भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

२९

‘राजा’ शब्दका प्रयोग किया है।

‘आचार्यमुपसङ्ग्य’—द्रोणाचार्यके पास जानेमें मुख्यतः तीन कारण मालूम देते हैं—

(१) अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये अर्थात् द्रोणाचार्यके भीतर पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा करके उनको अपने पक्षमें विशेषतासे करनेके लिये दुर्योधन द्रोणाचार्यके पास गया।

(२) व्यवहारमें गुरुके नाते आदर देनेके लिये भी द्रोणाचार्यके पास जाना उचित था।

(३) मुख्य व्यक्तिका सेनामें यथास्थान खड़े रहना बहुत आवश्यक होता है, अन्यथा व्यवस्था बिगड़ जाती है। इसलिये दुर्योधनका द्रोणाचार्यके पास खुद जाना उचित ही था।

यहाँ शंका हो सकती है कि दुर्योधनको तो पितामह भीष्मके पास जाना चाहिये था, जो कि सेनापति थे। पर दुर्योधन गुरु द्रोणाचार्यके पास ही क्यों गया? इसका समाधान यह है कि द्रोण और भीष्म—दोनों उभय-पक्षपाती थे अर्थात् वे कौरव और पाण्डव—दोनोंका ही पक्ष रखते थे। उन दोनोंमें भी द्रोणाचार्यको ज्यादा राजी करना था; क्योंकि द्रोणाचार्यके साथ दुर्योधनका गुरुके नाते तो स्नेह था, पर कुटुम्बके नाते स्नेह नहीं था; और अर्जुनपर द्रोणाचार्यकी विशेष कृपा थी। अतः उनको राजी

करनेके लिये दुर्योधनका उनके पास जाना ही उचित था। व्यवहारमें भी यह देखा जाता है कि जिसके साथ स्नेह नहीं है, उससे अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये मनुष्य उसको ज्यादा आदर देकर राजी करता है।

दुर्योधनके मनमें यह विश्वास था कि भीष्मजी तो हमारे दादाजी ही हैं; अतः उनके पास न जाऊँ तो भी कोई बात नहीं है। न जानेसे अगर वे नाराज भी हो जायेंगे तो मैं किसी तरहसे उनको राजी कर लूँगा। कारण कि पितामह भीष्मके साथ दुर्योधनका कौटुम्बिक सम्बन्ध और स्नेह था ही, भीष्मका भी उसके साथ कौटुम्बिक सम्बन्ध और स्नेह था। इसलिये भीष्मजीने दुर्योधनको राजी करनेके लिये जोरसे शंख बजाया है (पहले अध्यायका बारहवाँ श्लोक)।

‘वचनमब्रवीत्’—यहाँ ‘अब्रवीत्’ कहना ही पर्याप्त था; क्योंकि ‘अब्रवीत्’ क्रियाके अन्तर्गत ही ‘वचनम्’ आ जाता है अर्थात् दुर्योधन बोलेगा, तो वचन ही बोलेगा। इसलिये यहाँ ‘वचनम्’ शब्दकी आवश्यकता नहीं थी। फिर भी ‘वचनम्’ शब्द देनेका तात्पर्य है कि दुर्योधन नीतियुक्त गम्भीर वचन बोलता है, जिससे द्रोणाचार्यके मनमें पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा हो जाय और वे हमारे ही पक्षमें रहते हुए ठीक तरहसे युद्ध करें। जिससे हमारी विजय हो जाय, हमारा स्वार्थ सिद्ध हो जाय।

सम्बन्ध—द्रोणाचार्यके पास जाकर दुर्योधन क्या वचन बोला—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्यं महतीं चमूम्। व्यूहां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥ ३ ॥

आचार्य= हे आचार्य!धृष्टद्युम्नकेपाण्डुपुत्राणाम् = पाण्डवोंकी
तव= आपकेद्वाराएताम् = इस
धीमता= बुद्धिमान्व्यूहरचनासेमहतीम् = बड़ी भारी
शिष्येण= शिष्यखड़ीचमूम् = सेनाको
द्रुपदपुत्रेण= द्रुपदपुत्रकी हुईपश्य = देखिये!

व्याख्या—‘आचार्य’—द्रोणके लिये ‘आचार्य’ सम्बोधन देनेमें दुर्योधनका यह भाव मालूम देता है कि आप हम सबके—कौरवों और पाण्डवोंके आचार्य हैं। शस्त्रविद्या सिखानेवाले होनेसे आप सबके गुरु हैं। इसलिये आपके मनमें किसीका पक्ष या आग्रह नहीं होना चाहिये।

दुर्योधनका भाव यह है कि आप इतने सरल हैं कि अपने मारनेके लिये पैदा होनेवाले धृष्टद्युम्नको भी आपने अस्त्र-शस्त्रकी विद्या सिखायी है; और वह आपका शिष्य धृष्टद्युम्न इतना बुद्धिमान् है कि उसने आपको मारनेके लिये आपसे ही अस्त्र-शस्त्रकी विद्या सीखी है।

‘तव शिष्येण धीमता’—इन पदोंका प्रयोग करनेमें

‘द्रुपदपुत्रेण’—यह पद कहनेका आशय है कि आपको