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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

३४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १

यद्यपि यहाँ द्रोणाचार्य और भीष्मके बाद ही दुर्योधनको

कृपाचार्यका नाम लेना चाहिये था; परन्तु दुर्योधनको

कर्णपर जितना विश्वास था, उतना कृपाचार्यपर नहीं था।

इसलिये कर्णका नाम तो भीतरसे बीचमें ही निकल पड़ा।

द्रोणाचार्य और भीष्म कहीं कृपाचार्यका अपमान न समझ

लें, इसलिये दुर्योधन कृपाचार्यको 'संग्रामविजयी' विशेषण

देकर उनको प्रसन्न करना चाहता है।

'अश्वत्थामा'—ये भी चिरंजीवी हैं और आपके ही

पुत्र हैं। ये बड़े ही शूरवीर हैं। इन्होंने आपसे ही अस्त्र-

शस्त्रकी विद्या सीखी है। अस्त्र-शस्त्रकी कलामें ये बड़े

चतुर हैं।

'विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च'—आप यह न

समझें कि केवल पाण्डव ही धर्मात्मा हैं, हमारे पक्षमें भी

मेरा भाई विकर्ण बड़ा धर्मात्मा और शूरवीर है। ऐसे ही

हमारे प्रपितामह शान्तनुके भाई बाहीकके पौत्र तथा

सोमदत्तके पुत्र भूरिश्रवा भी बड़े धर्मात्मा हैं। इन्होंने बड़ी-

बड़ी दक्षिणावाले अनेक यज्ञ किये हैं। ये बड़े शूरवीर और

महारथी हैं।

[युद्धमें विकर्ण भीमके द्वारा और भूरिश्रवा सात्यकिके

द्वारा मारे गये।]

यहाँ इन शूरवीरोंके नाम लेनेमें दुर्योधनका यह भाव

मालूम देता है कि हे आचार्य! हमारी सेनामें आप, भीष्म,

कर्ण, कृपाचार्य आदि जैसे महान् पराक्रमी शूरवीर हैं, ऐसे

पाण्डवोंकी सेनामें देखनेमें नहीं आते। हमारी सेनामें

कृपाचार्य और अश्वत्थामा—ये दो चिरंजीवी हैं, जबकि

पाण्डवोंकी सेनामें ऐसा एक भी नहीं है। हमारी सेनामें

धर्मात्माओंकी भी कमी नहीं है। इसलिये हमारे लिये

डरनेकी कोई बात नहीं है।

अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।

नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥

अन्ये = इनके अतिरिक्त इच्छाका भी त्याग वाले हैं

बहवः = बहुत-से कर दिया है, (तथा जो)

शूराः = शूरवीर हैं, च = और सर्वे = सब-के-सब

(जिन्होंने) नानाशस्त्रप्रहरणाः = जो अनेक युद्धविशारदाः = युद्धकलामें

मदर्थे = मेरे लिये प्रकारके अस्त्र- अत्यन्त चतुर

त्यक्तजीविताः = अपने जीनेकी शस्त्रोंको चलाने- हैं।

व्याख्या—'अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्त-

जीविताः'—मैंने अभीतक अपनी सेनाके जितने शूरवीरोंके

नाम लिये हैं, उनके अतिरिक्त भी हमारी सेनामें बाहीक,

शल्य, भगदत्त, जयद्रथ आदि बहुत-से शूरवीर महारथी हैं,

जो मेरी भलाईके लिये, मेरी ओरसे लड़नेके लिये अपने

जीनेकी इच्छाका त्याग करके यहाँ आये हैं। वे मेरी

विजयके लिये मर भले ही जायँ, पर युद्धसे हटेंगे नहीं।

उनकी मैं आपके सामने क्या कृतज्ञता प्रकट करूँ ?

'नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः'—ये सभी

लोग हाथमें रखकर प्रहार करनेवाले तलवार, गदा, त्रिशूल

आदि नाना प्रकारके शस्त्रोंकी कलामें निपुण हैं; और

हाथसे फेंककर प्रहार करनेवाले बाण, तोमर, शक्ति आदि

अस्त्रोंकी कलामें भी निपुण हैं। युद्ध कैसे करना चाहिये;

किस तरहसे, किस पैंतरेसे और किस युक्तिसे युद्ध करना

चाहिये; सेनाको किस तरह खड़ी करनी चाहिये आदि

युद्धकी कलाओंमें भी ये बड़े निपुण हैं, कुशल हैं।

सम्बन्ध—दुर्योधनकी बातें सुनकर जब द्रोणाचार्य कुछ भी नहीं बोले, तब अपनी चालाकी न चल सकनेसे

दुर्योधनके मनमें क्या विचार आता है—इसको संजय आगेके श्लोकमें कहते हैं*।

सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमताष्टमम्। जीवेद्वर्षशतं सोऽपि सर्वव्याधिविवर्जितः॥

  • संजय व्यासप्रदत्त दिव्य दृष्टिसे सैनिकोंके मनमें आयी बातको भी जान लेनेमें समर्थ थे—

प्रकाशं वाप्रकाशं वा दिवा वा यदि वा निशि। मनसा चिन्तितमपि सर्वं वेत्स्यति सञ्जयः॥

(महाभारत, भीष्म० २।११)

श्लोक १० ]

  • साधक-संजीवनी *

३५

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।

पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥

द्रोणाचार्यको चुप देखकर दुर्योधनके मनमें विचार हुआ कि वास्तवमें—

अस्माकम् = हमारी तत् = वह बलम् = सेना (पाण्डवोंपर विजय करनेमें) अपर्याप्तम् = अपर्याप्त है, असमर्थ है; (क्योंकि) | भीष्माभिरक्षितम् = उसके संरक्षक (उभयपक्षपाती) भीष्म हैं। तु = परन्तु एतेषाम् = इन पाण्डवोंकी इदम् = यह बलम् = सेना (हमपर) | विजय करनेमें) पर्याप्तम् = पर्याप्त है, समर्थ है; (क्योंकि) भीमाभिरक्षितम् = इसके संरक्षक (निजसेनापक्षपाती) भीमसेन हैं। ---|---|---

व्याख्या—‘अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्’ —अर्थ—अन्यायके कारण दुर्योधनके मनमें भय होनेसे वह अपनी सेनाके विषयमें सोचता है कि हमारी सेना बड़ी होनेपर भी अर्थात् पाण्डवोंकी अपेक्षा चार अक्षौहिणी अधिक होनेपर भी पाण्डवोंपर विजय प्राप्त करनेमें है तो असमर्थ ही! कारण कि हमारी सेनामें मतभेद है। उसमें इतनी एकता (संगठन), निर्भयता, निःसंकोचता नहीं है, जितनी कि पाण्डवोंकी सेनामें है। हमारी सेनाके मुख्य संरक्षक पितामह भीष्म उभयपक्षपाती हैं अर्थात् उनके भीतर कौरव और पाण्डव—दोनों सेनाओंका पक्ष है। वे कृष्णके बड़े भक्त हैं। उनके हृदयमें युधिष्ठिरका बड़ा आदर है। अर्जुनपर भी उनका बड़ा स्नेह है। इसलिये वे हमारे पक्षमें रहते हुए भी भीतरसे पाण्डवोंका भला चाहते हैं। वे ही भीष्म हमारी सेनाके मुख्य सेनापति हैं। ऐसी दशामें हमारी सेना पाण्डवोंके मुकाबलेमें कैसे समर्थ हो सकती है? नहीं हो सकती।

‘पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्’ —परन्तु यह जो पाण्डवोंकी सेना है, यह हमारेपर विजय करनेमें समर्थ है। कारण कि इनकी सेनामें मतभेद नहीं है, प्रत्युत सभी एकमत होकर संगठित हैं। इनकी सेनाका संरक्षक बलवान् भीमसेन है, जो कि बचपनसे ही मेरेको हराता आया है। यह अकेला ही मेरेसहित सौ भाइयोंको मारनेकी प्रतिज्ञा कर चुका है अर्थात् यह हमारा नाश करनेपर तुला हुआ है! इसका शरीर वज्रके समान मजबूत है। इसको मैंने

जहर पिलाया था, तो भी यह मरा नहीं। ऐसा यह भीमसेन पाण्डवोंकी सेनाका संरक्षक है, इसलिये यह सेना वास्तवमें समर्थ है, पूर्ण है।

