श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
| यस्य | = जिसके | है (तथा) | गये हैं, |
|---|---|---|---|
| सर्वे | = सम्पूर्ण | ज्ञानाग्निदग्ध- | = जिसके |
| समारम्भाः | = कर्मके आरम्भ | कर्माण्म् | सम्पूर्ण कर्म |
| कामसङ्कल्प- | = संकल्प और | ज्ञानरूपी | |
| वर्जिताः | कामनासे रहित | अग्निसे जल | |
| तम् | |||
| = उसको | |||
| बुधाः | |||
| = ज्ञानिजन (भी) | |||
| पण्डितम् | |||
| = पण्डित (बुद्धिमान्) | |||
| आहुः | |||
| = कहते हैं। |
व्याख्या— ‘यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्प-वर्जिताः’—विषयोंका बार-बार चिन्तन होनेसे, उनकी बार-बार याद आनेसे उन विषयोंमें ‘ये विषय अच्छे हैं, काममें आनेवाले हैं, जीवनमें उपयोगी हैं और सुख देनेवाले हैं’—ऐसी सम्यग्बुद्धिका होना ‘संकल्प’ है और ‘ये विषय-पदार्थ हमारे लिये अच्छे नहीं हैं, हानिकारक हैं’—ऐसी बुद्धिका होना ‘विकल्प’ है। ऐसे संकल्प और विकल्प बुद्धिमें होते रहते हैं। जब विकल्प मिटकर केवल एक संकल्प रह जाता है, तब ‘ये विषय-पदार्थ हमें मिलने चाहिये, ये हमारे होने चाहिये’—इस तरह अन्तःकरणमें उनको प्राप्त करनेकी जो इच्छा पैदा हो जाती है, उसका नाम ‘काम’ (कामना) है। कर्मयोगसे सिद्ध हुए महापुरुषमें संकल्प और कामना—दोनों ही नहीं रहते अर्थात् उसमें न तो कामनाओंका कारण संकल्प रहता है और न संकल्पोंका कार्य कामना ही रहती है। अतः उसके द्वारा जो भी कर्म होते हैं, वे सब संकल्प और कामनासे रहित होते हैं।
संकल्प और कामना—ये दोनों कर्मके बीज हैं। संकल्प और कामना न रहनेपर कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् कर्म बाँधनेवाले नहीं होते। सिद्ध महापुरुषमें भी संकल्प और कामना न रहनेसे उसके द्वारा होनेवाले कर्म बन्धनकारक नहीं होते। उसके द्वारा लोकसंग्रहार्थ, कर्तव्यपरम्परासुरक्षार्थ सम्पूर्ण कर्म होते हुए भी वह उन कर्मोंसे स्वतः सर्वथा निरलिप्त रहता है।
भगवान्ने कहींपर संकल्पोंका (छठे अध्यायका चौथा श्लोक), कहींपर कामनाओंका (दूसरे अध्यायका पचपनवाँ श्लोक) और कहींपर संकल्प तथा कामना—दोनोंका
१—जहाँ दोनों पदोंका अर्थ प्रधान होता है, वहाँ ‘द्वन्द्वसमास’ होता है। यहाँ ‘संकल्प’ और ‘काम’ दोनों शब्द अपने-अपने अर्थमें प्रधान हैं। अतः यहाँ ‘संकल्प्याश्च कामाश्च’—ऐसा द्वन्द्वसमास होनेसे ‘संकल्पकामाः’—ऐसा रूप बना। परन्तु द्वन्द्वसमासके जिस पदमें कम स्वर होते हैं, उसका पूर्वप्रयोग होता है। यहाँ भी ‘काम’ शब्दमें कम स्वर होनेसे उसका पूर्वप्रयोग हुआ है; अतः ‘कामसंकल्पाः’—ऐसा रूप बना। अब ‘कामसंकल्पैर्वर्जिताः’—ऐसा तृतीया समास करनेपर पूरा पद ‘कामसंकल्पवर्जिताः’ बना।
२—यहाँ ‘समारम्भाः’ पद सिद्ध कर्मयोगीकी राग-द्वेषरहित सांगोपांग प्रवृत्तिका वाचक है, चौदहवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें आये हुए ‘आरम्भ’ पदका वाचक नहीं है। कारण कि वहाँ ‘प्रवृत्ति’ और ‘आरम्भ’—ये दो शब्द आये हैं; अतः वहाँ कर्तव्य-कर्मको करना ‘प्रवृत्ति’ है तथा भोग और संग्रहके उद्देश्यसे नये-नये कर्मोंको शुरु करना ‘आरम्भ’ है।
(छठे अध्यायका चौबीसवाँ-पचीसवाँ श्लोक) त्याग बताया है। अतः जहाँ केवल संकल्पोंका त्याग बताया गया है, वहाँ कामनाओंका और जहाँ केवल कामनाओंका त्याग बताया गया है, वहाँ संकल्पोंका त्याग भी समझ लेना चाहिये; क्योंकि संकल्प कामनाओंका कारण है और कामना संकल्पोंका कार्य है। तात्पर्य है कि साधकको सम्पूर्ण संकल्पों और कामनाओंका त्याग कर देना चाहिये।
मोटरकी चार अवस्थाएँ होती हैं—
१—मोटर गैरजमें खड़ी रहनेपर न ईंजन चलता है और न पहिये चलते हैं। २—मोटर चालू करनेपर ईंजन तो चलने लगता है, पर पहिये नहीं चलते। ३—मोटरको वहाँसे रवाना करनेपर ईंजन भी चलता है और पहिये भी चलते हैं। ४—निरापद ढलवाँ मार्ग आनेपर ईंजनको बंद कर देते हैं और पहिये चलते रहते हैं। इसी प्रकार मनुष्यकी भी चार अवस्थाएँ होती हैं—
१—न कामना होती है और न कर्म होता है। २—कामना होती है, पर कर्म नहीं होता। ३—कामना भी होती है और कर्म भी होता है। ४—कामना नहीं होती और कर्म होता है।
मोटरकी सबसे उत्तम (चौथी) अवस्था यह है कि ईंजन न चले और पहिये चलते रहें अर्थात् तेल भी खर्च न हो और रास्ता भी तय हो जाय। इसी तरह मनुष्यकी सबसे उत्तम अवस्था यह है कि कामना न हो और कर्म होते रहें। ऐसी अवस्थावाले मनुष्यको ज्ञानिजन भी पण्डित कहते हैं।
‘समारम्भाः’ —पदका यह भाव है कि कर्मयोगसे सिद्ध
श्लोक २० ]
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महापुरुषके द्वारा हरेक कर्म सुचारुरूपसे, सांगोपांग और तत्परतापूर्वक होता है। दूसरा एक भाव यह भी है कि उसके कर्म शास्त्रसम्मत होते हैं। उसके द्वारा करनेयोग्य कर्म ही होते हैं। जिससे किसीका अहित होता हो, वह कर्म उससे कभी नहीं होता।
‘सर्वे’ पदका यह भाव है कि उसके द्वारा होनेवाले सब-के-सब कर्म संकल्प और कामनासे रहित होते हैं। कोई-सा भी कर्म संकल्पसहित नहीं होता। प्रातः उठनेसे लेकर रातमें सोनेतक शौच-स्नान, खाना-पीना, पाठ-पूजा, जप-चिन्तन, ध्यान-समाधि आदि शरीर-निर्वाह-सम्बन्धी सम्पूर्ण कर्म संकल्प और कामनासे रहित ही होते हैं।
‘ज्ञानानिन्द्रधर्करमाणम्’ —कर्मोंका सम्बन्ध ‘पर’- (शरीर-संसार-) के साथ है, ‘स्व’- (स्वरूप-) के साथ नहीं; क्योंकि कर्मोंका आरम्भ और अन्त होता है, पर स्वरूप सदा ज्यों-का-त्यों रहता है—इस तत्त्वको ठीक-ठीक जानना ही ‘ज्ञान’ है। इस ज्ञानरूप अगिन्से सम्पूर्ण कर्म भस्म हो जाते हैं अर्थात् कर्मोंमें फल देनेकी (बीधनेकी) शक्ति नहीं रहती (गीता—चौथे अध्यायका सोलहवाँ और बत्तीसवाँ श्लोक)।
वास्तवमें शरीर और क्रिया—दोनों संसारसे अभिन्न हैं; पर स्वयं सर्वथा भिन्न होता हुआ भी भूलसे इनके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है। जब महापुरुषका अपने कहलानेवाले शरीरके साथ भी कोई सम्बन्ध नहीं रहता, तब जैसे संसार-मात्रसे सब कर्म होते हैं, ऐसे ही उसके कहलानेवाले शरीरसे सब कर्म होते हैं। इस प्रकार कर्मोंसे निर्लिप्तताका अनुभव होनेपर उस महापुरुषके वर्तमान कर्म ही नष्ट नहीं होते, प्रत्युत संचित कर्म भी सर्वथा नष्ट हो जाते हैं। प्रारब्ध-कर्म
भी केवल अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें उसके सामने आकर नष्ट हो जाते हैं; परन्तु फलसे असंग होनेके कारण वह उनका भीष्ता नहीं बनता अर्थात् किञ्चिन्मात्र भी सुखी या दुःखी नहीं होता। इसलिये प्रारब्ध-कर्म भी अस्थायी परिस्थितिमात्र उत्पन्न करके नष्ट हो जाते हैं।
‘तमाहुः पण्डितं बुधाः’ —जो कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके परमात्मामें लगा हुआ है, उस मनुष्यको समझना तो सुगम है, पर जो कर्मोंसे किञ्चिन्मात्र भी लिप्त हुए बिना तत्परतापूर्वक कर्म कर रहा है, उसे समझना कठिन है। सन्तोंकी वाणीमें आया है—
त्यागी शोभा जगतमें करता है सब कोय।
हरिया गृहस्थी संतका भेदी बिरला होय॥
तात्पर्य यह है कि संसारमें (बाहरसे त्याग करनेवाले) त्यागी पुरुषकी महिमा तो सब गाते हैं, पर गृहस्थमें रहकर सब कर्तव्य-कर्म करते हुए भी जो निर्लिप्त रहता है, उस (भीतरका त्याग करनेवाले) पुरुषको समझनेवाला कोई बिरला ही होता है।
जैसे कमलका पत्ता जलमें ही उत्पन्न होकर और जलमें रहते हुए भी जलसे लिप्त नहीं होता, ऐसे ही कर्मयोगी कर्मयोगिन्- (मनुष्यशरीर-) में ही उत्पन्न होकर और कर्ममय जगत्में रहकर कर्म करते हुए भी कर्मोंसे लिप्त नहीं होता१। कर्मोंसे लिप्त न होना कोई साधारण बुद्धिमानीका काम नहीं है। पीछेके अठारहवाँ श्लोकमें भगवान्ने ऐसे कर्मयोगीको ‘मनुष्योंमें बुद्धिमान्’ कहा है और यहाँ कहा है कि उसे ज्ञानजन भी पण्डित अर्थात् बुद्धिमान् कहते हैं। भाव यह है कि ऐसा कर्मयोगी पण्डितोंका भी पण्डित, ज्ञानियोंका भी ज्ञानी है२।
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥ २० ॥
| कर्मफलासङ्गम् = (जो) कर्म और फलकी आसक्ति | नित्यतृप्तः = सदा तृप्त है, | अपि = भी (वास्तवमें) |
|---|---|---|
| त्यक्त्वा = त्याग करके | सः = वह | किञ्चित् = कुछ |
| निराश्रयः = आश्रयसे रहित (और) | कर्मणि = कर्मोंमें | एव = भी |
| अभिप्रवृत्तः = अच्छी तरह | न = नहीं | |
| लगा हुआ | करोति = करता। |
१-निवृत्तिरपि मूढस्य प्रवृत्तिरुपजायते। प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलदायिनी ॥ (अष्टावक्रगीता १८।६१)
‘मूढ पुरुषकी निवृत्ति भी प्रवृत्तिको उत्पन्न करनेवाली होती है और ज्ञानी पुरुषकी प्रवृत्ति भी निवृत्ति-रूप फलको देनेवाली होती है।’
२-गृहेषु पण्डिताः केचित्केचिन्मूर्खेषु पण्डिताः। सभायां पण्डिताः केचित्केचित्यण्डितपण्डिताः ॥
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
व्याख्या —‘त्यक्त्वा कर्मफलसङ्गम्’—जब कर्म करते समय कर्ताका यह भाव रहता है कि शरीरादि कर्म-सामग्री मेरी है, मैं कर्म करता हूँ, कर्म मेरा और मेरे लिये है तथा इसका मेरेको अमुक फल मिलेगा, तब वह कर्मफलका हेतु बन जाता है। कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषको प्राकृत पदार्थसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेदका अनुभव हो जाता है, इसलिये कर्म करनेकी सामग्रीमें, कर्ममें तथा कर्मफलमें किंचिन्मात्र भी आसक्ति न रहनेके कारण वह कर्मफलका हेतु नहीं बनता।
सेना विजयकी इच्छासे युद्ध करती है। विजय होनेपर विजय सेनाकी नहीं, प्रत्युत राजाकी मानी जाती है; क्योंकि राजाने ही सेनाके जीवन-निर्वाहका प्रबन्ध किया है; उसे युद्ध करनेकी सामग्री दी है और उसे युद्ध करनेकी प्रेरणा की है और सेना भी राजाके लिये ही युद्ध करती है। इसी प्रकार शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि कर्म-सामग्रीके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही जीव उनके द्वारा किये गये कर्मके फलका भागी होता है।
कर्म-सामग्रीके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध न होनेके कारण महापुरुषका कर्मफलके साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता। वास्तवमें कर्मफलके साथ स्वरूपका सम्बन्ध है ही नहीं। कारण कि स्वरूप चेतन, अविनाशी और निर्विकार है; परन्तु कर्म और कर्मफल—दोनों जड़ तथा विकारी हैं और उनका आरम्भ तथा अन्त होता है। सदा स्वरूपके साथ न तो कोई कर्म रहता है तथा न कोई फल ही रहता है। इस तरह यद्यपि कर्म और फलसे स्वरूपका कोई सम्बन्ध नहीं है, तथापि जीवने भूलसे उनके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया है। यह माना हुआ सम्बन्ध ही बन्धनका कारण है। अगर यह माना हुआ सम्बन्ध मिट जाय, तो कर्म और फलसे उसकी स्वतःसिद्ध निलिप्तताका बोध हो जाता है।
‘निराश्रयः’ —‘देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिका किंचिन्मात्र भी आश्रय न लेना ही ‘निराश्रय’ अर्थात् आश्रयसे रहित होना है। कितना ही बड़ा धनी, राजा-महाराजा क्यों न हो, उसको देश, काल आदिका आश्रय लेना ही पड़ता है। परन्तु कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुष देश, काल आदिका कोई आश्रय नहीं मानता। आश्रय मिले या न मिले—इसकी उसे किंचिन्मात्र भी परवाह नहीं होती। इसलिये वह निराश्रय होता है।
