 'करना' समाप्त होता है, और अपने लिये करनेसे 'करना' शेष रहता है। 'करना' समाप्त होनेपर स्वतःसिद्ध 'योग'का अनुभव हो जाता है।
२-एवमुक्तस्तु कृष्णो न कुन्तीपुत्रो धनंजयः । अयुध्यमानं संग्रामे वरयामास केशवम् ॥
(महाभारत, उद्योग ७।२१)
२८०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
साधारण लोग भगवान्की दी हुई वस्तुओंको तो अपनी मानते हैं (जो अपनी हैं ही नहीं), पर भगवान्को अपना नहीं मानते (जो वास्तवमें अपने हैं)। वे लोग वैभवशाली भगवान्को न देखकर उनके वैभवको ही देखते हैं। वैभवको ही सच्चा माननेसे उनकी बुद्धि इतनी भ्रष्ट हो जाती है कि वे भगवान्का अभाव ही मान लेते हैं अर्थात् भगवान्की तरफ उनकी दृष्टि जाती ही नहीं। कुछ लोग वैभवकी प्राप्तिके लिये ही भगवान्का भजन करते हैं। भगवान्को चाहनेसे तो वैभव भी पीछे आ जाता है, पर वैभवको चाहनेसे भगवान् नहीं आ सकते। वैभव तो भक्तके चरणोंमें लोटता है; परन्तु सच्चे भक्त वैभवकी प्राप्तिके लिये भगवान्का भजन नहीं करते। वे वैभवको नहीं चाहते, अपितु भगवान्को ही चाहते हैं। वैभवको चाहनेवाले मनुष्य वैभवके भक्त (दास) होते हैं और भगवान्को चाहनेवाले मनुष्य भगवान्के भक्त होते हैं। अर्जुनने वैभव- (नारायणी सेना-) का त्याग करके केवल भगवान्को अपनाया, तो युद्धक्षेत्रमें भीष्म, द्रोण, युधिष्ठिर आदि महापुरुषोंके रहते हुए भी गीताका महान् दिव्य उपदेश केवल अर्जुनको ही प्राप्त हुआ, और बादमें राज्य भी अर्जुनको मिल गया!
'स एवार्यं मया तेष्व योगः प्रोक्तः पुरातनः'— इन पदोंका यह तात्पर्य नहीं है कि मैंने कर्मयोगको पूर्णतया कह दिया है, प्रत्युत यह तात्पर्य है कि जो कुछ कहा है, वह पूर्ण है। आगे भगवान्के जन्मके विषयमें अर्जुनद्वारा किये गये प्रश्नका उत्तर देकर भगवान्ने पुनः उसी कर्मयोगका वर्णन आरम्भ किया है।
भगवान् कहते हैं कि सृष्टिके आदिमें मैंने सूर्यके प्रति जो कर्मयोग कहा था, वही आज मैंने तुमसे कहा है। बहुत समय बीत जानेपर वह योग अप्रकट हो गया था, और मैं भी अप्रकट ही था। अब मैं भी अवतार लेकर प्रकट हुआ हूँ और योगको भी पुनः प्रकट किया है। अतः अनादिकालसे जो कर्मयोग मनुष्योंको कर्मबन्धनसे मुक्त करता आ रहा है, वह आज भी उन्हें कर्मबन्धनसे मुक्त कर देगा।
'रहस्यं होतदुत्तमम्'— जिस प्रकार अठारहवें अध्यायके छाछठवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनके सामने 'सर्वगुह्यतम' बात प्रकट की कि 'तू मेरी शरणमें आ जा, मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा', उसी प्रकार यहाँ 'उत्तम रहस्य'
प्रकट करते हैं कि 'मैंने ही सृष्टिके आदिमें सूर्यको उपदेश दिया था और वही मैं आज तुझे उपदेश दे रहा हूँ'।
भगवान् अर्जुनसे मानो यह कहते हैं कि तेरा सारथि बनकर तेरी आज्ञाका पालन करनेवाला होकर भी मैं आज तुझे वही उपदेश दे रहा हूँ, जो उपदेश मैंने सृष्टिके आदिमें सूर्यको दिया था। मैं साक्षात् वही हूँ और अभी अवतार लेकर गुप्तरीतिसे प्रकट हुआ हूँ—यह बहुत रहस्यकी बात है। इस रहस्यको आज मैं तेरे सामने प्रकट कर रहा हूँ; क्योंकि तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है।
साधारण मनुष्यकी तो बात ही क्या है, साधककी दृष्टि भी उपदेशकी ओर अधिक एवं उपदेशकी ओर कम जाती है। इस प्रसंगको पढ़ने-सुननेपर उपदिष्ट 'योग' पर तो दृष्टि जाती है, पर उपदेश्य भगवान् श्रीकृष्ण ही आदि नारायण हैं—इसपर प्रायः दृष्टि नहीं जाती। जो बात साधारणतः पकड़में नहीं आती, वह रहस्यकी होती है। भगवान् यहाँ 'रहस्यम्' पदसे अपना परिचय देते हैं, जिसका तात्पर्य है कि साधककी दृष्टि सर्वथा भगवान्की ओर ही रहनी चाहिये।
अपने-आपको 'आदि उपदेश्य' कहकर भगवान् मानो अपनेको मानवमात्रका 'गुरु' प्रकट करते हैं। नाटक खेलते समय मनुष्य जनताके सामने अपने असली स्वरूपको प्रकट नहीं करता, पर किसी आत्मीय जनके सामने अपनेको प्रकट भी कर देता है। ऐसे ही मनुष्य-अवतारके समय भी भगवान् अर्जुनके सामने अपना ईश्वरभाव प्रकट कर देते हैं अर्थात् जो बात छिपाकर रखनी चाहिये, वह बात प्रकट कर देते हैं। यही उत्तम रहस्य है।
कर्मयोगको भी उत्तम रहस्य माना जा सकता है। जिन कर्मोंसे जीव बँधता है (कर्मणा बध्यते जन्तुः) उन्हीं कर्मोंसे उसकी मुक्ति हो जाय—यह उत्तम रहस्य है। पदार्थोंको अपना मानकर अपने लिये कर्म करनेसे बन्धन होता है, और पदार्थोंको अपना न मानकर (दूसरोंका मानकर) केवल दूसरोंके हितके लिये निःस्वार्थभावपूर्वक सेवा करनेसे मुक्ति होती है। अनुकूलता-प्रतिकूलता, धनवता-निर्धनता, स्वस्थता-रुग्णता आदि कैसी ही परिस्थिति क्यों न हो, प्रत्येक परिस्थितिमें इस कर्मयोगका पालन स्वतन्त्रतापूर्वक हो सकता है। कर्मयोगमें रहस्यकी तीन बातें मुख्य हैं—
'श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर कुत्तीकुमार धनंजयने संग्रामभूमिमें (अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित एक अक्षौहिणी नारायणी सेनाको छोड़कर) युद्ध न करनेवाले निःशस्त्र उन भगवान् श्रीकृष्णको ही (अपना सहायक) चुना।'
श्लोक ३ ]
- साधक-संजीवनी *
२८९
(१) मेरा कुछ नहीं है। कारण कि मेरा स्वरूप सत् (अविनाशी) है और जो कुछ मिला है, वह सब असत् (नाशवान्) है, फिर असत् मेरा कैसे हो सकता है? अनित्यका नित्यके साथ सम्बन्ध कैसे हो सकता है?
(२) मेरे लिये कुछ नहीं चाहिये। कारण कि स्वरूप- (सत्-) में कभी अपूर्ति या कमी होती ही नहीं, फिर किस वस्तुकी कामना की जाय? अनुत्पन्न अविनाशी तत्त्वके लिये उत्पन्न होनेवाली नाशवान् वस्तु कैसे काममें आ सकती है?