यहाँ एक शंका हो सकती है कि दुर्योधनने अपनी सेनाके संरक्षकके लिये भीष्मजीका नाम लिया, जो कि सेनापतिके पदपर नियुक्त हैं। परन्तु पाण्डव-सेनाके संरक्षकके लिये भीमसेनका नाम लिया, जो कि सेनापति नहीं हैं। इसका समाधान यह है कि दुर्योधन इस समय सेनापतियोंकी बात नहीं सोच रहा है; किन्तु दोनों सेनाओंकी शक्तिके विषयमें सोच रहा है कि किस सेनाकी शक्ति अधिक है? दुर्योधनपर आरम्भसे ही भीमसेनकी शक्तिका, बलवत्ताका अधिक प्रभाव पड़ा हुआ है। अतः वह पाण्डव-सेनाके संरक्षकके लिये भीमसेनका ही नाम लेता है।

विशेष बात

अर्जुन कौरव-सेनाको देखकर किसीके पास न जाकर हाथमें धनुष उठाते हैं (गीता—पहले अध्यायका बीसवाँ श्लोक), पर दुर्योधन पाण्डवसेनाको देखकर द्रोणाचार्यके पास जाता है और उनसे पाण्डवोंकी व्यूहरचनायुक्त सेनाको देखनेके लिये कहता है। इससे सिद्ध होता है कि दुर्योधनके हृदयमें भय बैठा हुआ है*। भीतरमें भय होनेपर भी वह चालाकीसे द्रोणाचार्यको प्रसन्न करना चाहता है, उनको पाण्डवोंके विरुद्ध उकसाना चाहता है। कारण कि दुर्योधनके हृदयमें अर्थम है, अन्याय है, पाप है। अन्यायी, पापी व्यक्ति कभी निर्भय और सुख-शान्तिसे नहीं रह सकता—

  • जब कौरवोंकी सेनाके शंख आदि बाजे बजे, तब उनके शब्दका पाण्डव-सेनापर कुछ भी असर नहीं पड़ा। परन्तु जब पाण्डवोंकी सेनाके शंख बजे, तब उनके शब्दसे दुर्योधन आदिके हृदय विदीर्ण हो गये (१।१३,१९)। इससे सिद्ध होता है कि अर्थम—अन्यायका पक्ष लेनेके कारण दुर्योधन आदिके हृदय कमजोर हो गये थे और उनमें भय बैठा हुआ था।

३६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

यह नियम है। परन्तु अर्जुनके भीतर धर्म है, न्याय है। इसलिये अर्जुनके भीतर अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये चालाकी नहीं है, भय नहीं है; किन्तु उत्साह है, वीरता है। तभी तो वे वीरतामें आकर सेना-निरीक्षण करनेके लिये भगवान्को आज्ञा देते हैं कि 'हे अच्युत! दोनों सेनाओंके मध्यमें मेरे रथको खड़ा कर दीजिये' (पहले अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। इसका तात्पर्य है कि जिसके भीतर नाशवान् धन-सम्पत्ति आदिका आश्रय है, आदर है और जिसके भीतर अधर्म है, अन्याय है, दुर्भाव है, उसके भीतर वास्तविक बल नहीं होता। वह भीतरसे खोखला होता है

परिशिष्ट भाव —अर्जुनने अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित नारायणी सेनाको छोड़कर निःशस्त्र भगवान् श्रीकृष्णको स्वीकार किया था* और दुर्घोधनने भगवान्को छोड़कर उनकी नारायणी सेनाको स्वीकार किया था। तात्पर्य है कि अर्जुनकी दृष्टि भगवान्पर थी और दुर्घोधनकी दृष्टि वैभवपर थी। जिसकी दृष्टि भगवान्पर होती है, उसका हृदय बलवान् होता है; क्योंकि भगवान्का बल सच्चा है। परन्तु जिसकी दृष्टि सांसारिक वैभवपर होती है, उसका हृदय कमजोर होता है; क्योंकि संसारका बल कच्चा है।

सम्बन्ध—अब दुर्घोधन पितामह भीष्मको प्रसन्न करनेके लिये अपनी सेनाके सभी महारथियोंसे कहता है—

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।

भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥

= दुर्घोधन बाह्यदृष्टिसेलोगरहते हुए
अपनी सेनाकेसर्वेषु= सभीहि = निश्चितरूपसे
महारथियोंसेअयनेषु= मोर्चांपरभीष्मम् = पितामह भीष्मकी
बोला—यथाभागम्= अपनी-अपनीएव = ही
भवन्तः= आपजगहअभिरक्षन्तु = चारों ओरसे रक्षा
सर्वे, एव= सब-के-सबअवस्थिताः= दृढ़तासे स्थित करें।

व्याख्या —'अयनेषु च सर्वेषु....भवन्तः सर्व एव हि'—जिन-जिन मोर्चांपर आपकी नियुक्ति कर दी गयी है, आप सभी योद्धालोग उहाँ मोर्चांपर दृढ़तासे स्थित रहते हुए सब तरफसे, सब प्रकारसे भीष्मजीकी रक्षा करें।

भीष्मजीकी सब ओरसे रक्षा करें—यह कहकर दुर्घोधन भीष्मजीको भीतरसे अपने पक्षमें लाना चाहता है। ऐसा कहनेका दूसरा भाव यह है कि जब भीष्मजी युद्ध करें, तब किसी भी व्यूहद्वारसे शिखण्डी उनके सामने न आ जाय—इसका आपलोग खयाल रखें। अगर शिखण्डी उनके सामने आ जायगा, तो भीष्मजी उसपर शस्त्रास्त्र नहीं

और वह कभी निर्भय नहीं होता। परन्तु जिसके भीतर अपने धर्मका पालन है और भगवान्का आश्रय है, वह कभी भयभीत नहीं होता। उसका बल सच्चा होता है। वह सदा निश्चित और निर्भय रहता है। अतः अपना कल्याण चाहनेवाले साधकोंको अधर्म, अन्याय आदिका सर्वथा त्याग करके और एकमात्र भगवान्का आश्रय लेकर भगवत्प्रीत्यर्थ अपने धर्मका अनुष्ठान करना चाहिये। भौतिक सम्पत्तिको महत्त्व देकर और संयोगजन्य सुखके प्रलोभनमें फँसकर कभी अधर्मका आश्रय नहीं लेना चाहिये; क्योंकि इन दोनोंसे मनुष्यका कभी हित नहीं होता, प्रत्युत अहित ही होता है।

चलायेंगे। कारण कि शिखण्डी पहले जन्ममें भी स्त्री था और इस जन्ममें भी पहले स्त्री था, पीछे पुरुष बना है। इसलिये भीष्मजी इसको स्त्री ही समझते हैं और उन्होंने शिखण्डीसे युद्ध न करनेकी प्रतिज्ञा कर रखी है। यह शिखण्डी शंकरके वरदानसे भीष्मजीको मारनेके लिये ही पैदा हुआ है। अतः जब शिखण्डीसे भीष्मजीकी रक्षा हो जायगी, तो फिर वे सबको मार देंगे, जिससे निश्चित ही हमारी विजय होगी। इस बातको लेकर दुर्घोधन सभी महारथियोंसे भीष्मजीकी रक्षा करनेके लिये कह रहा है।

  • एवमुक्तस्तु कृष्णेन कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः। अयुध्यमानं संग्रामे वरयामास केशवम् ॥ (महा, उद्योग ७।२१)

'श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर कुन्तीपुत्र धनंजयने संग्रामभूमिमें (अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित एक अक्षौहिणी नारायणी सेनाको छोड़कर) युद्ध न करनेवाले निःशस्त्र उन भगवान् श्रीकृष्णको ही (अपना सहायक) चुना।'

लोक १२]

  • साधक-संजीवनी *

३७

सम्बन्ध—द्रोणाचार्यके द्वारा कुछ भी न बोलनेके कारण दुर्योधनका मानसिक उत्साह भंग हुआ देखकर उसके प्रति भीष्मजीके किये हुए स्नेह-सौहार्दकी बात संजय आगेके श्लोकमें प्रकट करते हैं।

तस्य सज्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।

सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्वौ प्रतापवान् ॥ १२ ॥

तस्य= उस (दुर्योधन)-केकुरुवृद्धः= कौरवोंमें वृद्धविनद्य= गरजकर
हर्षम्= (हृदयमें) हर्षप्रतापवान्= प्रभावशालीउच्चैः= जोरसे
सज्जनयन्= उत्पन्न करतेपितामहः= पितामह भीष्मनेशङ्खम्= शंख
हुएसिंहनादम्= सिंहके समानदध्वौ= बजाया।

व्याख्या —‘तस्य सज्जनयन् हर्षम्’—यद्यपि दुर्योधनके हृदयमें हर्ष होना शंखध्वनिका कार्य है और शंखध्वनि कारण है, इसलिये यहाँ शंखध्वनिका वर्णन पहले और हर्ष होनेका वर्णन पीछे होना चाहिये अर्थात् यहाँ ‘शंख बजाते हुए दुर्योधनको हर्षित किया’—ऐसा कहा जाना चाहिये। परन्तु यहाँ ऐसा न कहकर यही कहा है कि ‘दुर्योधनको हर्षित करते हुए भीष्मजीने शंख बजाया’। कारण कि ऐसा कहकर संजय यह भाव प्रकट कर रहे हैं कि पितामह भीष्मकी शंखवादन क्रियामात्रसे दुर्योधनके हृदयमें हर्ष उत्पन्न हो ही जायगा। भीष्मजीके इस प्रभावको द्योतन करनेके लिये ही संजय आगे ‘प्रतापवान्’ विशेषण देते हैं।