‘नित्यतृप्तः’ —‘जीव (आत्मा) परमात्माका सनातन अंश होनेसे सत्-स्वरूप है। सत्का कभी अभाव नहीं
होता—‘नाभावो विद्यते सतः’ (गीता २।१६)। परन्तु जब वह असत्के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब उसे अपनेमें अभाव अर्थात् कमीका अनुभव होने लगता है। उस कमीकी पूर्ति करनेके लिये वह सांसारिक वस्तुओंकी कामना करने लगता है। इच्छित वस्तुओंके मिलनेसे एक तृप्ति होती है; परन्तु वह तृप्ति ठहरती नहीं, वह क्षणिक होती है। कारण कि संसारकी प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदि प्रतिक्षण अभावकी ओर जा रही है; अतः उनके आश्रित रहनेवाली तृप्ति स्थायी कैसे रह सकती है? सत्-वस्तुकी तृप्ति असत् वस्तुसे हो ही कैसे सकती है? अतः जीव जबतक उत्पत्ति-विनाशशील क्रियाओं और पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध मानता है तथा उनके आश्रित रहता है, तबतक उसे स्वतःसिद्ध नित्यतृप्तिका अनुभव नहीं होता।
कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुष निराश्रय अर्थात् संसारके आश्रयसे सर्वथा रहित होता है, इसलिये उसे स्वतःसिद्ध नित्यतृप्तिका अनुभव हो जाता है। तीसरे अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें ‘आत्मतृप्तः’ पदसे भी इसी नित्यतृप्तिकी बात आयी है।
‘कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः’ —‘अभिप्रवृत्तः’ पदका तात्पर्य है कि कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषके द्वारा होनेवाले सब कर्म सांगोपांग रीतिसे होते हैं; क्योंकि कर्मफलमें उसकी किंचिन्मात्र भी आसक्ति नहीं होती। उसके सम्पूर्ण कर्म केवल संसारके हितके लिये होते हैं।
जिसकी कर्मफलमें आसक्ति होती है, वह सांगोपांग रीतिसे कर्म नहीं कर सकता, क्योंकि फलके साथ सम्बन्ध होनेसे कर्म करते हुए बीच-बीचमें फलका चिन्तन होनेसे उसकी शक्ति व्यर्थ खर्च हो जाती है, जिससे उसकी शक्ति पूरी तरह कर्म करनेमें नहीं लगती।
‘अपि’ पदका तात्पर्य है कि सांगोपांग रीतिसे सब कर्म करते हुए भी वह वास्तवमें किंचिन्मात्र भी कोई कर्म नहीं करता; क्योंकि सर्वथा निलिप्त होनेके कारण कर्मका स्पर्श ही नहीं होता। उसके सब कर्म अकर्म हो जाते हैं।
जब वह कुछ भी नहीं करता, तब वह कर्मफलसे बँध ही कैसे सकता है? इसीलिये अठारहवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि कर्मफलका त्याग करनेवाले कर्मयोगीको कर्मोंका फल कहीं भी नहीं मिलता—‘न तु सन्यासिनां क्वचित्।’
प्रकृति निरन्तर क्रियाशील है। अतः जबतक प्रकृतिके
श्लोक २१ ]
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गुणों- (क्रिया और पदार्थ-) से सम्बन्ध है, तबतक कर्म न करते हुए भी मनुष्यका कर्मके साथ सम्बन्ध हो जाता है। प्रकृतिके गुणोंसे सम्बन्ध न रहनेपर मनुष्य कर्म करते हुए परिशिष्ट भाव —जबतक मनुष्यमें कर्तृत्व है, तबतक वह करता है तो करता है, नहीं करता है तो करता है। परन्तु कर्तृत्व मिटनेपर वह कभी कुछ नहीं करता।
भी कुछ नहीं करता। कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषका प्रकृतिजन्म गुणोंसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता, इसलिये वह लोकहितार्थ सब कर्म करते हुए भी वास्तवमें कुछ नहीं करता।
सम्बन्ध—उन्नीसवें-बीसवें श्लोकोंमें कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषकी कर्मोंसे निर्लिप्तताका वर्णन करके अब भगवान् इक्कीसवें श्लोकमें निवृत्तिपरायण और बाईसवें श्लोकमें प्रवृत्तिपरायण कर्मयोगके साधककी कर्मोंसे निर्लिप्तताका वर्णन करते हैं।
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम् ॥ २१ ॥
यतचित्तात्मा = जिसका शरीर और अन्तःकरण अच्छी तरहसे वशमें किया हुआ है, त्यक्तसर्वपरिग्रहः = जिसने सब
प्रकारके संग्रहका परित्याग कर दिया है, (ऐसा) निराशीः = इच्छारहित (कर्मयोगी) केवलम् = केवल
शारीरम् = शरीर-सम्बन्धी कर्म = कर्म कुर्वन् = करता हुआ (भी) किल्विषम् = पापको न, आप्नोति = प्राप्त नहीं होता।
व्याख्या—'यतचित्तात्मा' —संसारमें आशा या इच्छा रहनेके कारण ही शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि वशमें नहीं होते। इसी श्लोकमें 'निराशीः ' पदसे बताया है कि कर्मयोगीमें आशा या इच्छा नहीं रहती। अतः उसके शरीर, इन्द्रियाँ और अन्तःकरण स्वतः वशमें रहते हैं। इनके वशमें रहनेसे उसके द्वारा व्यर्थकी कोई क्रिया नहीं होती।
'त्यक्तसर्वपरिग्रहः' —कर्मयोगी अगर संन्यासी है, तो वह सब प्रकारकी भोग-सामग्रीके संग्रहका स्वरूपसे त्याग कर देता है। अगर वह गृहस्थ है, तो वह भोग-बुद्धिसे (अपने सुखके लिये) किसी भी सामग्रीका संग्रह नहीं करता। उसके पास जो भी सामग्री है उसको वह अपनी और अपने लिये न मानकर संसारकी और संसारके लिये ही मानता है तथा संसारके सुखमें ही उस सामग्रीको लगाता है। भोगबुद्धिसे संग्रहका त्याग करना तो साधकमात्रके लिये आवश्यक है।
[ऐसा निवृत्तिपरक श्लोक गीतामें और कहीं नहीं आया है। छठे अध्यायके दसवें श्लोकमें ध्यानयोगीके लिये और अठारहवें अध्यायके तिरपनवें श्लोकमें ज्ञानयोगीके लिये परिग्रहका त्याग करनेकी बात आयी है। परन्तु उनसे भी ऊँची श्रेणीके परिग्रह-त्यागकी बात 'त्यक्तसर्वपरिग्रहः ' पदसे यहाँ आयी है; क्योंकि 'परिग्रह' के साथ 'सर्व' शब्द केवल यहाँ आया है। बारहवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें
भक्तियोगीके लिये 'अनिकेतः ' पद आया है, पर वहाँ इसका अर्थ निवास-स्थानमें ममता-आसक्तिसे रहित होना है।]
'निराशीः' —कर्मयोगीमें आशा, कामना, स्पृहा, वासना आदि नहीं रहते। वह बाहरसे ही भोग-सामग्रीके संग्रहका त्याग करता हो—इतनी ही बात नहीं है, प्रत्युत वह भीतरसे भी भोग-सामग्रीकी आशा या इच्छाका त्याग कर देता है। आशा या इच्छाका सर्वथा त्याग न होनेपर भी उसका उद्देश्य इनके त्यागका ही रहता है।
'शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्' —'शारीरम् कर्म ' (शरीर-सम्बन्धी कर्म)—के दो अर्थ होते हैं—एक तो शरीरसे होनेवाला कर्म और दूसरा शरीर-निर्वाहके लिये किया जानेवाला कर्म। शरीरसे होनेवाले कर्मकी बात पाँचवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भी आयी है, जिसका तात्पर्य है कि सभी कर्म केवल शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिके द्वारा ही हो रहे हैं, मेरा उनसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, ऐसा मानकर कर्मयोगी अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म करते हैं। परन्तु यहाँ आया श्लोक निवृत्तिपरक है, इसलिये यहाँ उपर्युक्त पदोंका अर्थ शरीरनिर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले आवश्यक कर्म (खान-पान, शौच-स्नान आदि) मानना ही उपयुक्त प्रतीत होता है। निवृत्ति-परायण कर्मयोगी केवल उतने ही कर्म करता है, जितनेसे केवल शरीर-निर्वाह हो जाय।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
‘नाप्नोति किल्विषम्’—जो कर्म करने अथवा न करनेसे अपना किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध रखता है, वह पापको अर्थात् जन्म-मरणरूप बन्धनको प्राप्त होता है। परन्तु आशारहित कर्मयोगी कर्म करने अथवा न करनेसे अपना कुछ भी सम्बन्ध नहीं रखता, इसलिये वह पापको प्राप्त नहीं होता अर्थात् उसके सब कर्म अकर्म हो जाते हैं।
निवृत्तिपरायण होनेपर भी कर्मयोगी कभी आलस्य-प्रमाद नहीं करता। आलस्य-प्रमादका भी भोग होता है। एकात्मनं यों ही पड़े रहनेसे आलस्यका भोग होता है और शास्त्रविरुद्ध तथा निरर्थक कर्म करनेसे प्रमादका भोग होता है। इस प्रकार निवृत्तिमें आलस्यके सुखका और प्रवृत्तिमें प्रमादके सुखका भोग हो सकता है। अतः आलस्य-प्रमादसे मनुष्य पापको प्राप्त होता है। परन्तु बहुत कम कर्म करनेपर भी निवृत्ति-परायण कर्मयोगीमें किञ्चिन्मात्र भी आलस्य-प्रमाद नहीं आते। यदि उसमें किञ्चिन्मात्र भी आलस्य-प्रमाद आते, तो ‘किल्विषम् न आप्नोति’ कहना बनता ही नहीं। वह ‘यत्तचित्तात्मा’ है अर्थात् उसके शरीर, इन्द्रियाँ और अन्तःकरण संयत हैं, इसलिये उसमें आलस्य-प्रमाद आ ही नहीं सकते। शरीर, इन्द्रियाँ तथा अन्तःकरणके वशमें होनेसे, भोग-सामग्रीका त्याग करनेसे तथा आशा, कामना, ममता आदिसे रहित होनेसे उसके द्वारा निषिद्ध क्रिया हो सकती ही नहीं।
यहाँ शंका हो सकती है कि जब उसके द्वारा पाप-क्रिया हो सकती ही नहीं, तब यह क्यों कहा गया कि वह पापको प्राप्त नहीं होता? इसका समाधान यह है कि क्रियामात्रके आरम्भमें अनिवार्य दोष (पाप) पाये जाते हैं—‘सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनानिरिवावृताः’ (गीता १८। ४८)। परन्तु मूलमें असत्के संग—कामना, ममता और आसक्तिसे ही पाप लगते हैं। कर्मयोगीमें कामना, ममता और आसक्ति होती ही नहीं अथवा उसका कामना, ममता और आसक्तिका उद्देश्य ही नहीं होता; इसलिये उसका कर्म करनेसे अथवा न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं होता। इसी कारण न तो उसे कर्मोंमें रहनेवाला आनुषंगिक पाप लगता है और न उसे शास्त्रविहित कर्मोंके त्यागका ही पाप लगता है।
दूसरी एक शंका यह हो सकती है कि तीसरे अध्यायमें भगवान्ने सिद्ध महापुरुषको भी (अपने लिये कोई कर्तव्य शेष न रहनेपर भी) लोकसंग्रहके लिये कर्म करनेकी प्रेरणा की है (तीसरे अध्यायका पचीसवाँ-
छब्बीसवाँ श्लोक)। अपने लिये भी भगवान्ने कहा है कि त्रिलोकीमें कुछ भी कर्तव्य और प्राप्त्य न होनेपर भी मैं सावधानीपूर्वक कर्म करता हूँ (तीसरे अध्यायके बाईसवेंसे चौबीसवें श्लोकतक)। अतः शरीर-निर्वाहमात्रके लिये कर्म करनेवाले कर्मयोगीको क्या लोकसंग्रहके त्यागका दोष नहीं लगेगा? इसका समाधान यह है कि कामना, ममता आदि न रहनेके कारण उसे कोई दोष नहीं लगता। यद्यपि सिद्ध महापुरुषमें और भगवान्में कामना, ममता आदिका सर्वथा अभाव होता है, तथापि वे जो लोकसंग्रहके लिये कर्म करते हैं, यह उनकी दया, कृपा ही है। वास्तवमें वे लोकसंग्रह करें अथवा न करें, इसमें वे स्वतन्त्र हैं, इसकी उनपर कोई जिम्मेवारी नहीं है (गीता—तीसरे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। वास्तवमें यह भी निवृत्तिपरायण साधकोंके लिये एक लोकसंग्रह ही है। लोकसंग्रह किया नहीं जाता, प्रत्युत होता है।
तीसरी एक शंका यह भी हो सकती है कि तीसरे अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भगवान्ने केवल अपने शरीरका पोषण करनेवाले मनुष्यको पापी कहा है और यहाँ कहते हैं कि शरीर-निर्वाहमात्रके लिये कर्म करनेवाला पापको नहीं प्राप्त होता। दोनोंका सामंजस्य कैसे हो? इसका समाधान यह है कि जबतक भोगबुद्धि है और कर्मा तथा पदार्थोंमें आसक्ति बनी हुई है, तबतक कर्म करने अथवा न करनेसे पाप लगता ही है, इसीलिये वहाँ ‘पचन्ति आत्मकारणात्’ पद आये हैं। परन्तु उस कर्मयोगीमें भोगबुद्धि नहीं है और कर्मा तथा पदार्थोंमें आसक्ति भी नहीं है; अतः सर्वथा निलिप्त होनेसे उसे कर्म करने अथवा न करनेसे किञ्चिन्मात्र भी पाप नहीं लगता।
प्रश्न —इस श्लोकको अगर सांख्ययोगीका मान लें तो क्या आपत्ति है; क्योंकि इसमें आये सब लक्षण सांख्य-योगीमें घटते हैं?
