श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
| यस्य | = जिसके | है (तथा) | गये हैं, |
|---|---|---|---|
| सर्वे | = सम्पूर्ण | ज्ञानाग्निदग्ध- | = जिसके |
| समारम्भाः | = कर्मके आरम्भ | कर्माण्म् | सम्पूर्ण कर्म |
| कामसङ्कल्प- | = संकल्प और | ज्ञानरूपी | |
| वर्जिताः | कामनासे रहित | अग्निसे जल | |
| तम् | |||
| = उसको | |||
| बुधाः | |||
| = ज्ञानिजन (भी) | |||
| पण्डितम् | |||
| = पण्डित (बुद्धिमान्) | |||
| आहुः | |||
| = कहते हैं। |
व्याख्या— ‘यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्प-वर्जिताः’—विषयोंका बार-बार चिन्तन होनेसे, उनकी बार-बार याद आनेसे उन विषयोंमें ‘ये विषय अच्छे हैं, काममें आनेवाले हैं, जीवनमें उपयोगी हैं और सुख देनेवाले हैं’—ऐसी सम्यग्बुद्धिका होना ‘संकल्प’ है और ‘ये विषय-पदार्थ हमारे लिये अच्छे नहीं हैं, हानिकारक हैं’—ऐसी बुद्धिका होना ‘विकल्प’ है। ऐसे संकल्प और विकल्प बुद्धिमें होते रहते हैं। जब विकल्प मिटकर केवल एक संकल्प रह जाता है, तब ‘ये विषय-पदार्थ हमें मिलने चाहिये, ये हमारे होने चाहिये’—इस तरह अन्तःकरणमें उनको प्राप्त करनेकी जो इच्छा पैदा हो जाती है, उसका नाम ‘काम’ (कामना) है। कर्मयोगसे सिद्ध हुए महापुरुषमें संकल्प और कामना—दोनों ही नहीं रहते अर्थात् उसमें न तो कामनाओंका कारण संकल्प रहता है और न संकल्पोंका कार्य कामना ही रहती है। अतः उसके द्वारा जो भी कर्म होते हैं, वे सब संकल्प और कामनासे रहित होते हैं।
संकल्प और कामना—ये दोनों कर्मके बीज हैं। संकल्प और कामना न रहनेपर कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् कर्म बाँधनेवाले नहीं होते। सिद्ध महापुरुषमें भी संकल्प और कामना न रहनेसे उसके द्वारा होनेवाले कर्म बन्धनकारक नहीं होते। उसके द्वारा लोकसंग्रहार्थ, कर्तव्यपरम्परासुरक्षार्थ सम्पूर्ण कर्म होते हुए भी वह उन कर्मोंसे स्वतः सर्वथा निरलिप्त रहता है।
भगवान्ने कहींपर संकल्पोंका (छठे अध्यायका चौथा श्लोक), कहींपर कामनाओंका (दूसरे अध्यायका पचपनवाँ श्लोक) और कहींपर संकल्प तथा कामना—दोनोंका
१—जहाँ दोनों पदोंका अर्थ प्रधान होता है, वहाँ ‘द्वन्द्वसमास’ होता है। यहाँ ‘संकल्प’ और ‘काम’ दोनों शब्द अपने-अपने अर्थमें प्रधान हैं। अतः यहाँ ‘संकल्प्याश्च कामाश्च’—ऐसा द्वन्द्वसमास होनेसे ‘संकल्पकामाः’—ऐसा रूप बना। परन्तु द्वन्द्वसमासके जिस पदमें कम स्वर होते हैं, उसका पूर्वप्रयोग होता है। यहाँ भी ‘काम’ शब्दमें कम स्वर होनेसे उसका पूर्वप्रयोग हुआ है; अतः ‘कामसंकल्पाः’—ऐसा रूप बना। अब ‘कामसंकल्पैर्वर्जिताः’—ऐसा तृतीया समास करनेपर पूरा पद ‘कामसंकल्पवर्जिताः’ बना।
२—यहाँ ‘समारम्भाः’ पद सिद्ध कर्मयोगीकी राग-द्वेषरहित सांगोपांग प्रवृत्तिका वाचक है, चौदहवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें आये हुए ‘आरम्भ’ पदका वाचक नहीं है। कारण कि वहाँ ‘प्रवृत्ति’ और ‘आरम्भ’—ये दो शब्द आये हैं; अतः वहाँ कर्तव्य-कर्मको करना ‘प्रवृत्ति’ है तथा भोग और संग्रहके उद्देश्यसे नये-नये कर्मोंको शुरु करना ‘आरम्भ’ है।
(छठे अध्यायका चौबीसवाँ-पचीसवाँ श्लोक) त्याग बताया है। अतः जहाँ केवल संकल्पोंका त्याग बताया गया है, वहाँ कामनाओंका और जहाँ केवल कामनाओंका त्याग बताया गया है, वहाँ संकल्पोंका त्याग भी समझ लेना चाहिये; क्योंकि संकल्प कामनाओंका कारण है और कामना संकल्पोंका कार्य है। तात्पर्य है कि साधकको सम्पूर्ण संकल्पों और कामनाओंका त्याग कर देना चाहिये।
मोटरकी चार अवस्थाएँ होती हैं—
१—मोटर गैरजमें खड़ी रहनेपर न ईंजन चलता है और न पहिये चलते हैं। २—मोटर चालू करनेपर ईंजन तो चलने लगता है, पर पहिये नहीं चलते। ३—मोटरको वहाँसे रवाना करनेपर ईंजन भी चलता है और पहिये भी चलते हैं। ४—निरापद ढलवाँ मार्ग आनेपर ईंजनको बंद कर देते हैं और पहिये चलते रहते हैं। इसी प्रकार मनुष्यकी भी चार अवस्थाएँ होती हैं—
१—न कामना होती है और न कर्म होता है। २—कामना होती है, पर कर्म नहीं होता। ३—कामना भी होती है और कर्म भी होता है। ४—कामना नहीं होती और कर्म होता है।
मोटरकी सबसे उत्तम (चौथी) अवस्था यह है कि ईंजन न चले और पहिये चलते रहें अर्थात् तेल भी खर्च न हो और रास्ता भी तय हो जाय। इसी तरह मनुष्यकी सबसे उत्तम अवस्था यह है कि कामना न हो और कर्म होते रहें। ऐसी अवस्थावाले मनुष्यको ज्ञानिजन भी पण्डित कहते हैं।
‘समारम्भाः’ —पदका यह भाव है कि कर्मयोगसे सिद्ध