‘कुरुवृद्धः’ —यद्यपि कुरुवंशियोंमें आयुकी दृष्टिसे भीष्मजीसे भी अधिक वृद्ध बाह्यीक थे (जो कि भीष्मजीके पिता शान्तनुके छोटे भाई थे), तथापि कुरुवंशियोंमें जितने बड़े-बूढ़े थे, उन सबमें भीष्मजी धर्म और ईश्वरको विशेषतासे जाननेवाले थे। अतः ज्ञानवृद्ध होनेके कारण संजय भीष्मजीके लिये ‘कुरुवृद्धः’ विशेषण देते हैं।

‘प्रतापवान्’ —भीष्मजीके त्यागका बड़ा प्रभाव था। वे कनक-कामिनीके त्यागी थे अर्थात् उन्होंने राज्य भी स्वीकार नहीं किया और विवाह भी नहीं किया। भीष्मजी अस्त्र-शस्त्रको चलानेमें बड़े निपुण थे और शास्त्रके भी बड़े जानकार थे। उनके इन दोनों गुणोंका भी लोगोंपर बड़ा प्रभाव था।

जब अकेले भीष्म अपने भाई विचित्रवीर्यके लिये

परिशिष्ट भाव —दुर्योधनके साथ द्रोणाचार्यका विद्याका सम्बन्ध था और भीष्मजीका जन्मका अर्थात् कौटुम्बिक सम्बन्ध था। जहाँ विद्याका सम्बन्ध होता है, वहाँ पक्षपात नहीं होता, पर जहाँ कौटुम्बिक सम्बन्ध होता है, वहाँ स्नेहवश पक्षपात हो जाता है। अतः दुर्योधनके द्वारा चालाकीसे कहे गये वचन सुनकर द्रोणाचार्य चुप रहे, जिससे दुर्योधनका मानसिक उत्साह भंग हो गया। परन्तु दुर्योधनको उदास देखकर कौटुम्बिक स्नेहके कारण भीष्मजी शंख बजाते हैं।

काशिराजकी कन्याओंको स्वयंवरसे हरकर ला रहे थे, तब वहाँ स्वयंवरके लिये इकट्ठे हुए सब क्षत्रिय उनपर टूट पड़े। परन्तु अकेले भीष्मजीने उन सबको हरा दिया। जिनसे भीष्म अस्त्र-शस्त्रकी विद्या पढ़े थे, उन गुरु परशुरामजीके सामने भी उन्होंने अपनी हार स्वीकार नहीं की। इस प्रकार शस्त्रके विषयमें उनका क्षत्रियोंपर बड़ा प्रभाव था।

जब भीष्म शर-शस्त्रापर सोये थे, तब भगवान् श्रीकृष्णने धर्मराजसे कहा कि ‘आपको धर्मके विषयमें कोई शंका हो तो भीष्मजीसे पूछ लें; क्योंकि शास्त्रज्ञानका सूर्य अस्ताचलको जा रहा है अर्थात् भीष्मजी इस लोकसे जा रहे हैं।’* इस प्रकार शास्त्रके विषयमें उनका दूसरोंपर बड़ा प्रभाव था।

‘पितामहः’ —इस पदका आशय यह मालूम देता है कि दुर्योधनके द्वारा चालाकीसे कही गयी बातोंका द्रोणाचार्यने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने यही समझा कि दुर्योधन चालाकीसे मेरेको ठगना चाहता है, इसलिये वे चुप ही रहे। परन्तु पितामह (दादा) होनेके नाते भीष्मजीको दुर्योधनकी चालाकीमें उसका बचपना दीखता है। अतः पितामह भीष्म द्रोणाचार्यके समान चुप न रहकर वात्सल्यभावके कारण दुर्योधनको हर्षित करते हुए शंख बजाते हैं।

‘सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्वौ’ —जैसे सिंहके गर्जना करनेपर हाथी आदि बड़े-बड़े पशु भी भयभीत हो जाते हैं, ऐसे ही गर्जना करनेमात्रसे सभी भयभीत हो जायें और दुर्योधन प्रसन्न हो जाय—इसी भावसे भीष्मजीने सिंहके समान गरजकर जोरसे शंख बजाया।

  • तस्मिन्स्तमिते भोष्ये कौरवाणां धुरंधरे। ज्ञानान्यस्तं गमिष्यन्ति तस्मात् त्वां चोदयाम्यहम् ॥ (महाभारत, शान्ति० ४६।२३॥)

३८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

सम्बन्ध—पितामह भीष्मके द्वारा शंख बजानेका परिणाम क्या हुआ, इसको संजय आगेके श्लोकमें कहते हैं।

ततः शङ्खाश्च भैर्यश्च पणवानकगोमुखः।

सहसैवाभ्यहन्वन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ १३ ॥

ततः= उसके बादपणवानकगोमुखः =: ढोल,अभ्यहन्वन्त = बज उठे। (उनका)
शङ्खाः= शंखमृदंग औरसः = वह
= औरनरसिंघे बाजेशब्दः = शब्द
भैर्यः= भेरी (नगाड़े)सहसा = एक साथतुमुलः = बड़ा भयंकर
= तथाएव = हीअभवत् = हुआ।

व्याख्या—‘ततः शङ्खाश्च भैर्यश्च पणवानक-गोमुखः’ —यद्यपि भीष्मजीने युद्धारम्भकी घोषणा करनेके लिये शंख नहीं बजाया था, प्रत्युत दुर्वाधनको प्रसन्न करनेके लिये ही शंख बजाया था, तथापि कौरव-सेनाने भीष्मजीके शंखवादनको युद्धकी घोषणा ही समझा। अतः भीष्मजीके शंख बजानेपर कौरव-सेनाके शंख आदि सब बाजे एक साथ बज उठे।

‘शंख’ समुद्रसे उत्पन्न होते हैं। ये ठाकुरजीकी सेवा-पूजामें रखे जाते हैं और आरती उतारने आदिके काममें आते हैं। मांगलिक कार्योंमें तथा युद्धके आरम्भमें ये मुखसे फूँक देकर बजाये जाते हैं। ‘भेरी’ नाम नगाड़ोंका है (जो बड़े नगाड़े होते हैं, उनको नौबत कहते हैं)। ये नगाड़े लोहेके बने हुए और भैंसेके चमड़ेसे मढ़े हुए होते हैं, तथा लकड़ीके ढंढेसे बजाये जाते हैं। ये मन्दिरोंमें एवं राजाओंके किलोंमें रखे जाते हैं। उत्सव और मांगलिक कार्योंमें ये विशेषतासे बजाये जाते हैं। राजाओंके यहाँ ये रोज बजाये जाते हैं। ‘पणव’ नाम ढोलका है। ये लोहेके अथवा लकड़ीके बने हुए और बकरेके चमड़ेसे मढ़े हुए

होते हैं तथा हाथसे या लकड़ीके ढंढेसे बजाये जाते हैं। ये आकारमें ढोलकीकी तरह होनेपर भी ढोलकीसे बड़े होते हैं। कार्यके आरम्भमें पणवोंको बजाना गणेशजीके पूजनके समान मांगलिक माना जाता है। ‘आनक’ नाम मृदंगका है। इनको पखावज भी कहते हैं। आकारमें ये लकड़ीकी बनायी हुई ढोलकीके समान होते हैं। ये मिट्टीके बने हुए और चमड़ेसे मढ़े हुए होते हैं तथा हाथसे बजाये जाते हैं। ‘गोमुख’ नाम नरसिंघेका है। ये आकारमें साँपकी तरह टेढ़े होते हैं और इनका मुख गायकी तरह होता है। ये मुखकी फूँकसे बजाये जाते हैं।

‘सहसैवाभ्यहन्वन्त’ *—कौरव-सेनामें उत्साह बहुत था। इसलिये पितामह भीष्मका शंख बजते ही कौरव-सेनाके सब बाजे अनायास ही एक साथ बज उठे। उनके बजनेमें देरी नहीं हुई तथा उनको बजानेमें परिश्रम भी नहीं हुआ।

‘स शब्दस्तुमुलोऽभवत्’ —अलग-अलग विभागोंमें, टुकड़ियोंमें खड़ी हुई कौरव-सेनाके शंख आदि बाजोंका शब्द बड़ा भयंकर हुआ अर्थात् उनकी आवाज बड़ी जोरसे गूँजती रही।