उत्तर —पहली बात तो यह है कि यहाँ कर्मयोगका प्रसंग है, इसलिये यह श्लोक मुख्यरूपसे कर्मयोगीका ही है। दूसरी बात, सांख्ययोगी अपनेको कर्ता मानता ही नहीं। उसमें ‘मैं कुछ भी नहीं करता हूँ’ (गीता—पाँचवें अध्यायका आठवाँ श्लोक)—ऐसा स्पष्ट विवेक रहता है; फिर उसके लिये ‘कर्म करता हुआ भी पापको नहीं प्राप्त होता’—ऐसा कहना कैसे बन सकता है?
कर्मयोगके साधकमें वैसा स्पष्ट विवेक जाग्रत् न होनेपर भी उसका यह निश्चय रहता है कि ‘मेरा कुछ नहीं है; मेरे लिये कुछ नहीं चाहिये और मेरे लिये कुछ नहीं करना है’।
श्लोक २२ ]
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३२३
इन तीन बातोंका दृढ़ निश्चय रहनेके कारण वह कर्म करते
हुए भी उनसे निर्लिप्त रहता है।
लोगोंमें प्राय: ऐसी मान्यता है कि कर्मयोगी गृहस्थ-
आश्रममें और ज्ञानयोगी (सांख्ययोगी) संन्यास-आश्रममें
रहता है। परन्तु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। जिसे शरीरसे
अपनी अलग सत्ताका स्पष्ट विवेक है, वह ज्ञानयोगी ही
है; चाहे वह गृहस्थ-आश्रममें हो अथवा संन्यास-आश्रममें।
जिसमें इतना विवेक नहीं है, पर उपर्युक्त तीन बातोंका
निश्चय पक्का है, वह कर्मयोगी ही है; चाहे वह गृहस्थ-
आश्रममें हो अथवा संन्यास-आश्रममें।
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सर: ।
सम: सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ २२ ॥
जो कर्मयोगी फलकी इच्छाके बिना-
यदृच्छालाभसन्तुष्ट: = अपने-आप
जो कुछ मिल
जाय, उसमें सन्तुष्ट
रहता है (और)
विमत्सर: = (जो) ईर्ष्यासे रहित,
द्वन्द्वातीतः = द्वन्द्वोंसे रहित
(तथा)
सिद्धौ = सिद्धि
च = और
असिद्धौ = असिद्धिमें
सम: = सम है, (वह)
कृत्वा = (कर्म) करते हुए
अपि = भी (उससे)
न = नहीं
निबध्यते = बँधता।
व्याख्या—'यदृच्छालाभसन्तुष्ट:'—कर्मयोगी निष्काम-
भावपूर्वक सांगोपांग रीतिसे सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्म करता है।
फल-प्राप्तिका उद्देश्य न रखकर कर्म करनेपर फलके
रूपमें उसे अनुकूलता या प्रतिकूलता, लाभ या हानि, मान
या अपमान, स्तुति या निन्दा आदि जो कुछ मिलता है,
उससे उसके अन्तःकरणमें कोई असन्तोष पैदा नहीं होता।
जैसे, वह व्यापार करता है तो उसे व्यापारमें लाभ हो
अथवा हानि, उसके अन्तःकरणपर उसका कोई असर नहीं
पड़ता। वह हरेक परिस्थितिमें समानरूपसे सन्तुष्ट रहता है;
क्योंकि उसके मनमें फलकी इच्छा नहीं होती। तात्पर्य यह
है कि व्यापारमें उसे लाभ-हानिका ज्ञान तो होता है तथा
वह उसके अनुसार यथोचित चेष्टा भी करता है, पर
परिणाममें वह सुखी-दु:खी नहीं होता। यदि साधकके
अन्तःकरणपर अनुकूलता-प्रतिकूलताका थोड़ा असर पड़
भी जाय, तो भी उसे घबराना नहीं चाहिये; क्योंकि
साधकके अन्तःकरणमें वह प्रभाव स्थायी नहीं रहता, शीघ्र
मिट जाता है।
उपर्युक्त पदोंमें आया 'लाभ' शब्द प्राप्तिके अर्थमें है,
जिसके अनुसार केवल लाभ या अनुकूलता मिलना ही
'लाभ' नहीं है, प्रत्युत लाभ-हानि, अनुकूलता-प्रतिकूलता
आदि जो कुछ प्राप्त हो जाय, वह सब 'लाभ' ही है।
'विमत्सर:'—कर्मयोगी सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ अपनी
एकता मानता है—'सर्वभूतभूतत्मा' (गीता ५।७)।
इसलिये उसका किसी भी प्राणीसे किंचिन्मात्र भी ईर्ष्याका
भाव नहीं रहता।
'विमत्सर:' पद अलगसे देनेका भाव यह है कि
अपनेमें किसी प्राणीके प्रति किंचिन्मात्र भी ईर्ष्याका भाव
न आ जाय, इस विषयमें कर्मयोगी बहुत सावधान रहता
है। कारण कि कर्मयोगीकी सम्पूर्ण क्रियाएँ प्राणिमात्रके
हितके लिये ही होती हैं; अतः यदि उसमें किंचिन्मात्र भी
ईर्ष्याका भाव होगा, तो उसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ दूसरोंके
हितके लिये नहीं हो सकेंगी।
ईर्ष्या-दोष बहुत सूक्ष्म है। दो दुकानदार हैं और
आपसमें मित्रता रखते हैं। उनमें एककी दूकान दूसरेकी
अपेक्षा ज्यादा चल जाय, तो दूसरेमें थोड़ी ईर्ष्या पैदा हो
जायगी कि उसकी दूकान ज्यादा चल गयी, मेरी कम
चली। इस प्रकार ईर्ष्या-दोषके कारण मित्रसे भी मित्रकी
उन्नति नहीं सही जाती। जहाँ आपसमें प्रेम है, एकता है,
मित्रता है, वहाँ भी ईर्ष्या-दोष आ जाता है; फिर जहाँ वैर,
भिन्नता आदि हो, वहाँका तो कहना ही क्या है? इसलिये
साधकको इस दोषसे बचनेके लिये विशेष सावधान रहना
चाहिये।
'द्वन्द्वातीतः'—कर्मयोगी लाभ-हानि, मान-अपमान,
स्तुति-निन्दा, अनुकूलता-प्रतिकूलता, सुख-दु:ख आदि
द्वन्द्वोंसे अतीत होता है, इसलिये उसके अन्तःकरणमें
उन द्वन्द्वोंसे होनेवाले राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकार
नहीं होते।
द्वन्द्व अनेक प्रकारके होते हैं; जैसे—भगवान्का सगुण-
३२४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
साकाररूप ठीक है या निर्गुण-निराकाररूप ठीक है, अद्वैत सिद्धान्त ठीक है या द्वैत सिद्धान्त ठीक है, भगवान्में मन लगा या नहीं लगा, एकान्त मिला या नहीं मिला, शान्ति मिली या नहीं मिली, सिद्धि मिली या नहीं मिली, इत्यादि। इन सब द्रष्टव्योंके साथ सम्बन्ध न होनेसे ही साधक निर्दृष्ट होता है। जैसे तराजू किसी भी तरफ झुक जाय तो वह बराबर नहीं कहलाता, ऐसे ही साधकके अन्तःकरणमें किसी भी तरफ झुकाव हो जाय तो वह द्रष्टातीत नहीं कहलाता।
कर्मयोगी सब प्रकारके द्रष्ट्योंसे अतीत होता है, इसलिये वह सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है (गीता—पाँचवें अध्यायका तीसरा श्लोक)।
‘समः सिद्धावसिद्धौ च’ —किसी भी कर्तव्य-कर्मका निर्विघ्नरूपसे पूरा हो जाना सिद्धि है और किसी प्रकारके विघ्न, बाधाके कारण उसका पूरा न होना असिद्धि है। कर्मका फल मिल जाना सिद्धि है और न मिलना असिद्धि है। सिद्धि और असिद्धिमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकारोंका न होना ही सिद्धि-असिद्धिमें सम रहना है। दूसरे अध्यायके अङ्गतीतसे श्लोकमें ‘सिद्धावसिद्धौः समो भूत्वा’ पदोंमें भी यही भाव आया है।
अपना कुछ भी नहीं है, अपने लिये कुछ भी नहीं चाहिये और अपने लिये कुछ भी नहीं करना है—ये तीनों बातें ठीक-ठीक अनुभवमें आ जायँ, तभी सिद्धि और असिद्धिमें पूर्णतः समता आयेगी।
‘कृत्वापि न निबध्यते’ —यहाँ ‘कृत्वा अपि’ पदोंका तात्पर्य है कि कर्मयोगी कर्म करते हुए भी नहीं बँधता, फिर कर्म न करते हुए बँधनेका प्रश्न ही पैदा नहीं होता। वह दोनों अवस्थाओंमें निलिप्त रहता है।
जैसे शरीर-निर्वाहमात्रके लिये कर्म करनेवाला कर्मयोगी
कर्मोंसे नहीं बँधता, वैसे ही शास्त्रविहित सम्पूर्ण कर्मोंको करनेवाला कर्मयोगी भी कर्मोंसे नहीं बँधता।
वास्तवमें देखा जाय तो कर्मयोगमें कर्म करना, अधिक करना, कम करना अथवा न करना बन्धन या मुक्तिका कारण नहीं है। इनके साथ जो लिप्तता (लगाव) है, वही बन्धनका कारण है और जो निलिप्तता है, वही मुक्तिका कारण है। जैसे नाटकमें एक व्यक्ति लक्ष्मणका और दूसरा व्यक्ति मेघनादका स्वर्ग धारण करता है और दोनों व्यक्ति अपने-अपने स्वर्गोंको ठीक-ठीक निभाते हुए भी उससे निलिप्त रहते हैं अर्थात् अपनेको वास्तवमें लक्ष्मण या मेघनाद नहीं मानते। ऐसे ही कर्मयोगी अपने वर्ण, आश्रम आदिके अनुसार कर्तव्यका पालन करते हुए भी उनसे निलिप्त रहता है अर्थात् उनसे अपना कोई सम्बन्ध नहीं मानता। उसका सम्बन्ध नित्य-निरन्तर रहनेवाले स्वरूपके साथ रहता है, प्रतिक्षण परिवर्तनशील प्रकृतिके साथ नहीं। इसलिये उसकी स्थिति स्वाभाविक ही समतामें रहती है। समतामें स्थिति रहनेसे वह कर्म करते हुए भी उनसे नहीं बँधता।
यदि विशेष विचारपूर्वक देखा जाय तो समता स्वतः-सिद्ध है। यह प्रत्येक मनुष्यका अनुभव है कि अनुकूल परिस्थितिमें हम जो रहते हैं, प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी हम वही रहते हैं। यदि हम वही (एक ही) न रहते, तो दो अलग-अलग (अनुकूल और प्रतिकूल) परिस्थितियोंका ज्ञान कैसे होता? इससे सिद्ध हुआ कि परिवर्तन परिस्थितियोंमें होता है अपने स्वरूपमें नहीं। इसलिये परिस्थितियोंके बदलनेपर भी स्वरूपसे हम सम (ज्यों-के-त्यों) ही रहते हैं। भूल यह होती है कि हम परिस्थितियोंकी ओर तो देखते हैं, पर स्वरूपकी ओर नहीं देखते। अपने सम स्वरूपकी ओर न देखनेके कारण ही हम आने-जाने-वाली परिस्थितियोंसे मिलकर सुखी-दुःखी होते हैं।
सम्बन्ध—तीसरे अध्यायके नवें श्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने ‘व्यतिरेक रीति’ से कहा था कि यज्ञसे अतिरिक्त कर्म मनुष्यको बँधते हैं। अब तेईसवें श्लोकके उत्तरार्धमें उसी बातको ‘अन्य रीति’ से कहते हैं।
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः। यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ २३ ॥
| गतसङ्गस्य | = जिसकी आसक्ति सर्वथा मिट गयी है, | ज्ञानावस्थित-चेतसः | = जिसकी बुद्धि स्वरूपके ज्ञानमें स्थित है, (ऐसे केवल) | आचरतः | = कर्म करनेवाले मनुष्यके |