(३) अपने लिये कुछ नहीं करना है। इसमें पहला कारण यह है कि स्वयं चेतन परमात्माका अंश है और कर्म जड़ है। स्वयं नित्य-निरन्तर रहता है, पर कर्मका तथा उसके फलका आदि और अन्त होता है। इसलिये अपने लिये कर्म करनेसे आदि-अन्तवाले कर्म और फलसे अपना सम्बन्ध जुड़ता है। कर्म और फलका तो अन्त हो जाता है, पर उनका संग भीतर रह जाता है, जो जन्म-मरणका कारण होता है—‘कारणं गुणसङ्कोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३।२१)।
दूसरा कारण यह है कि ‘करने’ का दायित्व उसीपर आता है, जो कर सकता है अर्थात् जिसमें करनेकी योग्यता है और जो कुछ पाना चाहता है। निष्क्रिय, निर्विकार, अपरिवर्तनशील और पूर्ण होनेके कारण चेतन स्वरूप शरीरके सम्बन्धके बिना कुछ कर ही नहीं सकता, इसलिये यह विधान मानना पड़ेगा कि स्वरूपको अपने लिये कुछ नहीं करना है।
तीसरा कारण यह है कि स्वरूप सत् है और पूर्ण है; अतः उसमें कभी कमी आती ही नहीं, आनेकी सम्भावना भी नहीं—‘नाभावो विद्यते सतः’ (गीता २।१६)। कमी न आनेके कारण उसमें कुछ पानेकी इच्छा भी नहीं होती। इससे स्वतः सिद्ध होता है कि स्वरूपपर ‘करने’ का दायित्व नहीं है अर्थात् उसे अपने लिये कुछ नहीं करना है।
कर्मयोगमें ‘कर्म’ तो संसारके लिये होते हैं और ‘योग’ अपने लिये होता है। परन्तु अपने लिये कर्म करनेसे ‘योग’का अनुभव नहीं होता। ‘योग’का अनुभव तभी होगा, जब कर्मका प्रवाह पूरा-का-पूरा संसारकी ओर ही हो जाय। कारण कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ, धन, सम्पत्ति आदि जो कुछ भी हमारे पास है, वह सब-का-सब संसारसे अभिन्न है, संसारका ही है और उन्हें
संसारकी सेवामें ही लगाना है। अतः पदार्थ और क्रियारूप संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये ही दूसरोंके लिये कर्म करना है। यही कर्मयोग है। कर्मयोग सिद्ध होनेपर करनेका राग, पानेकी लालसा, जीनेकी इच्छा और मरनेका भय—ये सब मिट जाते हैं।
जैसे सूर्यके प्रकाशमें लोग अनेक कर्म करते हैं, पर सूर्यका उन कर्मोंसे अपना कुछ भी सम्बन्ध नहीं होता, ऐसे ही ‘स्वयं’-(चेतन-)के प्रकाशमें सम्पूर्ण कर्म होते हैं, पर ‘स्वयं’का उनसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं होता; क्योंकि ‘स्वयं’ चेतन तथा अपरिवर्तनशील है और कर्म जड़ तथा परिवर्तनशील हैं। परन्तु जब ‘स्वयं’ भूलसे उन पदार्थों और कर्मोंके साथ थोड़ा-सा भी सम्बन्ध मान लेता है, अर्थात् उन्हें अपने और अपने लिये मान लेता है, तो फिर वे कर्म अवश्य ही उसे बाँध देते हैं।
नियत-कर्मका किसी भी अवस्थामें त्याग न करना तथा नियत समयपर कार्यके लिये तत्पर रहना भी सूर्यकी अपनी विलक्षणता है। कर्मयोगी भी सूर्यकी तरह अपने नियत-कर्मोंको नियत समयपर करनेके लिये सदा तत्पर रहता है।
कर्मयोगका ठीक-ठीक पालन किया जाय तो यदि कर्मयोगीमें ज्ञानके संस्कार हैं तो उसे ज्ञानकी प्राप्ति, और यदि भक्तिके संस्कार हैं तो उसे भक्तिकी प्राप्ति स्वतः हो जाती है। कर्मयोगका पालन करनेसे अपना ही नहीं, प्रत्युत संसारमात्रका भी परम हित होता है। दूसरे लोग देखें या न देखें, समझें या न समझें, मानें या न मानें, अपने कर्तव्यका ठीक-ठीक पालन करनेसे दूसरे लोगोंको कर्तव्य-पालनकी प्रेरणा स्वतः मिलती है और इस प्रकार सबकी सेवा भी हो जाती है।
मार्मिक बात
गीतामें भगवान्ने उपदेशके आरम्भमें दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकसे तीसवें श्लोकतक मनुष्यमात्रके अनुभव-(विवेक-) का वर्णन किया है। यह मनुष्यमात्रका ही अनुभव नहीं है, प्रत्युत जीवमात्रका भी अनुभव है; कारण कि ‘मैं हूँ’—ऐसे अपनी सत्ता-(होनेपन-) का अनुभव स्थावर-जंगम सभी प्राणियोंको है। वृक्ष, पर्वत आदिको भी इसका अनुभव है, पर वे इसे व्यक्त नहीं कर सकते। पशु-पक्षियोंमें तो प्रत्यक्ष देखनेमें भी आता है; जैसे—पशु-पक्षी आपसमें लड़ते हैं तो अपनी सत्ताको लेकर ही लड़ते हैं। यदि अपनी अलग सत्ताका अनुभव न हो तो वे
२८२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
लईं ही क्यों ? मनुष्यको तो इसका प्रत्यक्ष अनुभव है ही; परन्तु वह न तो अपने अनुभवकी ओर दृष्टि डालता है और न उसका आदर ही करता है। इस अनुभवको ही विवेक या निज-ज्ञान कहते हैं। यह विवेक सबमें स्वतः है और भगवत्प्रदत्त है।
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि प्रकृतिके अंश हैं, इसलिये इनसे होनेवाला ज्ञान प्रकृतिजन्य है। शास्त्रोंको पढ़-सुनकर इन इन्द्रियों-मन-बुद्धिके द्वारा जो परमार्थिक ज्ञान होता है, वह ज्ञान भी एक प्रकारसे प्रकृतिजन्य ही है। परमात्मतत्त्व इस प्रकृतिजन्य ज्ञानकी अपेक्षा अत्यन्त विलक्षण है। अतः परमात्मतत्त्वको निज-ज्ञान (स्वयंसे होनेवाले ज्ञान-) से ही जाना जा सकता है। निज-ज्ञान अर्थात् विवेकको महत्त्व देने से 'मैं कौन हूँ ? मेरा क्या है ? जड़ और चेतन क्या हैं ? प्रकृति और परमात्मा क्या हैं ?'—यह सब जाननेकी शक्ति आ जाती है। यही विवेक कर्मयोगमें भी काम आता है— यह मार्मिक बात है।
कर्मयोगमें विवेककी दो बातें मुख्य हैं—(१) अपने होनेपन-(‘मैं हूँ’) में कोई संदेह नहीं है और (२) अभी जो वस्तुएँ मिली हुई हैं, उनपर अपना कोई आधिपत्य नहीं है; क्योंकि वे पहले अपनी नहीं थीं और बादमें भी अपनी नहीं रहेंगी। मैं (स्वयं) निरन्तर रहता हूँ और ये मिली हुई वस्तुएँ—शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि निरन्तर बदलती रहती हैं और इनका निरन्तर वियोग होता रहता है। जैसे कर्मोंका आरम्भ और समाप्ति होती है, ऐसे ही उनके फलका भी संयोग और वियोग होता है। इसलिये कर्मों और पदार्थोंका सम्बन्ध संसारसे है, स्वयंसे नहीं। इस प्रकार विवेक जाग्रत् होते ही कामनाका नाश हो जाता है। कामनाका नाश होनेपर स्वतःसिद्ध निष्कामता प्रकट हो जाती है अर्थात् कर्मयोग पूर्णतः सिद्ध हो जाता है।
कामनासे विवेक ढक जाता है (गीता—तीसरे अध्यायका अङ्गीतसर्वा-उनतालीसर्वा श्लोक)। स्वार्थ-बुद्धि, भोग-बुद्धि, संग्रह-बुद्धि रखनेसे मनुष्य अपने कर्तव्यका ठीक-ठीक निर्णय नहीं कर पाता। वह उलझनोंको उलझनसे ही अर्थात् शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे ही सुलझाना चाहता है और इसीलिये वह वर्तमान परिस्थितिको बदलनेका ही उद्योग करता है। परन्तु परिस्थितिको बदलना अपने वशकी बात नहीं है, इसलिये उलझन सुलझनेकी अपेक्षा
अधिकाधिक उलझती चली जाती है। विवेक जाग्रत् होनेपर जब स्वार्थ-बुद्धि, भोग-बुद्धि, संग्रह-बुद्धि नहीं रहती, तब अपना कर्तव्य स्पष्ट दीखने लग जाता है और सभी प्रकारकी उलझने स्वतः सुलझ जाती हैं।
बाहरी परिस्थिति कर्मोंके अनुसार ही बनती है अर्थात् वह कर्मोंका ही फल है। धनवता-निर्धनता, निन्दा-स्तुति, आदर-निरादर, यश-अपयश, लाभ-हानि, जन्म-मरण, स्वस्थता-रुग्णता आदि सभी परिस्थितियाँ कर्मोंके अधीन हैं*। शुभ और अशुभ कर्मोंके फलस्वरूपमें अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति सामने आती रहती है; परन्तु उस परिस्थितिसे सम्बन्ध जोड़कर—उसे अपनी मानकर सुखी-दुःखी होना मूर्खता है। तात्पर्य यह है कि अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिका आना तो कर्मोंका फल है, और उससे सुखी-दुःखी होना अपनी अज्ञता—मूर्खताका फल है। कर्मोंका फल मिटाना तो हाथकी बात नहीं है, पर मूर्खता मिटाना बिलकुल हाथकी बात है। जिसे मिटा सकते हैं, उस मूर्खताको तो मिटाते नहीं और जिसे बदल सकते नहीं, उस परिस्थितिको बदलनेका उद्योग करते हैं—यह महान् भूल है! इसलिये अपने विवेकको महत्त्व देकर मूर्खताको मिटा देना चाहिये और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंका सदुपयोग करते हुए उनसे ऊँचे उठ जाना अर्थात् असंग हो जाना चाहिये। जो किसी भी परिस्थितिसे सम्बन्ध न जोड़कर उसका सदुपयोग करता है अर्थात् अनुकूल परिस्थितिमें दूसरोंकी सेवा करता है तथा प्रतिकूल परिस्थितिमें दुःखी नहीं होता अर्थात् सुखकी इच्छा नहीं करता, वह संसार-बन्धनसे सुगमतापूर्वक मुक्त हो जाता है।