सम्बन्ध— इस अध्यायके आरम्भमें ही धृतराष्ट्रने संजयसे पूछा था कि युद्धक्षेत्रमें मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया? अतः संजयने दूसरे श्लोकसे तेरहवें श्लोकतक ‘धृतराष्ट्रके पुत्रोंने क्या किया’—इसका उत्तर दिया। अब आगेके श्लोकसे संजय ‘पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया’—इसका उत्तर देते हैं।

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।

माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥ १४ ॥

  • कर्मको अत्यन्त सुगमतापूर्वक छोटन करनेके लिये जहाँ कर्म आदिको ही कर्ता बना दिया जाता है, उसको ‘कर्मकर्तृ’ प्रयोग कहते हैं। जैसे कोई लकड़ीको चीर रहा है, तो इस कर्मको सुगम बतानेके लिये ‘लकड़ी चीरी जा रही है’ ऐसा प्रयोग किया जाता है। ऐसे ही यहाँ ‘बाजे बजाये गये’ ऐसा प्रयोग होना चाहिये; परन्तु बाजे बजानेमें सुगमता बतानेके लिये, सेनाका उत्साह दिखानेके लिये ‘बाजे बज उठे’ ऐसा प्रयोग किया गया है।

श्लोक १४ ]

  • साधक-संजीवनी *

३९

ततः= उसके बादस्यन्दने= रथपरपाण्डवः= पाण्डुपुत्र अर्जुनने
श्वेतैः= सफेदस्थितौ= बैठे हुएएव= भी
हयैः= घोड़ोंसेमाधवः= लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्णदिव्यौ= दिव्य
युक्ते= युक्त= औरशङ्खौ= शंखोंको
महित= महान्प्रदध्मत्तुः= बड़े जोरसे बजाया।

व्याख्या—‘ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते’— चित्ररथ गन्धर्वने अर्जुनको सौ दिव्य घोड़े दिये थे। इन घोड़ोंमें यह विशेषता थी कि इनमेंसे युद्धमें कितने ही घोड़े क्यों न मारे जायें, पर ये संख्यामें सौ-के-सौ ही बने रहते थे, कम नहीं होते थे। ये पृथ्वी, स्वर्ग आदि सभी स्थानोंमें जा सकते थे। इन्हीं सौ घोड़ोंमेंसे सुन्दर और सुशिक्षित चार सफेद घोड़े अर्जुनके रथमें जुते हुए थे।

‘महित स्यन्दने स्थितौ’— यज्ञोंमें आहुतिरूपसे दिये गये घीको खाते-खाते अग्निको अजीर्ण हो गया था। इसीलिये अग्निदेव खाण्डववनकी विलक्षण-विलक्षण जड़ी-बूटियाँ खाकर (जलाकर) अपना अजीर्ण दूर करना चाहते थे। परन्तु देवताओंके द्वारा खाण्डववनकी रक्षा की जानेके कारण अग्निदेव अपने कार्यमें सफल नहीं हो पाते थे। वे जब-जब खाण्डववनको जलाते, तब-तब इन्द्र वर्षा करके उसको (अग्निको) बुझा देते। अन्तमें अर्जुनकी सहायतासे अग्निने उस पूरे वनको जलाकर अपना अजीर्ण दूर किया और प्रसन्न होकर अर्जुनको यह बहुत बड़ा रथ दिया। नौ बैलगाड़ियोंमें जितने अस्त्र-शस्त्र आ सकते हैं, उतने अस्त्र-शस्त्र इस रथमें पड़े रहते थे। यह सोनेसे मढ़ा हुआ और तेजोमय था। इसके पहिये बड़े ही दृढ़ एवं विशाल थे। इसकी ध्वजा बिजलीके समान चमकती थी। यह ध्वजा एक योजना (चार कोस) तक फहराया करती थी। इतनी लम्बी होनेपर भी इसमें न तो बोझ था, न यह कहीं रुकती थी और न कहीं वृक्ष आदिमें अटकती ही थी। इस ध्वजापर हनुमानजी विराजमान थे।

‘स्थितौ’ कहनेका तात्पर्य है कि उस सुन्दर और तेजोमय रथपर साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण और उनके प्यारे भक्त अर्जुनके विराजमान होनेसे उस रथकी शोभा और तेज बहुत ज्यादा बढ़ गया था।

‘माधवः पाण्डवश्चैव’— ‘मा’ नाम लक्ष्मीका है और ‘धव’ नाम पतिका है। अतः ‘माधव’ नाम लक्ष्मीपतिके है। यहाँ ‘पाण्डव’ नाम अर्जुनका है; क्योंकि अर्जुन सभी पाण्डवोंमें मुख्य हैं—‘पाण्डवानां धनञ्जयः

(गीता १०।३७)।

अर्जुन ‘नर’ के और श्रीकृष्ण ‘नारायण’ के अवतार थे। महाभारतके प्रत्येक पर्वके आरम्भमें नर (अर्जुन) और नारायण (भगवान् श्रीकृष्ण)—को नमस्कार किया गया है—‘नारायणां नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ’। इस दृष्टिसे पाण्डव-सेनामें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन—ये दोनों मुख्य थे। संजयने भी गीताके अन्तमें कहा है कि ‘जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण और गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन रहेंगे, वहाँपर श्री, विजय, विभूति और अटल नीति रहेगी’ (१८।७८)।

‘दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मत्तुः’— भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके हाथोंमें जो शंख थे, वे तेजोमय और अलौकिक थे। उन शंखोंको उन्होंने बड़े जोरसे बजाया।

यहाँ शंका हो सकती है कि कौरवपक्षमें मुख्य सेनापति पितामह भीष्म हैं, इसलिये उनका सबसे पहले शंख बजाना ठीक ही है; परन्तु पाण्डव-सेनामें मुख्य सेनापति भृष्टयुग्मके रहते हुए ही सारथि बने हुए भगवान् श्रीकृष्णने सबसे पहले शंख क्यों बजाया? इसका समाधान है कि भगवान् सारथि बनें चाहे महारथी बनें, उनकी मुख्यता कभी मिट ही नहीं सकती। वे जिस किसी भी पदपर रहें, सदा सबसे बड़े ही बने रहते हैं। कारण कि वे अच्युत हैं, कभी च्युत होते ही नहीं। पाण्डव-सेनामें भगवान् श्रीकृष्ण ही मुख्य थे और वे ही सबका संचालन करते थे। जब वे बाल्यावस्थामें थे, उस समय भी नन्द, उपनन्द आदि उनकी बात मानते थे। तभी तो उन्होंने बालक श्रीकृष्णके कहनेसे परम्परासे चली आयी इन्द्र-पूजाको छोड़कर गोवर्धनकी पूजा करनी शुरू कर दी। तात्पर्य है कि भगवान् जिस किसी अवस्थामें, जिस किसी स्थानपर और जहाँ कहीं भी रहते हैं, वहाँ वे मुख्य ही रहते हैं। इसीलिये भगवान्ने पाण्डव-सेनामें सबसे पहले शंख बजाया।

जो स्वयं छोटा होता है, वही ऊँचे स्थानपर नियुक्त होनेसे बड़ा माना जाता है। अतः जो ऊँचे स्थानके कारण अपनेको बड़ा मानता है, वह स्वयं वास्तवमें छोटा ही होता है। परन्तु

४०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

जो स्वयं बड़ा होता है, वह जहाँ भी रहता है, उसके कारण वह स्थान भी बड़ा माना जाता है। जैसे भगवान् यहाँ सारथि

बने हैं, तो उनके कारण वह सारथिका स्थान (पद) भी ऊँचा हो गया।

सम्बन्ध—अब संजय आगेके चार श्लोकोंमें पूर्वश्लोकका खुलासा करते हुए दूसरोंके शंखवादनाका वर्णन करते हैं।

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।

पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥ १५ ॥

हृषीकेशः = अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णनेदेवदत्तम् = देवदत्त नामक (शंख बजाया और)वृकोदरः = वृकोदर भीमने
पाञ्चजन्यम् = पांचजन्य नामक (तथा)भीमकर्मा = भयानक कर्म करनेवालेपौण्ड्रम् = पौण्ड्र नामक
महाशङ्खम् = महाशंख
दध्मौ = बजाया।

व्याख्या—‘पाञ्चजन्यं हृषीकेशः’— सबके अन्तर्यामी अर्थात् सबके भीतरकी बात जाननेवाले साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंके पक्षमें खड़े होकर ‘पांचजन्य’ नामक शंख बजाया। भगवान्ने पंचजन नामक शंखरूपधारी दैत्यको मारकर उसको शंखरूपसे ग्रहण किया था, इसलिये इस शंखका नाम ‘पांचजन्य’ हो गया।