|---|---|---|---|---|---|
| मुक्तस्य | = जो मुक्त हो गया है, | यज्ञाय | = यज्ञके लिये | समग्रम् | = सम्पूर्ण |
| कर्म | = कर्म | ||||
| प्रविलीयते | = नष्ट हो जाते हैं। |
श्लोक २३ ]
- साधक-संजीवनी *
३२५
व्याख्या —[कर्मयोगीके सम्पूर्ण कर्मके विलीन होनेकी बात गीताभरमें केवल इसी श्लोकमें आयी है, इसलिये यह कर्मयोगका मुख्य श्लोक है। इसी प्रकार चौथे अध्यायका छतीसवाँ श्लोक ज्ञानयोगका और अठारहवाँ अध्यायका छाछठवाँ श्लोक भक्तियोगका मुख्य श्लोक है।]
'गतसङ्कस्य' —क्रियाओंका, पदार्थोंका, घटनाओंका, परिस्थितियोंका, व्यक्तियोंका जो संग है, इनके साथ जो हृदयसे लगाव है, वही वास्तवमें बाँधनेवाला अर्थात् जन्म-मरण देनेवाला है (गीता—तेरहवाँ अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। स्वार्थभावको छोड़कर केवल लोगोंके हितके लिये, लोकसंग्रहार्थ कर्म करते रहनेसे कर्मयोगी क्रियाओं, पदार्थों आदिसे असंग हो जाता है अर्थात् उसकी आसक्ति सर्वथा मिट जाती है।
वास्तवमें मनुष्य स्वरूपसे असंग ही है—'असंगो ह्ययं पुरुषः' (बृहदारण्यक० ४।३।१५)। किंतु असंग होते हुए भी यह शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ, परिस्थिति, व्यक्ति आदिसे सम्बन्ध मानकर सुखकी इच्छासे उनमें आबद्ध हो जाता है। मेरी मनचाही हो अर्थात् जो मैं चाहता हूँ, वही हो और जो मैं नहीं चाहता, वह नहीं हो—ऐसा भाव जबतक रहता है, तबतक यह संग बढ़ता ही रहता है। वास्तवमें होता वही है, जो होनेवाला है। जो होनेवाला है उसे चाहें या न चाहें, वह होगा ही; और जो नहीं होनेवाला है, उसे चाहें या न चाहें, वह नहीं होगा। अतः अपनी मनचाही करके मनुष्य व्यर्थमें (बिना कारण) फैसता है और दुःख पाता है।
कर्मयोगी संसारसे मिली हुई शरीरादि वस्तुओंको अपनी और अपने लिये न मानकर उन्हें संसारकी ही मानकर संसारकी सेवामें अर्पण कर देता है। इससे वस्तुओं और क्रियाओंका प्रवाह संसारकी ओर ही हो जाता है और अपना असंग स्वरूप ज्यों-का-त्यों रह जाता है।
कर्मयोगीका 'अहम्' भी सेवामें लग जाता है। तात्पर्य यह है कि उसके भीतर 'मैं सेवक हूँ' यह भाव भी नहीं रहता। यह भाव तो मनुष्यको सेवकपनेके अभिमानसे बाँध देता है। सेवकपनेका अभिमान तभी होता है, जब सेवा-सामग्रीके साथ अपनापन होता है। सेवाकी वस्तु उसीकी थी, उसीको दे दी तो सेवा क्या हुई? हम तो उससे उग्रहण हुए। इसलिये सेवक न रहे, केवल सेवा रह जाय। यह भाव रहे कि सेवाके बदलेमें धन, मान, बड़ाई, पद, अधिकार आदि कुछ भी लेना नहीं है; क्योंकि उसपर
हमारा हक ही नहीं लगता। उसे स्वीकार करना तो अनधिकार चेष्टा है। लोग मेरेको सेवक कहें—ऐसा भाव भी न रहे और यदि वे कहें तो उसमें राजी भी न हो। इस प्रकार संसारकी वस्तुओंको संसारकी सेवामें सर्वथा लगा देनेसे अन्तःकरणमें एक प्रसन्नता होती है। उस प्रसन्नताका भी भोग न किया जाय तो स्वतःसिद्ध असंगताका अनुभव हो जाता है।
'मुक्तस्य' —जो अपने स्वरूपसे सर्वथा अलग है, उन क्रियाओं और शरीरादि पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध न होते हुए भी कामना, ममता और आसक्तिपूर्वक उनसे अपना सम्बन्ध मान लेनेसे मनुष्य बँध जाता है अर्थात् पराधीन हो जाता है। कर्मयोगका अनुष्ठान करनेसे जब माना हुआ (अवास्तविक) सम्बन्ध मिट जाता है, तब कर्मयोगी सर्वथा असंग हो जाता है। असंग होते ही वह सर्वथा मुक्त हो जाता है अर्थात् स्वाधीन हो जाता है।
'ज्ञानावस्थितचेतसः' —जिसकी बुद्धिमें स्वरूपका ज्ञान नित्य-निरन्तर जाग्रत् रहता है, वह 'ज्ञानावस्थित-चेतसः' है। स्वरूप-ज्ञान होते ही उसकी स्वरूपमें स्थिति हो जाती है, जो वास्तवमें पहलेसे ही थी।
वास्तवमें ज्ञान संसारका ही होता है। स्वरूपका ज्ञान नहीं होता; क्योंकि स्वरूप स्वतःज्ञानस्वरूप है। क्रिया और पदार्थ ही संसार है। क्रिया और पदार्थका विभाग अलग है तथा स्वरूपका विभाग अलग है अर्थात् क्रिया और पदार्थका स्वरूपके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। क्रिया और पदार्थ जड़ हैं तथा स्वरूप चेतन है। क्रिया और पदार्थ प्रकाश्य हैं तथा स्वरूप प्रकाशक है। इस प्रकार क्रिया और पदार्थकी स्वरूपसे भिन्नताका ठीक-ठीक ज्ञान होते ही क्रिया और पदार्थरूप संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होकर स्वतःसिद्ध असंग स्वरूपमें स्थितिका अनुभव हो जाता है।
'यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते' —'कर्ममें अकर्म' देखनेका ही एक प्रकार है—'यज्ञार्थ कर्म' अर्थात् यज्ञके लिये कर्म करना। निःस्वार्थभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना 'यज्ञ' है। जो यज्ञके लिये ही सम्पूर्ण कर्म करता है, वह कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जाता है और जो यज्ञके लिये कर्म नहीं करता अर्थात् अपने लिये कर्म करता है, वह कर्मोंसे बँध जाता है—'यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः' ' (गीता ३।९)।
प्रकृतिका कार्य है—क्रिया और पदार्थ। इन दोनोंमें क्रियाका भी आदि और अन्त होता है तथा पदार्थका भी
३२६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
आदि और अन्त होता है। क्रिया आरम्भ होनेसे पहले भी नहीं थी और समाप्त होनेके बाद भी नहीं रहेगी, इसलिये बीचमें भी वह नहीं है—ऐसा सिद्ध हुआ। इसी प्रकार पदार्थ उत्पन्न होनेसे पहले भी नहीं था और नष्ट होनेके बाद भी नहीं रहेगा, इसलिये बीचमें भी वह नहीं है—यह सिद्ध हुआ; क्योंकि यह सिद्धान्त है कि जो वस्तु आदि और अन्तमें नहीं होती, वह मध्य (वर्तमान)-में भी नहीं होती। परन्तु चेतन स्वरूपका आदि और अन्त नहीं होता, वह सदा अक्रियरूपसे ज्यों-का-त्यों रहता है। वह चेतन-तत्त्व क्रिया और पदार्थ—दोनोंका प्रकाशक है। इस प्रकार क्रिया और पदार्थके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध न होते हुए भी जब वह इनके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब वह बंध जाता है। इस बन्धनसे छूटनेका उपाय है—फलेच्छाका त्याग करके केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना।
संसारमें अनेक प्रकारकी क्रियाएँ हो रही हैं और अनेक प्रकारके पदार्थ विद्यमान हैं। परन्तु मनुष्य जिन क्रियाओं और पदार्थोंसे आसक्ति, ममता और कामनापूर्वक अपना सम्बन्ध मानता है, उन्हीं क्रियाओं और पदार्थोंसे वह बँधता है। जब मनुष्य कामना, ममता और आसक्तिका त्याग करके केवल दूसरोंके हितके लिये सम्पूर्ण कर्म करता है और मिले हुए पदार्थोंको दूसरोंका ही मानकर उनकी सेवामें लगाता है, तब कर्मयोगीके सम्पूर्ण (क्रियमाण, संचित और प्रारब्ध) कर्म विलीन हो जाते हैं अर्थात् उसे कर्मोंके साथ अपनी स्वतःसिद्ध असंगताका अनुभव हो जाता है।
विशेष बात
(१) कर्ता, करण और कर्म—इन तीनोंके मिलनेसे कर्मोंका संचय होता है (गीता—अठारहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। यदि कर्तापन न रहे तो कर्मोंका संग्रह नहीं होता; क्योंकि करण और कर्म—दोनों कर्ताके ही अधीन हैं। अतः कर्मसंचयका मुख्य हेतु कर्तापन ही है।
विचारपूर्वक देखा जाय तो कुछ-न-कुछ पानेकी इच्छासे ही करनेकी इच्छा उत्पन्न होती है, जिससे कर्तापन उत्पन्न होता है। कर्तापनसे बन्धन होता है। जब मनुष्य पानेकी इच्छासे अपने लिये कर्म करता है, तब उसका
कर्तापन दूढ़ हो जाता है। जब कर्मयोगी पानेकी इच्छाका त्याग करके केवल यज्ञके लिये अर्थात् दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है, तब उसका कर्तापन दूसरोंके लिये होता है; इससे उसे अपनी असंगताका अनुभव हो जाता है। इसलिये उसके द्वारा होनेवाले कर्मोंका संचय नहीं होता। कारण कि जब आधार (कर्तापन) ही नहीं रहा, तब कर्म टिकेंगे ही कहीं?
कर्मयोगमें 'ममता'-(मेरा-पन-) का त्याग और ज्ञानयोगमें 'अहंता' (मैं-पन-) का त्याग मुख्य है। ममताका त्याग होनेसे अहंताका और अहंताका त्याग होनेसे ममताका त्याग स्वतः हो जाता है। इसलिये कर्मयोगमें पहले 'ममता' मिटती है, फिर 'अहंता' स्वतः मिट जाती है, और ज्ञानयोगमें पहले 'अहंता' मिटती है, फिर 'ममता' स्वतः मिट जाती है। अहंता और ममताके मिटनेपर कर्तापन और भोक्तापन भी मिट जाते हैं।
कर्मयोगी अपने लिये कोई कर्म करता ही नहीं और कुछ चाहता ही नहीं; अतः वह कर्मोंके फलका भोक्ता नहीं बनता। जैसे, एक व्यक्तिको यहाँ कई दण्ड भोगने हैं। परन्तु वह मर जाय तो यहाँ उसके सभी दण्ड समाप्त हो जाते हैं; क्योंकि जब भोगनेवाला व्यक्ति ही नहीं रहा, तब दण्ड भोगेगा ही कौन? ऐसे ही जब कर्मयोगीका भोक्तापन मिट जाता है, तब उसके सभी कर्म समाप्त हो जाते हैं; क्योंकि जब भोक्ता ही नहीं रहा, तब कर्मोंका फल भोगेगा ही कौन?