जिसे मनुष्य नहीं चाहता, वह प्रतिकूल परिस्थिति पहले किये अशुभ-(पाप-) कर्मोंका फल होती है। अतः पाप-कर्म तो करने ही नहीं चाहिये। किसीको कष्ट पहुँचे, ऐसा काम तो स्वप्नमें भी नहीं करना चाहिये। परन्तु वर्तमानमें (नये) पाप-कर्म न करनेपर भी पुराने पाप-कर्मोंके फलस्वरूप जब प्रतिकूल परिस्थिति आ जाती है, तब अन्तःकरणमें चिन्ता, शोक, भय आदि भी आ जाते हैं। इसका कारण यह है कि हमने चिन्ता-शोकको अधिक परिचित बना लिया है। जैसे बिक्री की हुई गाय पुराने स्थानसे परिचित होनेके कारण बार-बार वहीं आ जाती है।
- सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभु जीवन्तु मरन्तु जसु अपजसु बिधि हाथ॥
(मानस २। १७९)
श्लोक ४-५]
- साधक-संजीवनी *
२८३
परन्तु उसे बार-बार नये स्थानपर पहुँचा दिया जाय, तो फिर वह पुराने स्थानपर आना छोड़ देती है। ऐसे ही आज और अभी यह दृढ़ विचार कर लें कि आने-जानेवाली परिस्थितिसे सम्बन्ध जोड़कर चिन्ता-शोक करना गलती है, यह गलती अब हम नहीं करेंगे, तो फिर ये चिन्ता-शोक आना छोड़ देंगे।
विवेककी पूर्ण जागृति न होनेपर भी कर्मयोगीमें एक निश्चयात्मिका बुद्धि रहती है कि जो अपना नहीं है, उससे सम्बन्ध-विच्छेद करना है और सांसारिक सुखोंको न भोगकर केवल सेवा करनी है। इस निश्चयात्मिका बुद्धिके
कारण उसके अन्तःकरणमें सांसारिक सुखोंका महत्त्व नहीं रहता। फिर 'भोगोंमें सुख है'—ऐसे भ्रममें उसे कोई डाल नहीं सकता। अतः इस एक निश्चयको अटल रखनेसे ही उसका कल्याण हो जाता है। सत्संग-स्वाध्यायसे ऐसी निश्चयात्मिका बुद्धिको बल मिलता है। अतः हरेक साधकको कम-से-कम ऐसा कल्याणकारी निश्चय अवश्य ही बना लेना चाहिये। ऐसा निश्चय बनानेमें सब स्वाधीन हैं, कोई पराधीन नहीं है। इसमें किसीकी किंचित् भी सहायताकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि इसमें स्वयं बलवान् है।
सम्बन्ध—मैंने ही सृष्टिके आदिमें सूर्यको उपदेश दिया था और वही मैं आज तुझे उपदेश दे रहा हूँ—इसे सुनकर अर्जुनमें स्वाभाविक यह जिज्ञासा जाग्रत् होती है कि जो अभी मेरे सामने बैठे हैं, इन भगवान् श्रीकृष्णने सृष्टिके आरम्भमें सूर्यको उपदेश कैसे दिया था? अतः इसे अच्छी तरह समझनेके लिये अर्जुन आगेके श्लोकमें भगवान्से प्रश्न करते हैं।
अर्जुन उवाच
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥ ४ ॥
अर्जुन बोले—
| भवतः | = आपका | परम् | = बहुत पुराना है; | एतत् | = यह योग |
|---|---|---|---|---|---|
| जन्म | = जन्म (तो) | (अतः) | प्रोक्तवान् | = कहा था— | |
| अपरम् | = अभीका है (और) | त्वम् | = आपने (ही) | इति | = यह बात (में) |
| विवस्वतः | = सूर्यका | आदौ | = सृष्टिके आरम्भमें | कथम् | = कैसे |
| जन्म | = जन्म | (सूर्यसे) | विजानीयाम् | = समझूँ? |
व्याख्या—'अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः'—आपका जन्म तो अभी कुछ वर्ष पूर्व श्रीवसुदेवजीके घर हुआ है, पर सूर्यका जन्म सृष्टिके आरम्भमें हुआ था। अतः आपने सूर्यको कर्मयोग कैसे कहा था?
अर्जुनके इस प्रश्नमें तर्क या आक्षेप नहीं है, प्रत्युत जिज्ञासा है। वे भगवान्के जन्म-सम्बन्धी रहस्यको सुगमातापूर्वक समझनेकी दृष्टिसे ही प्रश्न करते हैं, क्योंकि अपने जन्म-सम्बन्धी रहस्यको प्रकट करनेमें भगवान् ही सर्वथा समर्थ हैं।
'कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति'—मैं आपको सृष्टिके आदिमें उपदेश देनेवाला कैसे जानूँ?
अर्जुनके प्रश्नका तात्पर्य यह है कि सूर्यको उपदेश देनेके बादसे सूर्यवंशकी (मनु, इक्ष्वाकु आदि) कई पीढ़ियाँ बीत चुकी हैं और आपका अवतार अभीका है; अतः आपने सृष्टिके आदिमें सूर्यको उपदेश कैसे दिया था—यह बात मैं अच्छी तरह समझना चाहता हूँ। सूर्य तो अभी भी है, इसलिये उसे अभी भी उपदेश दिया जा सकता है। परन्तु आपने सूर्यको उपदेश देनेके बाद सूर्यवंशकी परम्पराका भी वर्णन किया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि आपने सूर्यको उपदेश अभी नहीं दिया है। अतः आपने सूर्यको कल्पके आदिमें कैसे उपदेश दिया था?
सम्बन्ध—अर्जुनके प्रश्नके उत्तरमें अपना अवतार-रहस्य प्रकट करनेके लिये भगवान् पहले अपनी सर्वज्ञताका दिग्दर्शन कराते हैं।
श्रीभगवानुवाच
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥ ५ ॥
२८४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
श्रीभगवान् बोले—
| परन्तप | = हे परन्तप | बहूनि | = बहुत-से | अहम् | = मैं |
|---|---|---|---|---|---|
| अर्जुन | = अर्जुन! | जन्मानि | = जन्म | वेद | = जानता हूँ, (पर) |
| मे | = मेरे | व्यतीतानि | = हो चुके हैं। | त्वम् | = तू |
| च | = और | तानि | = उन | न | = नहीं |
| तव | = तेरे | सर्वाणि | = सबको | वेत्थ | = जानता। |
व्याख्या—[तीसरे श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको अपना भक्त और प्रिय सखा कहा था, इसलिये पीछेके श्लोकमें अर्जुन अपने हृदयकी बात निःसंकोच होकर पूछते हैं। अर्जुनमें भगवान्के जन्म-रहस्यको जाननेकी प्रबल जिज्ञासा उत्पन्न हुई है, इसलिये भगवान् उनके सामने मित्रताके नाते अपने जन्मका रहस्य प्रकट कर देते हैं। यह नियम है कि श्रोताकी प्रबल जिज्ञासा होनेपर वक्ता अपनेको छिपाकर नहीं रख सकता। इसलिये सन्त-महात्मा भी अपनेमें विशेष श्रद्धा रखनेवालोंके सामने अपने-आपको प्रकट कर सकते हैं*—]
गूढुठ तत्त्वं न साधु दुरावहिं।
आरत अधिकारी जहं पावहिं॥
(मानस १।११०।१)
‘बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन’— समय-समयपर मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। परन्तु मेरा जन्म और तरहका है (जिसका वर्णन आगे छठे श्लोकमें करेंगे) और तेरा (जीवका) जन्म और तरहका है (जिसका वर्णन आठवें अध्यायके उन्नीसवें और तेरहवें अध्यायके इक्कीसवें एवं छब्बीसवें श्लोकमें करेंगे)। तात्पर्य यह कि मेरे और तेरे बहुत-से जन्म होनेपर भी वे अलग-अलग प्रकारके हैं।
दूसरे अध्यायके बारहवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा था कि मैं (भगवान्) और तू तथा ये राजालोग (जीव) पहले नहीं थे और आगे नहीं रहेंगे—ऐसा नहीं है। तात्पर्य यह कि भगवान् और उनका अंश जीवात्मा—दोनों ही अनादि और नित्य हैं।
‘तान्यहं वेद सर्वाणि’—संसारमें ऐसे ‘जातिस्मर’ जीव भी होते हैं, जिनको अपने पूर्वजन्मोंका ज्ञान होता है। ऐसे महापुरुष ‘युंजान योगी’ कहलाते हैं, जो साधना करके सिद्ध होते हैं। साधनामें अभ्यास करते-करते इनकी वृत्ति इतनी तेज हो जाती है कि ये जहाँ वृत्ति लगाते हैं, वहींका ज्ञान इनको हो जाता है। ऐसे योगी कुछ सीमातक ही अपने पुराने जन्मोंको जान सकते हैं, सम्पूर्ण जन्मोंको नहीं। इसके विपरीत भगवान् ‘युक्तयोगी’ कहलाते हैं, जो साधना किये बिना स्वतःसिद्ध, नित्य योगी हैं। जन्मोंको जाननेके लिये उन्हें वृत्ति नहीं लगानी पड़ती, प्रत्युत उनमें अपने और जीवोंके भी सम्पूर्ण जन्मोंका स्वतः-स्वाभाविक ज्ञान सदा बना रहता है। उनके ज्ञानमें भूत, भविष्य और वर्तमानका भेद नहीं है, प्रत्युत उनके अखण्ड ज्ञानमें सभी कुछ सदा वर्तमान ही रहता है (गीता ७।२६)। कारण कि भगवान् सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिमें पूर्णरूपसे विद्यमान रहते हुए भी इनसे सर्वथा अतीत रहते हैं।
