श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 35, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १
यद्यपि यहाँ द्रोणाचार्य और भीष्मके बाद ही दुर्योधनको
कृपाचार्यका नाम लेना चाहिये था; परन्तु दुर्योधनको
कर्णपर जितना विश्वास था, उतना कृपाचार्यपर नहीं था।
इसलिये कर्णका नाम तो भीतरसे बीचमें ही निकल पड़ा।
द्रोणाचार्य और भीष्म कहीं कृपाचार्यका अपमान न समझ
लें, इसलिये दुर्योधन कृपाचार्यको 'संग्रामविजयी' विशेषण
देकर उनको प्रसन्न करना चाहता है।
'अश्वत्थामा'—ये भी चिरंजीवी हैं और आपके ही
पुत्र हैं। ये बड़े ही शूरवीर हैं। इन्होंने आपसे ही अस्त्र-
शस्त्रकी विद्या सीखी है। अस्त्र-शस्त्रकी कलामें ये बड़े
चतुर हैं।
'विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च'—आप यह न
समझें कि केवल पाण्डव ही धर्मात्मा हैं, हमारे पक्षमें भी
मेरा भाई विकर्ण बड़ा धर्मात्मा और शूरवीर है। ऐसे ही
हमारे प्रपितामह शान्तनुके भाई बाहीकके पौत्र तथा
सोमदत्तके पुत्र भूरिश्रवा भी बड़े धर्मात्मा हैं। इन्होंने बड़ी-
बड़ी दक्षिणावाले अनेक यज्ञ किये हैं। ये बड़े शूरवीर और
महारथी हैं।
[युद्धमें विकर्ण भीमके द्वारा और भूरिश्रवा सात्यकिके
द्वारा मारे गये।]
यहाँ इन शूरवीरोंके नाम लेनेमें दुर्योधनका यह भाव
मालूम देता है कि हे आचार्य! हमारी सेनामें आप, भीष्म,
कर्ण, कृपाचार्य आदि जैसे महान् पराक्रमी शूरवीर हैं, ऐसे
पाण्डवोंकी सेनामें देखनेमें नहीं आते। हमारी सेनामें
कृपाचार्य और अश्वत्थामा—ये दो चिरंजीवी हैं, जबकि
पाण्डवोंकी सेनामें ऐसा एक भी नहीं है। हमारी सेनामें
धर्मात्माओंकी भी कमी नहीं है। इसलिये हमारे लिये
डरनेकी कोई बात नहीं है।
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥
अन्ये = इनके अतिरिक्त इच्छाका भी त्याग वाले हैं
बहवः = बहुत-से कर दिया है, (तथा जो)
शूराः = शूरवीर हैं, च = और सर्वे = सब-के-सब
(जिन्होंने) नानाशस्त्रप्रहरणाः = जो अनेक युद्धविशारदाः = युद्धकलामें
मदर्थे = मेरे लिये प्रकारके अस्त्र- अत्यन्त चतुर
त्यक्तजीविताः = अपने जीनेकी शस्त्रोंको चलाने- हैं।
व्याख्या—'अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्त-
जीविताः'—मैंने अभीतक अपनी सेनाके जितने शूरवीरोंके
नाम लिये हैं, उनके अतिरिक्त भी हमारी सेनामें बाहीक,
शल्य, भगदत्त, जयद्रथ आदि बहुत-से शूरवीर महारथी हैं,
जो मेरी भलाईके लिये, मेरी ओरसे लड़नेके लिये अपने
जीनेकी इच्छाका त्याग करके यहाँ आये हैं। वे मेरी
विजयके लिये मर भले ही जायँ, पर युद्धसे हटेंगे नहीं।
उनकी मैं आपके सामने क्या कृतज्ञता प्रकट करूँ ?
'नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः'—ये सभी
लोग हाथमें रखकर प्रहार करनेवाले तलवार, गदा, त्रिशूल
आदि नाना प्रकारके शस्त्रोंकी कलामें निपुण हैं; और
हाथसे फेंककर प्रहार करनेवाले बाण, तोमर, शक्ति आदि
अस्त्रोंकी कलामें भी निपुण हैं। युद्ध कैसे करना चाहिये;
किस तरहसे, किस पैंतरेसे और किस युक्तिसे युद्ध करना
चाहिये; सेनाको किस तरह खड़ी करनी चाहिये आदि
युद्धकी कलाओंमें भी ये बड़े निपुण हैं, कुशल हैं।
सम्बन्ध—दुर्योधनकी बातें सुनकर जब द्रोणाचार्य कुछ भी नहीं बोले, तब अपनी चालाकी न चल सकनेसे
दुर्योधनके मनमें क्या विचार आता है—इसको संजय आगेके श्लोकमें कहते हैं*।
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमताष्टमम्। जीवेद्वर्षशतं सोऽपि सर्वव्याधिविवर्जितः॥
- संजय व्यासप्रदत्त दिव्य दृष्टिसे सैनिकोंके मनमें आयी बातको भी जान लेनेमें समर्थ थे—
प्रकाशं वाप्रकाशं वा दिवा वा यदि वा निशि। मनसा चिन्तितमपि सर्वं वेत्स्यति सञ्जयः॥
(महाभारत, भीष्म० २।११)