(२) इसी अध्यायके नवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं—इस प्रकार जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता है, वह मेरेको प्राप्त होता है। जन्म तो केवल भगवान्के ही दिव्य होते हैं, पर कर्म मनुष्यमात्रके भी (यदि वे करना चाहें तो) दिव्य हो सकते हैं। अतः इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें भगवान् अपने कर्मोंकी दिव्यताका कारण बताते हैं कि कर्मोंके फलमें मेरी स्मृता नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते अर्थात् मेरे कर्म अकर्म हो जाते हैं। इस प्रकार कर्मोंका तत्त्व जानकर जो कर्म करता है, उसके भी कर्म अकर्म हो जाते हैं। फिर पंद्रहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि मुमुक्षुओंने भी इसी प्रकार जानकर कर्म किये हैं। इसके बाद सोलहवें श्लोकमें भगवान् कर्मोंका तत्त्व कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं, और
१-आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा। (माण्डूक्यकारिका ४। ३१)
२-अहंताके साथ भी ममता रहती है; जैसे—मेरा अहंकार। इसलिये कर्मयोगमें ममताका सर्वथा त्याग होनेपर अहंताके साथ भी ममता नहीं रहती। फिर अहंता (कथनमात्रके लिये) केवल संसारकी सेवाके लिये रह जाती है।
श्लोक २४ ]
- साधक-संजीवनी *
३२७
सत्रहवें श्लोकमें कहते हैं कि कर्म, विकर्म और अकर्म—तीनोंका तत्त्व जानना चाहिये। फिर अठारहवें श्लोकमें भगवान्ने मुख्यरूपसे कर्मोंका तत्त्व (अकर्म अथवा निलिप्तता) बतलाया।
कामनासे 'कर्म' होते हैं, कामनाके बढ़नेपर 'विकर्म' होते हैं और कामनाका अत्यन्त अभाव होनेसे 'अकर्म' होता
है। मूलमें इस (सोलहवेंसे बत्तीसवें श्लोकतकके) प्रकरणका तात्पर्य 'अकर्म' का वर्णन करना ही है। इसीलिये भगवान्ने कर्म और विकर्म—दोनोंके मूल कारण 'कामना' के त्यागका तथा 'अकर्मोंका' वर्णन उन्नीसवेंसे तेईसवें श्लोकतक प्रत्येक श्लोकमें किया है* और अन्तमें बत्तीसवें श्लोकमें इस प्रकरणका उपसंहार किया है।
परिशिष्ट भाव— एक 'क्रिया' होती है, एक 'कर्म' होता है और एक 'कर्मयोग' होता है। शरीर बालकसे जवान तथा जवानसे बूढ़ा होता है—यह 'क्रिया' है। क्रियासे न पाप होता है, न पुण्य; न बन्धन होता है, न मुक्ति। जैसे, गंगाजीका बहना क्रिया है; अतः कोई डूबकर मर जाय अथवा खेती आदि कोई परोपकार हो जाय तो गंगाजीको पाप-पुण्य नहीं लगता। जब मनुष्य क्रियासे सम्बन्ध जोड़कर कर्ता बन जाता है अर्थात् अपने लिये क्रिया करता है, तब वह क्रिया फलजनक 'कर्म' बन जाती है। कर्मसे बन्धन होता है—'यज्ञार्थार्त्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः' (गीता ३।९)। कर्मबन्धनसे छूटनेके लिये जब मनुष्य अपने लिये कुछ नहीं करता, प्रत्युत निःस्वार्थभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये ही कर्म करता है, तब वह 'कर्मयोग' हो जाता है। कर्मयोगसे बन्धन मिटता है—'यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते'। बन्धन मिटनेसे योग हो जाता है अर्थात् परमात्माके साथ नित्य-सम्बन्धका अनुभव हो जाता है। यह तेईसवाँ श्लोक कर्मयोगका मुख्य श्लोक है। जैसे भगवान्ने 'ज्ञानाग्निः सर्वकर्मणि भस्मसात्कुरुते' (४।३७) पदोंसे ज्ञानाग्निके द्वारा ज्ञानयोगीके सम्पूर्ण पाप भस्म होनेकी बात कही है और 'अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि' (१८।६६) पदोंसे भक्तके सम्पूर्ण पाप नष्ट होनेकी बात कही है, ऐसे ही इस श्लोकमें 'यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते' पदोंसे कर्मयोगीके समग्र कर्म (पाप) नष्ट होनेकी बात कही है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि यज्ञके लिये कर्म करनेसे सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं। साधकोंकी रुचि, विश्वास और योग्यताकी भिन्नताके कारण साधन भी भिन्न-भिन्न प्रकारके होते हैं। इसलिये अब आगेके सात श्लोकोंमें (चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक) भगवान् भिन्न-भिन्न प्रकारके साधनोंका 'यज्ञ' रूपसे वर्णन करते हैं।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २४ ॥
जिस यज्ञमें—
अर्पणम् = अर्पण अर्थात् जिससे अर्पण किया जाय, वे सुख, सुवा आदि पात्र (भी) | ब्रह्म = ब्रह्म है (और) ब्रह्मणा = ब्रह्मरूप कर्ताके द्वारा ब्रह्माग्नौ = ब्रह्मरूप अग्निमें हुतम् = आहुति देनारूप क्रिया (भी ब्रह्म है), ब्रह्मकर्मसमाधिना = (ऐसे यज्ञको करनेवाले) जिस | मनुष्यकी ब्रह्ममें ही कर्म-समाधि हो गयी है, तेन = उसके द्वारा गन्तव्यम् = प्राप्त करनेयोग्य (फल भी) ब्रह्म = ब्रह्म एव = ही है। ---|---|---
- उदाहरणार्थ—कामनाके त्यागकी बात इन पदोंमें आयी है—'कामसङ्कल्पवर्जिताः' (४।११); 'त्यक्त्वा कर्मफलसंगम्' (४।२०); 'निराशीः' (४।२१); 'यदुच्छालाभसन्तुष्टः' (४।२२) और 'गतसंगस्य' (४।२३)।
अकर्मकी बात इन पदोंमें आयी है—'ज्ञानाग्निदधकर्मणिम्' (४।१९); 'नैव किंचित्करोति सः' (४।२०); 'कर्म कुर्वन्नान्मोति किल्विषम्' (४।२१); 'कृत्वापि न निबध्यते' (४।२२) और 'कर्म समग्रं प्रविलीयते' (४।२३)।
३२८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
व्याख्या —[यज्ञमें आहुति मुख्य होती है। वह आहुति तब पूर्ण होती है, जब वह अगिरूप ही हो जाय अर्थात् हव्य पदार्थकी अगिनेसे अलग सत्ता ही न रहे। इसी प्रकार जितने भी साधन हैं, सब साध्यरूप हो जायें, तभी वे यज्ञ होते हैं।
जितने भी यज्ञ हैं, उनमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करना भावना नहीं है, प्रत्युत वास्तविकता है। भावना तो पदार्थोंकी है।
इस चौबीसवें श्लोकसे तीसवें श्लोकतक जिन यज्ञोंका वर्णन किया गया है, वे सब 'कर्मयोग' के अन्तर्गत हैं। कारण कि भगवान्ने इस प्रकरणके उपक्रममें भी 'तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्' (४।१६)—ऐसा कहा है; और उपसंहारमें भी 'कर्मजान्विद्धि तान्सर्वनिर्वं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे' (४।३२)—ऐसा कहा है तथा बीचमें भी कहा है—'यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते' (४।२३)। मुख्य बात यह है कि यज्ञकर्ताके सभी कर्म 'अकर्म' हो जायें। यज्ञ केवल यज्ञ-परम्पराकी रक्षाके लिये किये जायें तो सब-के-सब कर्म अकर्म हो जाते हैं। अतः इन सब यज्ञोंमें 'कर्ममें अकर्म' का ही वर्णन है।]
'ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः'—जिस पात्रसे अग्निमें आहुति दी जाती है, उस सुक, सुवा आदिको यहाँ 'अर्पणम्' पदसे कहा गया है—'अर्प्यते अनेन इति अर्पणम्।' उस अर्पणको ब्रह्म ही माने।
तिल, जौ, घी आदि जिन पदार्थोंका हवन किया जाता है, उन हव्य पदार्थोंको भी ब्रह्म ही माने।
'ब्रह्मगन्ना ब्रह्मणा हुतम्'—आहुति देनेवाला भी ब्रह्म ही है (गीता १३।२), जिसमें आहुति दी जा रही है, वह अग्नि भी ब्रह्म ही है और आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म ही है—ऐसा माने।
'ब्रह्मकर्मसमाधिना'—जैसे हवन करनेवाला पुरुष सुवा, हवि, अग्नि आदि सबको ब्रह्माका ही स्वरूप मानता है, ऐसे ही जो प्रत्येक कर्ममें कर्ता, करण, कर्म और पदार्थ सबको ब्रह्मरूप ही अनुभव करता है, उस पुरुषकी ब्रह्ममें ही कर्म-समाधि होती है अर्थात् उसकी सम्पूर्ण कर्मोंमें ब्रह्मबुद्धि होती है। उसके लिये सम्पूर्ण कर्म ब्रह्मरूप ही बन जाते हैं। ब्रह्मके सिवाय कर्मोंका अपना कोई अलग
स्वरूप रहता ही नहीं।
'ब्रह्मैव तेन गन्तव्यम्'—ब्रह्ममें ही कर्म-समाधि होनेसे जिसके सम्पूर्ण कर्म ब्रह्मरूप ही बन गये हैं, उसे फलके रूपमें निःसन्देह ब्रह्मकी ही प्राप्ति होती है। कारण कि उसकी दृष्टिमें ब्रह्मके सिवाय और किसीकी स्वतन्त्र सत्ता रहती ही नहीं।
इस (चौबीसवें) श्लोकको शिष्टजन भोजनके समय बोलते हैं, जिससे भोजनरूप कर्म भी यज्ञ बन जाय। भोजनरूप कर्ममें ब्रह्मबुद्धि इस प्रकार की जाती है—
(१) जिससे अर्पण किया जाता है, वह हाथ भी ब्रह्मरूप है—'सर्वतः पाणिपादं तत्' (गीता १३।१३)।
(२) भोजनके पदार्थ भी ब्रह्मरूप हैं—'अहमेवाज्यम्' (गीता ९।१६)।
(३) भोजन करनेवाला भी ब्रह्मरूप है—'ममैवांशो जीवलोकै' (गीता १५।७)।
(४) जठराग्नि भी ब्रह्मरूप है—'अहं वैश्वानरः' (गीता १५।१४)।
(५) भोजन करनारूप क्रिया अर्थात् जठराग्निमें अन्नकी आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म है—'अहं हुतम्' (गीता ९।१६)।
(६) इस प्रकार भोजन करनेवाले मनुष्योंके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य फल भी ब्रह्म ही है—'यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्' (गीता ४।३१)।
मार्मिक बात
प्रकृतिके कार्य संसारका स्वरूप है—क्रिया और पदार्थ। वास्तविक दृष्टिसे देखा जाय तो प्रकृति या संसार क्रियारूप ही है*। कारण कि पदार्थ एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता; उसमें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। अतः वास्तवमें पदार्थ परिवर्तनरूप क्रियाका पुंज ही है। केवल 'राग' के कारण पदार्थकी मुख्यता दीखती है। सम्पूर्ण क्रियाएँ अभावमें जा रही हैं। अतः संसार अभावरूप ही है। भावरूपसे केवल एक अक्रिय-तत्त्व ब्रह्म ही है, जिसकी सत्तासे अभावरूप संसार भी सत्तावान् प्रतीत हो रहा है। संसारकी अभावरूपताको इस प्रकारसे समझ सकते हैं—
संसारकी तीन अवस्थाएँ दीखती हैं—उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय; जैसे—वस्तु उत्पन्न होती है, फिर रहती है और अन्तमें नष्ट हो जाती है अथवा मनुष्य जन्म लेता है, फिर
- प्रकषेण करणं (भावे ल्युट्) इति प्रकृतिः। सम्यगीत्या सरतीति संसारः॥
श्लोक २५-२६ ]
- साधक-संजीवनी *
३२९
रहता है और अन्तमें मर जाता है। इससे आगे विचार करें तो केवल उत्पत्ति और प्रलयका ही क्रम है, स्थिति वस्तुतः है ही नहीं; जैसे—यदि मनुष्यकी पूरी आयु पचास वर्षकी है, तो बीस वर्ष बीतनेपर उसकी आयु तीस वर्ष ही रह जाती है। इससे आगे विचार करें तो केवल प्रलय-ही-प्रलय (नाश-ही-नाश) है, उत्पत्ति है ही नहीं; जैसे—आयुके जितने वर्ष बीत गये, उतने वर्ष मनुष्य मर ही गया।
इस प्रकार मनुष्य प्रतिक्षण ही मर रहा है, उसका जीवन प्रतिक्षण ही मृत्युमें जा रहा है। दृश्यमात्र प्रतिक्षण अदृश्यमें जा रहा है। प्रलय अभावका ही नाम है, इसलिये अभाव ही शेष रहा। अभावकी सत्ता भावरूप ब्रह्मपर ही टिकी हुई है। अतः भावरूपसे एक ब्रह्म ही शेष रहा—‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ (छान्दोग्य ३।१४।१); ‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९)।
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥ २५ ॥
| अपरे | = अन्य | पर्युपासते | = अनुष्ठान करते हैं | यज्ञके द्वारा |
|---|---|---|---|---|
| योगिनः | = योगीलोग | (और) | एव | |
| दैवम् | = दैव | |||
| (भगवदर्पणरूप) | अपरे | = दूसरे (योगीलोग) | यज्ञम् | |
| यज्ञम् | = यज्ञका | ब्रह्माग्नौ | = ब्रह्मरूप | यज्ञका |
| एव | = ही | अग्निमें | उपजुह्वति | |
| यज्ञेन | = (विचाररूप) | करते हैं। |
व्याख्या—‘दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते’— पूर्वश्लोकमें भगवान्ने सर्वत्र ब्रह्मदर्शनरूप यज्ञ करनेवाले साधकका वर्णन किया। यहाँ भगवान् ‘अपरे’ पदसे उससे भिन्न प्रकारके यज्ञ करनेवाले साधकोंका वर्णन करते हैं।
यहाँ ‘योगिनः’ पद यज्ञार्थ कर्म करनेवाले निष्काम साधकोंके लिये आया है।
सम्पूर्ण क्रियाओं तथा पदार्थोंको अपना और अपने लिये न मानकर उन्हें केवल भगवान्का और भगवान्के लिये ही मानना ‘दैवयज्ञ’ अर्थात् भगवदर्पणरूप यज्ञ है। भगवान् देवोंके भी देव हैं, इसलिये सब कुछ उनके अर्पण कर देनेको ही यहाँ ‘दैवयज्ञ’ कहा गया है।