['मैं उन सबको जानता हूँ—भगवान्के इस वचनसे साधकोंको एक विशेष आनन्द आना चाहिये कि हम भगवान्की जानकारीमें हैं, भगवान् हमें निरन्तर देख रहे हैं! हम कैसे ही क्यों न हों, पर हैं भगवान्के ज्ञानमें।]
‘न त्वं वेत्थ परन्तप’—जन्मोंको न जाननेमें मूल हेतु है—अन्तःकरणमें नाशवान् पदार्थोंका आकर्षण, महत्त्व होना। इसीके कारण मनुष्यका ज्ञान विकसित नहीं होता। अर्जुनके अन्तःकरणमें नाशवान् पदार्थोंका, व्यक्तियोंका महत्त्व था, इसीलिये वे कुटुम्बियोंके मरनेके भयसे युद्ध नहीं
- सन्त-महात्मा भी स्वयं छिपे रहते हैं और सबके सामने प्रकट नहीं होते। परन्तु निम्नलिखित तीन अवसरोंपर वे अपने-आपको प्रकट कर देते हैं—
१—जब कोई अत्यधिक श्रद्धालु सामने आ जाय और उसमें उन्हें (सन्त-महात्माको) जाननेकी उत्कट अभिलाषा हो।
२—जब अपने किसी प्रेमीका शरीर छूटनेवाला हो।
३—जब सन्त-महात्माका अपना कहलानेवाला शरीर छूट रहा हो।
दूसरे और तीसरे अवसरपर सन्त-महात्मा उस व्यक्तिके सामने भी अपने-आपको प्रकट कर देते हैं, जिसमें उतनी अधिक श्रद्धा तो नहीं है, पर वह उन सन्त-महात्माका हृदयसे आदर करता है और उन्हें जानना चाहता है।
श्लोक ६ ]
- साधक-संजीवनी *
२८५
करना चाहते थे। पहले अध्यायके तैतीसवें श्लोकमें अर्जुनने कहा था कि जिनके लिये हमारी राज्य, भोग और सुखकी इच्छा है, वे ही ये कुटुम्बी प्राणोंकी और धनकी आशा छोड़कर युद्धमें खड़े हैं—इससे सिद्ध होता है कि अर्जुन राज्य, भोग और सुख चाहते थे। अतः नाशवान् पदार्थोंकी कामना होनेके कारण वे अपने पूर्वजन्मोंको नहीं जानते थे।
ममता-आसक्तिपूर्वक अपने सुखभोग और आरामके लिये धनादि पदार्थोंका संग्रह करना 'परिग्रह' कहलाता है। परिग्रहका सर्वथा त्याग करना अर्थात् अपने सुख, आराम आदिके लिये किसी भी वस्तुका संग्रह न करना 'अपरिग्रह' कहलाता है। अपरिग्रहकी दृढ़ता होनेपर पूर्वजन्मोंका ज्ञान हो जाता है—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। अब आगेके श्लोकमें भगवान् अपने जन्म-(अवतार-) की विलक्षणता बताते हैं।
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवास्यात्ममायया ॥ ६ ॥
अजः | = (मैं) अजन्मा (और) | भूतानाम् | = सम्पूर्ण प्राणियोंका | प्रकृतिम् | = प्रकृतिको ---|---|---|---|---|--- अव्ययात्मा | = अविनाशी-स्वरूप | ईश्वरः | = ईश्वर | अधिष्ठाय | = अधीन करके सन् | = होते हुए | सन् | = होते हुए | आत्ममायया | = अपनी योगमायासे अपि | = भी (तथा) | अपि | = भी | सम्भवाभि | = प्रकट होता हूँ। | | स्वाम् | = अपनी | |
व्याख्या—[यह छठा श्लोक है और इसमें छः बातोंका भगवान्की हैं*; प्रकृति और योगमाया—ये दो बातें ही वर्णन हुआ है। अज, अव्यय और ईश्वर—ये तीन बातें भगवान्की शक्तिकी हैं और एक बात भगवान्के प्रकट
- गीतामें भगवान्ने अपने अज, अव्यय और ईश्वर—इन तीनों रूपोंको जानने और न जाननेकी बात कही है; जैसे— १-'अज'-स्वरूपको जाननेकी बात—
यो मामजमनादि च वेति लोकमहेश्वरम्। असम्भूढः स मत्स्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ (१०।३) न जाननेकी बात—
मृदोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ (७।२५)
२-'अव्यय'-स्वरूपको जाननेकी बात—
भजन्त्यन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिव्ययम् ॥ (९।१३) न जाननेकी बात—
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमन्तुतम् ॥ (७।२४)
३-'ईश्वर'-स्वरूपको जाननेकी बात—
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमुच्छति ॥ (५।२९) न जाननेकी बात—
अवजानन्ति मां मृढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ (९।११)
अपरिग्रहस्थैरे जन्मकथन्तासंबोधः।
(पातंजलयोगदर्शन २।३९)
संसार (क्रिया और पदार्थ) सदैव परिवर्तनशील और असत् है; अतः उसमें अभाव (कमी) होना निश्चित है। अभावरूप संसारसे सम्बन्ध जोड़नेके कारण मनुष्यको अपनेमें भी अभाव दीखने लग जाता है। अभाव दीखनेके कारण उसमें यह कामना पैदा हो जाती है कि अभावकी तो पूर्ति हो जाय, फिर नया और मिले। इस कामनाकी पूर्तिमें ही वह दिन-रात लगा रहता है। परन्तु कामनाकी पूर्ति होनेवाली है नहीं। कामनाओंके कारण मनुष्य बेहोश-सा हो जाता है। अतः ऐसे मनुष्यको अनेक जन्मोंका ज्ञान तो दूर रहा, वर्तमान कर्तव्यका भी ज्ञान (क्या कर रहा हूँ और क्या करना चाहिये) नहीं होता।
२८६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
होनेकी है।]
‘अजोऽपि सन्नव्ययात्मा’—इन पदोंसे भगवान् यह बताते हैं कि साधारण मनुष्योंकी तरह न तो मेरा जन्म है और न मेरा मरण ही है। मनुष्य जन्म लेते हैं और मर जाते हैं; परन्तु मैं ‘अजन्मा’ होते हुए भी प्रकट हो जाता हूँ और ‘अविनाशी’ होते हुए भी अन्तर्धान हो जाता हूँ। प्रकट होना और अन्तर्धान होना—दोनों ही मेरी अलौकिक लीलाएँ हैं। सम्पूर्ण प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट (अव्यक्त) थे और मरनेके बाद भी अप्रकट (अव्यक्त) हो जानेवाले हैं, केवल बीचमें ही प्रकट (व्यक्त) हैं (गीता—दूसरे अध्यायका अट्टाईसवाँ श्लोक)। परन्तु भगवान् सूर्यकी तरह सदा ही प्रकट रहते हैं। तात्पर्य है कि जैसे सूर्य उदय होनेसे पहले भी ज्यों-का-त्यों रहता है और अस्त होनेके बाद भी ज्यों-का-त्यों रहता है अर्थात् सूर्य तो सदा ही रहता है; किन्तु स्थानविशेषके लोगोंकी दृष्टिमें उसका उदय और अस्त होना दीखता है। ऐसे ही भगवान्का प्रकट होना और अन्तर्धान होना लोगोंकी दृष्टिमें है, वास्तवमें भगवान् सदा ही प्रकट रहते हैं।
दूसरे प्राणी जैसे कर्मके परतन्त्र होकर जन्म लेते हैं, भगवान्का जन्म वैसे नहीं होता। कर्मोंकी परतन्त्रतासे जन्म होनेपर दो बातें होती हैं—आयु और सुख-दुःखका भोग। भगवान्में ये दोनों ही नहीं होते।
दूसरे लोग जन्मते हैं तो शरीर पहले बालक होता है, फिर बड़ा होकर युवा हो जाता है, फिर वृद्ध हो जाता है और फिर मर जाता है। परन्तु भगवान्में ये परिवर्तन नहीं होते। वे अवतार लेकर बाललीला करते हैं और किशोर-अवस्था (पंद्रह वर्षकी अवस्था) तक बढ़नेकी लीला करते हैं। किशोर-अवस्थायतक पहुँचनेके बाद फिर वे नित्य किशोर ही रहते हैं। सैकड़ों वर्ष बीतनेपर भी भगवान् वैसे ही सुन्दर-स्वरूप रहते हैं। इसीलिये भगवान्के जितने चित्र बनाये जाते हैं, उसमें उनकी दाढ़ी-मूछें नहीं होतीं (अब कोई बना दे तो अलग बात है!)। इस प्रकार दूसरे प्राणियोंकी तरह न तो भगवान्का जन्म होता है, न परिवर्तन होता है और न मृत्यु ही होती है।
‘भूतानामिश्वरोऽपि सन्’—प्राणिमात्रके एकमात्र ईश्वर
(महान् शासक) रहते हुए ही भगवान् अवतारके समय छोटे-से बालक बन जाते हैं; परन्तु बालक बन जानेपर भी उनके ईश्वरभाव (शासकत्व)—में कोई कमी नहीं आती; जैसे—भगवान् श्रीकृष्णने छठीके दिन ही पूतना राक्षसोंको मार दिया। पूतनाका शरीर ढाई योजनाका और महान् भयंकर था। यदि उनमें ईश्वरभाव न होता तो छठीके दिन पूतनाको कैसे मार देते ? भगवान्ने तीन महीनेकी अवस्थामें शकटायुको, एक वर्षकी अवस्थामें तुणावर्तको और पाँच वर्षकी अवस्थामें अघासुरको मार दिया। इस तरह भगवान्ने बाल्यावस्थामें ही अनेक राक्षसोंको मार दिया। सात वर्षकी अवस्थामें ही उन्होंने गोवर्धन पर्वतको एक अँगुलीपर उठा लिया!