‘देवदत्तं धनञ्जयः’— राजसूय यज्ञके समय अर्जुनने बहुत-से राजाओंको जीतकर बहुत धन इकट्ठा किया था। इस कारण अर्जुनका नाम ‘धनंजय’ पड़ गया*। निवातकवचादि दैत्योंके साथ युद्ध करते समय इन्द्रने अर्जुनको ‘देवदत्त’ नामक शंख दिया था। इस शंखकी ध्वनि बड़े जोरसे होती

थी, जिससे शत्रुओंकी सेना घबरा जाती थी। इस शंखको अर्जुनने बजाया।

‘पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः’— हिडिम्बासुर, बकासुर, जटासुर आदि असुरों तथा कीचक, जरासन्ध आदि बलवान् वीरोंको मारनेके कारण भीमसेनका नाम ‘भीमकर्मा’ पड़ गया। उनके पेटमें जठराग्निके सिवाय ‘वृक’ नामकी एक विशेष अग्नि थी, जिससे बहुत अधिक भोजन पचता था। इस कारण उनका नाम ‘वृकोदर’ पड़ गया। ऐसे भीमकर्मा वृकोदर भीमसेनने बहुत बड़े आकारवाला ‘पौण्ड्र’ नामक शंख बजाया।

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।

नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥

कुन्तीपुत्रः = कुन्तीपुत्रनामक (शंख बजाया तथा)सहदेवः = सहदेवने
राजा = राजासुघोषमणिपुष्पकौ = सुघोष और मणिपुष्पक नामक (शंख बजाये)।
युधिष्ठिरः = युधिष्ठिरनेनकुलः = नकुल
अनन्तविजयम् = अनन्तविजय = और

व्याख्या—‘अनन्तविजयं राजा’……………‘सुघोषमणि-पुष्पकौ’— अर्जुन, भीम और युधिष्ठिर—ये तीनों कुन्तीके पुत्र हैं तथा नकुल और सहदेव—ये दोनों माद्रीके पुत्र हैं, यह विभाग दिखानेके लिये ही यहाँ युधिष्ठिरके लिये ‘कुन्तीपुत्र’ विशेषण दिया गया है।

युधिष्ठिरको ‘राजा’ कहनेका तात्पर्य है कि युधिष्ठिरजी

वनवासके पहले अपने आधे राज्य-(इन्द्रप्रस्थ-)के राजा थे, और नियमके अनुसार बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवासके बाद वे राजा होने चाहिये थे। ‘राजा’ विशेषण देकर संजय यह भी संकेत करना चाहते हैं कि आगे चलकर धर्मराज युधिष्ठिर ही सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डलके राजा होंगे।

  • सर्वाञ्जनपदाञ्जित्वा वित्तमादाय केवलम्। मध्ये धनस्य तिष्ठामि तेनाहर्मा धनञ्जयम् ॥ (महाभारत, विराट० ४४।१३)

श्लोक १७-१९ ]

  • साधक-संजीवनी *

४१

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः । धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ १७ ॥ दुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते । सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मः पृथक् पृथक् ॥ १८ ॥

पृथिवीपते= हे राजन् !विराटः= राजा विराटभुजाओंवाले
परमेष्वासः= श्रेष्ठ धनुषवाले= औरसौभद्रः
काश्यः= काशिराजअपराजितः= अजेय
= औरसात्यकिः= सात्यकि,
महारथः= महारथीदुपदः= राजा दुपदसर्वशः
शिखण्डी= शिखण्डी= औरपृथक्, पृथक्
= तथाद्रौपदेयाः= द्रौपदीके पाँचों पुत्र
धृष्टद्युम्नः= धृष्टद्युम्न= तथाशङ्खान्
= एवंमहाबाहुः= लम्बी-लम्बीदध्मः

व्याख्या —‘काश्यश्च परमेष्वासः.....शङ्खान् दध्मः पृथक् पृथक्’—महारथी शिखण्डी बहुत शूरवीर था। यह पहले जन्ममें स्त्री (काशिराजकी कन्या अम्बा) था और इस जन्ममें भी राजा दुपदको पुत्रीरूपसे प्राप्त हुआ था। आगे चलकर यही शिखण्डी स्थाणाकर्ण नामक यक्षसे पुरुषत्व प्राप्त करके पुरुष बना। भीष्मजी इन सब बातोंको जानते थे और शिखण्डीको स्त्री ही समझते थे। इस कारण वे इसपर बाण नहीं चलाते थे। अर्जुनने युद्धके समय इसीको आगे करके भीष्मजीपर बाण चलाये और उनको रथसे नीचे गिरा दिया। अर्जुनका पुत्र अभिमन्यु बहुत शूरवीर था। युद्धके समय इसने द्रोणनिर्मित चक्रव्यूहमें घुसकर अपने पराक्रमसे बहुत-से वीरोंका संहार किया। अन्तमें कौरव-सेनाके छः महारथियोंने इसको अन्यायपूर्वक घेरकर इसपर शस्त्र-

अस्त्र चलाये। दुःशासनपुत्रके द्वारा सिरपर गदाका प्रहार होनेसे इसकी मृत्यु हो गयी। संजयने शंखवादनेके वर्णनमें कौरव-सेनाके शूरवीरोंमेंसे केवल भीष्मजीका ही नाम लिया और पाण्डव-सेनाके शूरवीरोंमेंसे भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम आदि अठारह वीरोंके नाम लिये। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि संजयके मनमें अधर्मके पक्ष-(कौरवसेना-) का आदर नहीं है। इसलिये वे अधर्मके पक्षका अधिक वर्णन करना उचित नहीं समझते। परन्तु उनके मनमें धर्मके पक्ष-(पाण्डवसेना-) का आदर होनेसे और भगवान् श्रीकृष्ण तथा पाण्डवोंके प्रति आदरभाव होनेसे वे उनके पक्षका ही अधिक वर्णन करना उचित समझते हैं और उनके पक्षका वर्णन करनेमें ही उनको आनन्द आ रहा है।

सम्बन्ध—पाण्डव-सेनाके शंखवादनका कौरवसेनापर क्या असर हुआ—इसको आगेके श्लोकमें कहते हैं।

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् । नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥ १९ ॥

= औरनभः= आकाशधार्तराष्ट्राणाम्= अन्यायपूर्वक
सः= (पाण्डव-सेनाके शंखोंके) उस= औरराज्य हड़पनेवाले
तुमुलः= भयंकरपृथिवीम्= पृथ्वीकोदुर्योधन आदिके
घोषः= शब्दनेएव= भीहृदयानि= हृदय
व्यनुनादयन्= गुँजाते हुएव्यदारयत्= विदीर्ण कर दिये।

व्याख्या —‘स घोषो धार्तराष्ट्राणां.....तुमुलो गहरी, ऊँची और भयंकर हुई कि उस (ध्वनि-व्यनुनादयन्’—पाण्डव-सेनाकी वह शंखध्वनि इतनी विशाल, प्रतिध्वनि-) से पृथ्वी और आकाशके बीचका भाग गुँज

४२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

उठा। उस शब्दसे अन्यायपूर्वक राज्यको हड़पनेवालोंके और उनकी सहायताके लिये (उनके पक्षमें) खड़े हुए राजाओंके हृदय विदीर्ण हो गये। तात्पर्य है कि हृदयको किसी अस्त्र-शस्त्रसे विदीर्ण करनेसे जैसी पीड़ा होती है, वैसी ही पीड़ा उनके हृदयमें शंखध्वनिसे हो गयी। उस शंखध्वनिने कौरव-सेनाके हृदयमें युद्धका जो उत्साह था, बल था, उसको कमजोर बना दिया, जिससे उनके हृदयमें पाण्डव-सेनाका भय उत्पन्न हो गया।

संजय ये बातें धृतराष्ट्रको सुना रहे हैं। धृतराष्ट्रके सामने ही संजयका 'धृतराष्ट्रके पुत्रों अथवा सम्बन्धियोंके हृदय विदीर्ण कर दिये' ऐसा कहना सभ्यतापूर्ण और युक्तिसंगत नहीं मालूम देता। इसलिये संजयको 'धार्तराष्ट्रणाम्' न कहकर 'तावकीनानाम्' (आपके पुत्रों अथवा सम्बन्धियोंके— ऐसा) कहना चाहिये था; क्योंकि ऐसा कहना ही सभ्यता है। इस दृष्टिसे यहाँ 'धार्तराष्ट्रणाम्' पदका अर्थ 'जिन्होंने अन्यायपूर्वक राज्यको धारण किया'— ऐसा लेना ही युक्तिसंगत तथा सभ्यतापूर्ण मालूम देता है। अन्यायका पक्ष लेनेसे ही उनके हृदय विदीर्ण हो गये— इस दृष्टिसे भी यह अर्थ लेना ही युक्तिसंगत मालूम देता है। यहाँ शंका होती है कि कौरवोंकी ग्यारह अश्वीहिणी सेनाके शंख आदि बाजे बजे तो उनके शब्दका पाण्डवसेना-पर कुछ भी असर नहीं हुआ, पर पाण्डवोंकी सात अश्वीहिणी सेनाके शंख बजे तो उनके शब्दसे कौरव-सेनाके हृदय विदीर्ण क्यों हो गये? इसका समाधान यह है कि जिनके हृदयमें अधर्म, पाप, अन्याय नहीं है अर्थात् जो धर्मपूर्वक अपने कर्तव्यका पालन करते हैं, उनका हृदय मजबूत होता है, उनके हृदयमें भय नहीं होता। न्यायका पक्ष

