श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
चल ही रहा था और धृतराष्ट्रके भीतर भी आक्षेपपूर्वक पूछनेका भाव नहीं था। है। धृतराष्ट्र संजयसे भिन्न-भिन्न प्रकारकी छोटी-बड़ी सब घटनाओंको अनुक्रमसे विस्तारपूर्वक ठीक-ठीक जाननेके
यहाँ ‘क्लिम्’ शब्दका अर्थ प्रश्न लेना ही ठीक बैठता लिये ही प्रश्न कर रहे हैं।
परिशिष्ट भाव— ‘मेरे पुत्र (मामकाः) और ‘पाण्डुके पुत्र’ (पाण्डवाः)—इस मतभेदसे ही राग-द्वेष पैदा हुए, जिससे लड़ाई हुई, हलचल हुई। धृतराष्ट्रके भीतर पैदा हुए राग-द्वेषका फल यह हुआ कि सौ-के-सौ कौरव मारे गये, पर पाण्डव एक भी नहीं मारा गया!
जैसे दही बिलोते हैं तो उसमें हलचल पैदा होती है, जिससे मक्खन निकलता है, ऐसे ही ‘मामकाः’ और ‘पाण्डवाः’ के भेदसे पैदा हुई हलचलसे अर्जुनेके मनमें कल्याणकी अभिलाषा जाग्रत् हुई, जिससे भगवद्गीतारूपी मक्खन निकला!
तात्पर्य यह हुआ कि धृतराष्ट्रके मनमें होनेवाली हलचलसे लड़ाई पैदा हुई और अर्जुनेके मनमें होनेवाली हलचलसे गीता प्रकट हुई!
सम्बन्ध—धृतराष्ट्रके प्रश्नका उत्तर संजय आगेके श्लोकसे देना आरम्भ करते हैं।
सज्जय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥
संजय बोले—
| तदा | = उस समय | दृष्ट्वा | = देखकर | राजा | = राजा |
|---|---|---|---|---|---|
| व्यूढम् | = वज्रव्यूहसे | ||||
| खड़ी हुई | तु | = और | दुर्योधनः | = दुर्योधन (यह) | |
| पाण्डवानीकम् | = पाण्डव-सेनाको | आचार्यम् | = द्रोणाचार्यके | वचनम् | = वचन |
| उपसङ्गम्य | = पास जाकर | अब्रवीत् | = बोला। |
व्याख्या— ‘तदा’—जिस समय दोनों सेनाएँ युद्धके लिये खड़ी हुई थीं, उस समयकी बात संजय यहाँ ‘तदा’ पदसे कहते हैं। कारण कि धृतराष्ट्रका प्रश्न ‘युद्धकी इच्छावाले मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया’—इस विषयको सुननेके लिये ही है।
‘दृष्ट्वा’ पाण्डवानीकं व्यूढम्—पाण्डवोंकी वज्रव्यूह-से खड़ी सेनाको देखनेका तात्पर्य है कि पाण्डवोंकी सेना बड़ी ही सुचारुरूपसे और एक ही भावसे खड़ी थी अर्थात् उनके सैनिकोंमें दो भाव नहीं थे, मतभेद नहीं था। उनके पक्षमें धर्म और भगवान् श्रीकृष्ण थे। जिसके पक्षमें धर्म और भगवान् होते हैं, उसका दूसरोंपर बड़ा असर
पड़ता है। इसलिये संख्यामें कम होनेपर भी पाण्डवोंकी सेनाका तेज (प्रभाव) था और उसका दूसरोंपर बड़ा असर पड़ता था। अतः पाण्डव-सेनाका दुर्योधनपर भी बड़ा असर पड़ा, जिससे वह द्रोणाचार्यके पास जाकर नीतियुक्त गंभीर वचन बोला है।
‘राजा दुर्योधनः’—दुर्योधनको राजा कहनेका तात्पर्य है कि धृतराष्ट्रका सबसे अधिक अपनापन (मोह) दुर्योधनमें ही था। परम्पराकी दृष्टिसे भी युवराज दुर्योधन ही था। राज्यके सब कार्यकी देखभाल दुर्योधन ही करता था। धृतराष्ट्र तो नाममात्रके राजा थे। युद्ध होनेमें भी मुख्य हेतु दुर्योधन ही था। इन सभी कारणोंसे संजयने दुर्योधनके लिये
१-इस अध्यायमें तीन बार ‘दृष्ट्वा’ (देखकर) पदका प्रयोग हुआ है—पाण्डव-सेनाको देखकर दुर्योधनका द्रोणाचार्यके पास जाना (१।२); कौरव-सेनाको देखकर अर्जुनका धनुषको उठाना (१।२०); और अपने स्वजनों- (कुटुम्बियों-) को देखकर अर्जुनका मोहाविष्ट होना (१।२८)। इन तीनोंमेंसे दो ‘दृष्ट्वा’ तो आपसमें सेना देखनेके लिये आये हैं और एक ‘दृष्ट्वा’ स्वजनोंको देखनेके लिये आया है, जिससे अर्जुनका भाव बदल जाता है।
२-कौरव-सेनामें मतभेद था; क्योंकि दुर्योधन, दुःशासन आदि तो युद्ध करना चाहते थे, पर भीष्म, द्रोण, विकर्ण आदि युद्ध नहीं करना चाहते थे। यह नियम है कि जहाँ आपसमें मतभेद होता है, वहाँ तेज (प्रभाव) नहीं रहता—काँच कटोरो कुम्भ पय मोती मिनत् अवास। ताल घाव तिरिया कटक फाटा करे बिनास॥