श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 344, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ३७ ] * साधक-संजीवनी * ३४३
हो सकता है! कारण कि पाप कितने ही क्यों न हों, हैं वे असत् ही, जबकि ज्ञान सत् है। सत्के आगे असत् कैसे
टिक सकता है! पाप अपवित्र है, जबकि ज्ञान परमपवित्र है (इसी अध्यायका अड़तीसवाँ श्लोक)। अपवित्र वस्तु
पवित्र वस्तुको कैसे अटका सकती है! अतः पापोंमें ज्ञानको अटकानेकी ताकत नहीं है। ज्ञानप्राप्तिमें खास बाधा है-
नाशवान् सुखकी आसक्ति (गीता-तीसरे अध्यायके सैंतीसवेंसे इकतालीसवें श्लोकतक)। भोगासक्ति के कारण ही
मनुष्यकी पारमार्थिक विषयमें रुचि नहीं होती और रुचि न होनेसे ही ज्ञानकी प्राप्ति बड़ी कठिन प्रतीत होती है।
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ३७ ॥
अर्जुन = हे अर्जुन! | एधांसि = ईंधनोंको | ज्ञानाग्निः = ज्ञानरूपी अग्नि
यथा = जैसे | भस्मसात् = सर्वथा भस्म | सर्वकर्माणि = सम्पूर्ण कर्मोंको
समिद्धः = प्रज्वलित | कुरुते = कर देती है, | भस्मसात् = सर्वथा भस्म
अग्निः = अग्नि | तथा = ऐसे ही | कुरुते = कर देती है।
व्याख्या-'यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् | आना-जाना, भोजनका पचना आदि क्रियाएँ जिस समष्टि
कुरुतेऽर्जुन'-पीछेके श्लोकमें भगवान्ने ज्ञानरूपी नौकाके | प्रकृतिसे होती हैं, उसी प्रकृतिसे खाना-पीना, चलना,
द्वारा सम्पूर्ण पाप-समुद्रको तरनेकी बात कही। उससे यह | बैठना, देखना, बोलना आदि क्रियाएँ भी होती हैं। परन्तु
प्रश्न पैदा होता है कि पापसमुद्र तो शेष रहता ही है, फिर | मनुष्य अज्ञानवश उन क्रियाओंसे अपना सम्बन्ध मान लेता
उसका क्या होगा? अतः भगवान् पुनः दूसरा दृष्टान्त देते | है अर्थात् अपनेको उन क्रियाओंका कर्ता मान लेता है।
हुए कहते हैं कि जैसे प्रज्वलित अग्नि काष्ठादि सम्पूर्ण | इससे वे क्रियाएँ 'कर्म' बनकर मनुष्यको बाँध देती हैं।
ईंधनोंको इस प्रकार भस्म कर देती है कि उनका | इस प्रकार माने हुए सम्बन्धसे ही कर्म होते हैं, अन्यथा
किंचिन्मात्र भी अंश शेष नहीं रहता, ऐसे ही ज्ञानरूप | क्रियाएँ ही होती हैं।
अग्नि सम्पूर्ण पापोंको इस प्रकार भस्म कर देती है कि | तत्त्वज्ञान होनेपर अनेक जन्मोंके संचित कर्म सर्वथा
उनका किंचिन्मात्र भी अंश शेष नहीं रहता। | नष्ट हो जाते हैं। कारण कि सभी संचित कर्म अज्ञानके
'ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा'- | आश्रित रहते हैं; अतः ज्ञान होते ही (आश्रय, आधाररूप
जैसे अग्नि काष्ठको भस्म कर देती है, ऐसे ही तत्त्वज्ञान- | अज्ञान न रहनेसे) वे नष्ट हो जाते हैं। तत्त्वज्ञान होनेपर
रूपी अग्नि संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण-तीनों कर्मोंको | कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता; अतः सभी क्रियमाण कर्म अकर्म
भस्म कर देती है। जैसे अग्निमें काष्ठका अत्यन्त अभाव | हो जाते हैं अर्थात् फलजनक नहीं होते। प्रारब्ध कर्मका
हो जाता है, ऐसे ही तत्त्वज्ञानमें सम्पूर्ण कर्मोंका अत्यन्त | घटना-अंश (अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति) तो जबतक
अभाव हो जाता है। तात्पर्य यह है कि ज्ञान होनेपर कर्मोंसे | शरीर रहता है, तबतक रहता है; परन्तु ज्ञानीपर उसका कोई
अथवा संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। | असर नहीं पड़ता। कारण कि तत्त्वज्ञान होनेपर भोक्तृत्व
सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अनुभव | नहीं रहता; अतः अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति सामने
नहीं होता, प्रत्युत एक परमात्मतत्त्व ही शेष रहता है। | आनेपर वह सुखी-दुःखी नहीं होता। इस प्रकार तत्त्वज्ञान
वास्तवमें मात्र क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं | होनेपर संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण-तीनों कर्मोंसे
(गीता-तेरहवें अध्यायका उनतीसवाँ श्लोक)। उन क्रियाओंसे | किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता। कर्मोंसे अपना सम्बन्ध
अपना सम्बन्ध मान लेनेसे कर्म होते हैं। नाड़ियोंमें रक्त- | न रहनेसे कर्म नहीं रहते, भस्म रह जाती है अर्थात् सभी
प्रवाह होना, शरीरका बालकसे जवान होना, श्वासोंका | कर्म अकर्म हो जाते हैं।
सम्बन्ध-अब भगवान् आगे कहे श्लोकके पूर्वार्धमें तत्त्वज्ञानकी महिमा बताते हुए उत्तरार्धमें कर्मयोगकी विशेष महत्ता प्रकट करते हैं।