होनेसे उनमें उत्साह होता है, शूरवीरता होती है। पाण्डवोंने वनवासके पहले भी न्याय और धर्मपूर्वक राज्य किया था और वनवासके बाद भी नियमके अनुसार कौरवोंसे न्यायपूर्वक राज्य माँगा था। अतः उनके हृदयमें भय नहीं था, प्रत्युत उत्साह था, शूरवीरता थी। तात्पर्य है कि पाण्डवोंका पक्ष धर्मका था। इस कारण कौरवोंकी ग्यारह अश्वीहिणी सेनाके बाजोंके शब्दका पाण्डव-सेनापर कोई असर नहीं हुआ। परन्तु जो अधर्म, पाप, अन्याय आदि करते हैं, उनके हृदय स्वाभाविक ही कमजोर होते हैं। उनके हृदयमें निर्भयता, निःशंकता नहीं रहती। उनका खुदका किया पाप, अन्याय ही उनके हृदयको निर्बल बना देता है। अधर्म अधर्मीको खा जाता है। दुर्योधन आदिने पाण्डवोंको अन्यायपूर्वक मारनेका बहुत प्रयास किया था। उन्होंने छल-कपटसे अन्यायपूर्वक पाण्डवोंका राज्य छीना था और उनको बहुत कष्ट दिये थे। इस कारण उनके हृदय कमजोर, निर्बल हो चुके थे। तात्पर्य है कि कौरवोंका पक्ष अधर्मका था। इसलिये पाण्डवोंकी सात अश्वीहिणी सेनाकी शंख-ध्वनिसे उनके हृदय विदीर्ण हो गये, उनमें बड़े जोरकी पीड़ा हो गयी।

इस प्रसंगसे साधकको सावधान हो जाना चाहिये कि उसके द्वारा अपने शरीर, वाणी, मनसे कभी भी कोई अन्याय और अधर्मका आचरण न हो। अन्याय और अधर्मयुक्त आचरणसे मनुष्यका हृदय कमजोर, निर्बल हो जाता है। उसके हृदयमें भय पैदा हो जाता है। उदाहरणार्थ, लंकाधिपति रावणसे त्रिलोकी डरती थी। वही रावण जब सीताजीका हरण करने जाता है, तब भयभीत होकर इधर-उधर देखता है१। इसलिये साधकको चाहिये कि वह अन्याय—अधर्मयुक्त आचरण कभी न करे।

१- 'अन्यायेन धृतं राष्ट्रं यैस्ते धृतराष्ट्राः'। ऐसा बहुब्रीहि समास करनेके बाद 'धृतराष्ट्रा एव' इस विग्रहमें स्वार्थमें तद्विदितका 'अण्' प्रत्यय किया गया, जिससे 'धार्तराष्ट्राः' यह रूप बन गया। यहाँ षष्ठी विभक्तिके प्रयोगकी आवश्यकता होनेसे षष्ठीमें 'धार्तराष्ट्रणाम्' ऐसा प्रयोग किया गया है।

२- दुर्योधनके पक्षमें ग्यारह अश्वीहिणी सेनाका होना सम्भव ही नहीं था; परन्तु जब पाण्डव वनवासमें चले गये, तब दुर्योधनने धर्मराज युधिष्ठिरकी राज्य करनेकी नीतिको अपनाया। जैसे युधिष्ठिरजी अपना कर्तव्य समझकर प्रजाको सुख देनेके लिये धर्म और न्यायपूर्वक राज्य करते थे, ऐसे ही दुर्योधनने भी अपना राज्य स्थापित करनेके लिये, अपना प्रभाव जमानेके लिये प्रजाके साथ युधिष्ठिरके समान बर्ताव किया। तेह्र वर्षतक प्रजाके साथ अच्छा बर्ताव करनेसे युद्धके समय बहुत सेना जुट गयी, जो कि पहले पाण्डवोंके पक्षमें थी और पाण्डवोंको चाहती थी। इस प्रकार नौ अश्वीहिणी सेना तो प्रजाके साथ अच्छे बर्तावके प्रभावसे दुर्योधनके पक्षमें हो गयी और भगवान् श्रीकृष्णकी एक अश्वीहिणी नारायणी सेनाको तथा मद्रराज शल्यकी एक अश्वीहिणी सेनाको दुर्योधनने चालाकीसे अपने पक्षमें कर लिया, जो कि पाण्डवोंके पक्षमें थी। अतः दुर्योधनके पक्षमें ग्यारह अश्वीहिणी सेना और पाण्डवोंके पक्षमें सात अश्वीहिणी सेना थी।

३- सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती के बेपा॥

जाके डर सुर असुर डेराहीं। निमि न नींद दिन अन न खाहीं॥

श्लोक २०-२१ ]

  • साधक-संजीवनी *

४३

सम्बन्ध—धृतराष्ट्रने पहले श्लोकमें अपने और पाण्डुके पुत्रोंके विषयमें प्रश्न किया था। उसका उत्तर संजयने दूसरे श्लोकसे उन्नीसवें श्लोकतक दे दिया। अब संजय भगवद्गीताके प्राकट्यका प्रसंग आगेके श्लोकसे आरम्भ करते हैं।

अथ व्यवस्थितानृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।

प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥ २० ॥

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।

महीपते= हे महीपते धृतराष्ट्र !करनेवालेधनुः= (अपना) गाण्डीव
अथ= अबराजाओं और उनकेधनुष
शस्त्रसम्पाते= शस्त्र चलनेकीसाथियोंकोउद्यम्य= उठा लिया (और)
प्रवृत्ते= तैयारी हो ही रहीव्यवस्थितान् = व्यवस्थितरूपसेहृषीकेशम्= अन्तर्धामी भगवान्
थी किसामने खड़े हुएश्रीकृष्णसे
तदा= उस समयदृष्ट्वा = देखकरइदम्= यह
धार्तराष्ट्रान्= अन्यायपूर्वककपिध्वजः = कपिध्वजवाक्यम्= वचन
राज्यको धारणपाण्डवः = पाण्डुपुत्र अर्जुननेआह= बोले।

व्याख्या—‘अथ’ —इस पदका तात्पर्य है कि अब संजय भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादरूप ‘भगवद्गीता’ का आरम्भ करते हैं। अठारहवें अध्यायके चौहत्तरवें श्लोकमें आये ‘इति’ पदसे यह संवाद समाप्त होता है। ऐसे ही भगवद्गीताके उपदेशका आरम्भ उसके दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकसे होता है और अठारहवें अध्यायके छाछठवें श्लोकमें यह उपदेश समाप्त होता है।

‘प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते’ —यद्यपि पितामह भीष्मने युद्धारम्भकी घोषणाके लिये शंख नहीं बजाया था, प्रत्युत केवल दुर्योधनको प्रसन्न करनेके लिये ही शंख बजाया था, तथापि कौरव और पाण्डव-सेनाने उसको युद्धारम्भकी घोषणा ही मान लिया और अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र हाथमें उठाकर तैयार हो गये। इस तरह सेनाको शस्त्र उठाये देखकर वीरतामें भरकर अर्जुनने भी अपना गाण्डीव धनुष हाथमें उठा लिया।

‘व्यवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् दृष्ट्वा’ —इन पदोंसे संजयका तात्पर्य है कि जब आपके पुत्र दुर्योधनने पाण्डवोंकी सेनाको देखा, तब वह भागा-भाग द्रोणाचार्यके पास गया। परन्तु जब अर्जुनने कौरवोंकी सेनाको देखा, तब उनका हाथ सीधे गाण्डीव धनुषपर ही गया—‘धनुरुद्यम्य ’। इससे

मालूम होता है कि दुर्योधनके भीतर भय है और अर्जुनके भीतर निर्भयता है, उत्साह है, वीरता है।