सम्पूर्ण प्राणियोंके ईश्वर होते हुए भी भगवान् अवतारके समय छोटे-से-छोटे बन जाते हैं और छोटा-सा-छोटा काम भी कर देते हैं। वास्तवमें यही भगवान्की भगवत्ता है। भगवान् अर्जुनके घोड़े हाँकते हैं और उनकी आज्ञाका पालन करते हैं, फिर भी भगवान्का अर्जुनपर और दूसरे प्राणियोंपर ईश्वरभाव वैसा-का-वैसा ही है। सारथि होनेपर भी वे अर्जुनको गीताका महान् उपदेश देते हैं। भगवान् श्रीराम पिता दशरथकी आज्ञाको टालते नहीं और चौदह वर्षके लिये वनमें चले जाते हैं, फिर भी भगवान्का दशरथपर और दूसरे प्राणियोंपर ईश्वरभाव वैसा-का-वैसा ही है।
‘प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय’—जो सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे अलग है, वह भगवान्की शुद्ध प्रकृति है। यह शुद्ध प्रकृति भगवान्का स्वकीय सच्चिदानन्दधनस्वरूप है। इसीको संधिनी-शक्ति, संवित्-शक्ति और आह्लादिनी-शक्ति कहते हैं। इसीको चिन्मयशक्ति, कृपाशक्ति आदि नामोंसे कहते हैं। श्रीराधाजी१, श्रीसीताजी आदि भी यही हैं। भगवान्को प्राप्त करनेवाली ‘भक्ति’ और ‘ब्रह्मविद्या’ भी यही है।
प्रकृति भगवान्की शक्ति है। जैसे, अग्निमें दो शक्तियाँ रहती हैं—प्रकाशिका और दाहिका। प्रकाशिका-शक्ति अन्धकारको दूर करके प्रकाश कर देती है तथा भय भी मिटाती है। दाहिका-शक्ति जला देती है तथा वस्तुको पकाती एवं ठण्डक भी दूर करती है। ये दोनों शक्तियाँ
१-संधिनी-शक्ति ‘सत्’-स्वरूपा, संवित्-शक्ति ‘चित्’-स्वरूपा और आह्लादिनी-शक्ति ‘आनन्द’-स्वरूपा है।
२-अवतारके समय भगवान् अपनी शुद्ध प्रकृतिरूप शक्तियोंसहित अवतरित होते हैं और अवतार-कालमें इन शक्तियोंसे काम लेते हैं। श्रीराधाजी भगवान्की शक्ति हैं और उनकी अनुगामिनी अनेक सखियाँ हैं, जो सब भक्तिरूपा हैं और भक्ति प्रदान करनेवाली हैं। भक्तिरहित मनुष्य इनको नहीं जान सकते। इनको भगवान् और राधाजीकी कृपासे ही जान सकते हैं।
श्लोक ६ ]
- साधक-संजीवनी *
२८७
अग्निसे भिन्न भी नहीं हैं और अभिन्न भी नहीं हैं। भिन्न इसलिये नहीं हैं कि वे अग्निरूप ही हैं अर्थात् उन्हें अग्निसे अलग नहीं किया जा सकता, और अभिन्न इसलिये नहीं हैं कि अग्निके रहते हुए भी मन्त्र, औषध आदिसे अग्निकी दाहिका-शक्ति कुण्ठित की जा सकती है। ऐसे ही भगवान्में जो शक्ति रहती है, उसे भगवान्से भिन्न और अभिन्न—दोनों ही नहीं कह सकते।
जैसे दियासलाईमें अग्निकी सत्ता तो सदा रहती है, पर उसकी प्रकाशिका और दाहिका-शक्ति छिपी हुई रहती है; ऐसे ही भगवान् सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें सदा रहते हैं, पर उनकी शक्ति छिपी हुई रहती है। उस शक्तिको अधिष्ठित करके अर्थात् अपने वशमें करके, उसके द्वारा भगवान् प्रकट होते हैं। जैसे, जबतक अग्नि अपनी प्रकाशिका और दाहिका-शक्तिको लेकर प्रकट नहीं होती, तबतक सदा रहते हुए भी अग्नि नहीं दीखती, ऐसे ही जबतक भगवान् अपनी शक्तिको लेकर प्रकट नहीं होते, तबतक भगवान् हरदम रहते हुए भी नहीं दीखते।
राधाजी, सीताजी, रुक्मिणीजी आदि सब भगवान्की निजी दिव्य शक्तियाँ हैं। भगवान् सामान्यरूपसे सब जगह रहते हुए भी कोई काम नहीं करते। जब करते हैं, तब अपनी दिव्य शक्तिको लेकर ही करते हैं। उस दिव्य शक्तिके द्वारा भगवान् विचित्र-विचित्र लीलाएँ करते हैं। उनकी लीलाएँ इतनी विचित्र और अलौकिक होती हैं कि उनको सुनकर, गाकर और याद करके भी जीव पवित्र होकर अपना उद्धार कर लेते हैं।
निर्गुण-उपासनामें वही शक्ति 'ब्रह्मविद्या' हो जाती है, और सगुण-उपासनामें वही शक्ति 'भक्ति' हो जाती है। जीव भगवान्का ही अंश है। जब वह दूसरोंमें मानी हुई ममता हटाकर एकमात्र भगवान्की स्वतःसिद्ध वास्तविक आत्मीयताको जाग्रत् कर लेता है, तब भगवान्की शक्ति उसमें भक्तिरूपसे प्रकट हो जाती है। वह भक्ति इतनी विलक्षण है कि निराकार भगवान्को भी साकाररूपसे प्रकट कर देती है, भगवान्को भी खींच लेती है। वह भक्ति भी भगवान् ही देते हैं।
भगवान्की भक्तिरूप शक्तिके दो रूप हैं—विरह और मिलन। भगवान् विरह भी भेजते हैं*, और मिलन भी।
जब भगवान् विरह भेजते हैं, तब भक्त भगवान्के बिना व्याकुल हो जाता है। व्याकुलताकी अग्निमें संसारकी आसक्ति जल जाती है और भगवान् प्रकट हो जाते हैं। ज्ञानमार्गमें भगवान्की शक्ति पहले उल्टट जिज्ञासाके रूपमें आती है (जिससे तत्त्वको जाने बिना साधकसे रहा नहीं जाता) और फिर ब्रह्मविद्या-रूपसे जीवके अज्ञानका नाश करके उसके वास्तविक स्वरूपको प्रकाशित कर देती है। परन्तु भगवान्की वह दिव्य शक्ति, जिसे भगवान् विरहरूपसे भेजते हैं, उससे भी बहुत विलक्षण है। भगवान् कहाँ हैं? क्या करूँ? कहाँ जाऊँ?—इस प्रकार भक्त व्याकुल हो जाता है, तो यह व्याकुलता सब पापोंका नाश करके भगवान्को साकाररूपसे प्रकट कर देती है। व्याकुलतासे जितना जल्दी काम बनता है, उतना विवेक-विचारपूर्वक किये गये साधनसे नहीं।
विशेष बात
भगवान् अपनी प्रकृतिके द्वारा अवतार लेते हैं और तरह-तरहकी अलौकिक लीलाएँ करते हैं। जैसे अग्नि स्वयं कुछ नहीं करती, उसकी प्रकाशिका-शक्ति प्रकाश कर देती है, दाहिका-शक्ति जला देती है; ऐसे ही भगवान् स्वयं कुछ नहीं करते, उनकी दिव्य शक्ति ही सब काम कर देती है। शास्त्रोंमें आता है कि सीताजी कहती हैं—'रावणको मारना आदि सब काम मैंने किया है, रामजीने कुछ नहीं किया।'
जैसे मनुष्य और उसकी शक्ति (ताकत) है, ऐसे ही भगवान् और उनकी शक्ति है। उस शक्तिको भगवान्से अलग भी नहीं कह सकते और एक भी नहीं कह सकते। मनुष्यमें जो शक्ति है, उसे वह अपनेसे अलग करके नहीं दिखा सकता, इसलिये वह उससे अलग नहीं है। मनुष्य रहता है, पर उसकी शक्ति घटती-बढ़ती रहती है, इसलिये वह मनुष्यसे एक भी नहीं है। यदि उसकी मनुष्यसे एकता होती तो वह उसके स्वरूपके साथ बराबर रहती, घटती-बढ़ती नहीं। अतः भगवान् और उनकी शक्तिको भिन्न अथवा अभिन्न कुछ भी नहीं कह सकते। दार्शनिकोंने भिन्न भी नहीं कहा और अभिन्न भी नहीं कहा। वह शक्ति अनिवर्चनीय है। भगवान् श्रीकृष्णके उपासक उस शक्तिको श्रीजी-(राधाजी-) के नामसे कहते हैं।
जैसे पुरुष और स्त्री दो होते हैं, ऐसे श्रीकृष्ण और श्रीजी
- संतोंकी वाणीमें आया है—'दरिया हरि किरपा करी, बिरहा दिया पठाय।' अर्थात् भगवान्ने कृपा करके मेरे लिये विरह भेज दिया!
