श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृतमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥ ३६ ॥
| चेत् | = अगर (तू) | पापकृतमः | = अधिक पापी | सर्वम् | = सम्पूर्ण |
|---|---|---|---|---|---|
| सर्वेभ्यः | = सब | असि | = हैं, (तो भी तू) | वृजिनम् | = पाप-समुद्रसे |
| पापेभ्यः | = पापियोंसे | ज्ञानप्लवेन | = ज्ञानरूपी नौकाके द्वारा | सन्तरिष्यसि | = अच्छी तरह तर |
| अपि | = भी | एव | = निःसन्देह | जायगा । |
व्याख्या—‘अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृतमः’— ‘पाप करनेवालोंकी तीन श्रेणियाँ होती हैं—(१) ‘पापकृत’ अर्थात् पाप करनेवाला, (२) ‘पापकृतर’ अर्थात् दो पापियोंमें एकसे अधिक पाप करनेवाला और (३) ‘पापकृतम’ अर्थात् सम्पूर्ण पापियोंमें सबसे अधिक पाप करनेवाला । यहाँ ‘पापकृतमः’ पदका प्रयोग करके भगवान् कहते हैं कि अगर तू सम्पूर्ण पापियोंमें भी अत्यन्त पाप करनेवाला है, तो भी तत्त्वज्ञानसे तू सम्पूर्ण पापोंसे तर सकता है ।
भगवानुका यह कथन बहुत आश्वासन देनेवाला है । तात्पर्य यह है कि जो पापोंका त्याग करके साधनमें लगा हुआ है, उसका तो कहना ही क्या है ! पर जिसने पहले बहुत पाप किये हों, उसको भी जिज्ञासा जाग्रत् होनेके बाद अपने उद्धारके विषयमें कभी निराश नहीं होना चाहिये । कारण कि पापी-से-पापी मनुष्य भी यदि चाहे तो इसी जन्ममें अभी अपना कल्याण कर सकता है । पुराने पाप उतने बाधक नहीं होते, जितने वर्तमानके पाप बाधक होते हैं । अगर मनुष्य वर्तमानमें पाप करना छोड़ दे और निश्चय कर ले कि अब मैं कभी पाप नहीं करूँगा और केवल तत्त्वज्ञानको प्राप्त करूँगा, तो उसके पापोंका नाश होते देरी नहीं लगती ।
यदि कहीं सौ वर्षोंसे घना अँधेरा छाया हो और वहाँ दीपक जला दिया जाय, तो उस अँधेरेको दूर करके प्रकाश करनेमें दीपकको सौ वर्ष नहीं लगते, प्रत्युत दीपक जलाते ही तत्काल अँधेरा मिट जाता है । इसी तरह तत्त्वज्ञान होते ही पहले किये गये सम्पूर्ण पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं ।
‘चेत्’—(यदि) पद देनेका तात्पर्य यह है कि प्रायः
परिशिष्ट भाव— यहाँ भगवान्ने ‘पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृतमः’ पदोंसे पापीकी आखिरी हद बता दी है ! यद्यपि ‘पापेभ्यः’ पद बहुवचन होनेसे सम्पूर्ण पापियोंका वाचक है, फिर भी भगवान्ने इसके साथ ‘सर्वेभ्यः’ पद दिया । ‘सर्वेभ्यः’ पद भी सम्पूर्णका वाचक है । ये दो पद देनेके बाद भी भगवान्ने ‘पापकृतमः’ पद और दिया है, जो अतिशयताका बोधक है । पहले ‘पापकृत’ होता है, फिर ‘पापकृतर’ होता है और फिर ‘पापकृतम’ होता है । तात्पर्य निकला कि सम्पूर्ण संसारमें जितने भी पापी हो सकते हैं, उन सम्पूर्ण पापियोंसे भी जो अत्यधिक पापी है, उसको भी ज्ञान प्राप्त
ऐसे पापी मनुष्य परमात्मामें नहीं लगते; परन्तु वे परमात्मामें लग नहीं सकते—ऐसी बात नहीं है । किसी महापुरुषके संगसे अथवा किसी घटना, परिस्थिति, वातावरण आदिके प्रभावसे यदि उनका ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाय कि अब परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त करना ही है, तो वे भी सम्पूर्ण पाप-समुद्रसे भलीभाँति तर जाते हैं ।
नवें अध्यायके तीसवें-इकतीसवें श्लोकोंमें भी भगवान्ने ऐसी ही बात अनन्यभावसे अपना भजन करनेवालेके लिये कही है कि महान् दुराचारी मनुष्य भी अगर यह निश्चय कर ले कि अब मैं भगवानुका भजन ही करूँगा, तो उसका भी बहुत जल्दी कल्याण हो जाता है ।
‘सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि’—प्रकृतिके कार्य शरीर और संसारके सम्बन्धसे ही सम्पूर्ण पाप होते हैं । तत्त्वज्ञान होनेपर जब इनसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, तब पाप कैसे रह सकते हैं—‘मूलाभावे कृतः शाखा’ ?
परमात्माके स्वतःसिद्ध ज्ञानके साथ एक होना ही ‘ज्ञानप्लव’ अर्थात् ज्ञानरूप नौकाका प्राप्त होना है । मनुष्य कितना ही पापी क्यों न रहा हो, ज्ञानरूप नौकासे वह सम्पूर्ण पाप-समुद्रसे अच्छी तरह तर जाता है । यह ज्ञानरूप नौका कभी टूटती-फूटती नहीं, इसमें कभी छिद्र नहीं होता और यह कभी डूबती भी नहीं । यह मनुष्यको पाप-समुद्रसे पार करा देती है ।
‘ज्ञानयज्ञ’ (चौथे अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक) से ही यह ज्ञानरूप नौका प्राप्त होती है । यह ज्ञानयज्ञ आरम्भसे ही ‘विवेक’ को लेकर चलता है और ‘तत्त्वज्ञान’ में इसकी पूर्णता हो जाती है । पूर्णता होनेपर लेशमात्र भी पाप नहीं रहता ।