‘कपिध्वजः’ —अर्जुनके लिये ‘कपिध्वज’ विशेषण देकर संजय धृतराष्ट्रको अर्जुनके रथकी ध्वजापर विराजमान हनुमान्जीका स्मरण कराते हैं। जब पाण्डव वनमें रहते थे, तब एक दिन अकस्मात् वायुने एक दिव्य सहस्रदल कमल लाकर द्रौपदीके सामने डाल दिया। उसे देखकर द्रौपदी बहुत प्रसन्न हो गयी और उसने भीमसेनसे कहा कि ‘वीरवर! आप ऐसे बहुत-से कमल ला दीजिये।’ द्रौपदीकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये भीमसेन वहाँसे चल पड़े। जब वे कदलीवनमें पहुँचे, तब वहाँ उनकी हनुमान्जीसे भेंट हो गयी। उन दोनोंकी आपसमें कई बातें हुईं। अन्तमें हनुमान्जीने भीमसेनसे वरदान माँगनेके लिये आग्रह किया तो भीमसेनने कहा कि ‘मेरेपर आपकी कृपा बनी रहे’। इसपर हनुमान्जीने कहा कि ‘हे वायुपुत्र! जिस समय तुम बाण और शक्तिके आधातसे व्याकुल शत्रुओंकी सेनामें घुसकर सिंहनाद करोगे, उस समय मैं अपनी गर्जनासे उस सिंहनादको और बढ़ा दूँगा। इसके सिवाय अर्जुनके रथकी ध्वजापर बैठकर मैं ऐसी भयंकर गर्जना किया करूँगा, जो शत्रुओंके प्राणोंको हरनेवाली होगी,

सो दससीस स्वान की नाई। इत उत चितइ चला भडिहई॥

इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा॥

(मानस ३। २८। ४-५)

४४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

जिससे तुम लोग अपने शत्रुओंको सुगमतासे मार सकोगे।*’ इस प्रकार जिनके रथकी ध्वजापर हनुमान्जी विराजमान हैं, उनकी विजय निश्चित है।

‘पाण्डवः’—धृतराष्ट्रने अपने प्रश्नमें ‘पाण्डवाः’ पदका प्रयोग किया था। अतः धृतराष्ट्रको बार-बार पाण्डवोंकी याद दिलानेके लिये संजय (१।१४ में और यहाँ) ‘पाण्डवः’ शब्दका प्रयोग करते हैं।

‘हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते’—पाण्डव-सेनाको देखकर दुर्योधन तो गुरु द्रोणाचार्यके पास जाकर चालाकीसे भरे हुए वचन बोलता है; परन्तु अर्जुन कौरव-सेनाको देखकर जो जगदगुरु हैं, अन्तर्धामी हैं, मन-बुद्धि आदिके प्रेरक हैं—ऐसे भगवान् श्रीकृष्णसे शूरवीरता, उत्साह और अपने कर्तव्यसे भरे हुए (आगे कहे जानेवाले) वचन बोलते हैं।

अर्जुन उवाच

सेनयोरुभयोर्यमध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥ २१ ॥ यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्। कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ॥ २२ ॥

अर्जुन बोले—

अच्युत= हे अच्युत !स्थापय= खड़ा कीजिये,निरीक्षे= देख न लूँ कि
उभयोः= दोनोंयावत्= जबतकअस्मिन्= इस
सेनयोः= सेनाओंकेअहम्= मैं (युद्धक्षेत्रमें)रणसमुद्यमे= युद्धरूप उद्योगमें
मध्ये= मध्यमेंअवस्थितान्= खड़े हुएमया= मुझे
मे= मेरेएतान्= इनकैः= किन-किनके
रथम्= रथको (आप
तबतक)योद्धुकामान्= युद्धकी
इच्छावालोंकोसह= साथ
योद्धव्यम्= युद्ध करना योग्य है।

व्याख्या—‘अच्युत सेनयोरुभयोर्यमध्ये रथं स्थापय’—दोनों सेनाएँ जहाँ युद्ध करनेके लिये एक-दूसरेके सामने खड़ी थीं, वहाँ उन दोनों सेनाओंमें इतनी दूरी थी कि एक सेना दूसरी सेनापर बाण आदि मार सके। उन दोनों सेनाओं-का मध्यभाग दो तरफसे मध्य था—(१) सेनाएँ जितनी चौड़ी खड़ी थीं, उस चौड़ाईका मध्यभाग और (२) दोनों सेनाओंका मध्यभाग, जहाँसे कौरव-सेना जितनी दूरीपर खड़ी थी, उतनी ही दूरीपर पाण्डव-सेना खड़ी थी। ऐसे मध्यभागमें रथ खड़ा करनेके लिये अर्जुन भगवान्से कहते हैं, जिससे दोनों सेनाओंको आसानीसे देखा जा सके।

‘सेनयोरुभयोर्यमध्ये’ पद गीतामें तीन बार आया है—यहाँ (१।२१ में), इसी अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें और दूसरे अध्यायके दसवें श्लोकमें। तीन बार आनेका तात्पर्य है कि पहले अर्जुन शूरवीरताके साथ अपने रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा करनेकी आज्ञा देते हैं (पहले अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक), फिर भगवान् दोनों सेनाओंके

बीचमें रथको खड़ा करके कुरुवंशियोंको देखनेके लिये कहते हैं (पहले अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक) और अन्तमें दोनों सेनाओंके बीचमें ही विषादमग्न अर्जुनको गीताका उपदेश देते हैं (दूसरे अध्यायका दसवाँ श्लोक)। इस प्रकार पहले अर्जुनमें शूरवीरता थी, बीचमें कुटुम्बियोंको देखनेसे मोहके कारण उनको युद्धसे उपरति हो गयी और अन्तमें उनको भगवान्से गीताका महान् उपदेश प्राप्त हुआ, जिससे उनका मोह दूर हो गया। इससे यह भाव निकलता है कि मनुष्य जहाँ-कहीं और जिस-किसी परिस्थितिमें स्थित है, वहाँ रहकर वह प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करके निष्काम हो सकता है और वहाँ उसको परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है। कारण कि परमात्मा सम्पूर्ण परिस्थितियोंमें सदा एकरूपसे रहते हैं।

‘यावदेतान्निरीक्षेऽहं’……‘रणसमुद्यमे’—दोनों सेनाओंके बीचमें रथ कबतक खड़ा करें ? इसपर अर्जुन कहते हैं कि युद्धकी इच्छाको लेकर कौरव-सेनामें आये हुए सेनासहित जितने भी राजालोग खड़े हैं, उन सबको जबतक

  • तदाहं बृहद्यध्यामि स्वरवेण रवं तव। विजयस्य ध्वजस्थश्च नदान् मोक्ष्यामि दारुणान् ॥

शत्रूणां ये प्राणहराः सुखं येन हनिष्यथ। (महाभारत, वन० १५१।१७-१८)

श्लोक २३—२५]

  • साधक-संजीवनी *

४५

में देख न लूँ, तबतक आप रथको वहीं खड़ा रखिये। इस युद्धके उद्योगमें मुझे किन-किनके साथ युद्ध करना है? उनमें कौन मेरे समान बलवाले हैं? कौन मेरेसे कम बलवाले हैं? और कौन मेरेसे अधिक बलवाले हैं? उन सबको मैं जरा देख लूँ।

यहाँ 'योद्धुकामान्' पदसे अर्जुन कह रहे हैं कि हमने तो सन्धिकी बात ही सोची थी, पर उन्होंने सन्धिकी बात स्वीकार नहीं की; क्योंकि उनके मनमें युद्ध करनेकी ज्यादा इच्छा है। अतः उनको मैं देखूँ कि कितने बलको लेकर वे युद्ध करनेकी इच्छा रखते हैं।

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।

धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३ ॥

दुर्बुद्धेः= दुष्टबुद्धिये= जोउतावले
धार्तराष्ट्रस्य= दुर्योधनकाएते= ये राजालोगहुए (इन)
युद्धे= युद्धमेंअत्र= इस सेनामेंसबको)
प्रियचिकीर्षवः= प्रिय करनेकीसमागताः= आये हुए हैं,अहम्
इच्छावालेयोत्स्यमानान्= युद्ध करनेकोअवेक्षे

व्याख्या —'धार्तराष्ट्रस्य * दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः'—यहाँ दुर्योधनको दुष्टबुद्धि कहकर अर्जुन यह बताना चाहते हैं कि इस दुर्योधनने हमारा नाश करनेके लिये आजतक कई तरहके षड्यन्त्र रचे हैं। हमें अपमानित करनेके लिये कई तरहके उद्योग किये हैं। नियमके अनुसार और न्यायपूर्वक हम आधे राज्यके अधिकारी हैं, पर उसको भी यह हड़पना चाहता है, देना नहीं चाहता। ऐसी तो इसकी दुष्टबुद्धि है; और यहाँ आये हुए राजालोग युद्धमें इसका प्रिय करना चाहते हैं! वास्तवमें तो मित्रोंका यह कर्तव्य होता है कि वे ऐसा काम करें, ऐसी बात बतायें, जिससे अपने मित्रका लोक-परलोकमें हित हो। परन्तु ये राजालोग दुर्योधनकी दुष्टबुद्धिको शुद्ध न करके उलटे उसको बढ़ाना चाहते हैं और दुर्योधनसे युद्ध कराकर, युद्धमें उसकी सहायता करके उसका पतन ही करना चाहते हैं।

