श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 345, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें३४४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ४
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥ ३८ ॥
इह = इस मनुष्यलोकमें
ज्ञानेन = ज्ञानके
सदृशम् = समान
पवित्रम् = पवित्र करनेवाला
हि = निःसन्देह
(दूसरा कोई
साधन) = कर्मयोगी)
न = नहीं
विद्यते = है।
योगसंसिद्धः = जिसका योग
भलीभाँति सिद्ध
हो गया है, (वह
तत् = उस तत्त्वज्ञानको
कालेन = अवश्य ही
स्वयम् = स्वयं
आत्मनि = अपने-आपमें
विन्दति = पा लेता है।
व्याख्या—'न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते'—
यहाँ 'इह' पद मनुष्यलोकका वाचक है; क्योंकि सब-की-
सब पवित्रता इस मनुष्यलोकमें ही प्राप्त की जाती है।
पवित्रता प्राप्त करनेका अधिकार और अवसर मनुष्य-
शरीरमें ही है। ऐसा अधिकार किसी अन्य शरीरमें नहीं
है। अलग-अलग लोकोंके अधिकार भी मनुष्यलोकसे ही
मिलते हैं।
संसारकी स्वतन्त्र सत्ताको माननेसे तथा उससे सुख
लेनेकी इच्छासे ही सम्पूर्ण दोष, पाप उत्पन्न होते हैं
(गीता—तीसरे अध्यायका सैंतीसवाँ श्लोक)। तत्त्वज्ञान
होनेपर जब संसारकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं रहती, तब
सम्पूर्ण पापोंका सर्वथा नाश हो जाता है और महान्
पवित्रता आ जाती है। इसलिये संसारमें ज्ञानके समान पवित्र
करनेवाला दूसरा कोई साधन है ही नहीं।
संसारमें यज्ञ, दान, तप, पूजा, व्रत, उपवास, जप,
ध्यान, प्राणायाम आदि जितने साधन हैं तथा गंगा, यमुना,
गोदावरी आदि जितने तीर्थ हैं, वे सभी मनुष्यके पापोंका
नाश करके उसे पवित्र करनेवाले हैं। परन्तु उन सबमें भी
तत्त्वज्ञानके समान पवित्र करनेवाला कोई भी साधन, तीर्थ
आदि नहीं है; क्योंकि वे सब तत्त्वज्ञानके साधन हैं और
तत्त्वज्ञान उन सबका साध्य है।
परमात्मा पवित्रोंके भी पवित्र हैं—'पवित्राणां पवित्रम्'
(विष्णुसहस्र० १०)। उन्हीं परमपवित्र परमात्माका अनुभव
करानेवाले होनेसे तत्त्वज्ञान भी अत्यन्त पवित्र है।
'योगसंसिद्धः'—जिसका कर्मयोग सिद्ध हो गया है
अर्थात् कर्मयोगका अनुष्ठान सांगोपांग पूर्ण हो गया है, उस
महापुरुषको यहाँ 'योगसंसिद्धः' कहा गया है, छठे
अध्यायके चौथे श्लोकमें उसीको 'योगारूढः' कहा गया
है। योगारूढ होना कर्मयोगकी अन्तिम अवस्था है। योगारूढ
होते ही तत्त्वबोध हो जाता है। तत्त्वबोध हो जानेपर
संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है।
कर्मयोगीकी मुख्य बात है—अपना कुछ भी न मानकर
सम्पूर्ण कर्म संसारके हितके लिये करना, अपने लिये कुछ
भी न करना। ऐसा करनेपर सामग्री और क्रिया-शक्ति-
दोनोंका प्रवाह संसारकी सेवामें हो जाता है। संसारकी
सेवामें प्रवाह होनेपर 'मैं सेवक हूँ' ऐसा (अहम्का) भाव
भी नहीं रहता अर्थात् सेवक नहीं रहता, केवल सेवा रह
जाती है। इस प्रकार जब सेवक सेवा बनकर सेव्यमें लीन
हो जाता है, तब प्रकृतिके कार्य शरीर तथा संसारसे सर्वथा
वियोग (सम्बन्ध-विच्छेद) हो जाता है। वियोग होनेपर
संसारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रह जाती, केवल क्रिया रह
जाती है। इसीको योगकी संसिद्धि अर्थात् सम्यक् सिद्धि
कहते हैं।
कर्म और फलकी आसक्तिसे ही 'योग'का अनुभव
नहीं होता। वास्तवमें कर्मों और पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद
स्वतःसिद्ध है। कारण कि कर्म और पदार्थ तो अनित्य
(आदि-अन्तवाले) हैं, और अपना स्वरूप नित्य है।
अनित्य कर्मोंसे नित्य स्वरूपको क्या मिल सकता है?
इसलिये स्वरूपको कर्मोंके द्वारा कुछ नहीं पाना है—यह
'कर्मविज्ञान' है। कर्मविज्ञानका अनुभव होनेपर कर्मफलसे
भी सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है अर्थात् कर्मजन्य सुख
लेनेकी आसक्ति सर्वथा मिट जाती है, जिसके मिटते ही
परमात्माके साथ अपने स्वाभाविक नित्य-सम्बन्धका अनुभव
हो जाता है, जो 'योगविज्ञान' है। योगविज्ञानका अनुभव
होना ही योगकी संसिद्धि है।
'तत्स्वयं कालेनात्मनि विन्दति'—जिस तत्त्वज्ञानसे
सम्पूर्ण कर्म भस्म हो जाते हैं और जिसके समान पवित्र
करनेवाला संसारमें दूसरा कोई साधन नहीं है, उसी तत्त्व-
ज्ञानको कर्मयोगी योगसंसिद्ध होनेपर दूसरे किसी साधनके
बिना स्वयं अपने-आपमें ही तत्काल प्राप्त कर लेता है।