परिशिष्ट भाव—‘ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति’ का यह अर्थ भी ले सकते हैं—दूसरे योगीलोग संसाररूप ब्रह्मकी सेवाके लिये केवल लोकसंग्रहरूप यज्ञके लिये कर्तव्य-कर्मरूप यज्ञ करते हैं अर्थात् यज्ञार्थ कर्म करते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका नवों और चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)।
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥ २६ ॥
अन्ये | = अन्य (योगीलोग) | संयमाग्निषु | = संयमरूप अग्नियोंमें | शब्दादीन् | = शब्दादि ---|---|---|---|---|--- श्रोत्रादीनि | = श्रोत्रादि | जुह्वति | = हवन किया करते हैं (और) | विषयान् | = विषयोंका इन्द्रियाणि | = समस्त इन्द्रियोंका | अन्ये | = दूसरे (योगीलोग) | इन्द्रियाग्निषु | = इन्द्रियरूप अग्नियोंमें | | | | जुह्वति | = हवन किया करते हैं।
३३०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
व्याख्या— श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति’—यहाँ संयरूप अग्नियोंमें इन्द्रियोंकी आहुति देनेको यज्ञ कहा गया है। तात्पर्य यह है कि एकांतकालमें श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और प्राण—ये पाँचों इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों (क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध)—की ओर बिलकुल प्रवृत्त न हों। इन्द्रियाँ संयरूप ही बन जायँ। पूरा संयम तभी समझना चाहिये, जब इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि तथा अहम्—इन सबमेंसे राग-आसक्तिका सर्वथा अभाव हो जाय (गीता—दूसरे अध्यायका अट्टावनवाँ, उन्सठवाँ तथा अड़सठवाँ श्लोक)।
‘शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति’ — शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच विषय हैं। विषयोंका इन्द्रियरूप अग्नियोंमें हवन करनेसे वह यज्ञ हो जाता है। तात्पर्य यह है कि व्यवहारकालमें विषयोंका इन्द्रियोंसे संयोग होते रहनेपर भी इन्द्रियोंमें कोई विकार उत्पन्न न हो (गीता—दूसरे अध्यायका चौसठवाँ-पैंसठवाँ श्लोक)।
इन्द्रियाँ राग-द्वेषसे रहित हो जायँ। इन्द्रियोंमें राग-द्वेष उत्पन्न करनेकी शक्ति विषयोंमें रहे ही नहीं।
इस श्लोकमें कहे गये दोनों प्रकारके यज्ञोंमें राग-आसक्तिका सर्वथा अभाव होनेपर ही सिद्धि (परमात्म-प्राप्ति) होती है। राग-आसक्तिको मिटानेके लिये ही दो प्रकारकी प्रक्रियाका यज्ञरूपसे वर्णन किया गया है—
पहली प्रक्रियामें साधक एकांतकालमें इन्द्रियोंका संयम करता है। विवेक-विचार, जप-ध्यान आदिसे इन्द्रियोंका संयम होने लगता है। पूरा संयम होनेपर जब रागका अभाव हो जाता है, तब एकांतकाल और व्यवहारकाल—दोनोंमें उसकी समान स्थिति रहती है।
दूसरी प्रक्रियामें साधक व्यवहारकालमें राग-द्वेषरहित इन्द्रियोंसे व्यवहार करते हुए मन, बुद्धि और अहम्से भी राग-द्वेषका अभाव कर देता है। रागका अभाव होनेपर व्यवहारकाल और एकांतकाल—दोनोंमें उसकी समान स्थिति रहती है।
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।
आत्मसंयमयोगान्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ २७ ॥
| अपरे | = अन्य (योगीलोग) | प्राणकर्माणि | = प्राणोंकी क्रियाओंको | योग (समाधियोग) | = हवन |
|---|---|---|---|---|---|
| सर्वाणि | = सम्पूर्ण | ज्ञानदीपिते | = ज्ञानसे प्रकाशित | रूप अग्निमें | किया |
| इन्द्रियकर्माणि | = इन्द्रियोंकी क्रियाओंको | आत्मसंयम- | जुह्वति | करते हैं। | |
| च | = और | योगान्नौ | = आत्मसंयम- |
व्याख्या— सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे’—इस श्लोकमें समाधिको यज्ञका रूप दिया गया है। कुछ योगीलोग दसों इन्द्रियोंकी क्रियाओंका समाधिमें हवन किया करते हैं। तात्पर्य यह है कि समाधि-अवस्थामें मन-बुद्धिसहित सम्पूर्ण इन्द्रियों—(ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों—) की क्रियाएँ रुक जाती हैं। इन्द्रियाँ सर्वथा निश्चल और शान्त हो जाती हैं।
समाधिरूप यज्ञमें प्राणोंकी क्रियाओंका भी हवन हो जाता है अर्थात् समाधिकालमें प्राणोंकी क्रियाएँ भी रुक जाती हैं। समाधिमें प्राणोंकी गति रोकनेके दो प्रकार हैं— एक तो हठयोगकी समाधि होती है, जिसमें प्राणोंको रोकनेके लिये कुम्भक किया जाता है। कुम्भकका अभ्यास बढ़ते-बढ़ते प्राण रुक जाते हैं, जो घटोतक, दिनोतक रुके
रह सकते हैं। इस प्राणायामसे आयु बढ़ती है; जैसे—वर्षा होनेपर जल बहने लगता है तो जलके साथ-साथ बालू भी आ जाती है, उस बालूमें मेढक दब जाता है। वर्षा बीतनेपर जब बालू सूख जाती है, तब मेढक उस बालूमें ही चुपचाप सूखे हुएकी तरह पड़ा रहता है, उसके प्राण रुक जाते हैं। पुनः जब वर्षा आती है, तब वर्षाका जल ऊपर गिरनेपर मेढकमें पुनः प्राणोंका संचार होता जाता है और वह टराने लग जाता है।
दूसरे प्रकारमें मनको एकाग्र किया जाता है। मन सर्वथा एकाग्र होनेपर प्राणोंकी गति अपने-आप रुक जाती है।
‘ज्ञानदीपिते’ —समाधि और निद्रा—दोनोंमें कारणशरीरसे सम्बन्ध रहता है, इसलिये बाहरसे दोनोंकी समान अवस्था दिखायी देती है। यहाँ ‘ज्ञानदीपिते’ पदसे समाधि
श्लोक २८ ]
- साधक-संजीवनी *
३३१
और निद्रामें परस्पर भिन्नता सिद्ध की गयी है। तात्पर्य यह कि बाहरसे समान दिखायी देनेपर भी समाधिकालमें 'एक सच्चिदानन्द परमात्मा ही सर्वत्र परिपूर्ण है' ऐसा ज्ञान प्रकाशित (जाग्रत्) रहता है और निद्राकालमें वृत्तियाँ अविद्यामें लीन हो जाती हैं। समाधिकालमें प्राणोंकी गति रुक जाती है और निद्राकालमें प्राणोंकी गति चलती रहती है। इसलिये निद्रा आनेसे समाधि नहीं लगती।
'आत्मसंयमयोगाग्नी जुह्वति'—चितवृत्तिनिरोधरूप अर्थात् समाधिरूप यज्ञ करनेवाले योगीलोग इन्द्रियों तथा प्राणोंकी क्रियाओंका समाधियोरूप अग्निमें हवन किया करते हैं अर्थात् मन-बुद्धिसहित सम्पूर्ण इन्द्रियों और प्राणोंकी क्रियाओंको रोककर समाधिमें स्थित हो जाते हैं। समाधि-कालमें सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और प्राण अपनी चंचलता छो देते हैं। एक सच्चिदानन्दधन परमात्माका ज्ञान ही जाग्रत् रहता है।
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च
योगयज्ञास्तथापरे ।
यतयः संशितव्रताः ॥ २८ ॥
| अपरे | = दूसरे (कितने ही) | तपोयज्ञाः | = (और कितने ही) |
|---|---|---|---|
| संशितव्रताः | = तीक्ष्ण व्रत करनेवाले | तपोयज्ञ करनेवाले हैं | |
| यतयः | = प्रयत्नशील साधक | तथा | = और (दूसरे कितने ही) |
| द्रव्ययज्ञाः | = द्रव्यमय यज्ञ |
| करनेवाले हैं | योगयज्ञाः | = योगयज्ञ करनेवाले हैं |
|---|---|---|
| =( और कितने ही) | च | = तथा (कितने ही) |
| तपोयज्ञ करनेवाले हैं | स्वाध्याय- | |
| = और (दूसरे कितने ही) | ज्ञानयज्ञाः | = स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ करनेवाले हैं। |
व्याख्या—'यतयः संशितव्रताः' —अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरीका अभाव), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (भोग-बुद्धिसे संग्रहका अभाव)—ये पाँच 'यम' हैं*, जिन्हें 'महाव्रत' के नामसे कहा गया है। शास्त्रोंमें इन महाव्रतोंकी बहुत प्रशंसा, महिमा है। इन व्रतोंका सार यही है कि मनुष्य संसारसे विमुख हो जाय। इन व्रतोंका पालन करनेवाले साधकोंके लिये यहाँ 'संशितव्रताः ' पद आया है। इसके सिवाय इस श्लोकमें आये चारों यज्ञोंमें जो-जो पालनीय व्रत अर्थात् नियम हैं, उनपर दृढ़ रहकर उनका पालन करनेवाले भी सब 'संशितव्रताः ' हैं। अपने-अपने यज्ञके अनुष्ठानमें प्रयत्नशील होनेके कारण उन्हें 'यतयः ' कहा गया है।
'संशितव्रताः ' पदके साथ ('द्रव्ययज्ञाः ,' 'तपोयज्ञाः ,' 'योगयज्ञाः ' और 'ज्ञानयज्ञाः ' की तरह) 'यज्ञाः ' पद नहीं दिया जानेके कारण इसे अलग यज्ञ नहीं माना गया है।
'द्रव्ययज्ञाः —मात्र संसारके हितके उद्देश्यसे कुआँ, तालाब, मन्दिर, धर्मशाला आदि बनवाना, अभावग्रस्त लोगोंको अन्न, जल, वस्त्र, औषध, पुस्तक आदि देना, दान करना इत्यादि सब 'द्रव्ययज्ञ' है। द्रव्य-(तीनों शरीरोंसहित सम्पूर्ण पदार्थों—) को अपना और अपने लिये न मानकर निःस्वार्थभावसे उन्हींका मानकर उनकी सेवामें
लगानेसे द्रव्ययज्ञ सिद्ध हो जाता है।
शरीरादि जितनी वस्तुएँ हमारे पास हैं, उन्हींसे यज्ञ हो सकता है, अधिककी आवश्यकता नहीं है। मनुष्य बालकसे उतनी ही आशा रखता है, जितना वह कर सकता है, फिर सर्वज्ञ भगवान् तथा संसार हमसे हमारी क्षमतासे अधिककी आशा कैसे रखेंगे?
'तपोयज्ञाः —अपने कर्तव्य-(स्वधर्म—) के पालनमें जो-जो प्रतिकूलताएँ, कठिनाइयाँ आयें, उन्हें प्रसन्नतापूर्वक सह लेना 'तपोयज्ञ' है। लोकहितार्थ एकादशी आदिका व्रत रखना, मौन धारण करना आदि भी 'तपोयज्ञ' अर्थात् तपस्यारूप यज्ञ हैं। परन्तु प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थिति, वस्तु, व्यक्ति, घटना आनेपर भी साधक प्रसन्नतापूर्वक अपने कर्तव्यका पालन करता रहे—अपने कर्तव्यसे थोड़ा भी विचलित न हो तो यह सबसे बड़ी तपस्या है, जो शीघ्र सिद्धि देनेवाली होती है।
गाँवभरकी गन्दगी, कूड़ा-करकट बाहर एक जगह इकट्ठा हो जाय, तो वह बुरा लगता है; परन्तु वही कूड़ा-करकट खेतमें पड़ जाय, तो खेतीके लिये खादरूपसे बढ़िया सामग्री बन जाता है। इसी प्रकार प्रतिकूलता बुरी लगती है और उसे हम कूड़े-करकटकी तरह फेंक देते हैं अर्थात् उसे महत्व नहीं देते; परन्तु वही प्रतिकूलता अपना
- अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥ (योगदर्शन २। ३०)
३३२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
कर्तव्य-पालन करनेके लिये बढ़िया सामग्री है। इसलिये प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थितिको सहर्ष सहनेके समान दूसरा कोई तप नहीं है। भोगोंमें आसक्ति रहनेसे अनुकूलता अच्छी और प्रतिकूलता बुरी लगती है। इसी कारण प्रतिकूलताका महत्त्व समझमें नहीं आता।
‘योगयज्ञास्तथापे’ —यहाँ योग नाम अन्तःकरणकी समताका है। समताका अर्थ है—कार्यकी पूर्ति और अपूर्तिमें, फलकी प्राप्ति और अप्राप्तिमें, अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिमें, निन्दा और स्तुतिमें, आदर और निरादरमें सम रहना अर्थात् अन्तःकरणमें हलचल, राग-द्वेष, हर्ष-शोक, सुख-दुःखका न होना। इस तरह सम रहना ही ‘योगयज्ञ’ है।
‘स्वाध्यायज्ञानयज्ञः’ —केवल लोकहितके लिये गीता, रामायण, भागवत आदिका तथा वेद, उपनिषद् आदिका यथाधिकार मनन-विचारपूर्वक पठन-पाठन करना, अपनी वृत्तियोंका तथा जीवनका अध्ययन करना आदि सब स्वाध्यायरूप ‘ज्ञानयज्ञ’ है।
गीताके अन्तमें भगवान्ने कहा है कि जो इस गीता-शास्त्रका अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होऊँगा—ऐसा मेरा मत है (अठारहवें अध्यायका सत्तरवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह है कि गीताका स्वाध्याय ‘ज्ञानयज्ञ’ है। गीताके भावोंमें गहरे उतरकर विचार करना, उसके भावोंको समझनेकी चेष्टा करना आदि सब स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ है।
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥ २९ ॥
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥
अपरे | = दूसरे (कितने ही) | रुद्ध्वा | = रोककर (कुम्भक करके) | प्राणान् | = प्राणोंका ---|---|---|---|---|--- प्राणायाम- | = प्राणायामके | प्राणे | = (फिर) प्राणमें | प्राणेषु | = प्राणोंमें परायणाः | परायण हुए (योगीलोग) | अपानम् | = अपानका | जुह्वति | = हवन किया करते हैं। अपाने | = अपानमें | जुह्वति | = हवन (रेचक) करते हैं; | एते | = ये प्राणम् | = प्राणका (पूरक करके) | तथा | = तथा | सर्वे, अपि | = सभी (साधक) प्राणापानगती | = प्राण और अपानकी गति | अपरे | = अन्य (कितने ही) | यज्ञक्षपित- | = यज्ञों द्वारा | | नियताहाराः | = नियमित आहार करनेवाले | कल्मषाः | पापोंका नाश करनेवाले (और) | | | | यज्ञविदः | = यज्ञोंको जाननेवाले हैं।