२८८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
दो नहीं हैं। ज्ञानमें तो द्वैतका अद्वैत होता है अर्थात् दो होकर भी एक हो जाता है, और भक्तिमें अद्वैतका द्वैत होता है अर्थात् एक होकर भी दो हो जाता है। जीव और ब्रह्म एक हो जायँ तो 'ज्ञान' होता है और एक ही ब्रह्म दो रूप हो जाय तो 'भक्ति' होती है। एक ही अद्वैत-तत्त्व प्रेमकी लीला करनेके लिये, प्रेमका आस्वादन करनेके लिये, सम्पूर्ण जीवोंको प्रेमका आनन्द देनेके लिये श्रीकृष्ण और श्रीजी—इन दो रूपोंसे प्रकट होता है*। दो रूप होनेपर भी दोनोंमें कौन बड़ा है और कौन छोटा, कौन प्रेमी है और कौन प्रेमास्पद? इसका पता ही नहीं चलता। दोनों ही एक-दूसरेसे बढ़कर विलक्षण दीखते हैं। दोनों एक-दूसरेके प्रति आकृष्ट होते हैं। श्रीजीको देखकर भगवान् प्रसन्न होते हैं और भगवान्को देखकर श्रीजी। दोनोंकी परस्पर प्रेम-लीलासे रसकी वृद्धि होती है। इसीको रास कहते हैं।
भगवान्की शक्तियाँ अनन्त हैं, अपार हैं। उनकी दिव्य शक्तियोंमें ऐश्वर्य-शक्ति भी है और माधुर्य-शक्ति भी। ऐश्वर्य-शक्तिसे भगवान् ऐसे विचित्र और महान् कार्य करते हैं, जिनको दूसरा कोई कर ही नहीं सकता। ऐश्वर्य-शक्तिके कारण उनमें जो महत्ता, विलक्षणता, अलौकिकता दीखती है, वह उनके सिवाय और किसीमें देखने-सुननेमें नहीं आती। माधुर्य-शक्तिमें भगवान् अपने ऐश्वर्यको भूल जाते हैं। भगवान्को भी मोहित करनेवाली माधुर्य-शक्तिमें एक मधुरता, मिठास होती है, जिसके कारण भगवान् बड़े मधुर और प्रिय लगते हैं। जब भगवान् ग्वालबालोंके साथ खेलते हैं, तब माधुर्य-शक्ति प्रकट रहती है। अगर उस समय ऐश्वर्य-शक्ति प्रकट हो जाय तो सारा खेल बिगड़ जाय; ग्वालबाल डर जायँ और भगवान्के साथ खेल भी न सकें। ऐसे ही भगवान् कहीं मित्ररूपसे, कहीं पुत्ररूपसे और कहीं पतिरूपसे प्रकट हो जाते हैं, तो उस समय उनकी ऐश्वर्य-शक्ति छिपी रहती है और माधुर्य-शक्ति प्रकट रहती है। तात्पर्य है कि भगवान् भक्तोंके भावोंके अनुसार उनको आनन्द देनेके लिये ही अपनी ऐश्वर्य-शक्तिको छिपाकर माधुर्य-शक्ति प्रकट कर देते हैं।
जिस समय माधुर्य-शक्ति प्रकट रहती है, उस समय ऐश्वर्य-शक्ति प्रकट नहीं होती और जिस समय ऐश्वर्य-शक्ति प्रकट रहती है, उस समय माधुर्य-शक्ति प्रकट नहीं होती। ऐश्वर्य-शक्ति केवल तभी प्रकट होती है, जब
माधुर्यभावमें कोई शंका पैदा हो जाय। जैसे, माधुर्य-शक्तिके प्रकट रहनेपर भगवान् श्रीकृष्ण बछड़ोंको ढूंढ़ते हैं। परन्तु 'बछड़े कहाँ गये?' यह शंका पैदा होते ही ऐश्वर्य-शक्ति प्रकट हो जाती है और भगवान् तत्काल जान जाते हैं कि बछड़ोंको ब्रह्माजी ले गये हैं।
भगवान्में एक सौन्दर्य-शक्ति भी होती है, जिससे हरेक प्राणी उनमें आकृष्ट हो जाता है। भगवान् श्रीकृष्णके सौन्दर्य-को देखकर मथुरापुरवासिनी स्त्रियाँ आपसमें कहती हैं—
गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य रूपं लावण्यसारमसमोर्ध्वमनन्यसिद्धम् ।
दृगिभः पिबन्त्यनुसवाभिन्वं दुराप- मेकान्तधाम यशसः श्रिय ऐश्वरस्य॥
(श्रीमद्भा० १०।४४।१४)
'इन भगवान् श्रीकृष्णका रूप सम्पूर्ण सौन्दर्यका सार है, सुष्ठिमात्रमें किसीका भी रूप इनके रूपके समान नहीं है। इनका रूप किसीके सँवारने-सजाने अथवा गहने-कपड़ोंसे नहीं, प्रत्युत स्वयंसिद्ध है। इस रूपको देखते-देखते तृप्ति भी नहीं होती; क्योंकि यह नित्य नवीन ही रहता है। समग्र यश, सौन्दर्य और ऐश्वर्य इस रूपके आश्रित है। इस रूपके दर्शन बहुत ही दुर्लभ हैं। गोपियोंने पता नहीं कौन-सा तप किया था, जो अपने नेत्रोंके दोनोंसे सदा इनकी रूप-माधुरीका पान किया करती हैं!'
शुकदेवजी कहते हैं—
निरीक्ष्य तावुतमपूरुषी जना मञ्चस्थिता नागरराष्ट्रका नृप।
प्रहर्षवेगोत्कलितेक्षणानानाः
पपुर्न तृप्ता नयनेस्तदाननम्॥ पिबन्त इव चक्षुर्भ्यां लिहन्त इव जिह्वाया। जिघ्रन्त इव नासाभ्यां शिलष्यन्त इव बाहुभिः॥
(श्रीमद्भा १०।४३।२०-२१)
'परीक्षित! मंचोंपर जितने लोग बैठे थे, वे मथुराके नागरिक और राष्ट्रके जन-समुदाय पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीको देखकर इतने प्रसन्न हुए कि उनके नेत्र और मुखकमल खिल उठे, उत्कण्ठासे भर गये। वे नेत्रोंद्वारा उनकी मुख-माधुरीका पान करते-करते तृप्त ही नहीं होते थे; मानो वे उन्हें नेत्रोंसे पी रहे हों, जिह्वासे चाट रहे हों, नासिकासे सूँघ रहे हों और भुजाओंसे पकड़कर
- येयं राधा यश्च कृष्णो रसाब्धिर्देहश्चैकः क्रीडनार्थं द्विधाभूत् । (श्रीराधातापनीयोपनिषद्)
'जो ये राधा और जो ये कृष्ण रसके सागर हैं, वे एक ही हैं, पर लीलाके लिये दो रूप बने हुए हैं।'
श्लोक ६ ] * साधक-संजीवनी * २८९
हृदयसे सटा रहे हों!'
