भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक ६ ]

  • साधक-संजीवनी *

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करना चाहते थे। पहले अध्यायके तैतीसवें श्लोकमें अर्जुनने कहा था कि जिनके लिये हमारी राज्य, भोग और सुखकी इच्छा है, वे ही ये कुटुम्बी प्राणोंकी और धनकी आशा छोड़कर युद्धमें खड़े हैं—इससे सिद्ध होता है कि अर्जुन राज्य, भोग और सुख चाहते थे। अतः नाशवान् पदार्थोंकी कामना होनेके कारण वे अपने पूर्वजन्मोंको नहीं जानते थे।

ममता-आसक्तिपूर्वक अपने सुखभोग और आरामके लिये धनादि पदार्थोंका संग्रह करना 'परिग्रह' कहलाता है। परिग्रहका सर्वथा त्याग करना अर्थात् अपने सुख, आराम आदिके लिये किसी भी वस्तुका संग्रह न करना 'अपरिग्रह' कहलाता है। अपरिग्रहकी दृढ़ता होनेपर पूर्वजन्मोंका ज्ञान हो जाता है—

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। अब आगेके श्लोकमें भगवान् अपने जन्म-(अवतार-) की विलक्षणता बताते हैं।

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवास्यात्ममायया ॥ ६ ॥

अजः | = (मैं) अजन्मा (और) | भूतानाम् | = सम्पूर्ण प्राणियोंका | प्रकृतिम् | = प्रकृतिको ---|---|---|---|---|--- अव्ययात्मा | = अविनाशी-स्वरूप | ईश्वरः | = ईश्वर | अधिष्ठाय | = अधीन करके सन् | = होते हुए | सन् | = होते हुए | आत्ममायया | = अपनी योगमायासे अपि | = भी (तथा) | अपि | = भी | सम्भवाभि | = प्रकट होता हूँ। | | स्वाम् | = अपनी | |

व्याख्या—[यह छठा श्लोक है और इसमें छः बातोंका भगवान्की हैं*; प्रकृति और योगमाया—ये दो बातें ही वर्णन हुआ है। अज, अव्यय और ईश्वर—ये तीन बातें भगवान्की शक्तिकी हैं और एक बात भगवान्के प्रकट

  • गीतामें भगवान्ने अपने अज, अव्यय और ईश्वर—इन तीनों रूपोंको जानने और न जाननेकी बात कही है; जैसे— १-'अज'-स्वरूपको जाननेकी बात—

यो मामजमनादि च वेति लोकमहेश्वरम्। असम्भूढः स मत्स्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ (१०।३) न जाननेकी बात—

मृदोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ (७।२५)

२-'अव्यय'-स्वरूपको जाननेकी बात—

भजन्त्यन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिव्ययम् ॥ (९।१३) न जाननेकी बात—

परं भावमजानन्तो ममाव्ययमन्तुतम् ॥ (७।२४)

३-'ईश्वर'-स्वरूपको जाननेकी बात—

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमुच्छति ॥ (५।२९) न जाननेकी बात—

अवजानन्ति मां मृढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ (९।११)

अपरिग्रहस्थैरे जन्मकथन्तासंबोधः।

(पातंजलयोगदर्शन २।३९)

संसार (क्रिया और पदार्थ) सदैव परिवर्तनशील और असत् है; अतः उसमें अभाव (कमी) होना निश्चित है। अभावरूप संसारसे सम्बन्ध जोड़नेके कारण मनुष्यको अपनेमें भी अभाव दीखने लग जाता है। अभाव दीखनेके कारण उसमें यह कामना पैदा हो जाती है कि अभावकी तो पूर्ति हो जाय, फिर नया और मिले। इस कामनाकी पूर्तिमें ही वह दिन-रात लगा रहता है। परन्तु कामनाकी पूर्ति होनेवाली है नहीं। कामनाओंके कारण मनुष्य बेहोश-सा हो जाता है। अतः ऐसे मनुष्यको अनेक जन्मोंका ज्ञान तो दूर रहा, वर्तमान कर्तव्यका भी ज्ञान (क्या कर रहा हूँ और क्या करना चाहिये) नहीं होता।