व्याख्या—‘अपाने जुह्वति’.....‘प्राणायाम-परायणाः’ —प्राणका स्थान हृदय (ऊपर) तथा अपानका स्थान गुदा (नीचे) हैं। श्वासको बाहर निकालते समय वायुकी गति ऊपरकी ओर तथा श्वासको भीतर ले जाते समय वायुकी गति नीचेकी ओर होती है। इसलिये श्वासको बाहर निकालना ‘प्राण’ का कार्य और श्वासको भीतर ले जाना ‘अपान’ का कार्य है। योगीलोग पहले
बाहरकी वायुको बायीं नासिका-(चन्द्रनाड़ी-) के द्वारा भीतर ले जाते हैं। वह वायु हृदयमें स्थित प्राणवायुको साथ लेकर नाभिसे होती हुई स्वाभाविक ही अपानमें लीन हो जाती है। इसको ‘पूरक’ कहते हैं। फिर वे प्राणवायु और अपानवायु—दोनोंकी गति रोक देते हैं। न तो श्वास बाहर जाता है और न श्वास भीतर ही आता है। इसको ‘कुम्भक’ कहते हैं। इसके बाद वे भीतरकी वायुको दायीं नासिका-
१-इस (उन्तीसवें) श्लोकमें ‘अपरे’ कर्ता और ‘जुह्वति’ क्रिया एक ही आयी है; अतः यहाँ पूरक, कुम्भक और रेचकपूर्वक किया जानेवाला एक ही प्राणायामरूप यज्ञ लिया गया है।
२-हृदि प्राणः स्थितो नियमपानो गुदमण्डले। (योगचूडामण्युपनिषद् २३)
श्लोक २९-३० ]
- साधक-संजीवनी *
३३३
(सूर्यनाड़ी- ) के द्वारा बाहर निकालते हैं। वह वायु स्वाभाविक ही प्राणवायुको तथा उसके पीछे-पीछे अपानवायुको साथ लेकर बाहर निकलती है। यही प्राण-वायुमें अपानवायुका हवन करना है। इसको 'रेचक' कहते हैं। चार भगवन्नामसे पूरक, सोलह भगवन्नामसे कुम्भक और आठ भगवन्नामसे रेचक किया जाता है।
इस प्रकार योगीलोग पहले चन्द्रनाड़ीसे पूरक, फिर कुम्भक और फिर सूर्यनाड़ीसे रेचक करते हैं। इसके बाद सूर्यनाड़ीसे पूरक, फिर कुम्भक और फिर चन्द्रनाड़ीसे रेचक करते हैं। इस तरह बार-बार पूरक-कुम्भक-रेचक करना प्राणायामरूप यज्ञ है। परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे निष्कामभावपूर्वक प्राणायामके परायण होनेसे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं*।
'अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति' — नियमित आहार-विहार करनेवाले साधक ही प्राणोंका प्राणोंमें हवन कर सकते हैं। अधिक या बहुत कम भोजन करनेवाला अथवा बिलकुल भोजन न करनेवाला यह प्राणायाम नहीं कर सकता (गीता—छठे अध्यायका सोलहवाँ-सत्रहवाँ श्लोक)।
प्राणोंका प्राणोंमें हवन करनेका तात्पर्य है—प्राणका प्राणमें और अपानका अपानमें हवन करना अर्थात् प्राण और अपानको अपने-अपने स्थानोंपर रोक देना। न श्वास बाहर निकालना और न श्वास भीतर लेना। इसे 'स्तम्भवृत्ति प्राणायाम' भी कहते हैं। इस प्राणायामसे स्वाभाविक ही वृत्तियाँ शान्त होती हैं और पापीका नाश हो जाता है। केवल परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखकर प्राणायाम करनेसे अन्तःकरण निर्मल हो जाता है और परमात्मप्राप्ति हो जाती है।
'सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्पषाः' — चौबीसवें श्लोकसे तीसवें श्लोकके पूर्वार्धतक जिन यज्ञोंका वर्णन हुआ है, उनका अनुष्ठान करनेवाले साधकोंके लिये यहाँ 'सर्वेऽप्येते' पद आया है। उन यज्ञोंका अनुष्ठान करते रहनेसे उनके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं और अविनाशी परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।
वास्तवमें सम्पूर्ण यज्ञ केवल कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये ही हैं—ऐसा जानेवाले ही 'यज्ञवित्' अर्थात् यज्ञके तत्त्वको जानेवाले हैं। कर्मोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर परमात्माका अनुभव हो जाता है। जो लोग अविनाशी परमात्माका अनुभव करनेके लिये यज्ञ नहीं
करते, प्रत्युत इस लोक और परलोक (स्वर्गादि)-के विनाशी भोगोंकी प्राप्तिके लिये ही यज्ञ करते हैं, वे यज्ञके तत्त्वको जाननेवाले नहीं हैं। कारण कि विनाशी पदार्थोंकी कामना ही बन्धनका कारण है—'गतागतं कामकामा लभन्ते' (गीता ९।२१)। अतः मनमें कामना-वासना रखकर परिश्रमपूर्वक बड़े-बड़े यज्ञ करनेपर भी जन्म-मरणका बन्धन बना रहता है—
मिटी न मनकी वासना, नौ तत भये न नास।
तुलसी केते पच मुये, दे दे तन को त्रास॥
विशेष बात
यज्ञ करते समय अग्निमें आहुति दी जाती है। आहुति दी जानेवाली वस्तुओंके रूप पहले अलग-अलग होते हैं; परन्तु अग्निमें आहुति देनेके बाद उनके रूप अलग-अलग नहीं रहते, अपितु सभी वस्तुएँ अग्निरूप हो जाती हैं। इसी प्रकार परमात्मप्राप्तिके लिये जिन साधनोंका यज्ञरूपसे वर्णन किया गया है, उनमें आहुति देनेका तात्पर्य यही है कि आहुति दी जानेवाली वस्तुओंकी अलग सत्ता रहे ही नहीं, सब स्वाहा हो जायें। जबतक उनकी अलग सत्ता बनी हुई है, तबतक वास्तवमें उनकी आहुति दी ही नहीं गयी अर्थात् यज्ञका अनुष्ठान हुआ ही नहीं।
इसी अध्यायके सोलहवें श्लोकसे भगवान् कर्मोंके तत्त्व (कर्ममें अकर्म) का वर्णन कर रहे हैं। कर्मोंका तत्त्व है— कर्म करते हुए भी उनसे नहीं बँधना। कर्मोंसे न बँधनेका ही एक साधन है—यज्ञ। जैसे अग्निमें डालनेपर सब वस्तुएँ स्वाहा हो जाती हैं, ऐसे ही केवल लोकहितके लिये किये जानेवाले सब कर्म स्वाहा हो जाते हैं—'यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते' (गीता ४।२३)।
निष्कामभावपूर्वक केवल लोकहितार्थ किये गये साधारण-से-साधारण कर्म भी परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले हो जाते हैं। परन्तु सकामभावपूर्वक किये गये बड़े-से-बड़े कर्मोंसे भी परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती। कारण कि उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंकी कामना ही बाँधनेवाली है। पदार्थ और क्रियारूप संसारसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण मनुष्यमात्रमें पदार्थ पाने और कर्म करनेका राग रहता है कि मुझे कुछ-न-कुछ मिलता रहे और मैं कुछ-न-कुछ करता रहूँ। इसीको 'पानेकी कामना' तथा 'करनेका वेग' कहते हैं।
मनुष्यमें जो पानेकी कामना रहती है, वह वास्तवमें
- गीताध्ययनशीलस्य प्राणायामपरस्य च। नैव सन्ति हि पापानि पूर्वजन्मकृतानि च॥
३३४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
अपने अंशी परमात्माको ही पानेकी भूख है; परन्तु परमात्मासे विमुख और संसारके सम्मुख होनेके कारण मनुष्य इस भूखको सांसारिक पदार्थोंसे ही मिटाना चाहता है। सांसारिक पदार्थ विनाशी हैं और जीव अविनाशी है। अविनाशीकी भूख विनाशी पदार्थोंसे मिट ही कैसे सकती है? परन्तु जबतक संसारकी सम्मुखता रहती है, तबतक पानेकी कामना बनी रहती है। जबतक मनुष्यमें पानेकी कामना रहती है, तबतक उसमें करनेका वेग बना रहता है। इस प्रकार जबतक पानेकी कामना और करनेका वेग बना हुआ है अर्थात् पदार्थ और क्रियासे सम्बन्ध बना हुआ
है, तबतक जन्म-मरण नहीं छूटता। इससे छूटनेका उपाय है—कुछ भी पानेकी कामना न रखकर केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना। इसीको लोकसंग्रह, यज्ञार्थ कर्म, लोकहितार्थ कर्म आदि नामोंसे कहा गया है।
केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे संसारसे सम्बन्ध छूट जाता है और असंगता आ जाती है। अगर केवल भगवान्के लिये कर्म किये जायें, तो संसारसे सम्बन्ध छूटकर असंगता तो आ ही जाती है, इसके साथ एक और विलक्षण बात यह होती है कि भगवान्का 'प्रेम' प्राप्त हो जाता है!
परिशिष्ट भाव —निःस्वार्थभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्तव्यकर्म करनेका नाम 'यज्ञ' है। यज्ञसे सभी कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् बाँधनेवाले नहीं होते। चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक कुल बारह प्रकारके यज्ञ बताये गये हैं, जो इस प्रकार हैं—
(१) ब्रह्मयज्ञ—प्रत्येक कर्ममें कर्ता, करण क्रिया, पदार्थ आदि सबको ब्रह्मरूपसे अनुभव करना।
(२) भगवददर्पणरूप यज्ञ—सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थोंको केवल भगवान्का और भगवान्के लिये ही मानना।
(३) अभिन्नतारूप यज्ञ—असत्से सर्वथा विमुख होकर परमात्मामें लीन हो जाना अर्थात् परमात्मासे भिन्न अपनी स्वतन्त्र सत्ता न रखना।
[ कर्तव्य-कर्मरूप यज्ञ—केवल दूसरोंके हितके लिये सम्पूर्ण कर्तव्यकर्म करना। ]
(४) संयमरूप यज्ञ—एकांतकालमें अपनी इन्द्रियोंको विषयोंमें प्रवृत्त न होने देना।
(५) विषय-हवनरूप यज्ञ—व्यवहारकालमें इन्द्रियोंका विषयोंसे संयोग होनेपर भी उनमें राग-द्वेष पैदा न होने देना (गीता—दूसरे अध्यायका चौंसठवाँ-पैंसठवाँ श्लोक)।
(६) समाधिरूप यज्ञ—मन-बुद्धिसहित सम्पूर्ण इन्द्रियों और प्राणोंकी क्रियाओंको रोककर ज्ञानसे प्रकाशित समाधिमें स्थित हो जाना।
(७) द्रव्ययज्ञ—सम्पूर्ण पदार्थोंको निःस्वार्थभावसे दूसरोंकी सेवामें लगा देना।
(८) तपोयज्ञ—अपने कर्तव्यके पालनमें आनेवाली कठिनाइयोंको प्रसन्नतापूर्वक सह लेना।
(९) योगयज्ञ—कार्यकी सिद्धि-असिद्धिमें तथा फलकी प्राप्ति-अप्राप्तिमें सम रहना।
(१०) स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ—दूसरोंके हितके लिये सत्-शास्त्रोंका पठन-पाठन, नाम-जप आदि करना।
(११) प्राणायामरूप यज्ञ—पूरक, कुम्भक और रेचकपूर्वक प्राणायाम करना।
(१२) स्तम्भवृत्ति (चतुर्थ) प्राणायामरूप यज्ञ—नियमित आहार करते हुए प्राण और अपानको अपने-अपने स्थानोंपर रोक देना।
—इन सबका तात्पर्य है कि हमारी मात्र क्रियाएँ यज्ञरूप ही होनी चाहिये, तभी जीवन सफल होगा। तात्पर्य है कि हमें अपने लिये कुछ नहीं करना है। क्रिया और पदार्थके साथ हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। हमारा सम्बन्ध परमात्माके साथ है, जो क्रिया और पदार्थसे रहित हैं।
सम्बन्ध—चौबीसवें श्लोकसे तीसवें श्लोकके पूर्वार्धतक भगवान्ने कुल बारह प्रकारके यज्ञोंका वर्णन किया और तीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें यज्ञ करनेवाले साधकोंकी प्रशंसा की। अब भगवान् आगेके श्लोकमें यज्ञ करनेसे होनेवाले लाभ और न करनेसे होनेवाली हानि बताते हैं।
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥
श्लोक ३२ ]
- साधक-संजीवनी *
३३५
कुरुसत्तम | = हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! | ब्रह्म | = परब्रह्म परमात्माको ---|---|---|--- यज्ञशिष्टा- | = यज्ञसे बचे हुए | यान्ति | = प्राप्त होते हैं। मृतभुजः | = अमृतका अनुभव करनेवाले | अयज्ञस्य | = यज्ञ न करनेवाले मनुष्यके लिये सनातनम् | = सनातन | अयम् | = यह
| लोकः | = मनुष्यलोक (भी) |
|---|---|
| न | = (सुखदायक) नहीं |
| अस्ति | = है, |
| अन्यः | = (फिर) परलोक |
| कृतः | = कैसे (सुखदायक |
| होगा) ? |
व्याख्या—‘यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्’— यज्ञ करनेसे अर्थात् निष्कामभावपूर्वक दूसरोंको सुख पहुँचानेसे समताका अनुभव हो जाना ही ‘यज्ञशिष्ट अमृत’का अनुभव करना है। अमृत अर्थात् अमरताका अनुभव करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। स्वरूपसे मनुष्य अमर है। मरनेवाली वस्तुओंके संगसे ही मनुष्यको मृत्युका अनुभव होता है। इन वस्तुओंको संसारके हितमें लगानेसे जब मनुष्य असंग हो जाता है, तब उसे स्वतःसिद्ध अमरताका अनुभव हो जाता है।
कर्तव्यमात्र केवल कर्तव्य समझकर किया जाय, तो वह यज्ञ हो जाता है। केवल दूसरोंके हितके लिये किया जानेवाला कर्म ही कर्तव्य होता है। जो कर्म अपने लिये किया जाता है, वह कर्तव्य नहीं होता, प्रत्युत कर्ममात्र होता है, जिससे मनुष्य बँधता है। इसलिये यज्ञमें देना-ही-देना होता है, लेना केवल निर्वाहमात्रके लिये होता है (गीता— चौथे अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। शरीर यज्ञ करनेके लिये समर्थ रहे—इस दृष्टिसे शरीर-निर्वाहमात्रके लिये वस्तुओंका उपयोग करना भी यज्ञके अन्तर्गत है। मनुष्य- शरीर यज्ञके लिये ही है। उसे मान-बड़ाई, सुख-आराम आदिमें लगाना बन्धनकारक है। केवल यज्ञके लिये कर्म करनेसे मनुष्य बन्धनरहित (मुक्त) हो जाता है और उसे