भगवान् श्रीरामके सौन्दर्यको देखकर विदेह राजा
जनक भी विदेह अर्थात् देहकी सुध-बुधसे रहित हो जाते हैं-
मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेह बिदेह बिसेषी॥
(मानस १।२१५।४)
और कहते हैं-
सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥
(मानस १।२१६।२)
वनमें रहनेवाले कोल-भील भी भगवान्के विग्रहको
देखकर मुग्ध हो जाते हैं-
करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे॥
चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े॥
(मानस २।१३५।३)
प्रेमियोंकी तो बात ही क्या, वैरभाव रखनेवाले राक्षस
खर-दूषण भी भगवान्के विग्रहकी सुन्दरताको देखकर
चकित हो जाते हैं और कहते हैं-
नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते॥
हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई॥
(मानस ३।१९।२)
तात्पर्य है कि भगवान्के दिव्य सौन्दर्यकी ओर प्रेमी,
विरक्त, ज्ञानी, मूर्ख, वैरी, असुर और राक्षसतक सबका मन
आकृष्ट हो जाता है।
‘सम्भवाम्यात्ममायया’—जो मनुष्य भगवान्से विमुख
रहते हैं, उनके सामने भगवान् अपनी योगमायामें छिपे रहते
हैं और साधारण मनुष्य-जैसे ही दीखते हैं। मनुष्य ज्यों-
ज्यों भगवान्के सम्मुख होता जाता है, त्यों-त्यों भगवान्
उसके सामने प्रकट होते जाते हैं। इसी योगमायाका आश्रय
लेकर भगवान् विचित्र-विचित्र लीलाएँ करते हैं।
भगवद्विमुख मूढ़ पुरुषके आगे दो परदे रहते हैं-
एक तो अपनी मूढ़ताका और दूसरा भगवान्की योग-
मायाका (गीता-सातवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक)।
अपनी मूढ़ता रहनेके कारण भगवान्का प्रभाव साक्षात् सामने
प्रकट होनेपर भी वह उसे समझ नहीं सकता; जैसे-
द्रौपदीका चीर-हरण करनेके लिये दु:शासन अपना पूरा
बल लगाता है, उसकी भुजाएँ थक जाती हैं, पर साड़ीका
अन्त नहीं आता-
द्रुपद सुता निरबल भइ ता दिन, तजि आये निज धाम।
दुस्सासन की भुजा थकित भई, बसन-रूप भए स्याम॥
-इस प्रकार भगवान्ने सभाके भीतर अपना ऐश्वर्य
साक्षात् प्रकट कर दिया। परन्तु अपनी मूढ़ताके कारण
दु:शासन, दुर्योधन, कर्ण आदिपर इस बातका कोई असर
ही नहीं पड़ा कि द्रौपदीके द्वारा भगवान्को पुकारनेमात्रसे
कितनी विलक्षणता प्रकट हो गयी! एक स्त्रीका चीरहरण
भी नहीं कर सके तो और क्या कर सकते हैं! इस तरफ
उनकी दृष्टि ही नहीं गयी। भगवान्का प्रभाव सामने देखते
हुए भी वे उसे जान नहीं सके।
यदि जीव अपनी मूढ़ता (अज्ञान) दूर कर दे तो उसे
अपने स्वरूपका अथवा परमात्मतत्त्वका बोध तो हो जाता
है, पर भगवान्के दर्शन नहीं होते। भगवान्के दर्शन तभी
होते हैं, जब भगवान् अपनी योगमायाका परदा हटा देते
हैं। अपना अज्ञान मिटाना तो जीवके हाथकी बात है, पर
योग-मायाको दूर करना उसके हाथकी बात नहीं है। वह
सर्वथा भगवान्के शरण हो जाय तो भगवान् अपनी शक्तिसे
उसका अज्ञान भी मिटा सकते हैं और दर्शन भी दे सकते हैं।
भगवान् जितनी लीलाएँ करते हैं, सब योगमायाका
आश्रय लेकर ही करते हैं। इसी कारण उनकी लीलाको
देख सकते हैं, उसका अनुभव कर सकते हैं। यदि वे योग-
मायाका आश्रय न लें तो उनकी लीलाको कोई देख ही
नहीं सकता, उसका आस्वादन कोई कर ही नहीं सकता।
अवतार-सम्बन्धी विशेष बात
अवतारका अर्थ है-नीचे उतरना। सब जगह परिपूर्ण
रहनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा अपने अनन्य भक्तोंकी
इच्छा पूरी करनेके लिये अत्यधिक कृपासे एक स्थान-
विशेषमें अवतार लेते हैं और छोटे बन जाते हैं। दूसरे
लोगोंका प्रभाव या महत्त्व तो बड़े हो जानेसे होता है, पर
भगवान्का प्रभाव या महत्त्व छोटे हो जानेसे होता है। कारण
१-योगमायाका आश्रय लेकर ही भगवान् रासलीला करते हैं-
भगवानपि ता रात्री: शरदोत्फुल्लमालिका:। वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रित:॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१)
२-अपने स्वरूपका बोध होनेपर भगवान्के दर्शन हो जायँ-ऐसा नियम नहीं है। परन्तु भगवान्के दर्शन होनेपर अपने
स्वरूपका बोध भी हो जाता है। इसलिये भगवान् कहते हैं-
मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा॥ (मानस ३।३६।५)
१९०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
कि अपार, असीम, अनन्त होकर भी भगवान् छोटे-से बन जाते हैं—यह उनकी विलक्षणता ही है। जैसे, भगवान् अनन्त ब्रह्माण्डोंको धारण करते हैं; परन्तु एक पर्वतको धारण करनेसे भगवान् 'गिरिधारी' नामसे प्रसिद्ध हो गये! अनन्त ब्रह्माण्ड जिनके रोम-रोममें स्थित है*, ऐसे परमेश्वर एक पर्वतको उठा लें—यह कोई बड़ी बात नहीं, प्रत्युत छोटी बात है। परन्तु छोटी बातमें ही भगवान्की बड़ी बात होती है। इसी प्रकार अवतार लेनेमें ही भगवान्की विशेषता है।
साधारण आदमी जिस स्थितिपर है, उसी स्थितिपर आकर भगवान् वैसी लीला करते हैं। बिलकुल भोले-भाले साधारण बालककी तरह बनकर लीला करते हैं। ग्वालबालोंसे खेलते समय वे दूसरे ग्वालबालसे हार भी जाते हैं। जो ग्वालबाल जीत जाता है, वह सवार बन जाता है और भगवान् घोड़ा बन जाते हैं। यह उनकी विशेष महत्ता है।
भगवान्के प्रभावको जाननेवाले ज्ञानी महात्मा लोगो उनके स्वरूपमें मस्त रहते हैं; पर भक्तोंको उनकी साधारण अन्न बालककी तरह भोली-भाली लीला बड़ी विचित्र और मीठी लगती है। वहाँ ज्ञानियोंका ज्ञान नहीं चलता। ज्ञानियोंके शिरोमणि ब्रह्माजी भी भगवान्की लीलाको देखकर चकरा गये! बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, योगी-तपस्वी,
संत-महात्मा भी उनकी लीलाओंके रहस्यको नहीं जान सकते और इस विषयमें मूक हो जाते हैं। भगवान् ही कृपा करके जिन प्यारे अन्तरंग भक्तोंको जानाना चाहते हैं, वे ही उनकी लीलाके तत्त्वको जान पाते हैं—'सोड् जानइ जेहि देहु जनाई' (मानस २।१२७।२)। गायें चराते समय, ग्वालबालोंसे खेलते समय भी भगवान् बड़े-बड़े प्रभावशाली कार्य कर देते हैं। बड़े-बड़े बलवान् राक्षसोंको भी चुर्चुरियोंमें ही खत्म कर देते हैं। छोटे-से बालक बननेपर भी उनका प्रभाव वैसा-का-वैसा ही रहता है।
जैसे कोई बहुत बड़ा विद्वान् किसी बालकको वर्णमाला सिखाता है, तो वह बालकका हाथ पकड़कर उससे 'क ख ग ....' लिखवाता है और मुँहसे भी वैसा बोलता है; परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वह विद्वान् स्वयं वर्णमाला सीखता है। वह तो बालककी स्थितिमें आकर उसे सिखाता है, जिससे वह सुगमतापूर्वक सीख जाय। ऐसे ही अनन्तब्रह्माण्डनायक भगवान् हमलोगोंके बीच हमारे सामने आते हैं और हमारी तरह ही बनकर हमें शिक्षा देते हैं। उनकी बड़ी अलौकिक विचित्र-विचित्र लीलाएँ होती हैं, जिनका श्रवण, पठन और गायन करनेसे भी लोगोंका उद्धार हो जाता है।
परिशिष्ट भाव —भगवान् प्रकृतिकी सहायतासे ही क्रिया (लीला) करते हैं। इसीलिये सीताजी कहती हैं कि सब कार्य मैंने किये हैं, भगवान् रामने कुछ नहीं किया (अध्यात्मरामायण, बाल० पहले अध्यायके बत्तीसवेंसे तैंतालिसवें श्लोकतक)। परन्तु भगवान् मनुष्यको तरह प्रकृतिके अधीन नहीं होते—'प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय।' कारण कि भगवान्के लिये प्रकृति 'पर' नहीं है, प्रत्युत उनसे अभिन्न है (गीता—सातवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक)। भगवान्को प्रकृतिमें स्थित मनुष्योंके सामने आना है, इसलिये वे प्रकृतिको स्वीकार करके प्रकट होते हैं। तभी मनुष्य उनको देख सकते हैं।
सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके श्लोकमें अपने अवतारका अवसर बताते हैं।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ ७ ॥
| भारत | = हे भरतवंशी | अधर्मस्य | = अधर्मकी | अहम् | = मैं |
|---|---|---|---|---|---|
| अर्जुन! | अभ्युत्थानम् | = वृद्धि | आत्मानम् | = अपने- | |
| यदा, यदा | = जब-जब | भवति | = होती है, | आपको | |
| धर्मस्य | = धर्मकी | तदा | = तब-तब | सृजामि | = (साकाररूपसे) |
| ग्लानिः | = हानि (और) | हि | = ही | प्रकट करता हूँ। |
- रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड। (मानस १।२०१)
श्लोक ७]
- साधक-संजीवनी *
२११
