भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ४ ]

श्रीभगवान् बोले—

परन्तप= हे परन्तपबहूनि= बहुत-सेअहम्= मैं
अर्जुन= अर्जुन!जन्मानि= जन्मवेद= जानता हूँ, (पर)
मे= मेरेव्यतीतानि= हो चुके हैं।त्वम्= तू
= औरतानि= उन= नहीं
तव= तेरेसर्वाणि= सबकोवेत्थ= जानता।

व्याख्या—[तीसरे श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको अपना भक्त और प्रिय सखा कहा था, इसलिये पीछेके श्लोकमें अर्जुन अपने हृदयकी बात निःसंकोच होकर पूछते हैं। अर्जुनमें भगवान्के जन्म-रहस्यको जाननेकी प्रबल जिज्ञासा उत्पन्न हुई है, इसलिये भगवान् उनके सामने मित्रताके नाते अपने जन्मका रहस्य प्रकट कर देते हैं। यह नियम है कि श्रोताकी प्रबल जिज्ञासा होनेपर वक्ता अपनेको छिपाकर नहीं रख सकता। इसलिये सन्त-महात्मा भी अपनेमें विशेष श्रद्धा रखनेवालोंके सामने अपने-आपको प्रकट कर सकते हैं*—]

गूढुठ तत्त्वं न साधु दुरावहिं।

आरत अधिकारी जहं पावहिं॥

(मानस १।११०।१)

‘बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन’— समय-समयपर मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। परन्तु मेरा जन्म और तरहका है (जिसका वर्णन आगे छठे श्लोकमें करेंगे) और तेरा (जीवका) जन्म और तरहका है (जिसका वर्णन आठवें अध्यायके उन्नीसवें और तेरहवें अध्यायके इक्कीसवें एवं छब्बीसवें श्लोकमें करेंगे)। तात्पर्य यह कि मेरे और तेरे बहुत-से जन्म होनेपर भी वे अलग-अलग प्रकारके हैं।

दूसरे अध्यायके बारहवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा था कि मैं (भगवान्) और तू तथा ये राजालोग (जीव) पहले नहीं थे और आगे नहीं रहेंगे—ऐसा नहीं है। तात्पर्य यह कि भगवान् और उनका अंश जीवात्मा—दोनों ही अनादि और नित्य हैं।

‘तान्यहं वेद सर्वाणि’—संसारमें ऐसे ‘जातिस्मर’ जीव भी होते हैं, जिनको अपने पूर्वजन्मोंका ज्ञान होता है। ऐसे महापुरुष ‘युंजान योगी’ कहलाते हैं, जो साधना करके सिद्ध होते हैं। साधनामें अभ्यास करते-करते इनकी वृत्ति इतनी तेज हो जाती है कि ये जहाँ वृत्ति लगाते हैं, वहींका ज्ञान इनको हो जाता है। ऐसे योगी कुछ सीमातक ही अपने पुराने जन्मोंको जान सकते हैं, सम्पूर्ण जन्मोंको नहीं। इसके विपरीत भगवान् ‘युक्तयोगी’ कहलाते हैं, जो साधना किये बिना स्वतःसिद्ध, नित्य योगी हैं। जन्मोंको जाननेके लिये उन्हें वृत्ति नहीं लगानी पड़ती, प्रत्युत उनमें अपने और जीवोंके भी सम्पूर्ण जन्मोंका स्वतः-स्वाभाविक ज्ञान सदा बना रहता है। उनके ज्ञानमें भूत, भविष्य और वर्तमानका भेद नहीं है, प्रत्युत उनके अखण्ड ज्ञानमें सभी कुछ सदा वर्तमान ही रहता है (गीता ७।२६)। कारण कि भगवान् सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिमें पूर्णरूपसे विद्यमान रहते हुए भी इनसे सर्वथा अतीत रहते हैं।

['मैं उन सबको जानता हूँ—भगवान्के इस वचनसे साधकोंको एक विशेष आनन्द आना चाहिये कि हम भगवान्की जानकारीमें हैं, भगवान् हमें निरन्तर देख रहे हैं! हम कैसे ही क्यों न हों, पर हैं भगवान्के ज्ञानमें।]

‘न त्वं वेत्थ परन्तप’—जन्मोंको न जाननेमें मूल हेतु है—अन्तःकरणमें नाशवान् पदार्थोंका आकर्षण, महत्त्व होना। इसीके कारण मनुष्यका ज्ञान विकसित नहीं होता। अर्जुनके अन्तःकरणमें नाशवान् पदार्थोंका, व्यक्तियोंका महत्त्व था, इसीलिये वे कुटुम्बियोंके मरनेके भयसे युद्ध नहीं

  • सन्त-महात्मा भी स्वयं छिपे रहते हैं और सबके सामने प्रकट नहीं होते। परन्तु निम्नलिखित तीन अवसरोंपर वे अपने-आपको प्रकट कर देते हैं—

१—जब कोई अत्यधिक श्रद्धालु सामने आ जाय और उसमें उन्हें (सन्त-महात्माको) जाननेकी उत्कट अभिलाषा हो।

२—जब अपने किसी प्रेमीका शरीर छूटनेवाला हो।

३—जब सन्त-महात्माका अपना कहलानेवाला शरीर छूट रहा हो।

दूसरे और तीसरे अवसरपर सन्त-महात्मा उस व्यक्तिके सामने भी अपने-आपको प्रकट कर देते हैं, जिसमें उतनी अधिक श्रद्धा तो नहीं है, पर वह उन सन्त-महात्माका हृदयसे आदर करता है और उन्हें जानना चाहता है।

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