सनातन ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है।
‘नार्य लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कृतोऽन्यः कुरुसत्तम’— जैसे तीसरे अध्यायके आठवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि कर्म न करनेसे तेरा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा, ऐसे ही यहाँ कहते हैं कि यज्ञ न करनेसे तेरा यह लोक भी लाभदायक नहीं रहेगा, फिर परलोकका तो कहना ही क्या है ! केवल स्वार्थभावसे (अपने लिये) कर्म करनेसे इस लोकमें संघर्ष उत्पन्न हो जायगा और सुख-शान्ति भंग हो जायगी तथा परलोकमें कल्याण भी नहीं होगा।
अपने कर्तव्यका पालन न करनेसे घरमें भी भेद और संघर्ष पैदा हो जाता है, खटपट मच जाती है। घरमें कोई स्वार्थी, पेट्ट व्यक्ति हो, तो घरवालोंको उसका रहना सुहाता नहीं। स्वार्थत्यागपूर्वक अपने कर्तव्यसे सबको सुख पहुँचाना घरमें अथवा संसारमें रहनेकी विद्या है। अपने कर्तव्यका पालन करनेसे दूसरोंको भी कर्तव्य-पालनकी प्रेरणा मिलती है। इससे घरमें एकता और शान्ति स्वाभाविक आ जाती है। परन्तु अपने कर्तव्यका पालन न करनेसे इस लोकमें सुखपूर्वक जीना भी कठिन हो जाता है और अन्य लोकोंकी तो बात ही क्या है ! इसके विपरीत अपने कर्तव्यका ठीक-ठीक पालन करनेसे यह लोक भी सुखदायक हो जाता है और परलोक भी।
सम्बन्ध—इसी अध्यायके सोलहवें श्लोकमें भगवान्ने कर्मोंका तत्त्व बतानेकी प्रतिज्ञा की थी। उसका विस्तारसे वर्णन करके अब भगवान् उसका उपसंहार करते हैं।
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानिवेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२ ॥
एवम् | = इस प्रकार (और भी) | वितताः | = विस्तारसे कहे गये हैं। | विद्धि | = जान। ---|---|---|---|---|--- बहुविधाः | = बहुत तरहके | तान् | = उन | एवम् | = इस प्रकार यज्ञाः | = यज्ञ | सर्वान् | = सब यज्ञोंको (तू) | ज्ञात्वा | = जानकर (यज्ञ करनेसे) ब्रह्मणः | = वेदकी | कर्मजान् | = कर्मजन्म | विमोक्ष्यसे | = (तू कर्मबन्धनसे मुक्त हो जायगा। मुखे | = वाणीमें | | | |
३३६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
व्याख्या—‘एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे’ —चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक जिन बारह यज्ञोंका वर्णन किया गया है, उनके सिवाय और भी अनेक प्रकारके यज्ञोंका वेदकी वाणीमें विस्तारसे वर्णन किया गया है। कारण कि साधकोंकी प्रकृतिके अनुसार उनकी निष्ठाएँ भी अलग-अलग होती हैं और तदनुसार उनके साधन भी अलग-अलग होते हैं।
वेदोंमें सकाम अनुष्ठानोंका भी विस्तारसे वर्णन किया गया है। परन्तु उन सबसे नाशवान् फलकी ही प्राप्ति होती है, अविनाशीकी नहीं। इसलिये वेदोंमें वर्णित सकाम अनुष्ठान करनेवाले मनुष्य स्वर्गलोकको जाते हैं और पुण्य क्षीण होनेपर पुनः मृत्युलोकमें आ जाते हैं। इस प्रकार वे जन्म-मरणके बन्धनमें पड़े रहते हैं (गीता—नवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। परन्तु यहाँ उन सकाम अनुष्ठानोंकी बात नहीं कही गयी है। यहाँ निष्कामकर्मरूप उन यज्ञोंकी बात कही गयी है, जिनके अनुष्ठानसे परमात्माकी प्राप्ति होती है—‘यान्ति ब्रह्म सनातनम् ’ (गीता ४।३१)।
वेदोंमें केवल स्वर्गप्राप्तिके साधनरूप सकाम अनुष्ठानोंका ही वर्णन हो, ऐसी बात नहीं है। उनमें परमात्मप्राप्तिके साधनरूप श्रवण, मनन, निदिध्यासन, प्राणायाम, समाधि आदि अनुष्ठानोंका भी वर्णन हुआ है। उपर्युक्त पदोंमें उन्हींका लक्ष्य है।
तीसरे अध्यायके चौदहवें-पंद्रहवें श्लोकोंमें कहा गया है कि यज्ञ वेदसे उत्पन्न हुए हैं और सर्वव्यापी परमात्मा उन यज्ञोंमें नित्य प्रतिष्ठित (विराजमान) हैं। यज्ञोंमें परमात्मा नित्य प्रतिष्ठित रहनेसे उन यज्ञोंका अनुष्ठान केवल परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये ही करना चाहिये।
‘कर्मजान्विद्धि तासर्वान्’ —चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक जिन बारह यज्ञोंका वर्णन हुआ है तथा उसी प्रकार वेदोंमें जिन यज्ञोंका वर्णन हुआ है, उन सब यज्ञोंके लिये यहाँ ‘तान् सर्वान् ’ पद आये हैं।
‘कर्मजान् विद्धि’ पदोंका तात्पर्य है कि वे सब-के-सब यज्ञ कर्मजन्म हैं अर्थात् कर्मोंसे होनेवाले हैं। शरीरसे जो क्रियाएँ होती हैं, वाणीसे जो कथन होता है और मनसे जो संकल्प होते हैं, वे सभी कर्म कहलाते हैं—‘शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ’ (गीता १८।१५)।
अर्जुन अपना कल्याण तो चाहते हैं, पर युद्धरूप
कर्तव्य-कर्मको पाप मानकर उसका त्याग करना चाहते हैं। इसलिये ‘कर्मजान् विद्धि ’ पदोंसे भगवान् अर्जुनके प्रति ऐसा भाव प्रकट कर रहे हैं कि युद्धरूप कर्तव्यकर्मका त्याग करके अपने कल्याणके लिये तू जो साधन करेगा, वह भी तो कर्म ही होगा। वास्तवमें कल्याण कर्मसे नहीं होता, प्रत्युत कर्मोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे होता है। इसलिये यदि तू युद्धरूप कर्तव्य-कर्मको भी निलिप्त रहकर करेगा, तो उससे भी तेरा कल्याण हो जायगा; क्योंकि मनुष्यको कर्म नहीं बाँधते, प्रत्युत (कर्मकी और उसके फलकी) आसक्ति ही बाँधती है (गीता—छठे अध्यायका चौथा श्लोक)। युद्ध तो तेरा सहज कर्म (स्वधर्म) है, इसलिये उसे करना तेरे लिये सुगम भी है।
‘एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे’ —भगवान्ने इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें बताया कि कर्मफलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म नहीं बाँधते—इस प्रकार जो मुझे जान लेता है, वह भी कर्मोंसे नहीं बाँधता। तात्पर्य यह है कि जिसने कर्म करते हुए भी उनसे निलिप्त रहनेकी विद्या (—कर्मफलमें स्पृहा न रखना)-को सीखकर उसका अनुभव कर लिया है, वह कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जाता है। फिर पंद्रहवें श्लोकमें भगवान्ने इसी बातको ‘एवं ज्ञात्वा ’ पदोंसे कहा। वहाँ भी यही भाव है कि मुमुक्षु पुरुष भी इसी प्रकार जानकर कर्म करते आये हैं। सोलहवें श्लोकमें कर्मोंसे निलिप्त रहनेके इसी तत्त्वको विस्तारसे कहनेके लिये भगवान्ने प्रतिज्ञा की और ‘यज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ’ पदोंसे उसे जाननेका फल मुक्त होना बताया। अब इस श्लोकमें ‘एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ’ पदोंसे ही उस विषयका उपसंहार करते हैं। तात्पर्य यह है कि फलकी इच्छाका त्याग करके केवल लोकहितार्थ कर्म करनेसे मनुष्य कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
संसारमें असंख्य क्रियाएँ होती रहती हैं; परन्तु जिन क्रियाओंसे मनुष्य अपना सम्बन्ध जोड़ता है, उन्हींसे वह बाँधता है। संसारमें कहीं भी कोई क्रिया (घटना) हो, जब मनुष्य उससे अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है—उसमें राजी या नाराज होता है, तब वह उस क्रियासे बाँध जाता है। जब शरीर या संसारमें होनेवाली किसी भी क्रियासे मनुष्यका सम्बन्ध नहीं रहता, तब वह कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
सम्बन्ध—यज्ञोंका वर्णन सुनकर ऐसी जिज्ञासा होती है कि उन यज्ञोंमेंसे कौन-सा यज्ञ श्रेष्ठ है? इसका समाधान भगवान् आगेके श्लोकमें करते हैं।
श्लोक ३३ ]
- साधक-संजीवनी *
३३७
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञानयज्ञः परन्तप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥
परन्तप, पार्थ = हे परन्तप अर्जुन! | श्रेयान् = श्रेष्ठ है। सर्वम् = सम्पूर्ण कर्म = कर्म (और) | ज्ञाने = ज्ञान (तत्त्वज्ञान)-में ---|---|--- द्रव्यमयात् = द्रव्यमय यज्ञात् = यज्ञसे | | परिसमाप्यते = समाप्त (लीन) हो ज्ञानयज्ञः = ज्ञानयज्ञ | अखिलम् = पदार्थ | जाते हैं।
व्याख्या —‘श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञानयज्ञः परन्तप’—जिन यज्ञोंमें द्रव्यों (पदार्थों) तथा कर्मोंकी आवश्यकता होती है, वे सब यज्ञ ‘द्रव्यमय’ होते हैं। ‘द्रव्य’ शब्दके साथ ‘मय’ प्रत्यय प्रचुरताके अर्थमें है। जैसे मिट्टीकी प्रधानतावाला पात्र ‘मुन्मय’ कहलाता है, ऐसे ही द्रव्यकी प्रधानतावाला यज्ञ ‘द्रव्यमय’ कहलाता है। ऐसे द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है; क्योंकि ज्ञानयज्ञमें द्रव्य और कर्मकी आवश्यकता नहीं होती।
सभी यज्ञोंको भगवान्ने कर्मजन्य कहा है (चौथे अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक)। यहाँ भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्म ज्ञानयज्ञमें परिसमाप्त हो जाते हैं अर्थात् ज्ञानयज्ञ कर्मजन्य नहीं है, प्रत्युत विवेक-विचारजन्य है। अतः यहाँ जिस ज्ञानयज्ञकी बात आयी है, वह पूर्ववर्णित बारह यज्ञोंके अन्तर्गत आये ज्ञानयज्ञ (चौथे अध्यायका अष्टाईसवाँ श्लोक)–का वाचक नहीं है, प्रत्युत आगेके (चौतीसवें) श्लोकमें वर्णित ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रक्रियाका वाचक है। पूर्ववर्णित बारह यज्ञोंका वाचक यहाँ ‘द्रव्यमय यज्ञ’ है। द्रव्यमय यज्ञ समाप्त करके ही ज्ञानयज्ञ किया जाता है।
अगर सूक्ष्मदृष्टिसे देखा जाय तो ज्ञानयज्ञ भी क्रियाजन्य ही है, परन्तु इसमें विवेक-विचारकी प्रधानता रहती है।
‘सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते’—‘सर्वम्’ और ‘अखिलम्’— दोनों शब्द पर्यायवाची हैं और उनका अर्थ ‘सम्पूर्ण’ होता है। इसलिये यहाँ ‘सर्वम् कर्म ’ का अर्थ सम्पूर्ण कर्म (मात्र कर्म) और ‘अखिलम् ’ का अर्थ सम्पूर्ण द्रव्य (मात्र पदार्थ) लेना ही ठीक मालूम देता है।
जबतक मनुष्य अपने लिये कर्म करता है, तबतक उसका सम्बन्ध क्रियाओं और पदार्थोंसे बना रहता है। जबतक क्रियाओं और पदार्थोंसे सम्बन्ध रहता है, तभीतक अन्तःकरणमें अशुद्धि रहती है, इसलिये अपने लिये कर्म न करनेसे ही अन्तःकरण शुद्ध होता है।
अन्तःकरणमें तीन दोष रहते हैं—मल (संचित पाप),
विक्षेप (चित्की चंचलता) और आवरण (अज्ञान)। अपने लिये कोई भी कर्म न करनेसे अर्थात् संसारमात्रकी सेवाके लिये ही कर्म करनेसे जब साधकके अन्तःकरणमें स्थित मल और विक्षेप—दोनों दोष मिट जाते हैं, तब वह ज्ञानप्राप्तिके द्वारा आवरण-दोषको मिटानेके लिये कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके गुरुके पास जाता है। उस समय वह कर्म और पदार्थोंसे ऊँचा उठ जाता है अर्थात् कर्म और पदार्थ उसके लक्ष्य नहीं रहते, प्रत्युत एक चिन्मय तत्त्व ही उसका लक्ष्य रहता है। यही सम्पूर्ण कर्मों और पदार्थोंका तत्त्वज्ञानमें समाप्त होना है।
ज्ञानप्राप्तिकी प्रचलित प्रक्रिया
शास्त्रोंमें ज्ञानप्राप्तिके आठ अन्तर्ग साधन कहे गये हैं—(१) विवेक, (२) वैराग्य, (३) शमादि षट्सम्पत्ति (शम, दम, श्रद्धा, उपरति, तितिक्षा और समाधान), (४) मुमुक्षुता, (५) श्रवण, (६) मनन, (७) निदिध्यासन और (८) तत्त्वपदार्थसंशोधन। इनमें पहला साधन विवेक है। सत् और असत्को अलग-अलग जानना ‘विवेक’ कहलाता है। सत्-असत्को अलग-अलग जानकर असत्का त्याग करना अथवा संसारसे विमुख होना ‘वैराग्य’ है। इसके बाद शमादि षट्सम्पत्ति आती है। मनको इन्द्रियोंके विषयोंसे हटाना ‘शम’ है। इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाना ‘दम’ है। ईश्वर, शास्त्र आदिपर पूज्यभावपूर्वक प्रत्यक्षसे भी अधिक विश्वास करना ‘श्रद्धा’ है। वृत्तियोंका संसारकी ओरसे हट जाना ‘उपरति’ है। सरदी-गरमी आदि द्वन्द्वोंको सहना, उनकी उपेक्षा करना ‘तितिक्षा’ है। अन्तःकरणमें शंकाओंका न रहना ‘समाधान’ है। इसके बाद चौथा साधन है—मुमुक्षुता। संसारसे छूटनेकी इच्छा ‘मुमुक्षुता’ है।
मुमुक्षुता जाग्रत् होनेके बाद साधक पदार्थों और कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरुके पास जाता है। गुरुके पास निवास करते हुए शास्त्रोंको सुनकर तात्पर्यका निर्णय करना तथा उसे धारण करना ‘श्रवण’ है। श्रवणसे