व्याख्या— ‘यदा यदा हि धर्मस्य ..... अभ्युत्थान-मधर्मस्य’—धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धिका स्वरूप है—भगवत्प्रेमी, धर्मात्मा, सदाचारी, निरपराध और निर्बल मनुष्योंपर नास्तिक, पापी, दुराचारी और बलवान् मनुष्योंका अत्याचार बढ़ जाना तथा लोगोंमें सदगुण-सदाचारोंकी अत्यधिक कमी और दुर्गुण-दुराचारोंकी अत्यधिक वृद्धि हो जाना।
‘यदा यदा’ पदोंका तात्पर्य है कि जब-जब आवश्यकता पड़ती है, तब-तब भगवान् अवतार लेते हैं। एक युगमें भी जितनी बार आवश्यकता और अवसर प्राप्त हो जाय, उतनी बार अवतार ले सकते हैं। उदाहरणार्थ, समुद्र-मन्थनके समय भगवान्ने अजितरूपसे समुद्र-मन्थन किया, कच्छरूपसे मन्दराचलको धारण किया तथा सहस्रबाहुरूपसे मन्दराचलको ऊपरसे दबाकर रखा। फिर देवताओंको अमृत बाँटनेके लिये मोहिनी-रूप धारण किया। इस प्रकार भगवान्ने एक साथ अनेक रूप धारण किये।
अधर्मकी वृद्धि और धर्मका ह्रास होनेका मुख्य कारण है—नाशवान् पदार्थोंकी ओर आकर्षण। जैसे माता और पितासे शरीर बनता है, ऐसे ही प्रकृति और परमात्मासे सृष्टि बनती है। इसमें प्रकृति और उसका कार्य संसार तो प्रतिक्षण बदलता रहता है, कभी क्षणमात्र भी एकरूप नहीं रहता और परमात्मा तथा उनका अंश जीवात्मा—दोनों सम्पूर्ण देश, काल आदिमें नित्य-निरन्तर रहते हैं, इनमें कभी किञ्चिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं होता। जब जीव अनित्य, उत्पत्ति-विनाशशील प्राकृत पदार्थोंसे सुख पानेकी इच्छा करने लगता है और उनकी प्राप्तिमें सुख मानने लगता है, तब उसका पतन होने लगता है। लोगोंकी सांसारिक भोग और संग्रहमें ज्यों-ज्यों आसक्ति बढ़ती है, त्यों-ही-त्यों समाजमें अधर्म बढ़ता है और ज्यों-ज्यों अधर्म बढ़ता है, त्यों-ही-त्यों समाजमें पापाचरण, कलह, विद्रोह आदि दोष बढ़ते हैं।
सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग—इन चारों युगोंकी ओर देखा जाय तो इनमें भी क्रमशः धर्मका ह्रास होता है। सत्ययुगमें धर्मके चारों चरण रहते हैं, त्रेतायुगमें धर्मके तीन चरण रहते हैं, द्वापरयुगमें धर्मके दो चरण रहते हैं और कलियुगमें धर्मका केवल एक चरण शेष रहता है। जब युगकी मर्यादासे भी अधिक धर्मका ह्रास हो जाता है, तब भगवान् धर्मकी पुनः स्थापना करनेके लिये अवतार
लेते हैं।
‘तदात्मानं सुजाय्यहम्’ —जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब भगवान् अवतार ग्रहण करते हैं। अतः भगवान्के अवतार लेनेका मुख्य प्रयोजन है—धर्मकी स्थापना करना और अधर्मका नाश करना।
धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होनेपर लोगोंकी प्रवृत्ति अधर्ममें हो जाती है। अधर्ममें प्रवृत्ति होनेसे स्वाभाविक पतन होता है। भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद् हैं। इसलिये लोगोंको पतनमें जानेसे रोकनेके लिये वे स्वयं अवतार लेते हैं।
कर्मोंमें सकामभाव उत्पन्न होना ही धर्मकी हानि है और अपने-अपने कर्तव्यसे च्युत होकर निषिद्ध आचरण करना ही अधर्मका अभ्युत्थान है! ‘काम’ अर्थात् कामनासे ही सब-के-सब अधर्म, पाप, अन्याय आदि होते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका सँतोसवॉ श्लोक)। अतः इस ‘काम’का नाश करनेके लिये तथा निष्कामभावका प्रसार करनेके लिये भगवान् अवतार लेते हैं।
यहाँ शंका हो सकती है कि वर्तमान समयमें धर्मका ह्रास और अधर्मकी वृद्धि बहुत हो रही है, फिर भगवान् अवतार क्यों नहीं लेते? इसका समाधान यह है कि युगको देखते हुए अभी वैसा समय नहीं आया है, जिससे भगवान् अवतार लें। त्रेतायुगमें राक्षसोंने ऋषि-मुनियोंको मारकर उनकी हड्डियोंके ढेर लगा दिये थे। यह तो त्रेतायुगसे भी गया-बीता कलियुग है, पर अभी धर्मात्मा पुरुष जी रहे हैं, उनका कोई नाश नहीं करता। दूसरी एक बात और है। जब धर्मका ह्रास और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब भगवान्की आज्ञासे संत इस पृथ्वीपर आते हैं अथवा यहींसे विशेष साधक पुरुष प्रकट हो जाते हैं और धर्मकी स्थापना करते हैं। कभी-कभी परमात्माको प्राप्त हुए कारक महापुरुष भी संसारका उद्धार करनेके लिये आते हैं। साधक और सन्त पुरुष जिस देशमें रहते हैं, उस देशमें अधर्मकी वैसी वृद्धि नहीं होती और धर्मकी स्थापना होती है।
जब साधकों और सन्त-महात्माओंसे भी लोग नहीं मानते, प्रत्युत उनका विनाश करना आरम्भ कर देते हैं और जब धर्मका प्रचार करनेवाले बहुत कम रहते हैं तथा जिस युगमें जैसा धर्म होना चाहिये, उसकी अपेक्षा भी बहुत अधिक धर्मका ह्रास हो जाता है, तब भगवान् स्वयं आते हैं।
२९२ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ४
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अपने अवतारके अवसरका वर्णन करके अब भगवान् अपने अवतारका प्रयोजन बताते हैं।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ८ ॥
साधूनाम् = साधुओं
(भक्तों)-की
परित्राणाय = रक्षा करनेके लिये,
दुष्कृताम् = पापकर्म
करनेवालोंका
विनाशाय = विनाश करनेके
लिये
च = और
धर्मसंस्थापनार्थाय = धर्मकी
भलीभाँति
स्थापना करनेके
लिये (मैं)
युगे, युगे = युग-युगमें
सम्भवामि = प्रकट हुआ
करता हूँ।
व्याख्या—'परित्राणाय साधूनाम्'—साधु मनुष्योंके
द्वारा ही अधर्मका नाश और धर्मका प्रचार होता है, इसलिये
उनकी रक्षा करनेके लिये भगवान् अवतार लेते हैं।
दूसरोंका हित करना ही जिनका स्वभाव है और जो
भगवान्के नाम, रूप, गुण, प्रभाव, लीला आदिका श्रद्धा-
प्रेमपूर्वक स्मरण, कीर्तन आदि करते हैं और लोगोंमें भी
इसका प्रचार करते हैं, ऐसे भगवान्के आश्रित भक्तोंके
लिये यहाँ 'साधूनाम्' पद आया है।
जिसका एकमात्र परमात्म-प्राप्तिका उद्देश्य है, वह
साधु है* और जिसका नाशवान् संसारका उद्देश्य है, वह
असाधु है।
असत् और परिवर्तनशील वस्तुमें सद्भाव करने और
उसे महत्त्व देनेसे कामनाएँ पैदा होती हैं। ज्यों-ज्यों
कामनाएँ नष्ट होती हैं, त्यों-त्यों साधुता आती है और
ज्यों-ज्यों कामनाएँ बढ़ती हैं, त्यों-त्यों साधुता लुप्त होती
है। कारण कि असाधुताका मूल हेतु कामना ही है। साधुतासे
अपना उद्धार और लोगोंका स्वतः उपकार होता है।
साधु पुरुषके भावों और क्रियाओंमें पशु, पक्षी, वृक्ष,
पर्वत, मनुष्य, देवता, पितर, ऋषि, मुनि आदि सबका हित
भरा रहता है—
हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।
(मानस ७। ४७। ३)
यदि लोग उसके मनके भावोंको जान जायँ तो वे
उसके चरणोंके दास बन जायँ। इसके विपरीत यदि लोग
दुष्ट पुरुषके मनके भावोंको जान जायँ तो दिनमें कई बार
लोगोंसे उसकी पिटाई हो।
यहाँ शंका हो सकती है कि यदि भगवान् साधु
पुरुषोंकी रक्षा किया करते हैं तो फिर संसारमें साधु पुरुष
दुःख पाते हुए क्यों देखे जाते हैं? इसका समाधान यह है
कि साधु पुरुषोंकी रक्षाका तात्पर्य उनके भावोंकी रक्षा है;
शरीर, धन-सम्पत्ति, मान-बड़ाई आदिकी रक्षा नहीं; कारण
कि वे इन सांसारिक पदार्थोंको महत्त्व नहीं देते। भगवान्
भी इन वस्तुओंको महत्त्व नहीं देते; क्योंकि सांसारिक
पदार्थोंको महत्त्व देनेसे ही असाधुता पैदा होती है।
भक्तोंमें सांसारिक पदार्थोंका महत्त्व, उद्देश्य होता ही
नहीं; तभी तो वे भक्त हैं। भक्तलोग प्रतिकूलता-(दुःखदायी
परिस्थिति-) में विशेष प्रसन्न होते हैं; क्योंकि प्रतिकूलतासे
जितना आध्यात्मिक लाभ होता है, उतना किसी दूसरे
साधनसे नहीं होता। वास्तवमें भक्ति भी प्रतिकूलतामें ही
बढ़ती है। सांसारिक राग, आसक्तिसे ही पतन होता है और
प्रतिकूलतासे वह राग टूटता है। इसलिये भगवान्का भक्तोंके
लिये प्रतिकूलता भेजना भी वास्तवमें भक्तोंकी रक्षा करना
है।
'विनाशाय च दुष्कृताम्'—दुष्ट मनुष्य अधर्मका
प्रचार और धर्मका नाश करते हैं, इसलिये उनका विनाश
करनेके लिये भगवान् अवतार लेते हैं।
जो मनुष्य कामनाके अत्यधिक बढ़नेके कारण झूठ,
कपट, छल, बेईमानी आदि दुर्गुण-दुराचारोंमें लगे हुए हैं,
जो निरपराध सद्गुण, सदाचारी, साधुओंपर अत्याचार
किया करते हैं, जो दूसरोंका अहित करनेमें ही लगे रहते
हैं, जो प्रवृत्ति और निवृत्तिको नहीं जानते, भगवान् और
वेद-शास्त्रोंका विरोध करना ही जिनका स्वभाव हो गया
है, ऐसे आसुरी सम्पत्तिमें अधिक रचे-पचे रहकर वैसा
ही बुरा आचरण करनेवाले मनुष्योंके लिये यहाँ 'दुष्कृताम्'
पद आया है। भगवान् अवतार लेकर ऐसे ही दुष्ट
मनुष्योंका विनाश करते हैं।
- साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः। (गीता ९। ३०)