तात्पर्य है कि दुर्योधनका हित किस बातमें है; उसको राज्य भी किस बातसे मिलेगा और उसका परलोक भी किस बातसे सुधरेगा—इन बातोंका वे विचार ही नहीं कर रहे हैं। अगर ये राजालोग उसको यह सलाह देते कि भाई, कम-से-कम आधा राज्य तुम रखो और पाण्डवोंका आधा राज्य पाण्डवोंको दे दो तो इससे दुर्योधनका आधा राज्य भी रहता और उसका परलोक भी सुधरता।

'योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः'—इन युद्धके लिये उतावले होनेवालोंको जरा देख तो लूँ! इन्होंने अधर्मका, अन्यायका पक्ष लिया है, इसलिये ये हमारे सामने टिक नहीं सकेंगे, नष्ट हो जायेंगे।

'योत्स्यमानान्' कहनेका तात्पर्य है कि इनके मनमें युद्धकी ज्यादा आ रही है; अतः देखूँ तो सही कि ये हैं कौन ?

सम्बन्ध —अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान्ने क्या किया—इसको संजय आगेके दो श्लोकोंमें कहते हैं।

सज्जय उवाच

एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।

सेनयोरुभयोर्यमध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।

उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरुन्निति ॥ २५ ॥

  • 'धार्तराष्ट्र' पदके दो अर्थ होते हैं—(१) धृतराष्ट्रके पुत्र अथवा सम्बन्धी (२) अन्यायपूर्वक राष्ट्र-(राज्य-) को धारण करनेवाले। यहाँ धृतराष्ट्रके पुत्र—दुर्योधनके लिये ही 'धार्तराष्ट्रस्य' पद आया है।

४६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

संजय बोले—

भारत | = हे भरतवंशी राजन्! | सेनयोः | = सेनाओंके | रथोत्तमम् | = श्रेष्ठ रथको ---|---|---|---|---|--- गुडाकेशन | = निद्राविजयी अर्जुनके द्वारा | मध्ये | = मध्यभागमें | स्थापयित्वा | = खड़ा करके एवम् | = इस तरह | भीष्मद्रोणप्रमुखतः | = पितामह भीष्म और आचार्य द्रोणके | इति | = इस प्रकार उक्तः | = कहनेपर | च | = तथा | उवाच | = कहा कि हृषीकेशः | = अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णने | सर्वेषाम् | = सम्पूर्ण | पार्थ | = 'हे पार्थ! उभयोः | = दोनों | महीक्षिताम् | = राजाओंके सामने | एतान् | = इन | | | | समवेतान् | = इकट्ठे हुए | | | | कुरुन् | = कुरुवंशियोंको | | | | पश्य | = देख'।

व्याख्या—'गुडाकेशन'—'गुडाकेश' शब्दके दो अर्थ होते हैं—(१) 'गुडा' नाम मुड़े हुआ है और 'केश' नाम बालोंका है। जिसके सिरके बाल मुड़े हुए अर्थात् घुँघराले हैं, उसका नाम 'गुडाकेश' है। (२) 'गुडाका' नाम निद्राका है और 'ईश' नाम स्वामीका है। जो निद्राका स्वामी है अर्थात् निद्रा ले चाहे न ले—ऐसा जिसका निद्रापर अधिकार है, उसका नाम 'गुडाकेश' है। अर्जुनके केश घुँघराले थे और उनका निद्रापर आधिपत्य था; अतः उनको 'गुडाकेश' कहा गया है।

'एवमुक्तः'—जो निद्रा-आलस्यके सुखका गुलाम नहीं होता और जो विषय-भोगोंका दास नहीं होता, केवल भगवान्का ही दास (भक्त) होता है, उस भक्तकी बात भगवान् सुनते हैं; केवल सुनते ही नहीं, उसकी आज्ञाका पालन भी करते हैं। इसलिये अपने सखा भक्त अर्जुनके द्वारा आज्ञा देनेपर अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णने दोनों सेनाओंके बीचमें अर्जुनका रथ खड़ा कर दिया।

'हृषीकेशः'—इन्द्रियोंका नाम 'हृषीक' है। जो इन्द्रियोंके ईश अर्थात् स्वामी हैं, उनको हृषीकेश कहते हैं। पहले इक्कीसवें श्लोकमें और यहाँ 'हृषीकेश' कहनेका तात्पर्य है कि जो मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि सबके प्रेरक हैं, सबको आज्ञा देनेवाले हैं, वे ही अन्तर्यामी भगवान् यहाँ अर्जुनकी आज्ञाका पालन करनेवाले बन गये हैं! यह उनकी अर्जुनपर कितनी अधिक कृपा है!

'सेनयोरुभयोरमध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्'—दोनों सेनाओंके बीचमें जहाँ खाली जगह थी, वहाँ भगवान्ने अर्जुनके श्रेष्ठ रथको खड़ा कर दिया।

'भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्'—उस रथको भी भगवान्ने विलक्षण चतुराईसे ऐसी जगह खड़ा किया, जहाँसे अर्जुनको कौटुम्बिक सम्बन्धवाले पितामह भीष्म, विद्याके सम्बन्धवाले आचार्य द्रोण एवं कौरव-

सेनाके मुख्य-मुख्य राजालोग सामने दिखायी दे सकें।

'उवाच पार्थ पश्येतान्समवेतान्कुरुनिति'—'कुरु' पदमें धृतराष्ट्रके पुत्र और पाण्डुके पुत्र—ये दोनों आ जाते हैं; क्योंकि ये दोनों ही कुरुवंशी हैं। युद्धके लिये एकत्र हुए इन कुरुवंशियोंको देख—ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि इन कुरुवंशियोंको देखकर अर्जुनके भीतर यह भाव पैदा हो जाय कि हम सब एक ही तो हैं! इस पक्षके हों, चाहे उस पक्षके हों; भले हों, चाहे बुरे हों; सदाचारी हों, चाहे दुराचारी हों; पर हैं सब अपने ही कुटुम्बी। इस कारण अर्जुनमें छिपा हुआ कौटुम्बिक ममतायुक्त मोह जाग्रत् हो जाय और मोह जाग्रत् होनेसे अर्जुन जिज्ञासु बन जाय, जिससे अर्जुनको निमित्त बनाकर भावी कलियुगी जीवोंके कल्याणके लिये गीताका महान् उपदेश दिया जा सके—इसी भावसे भगवान्ने यहाँ 'पश्येतान् समवेतान् कुरुन्' कहा है। नहीं तो भगवान् 'पश्येतान् धार्तराष्ट्रान् समानिति'—ऐसा भी कह सकते थे; परन्तु ऐसा कहनेसे अर्जुनके भीतर युद्ध करनेका जोश आता; जिससे गीताके प्राकट्यका अवसर ही नहीं आता! और अर्जुनके भीतरका प्रसुप्त कौटुम्बिक मोह भी दूर नहीं होता, जिसको दूर करना भगवान् अपनी जिम्मेवारी मानते हैं। जैसे कोई फोड़ा हो जाता है तो वैद्यलोग पहले उसको पकानेकी चेष्टा करते हैं और जब वह पक जाता है, तब उसको चौरा देकर साफ कर देते हैं; ऐसे ही भगवान् भक्तके भीतर छिपे हुए मोहको पहले जाग्रत् करके फिर उसको मिटाते हैं। यहाँ भी भगवान् अर्जुनके भीतर छिपे हुए मोहको 'कुरुन् पश्य' कहकर जाग्रत् कर रहे हैं, जिसको आगे उपदेश देकर नष्ट कर देंगे।

अर्जुनने कहा था कि 'इनको मैं देख तूँ'—'निरिक्षे' (१।२२) 'अवेक्षे' (१।२३); अतः यहाँ भगवान्को 'पश्य' (तू देख ले)—ऐसा कहनेकी जरूरत ही नहीं थी। भगवान्को तो केवल रथ खड़ा कर देना चाहिये था। परन्तु

श्लोक २६—२८ ]

  • साधक-संजीवनी *

४७

भगवान्ने रथ खड़ा करके अर्जुनके मोहको जाग्रत करनेके लिये ही 'कुरुन्तु पश्य' (इन कुरुवंशियोंको देख) —ऐसा कहा है।

कौटुम्बिक स्नेह और भगवत्प्रेम —इन दोनोंमें बहुत अन्तर है। कुटुम्बमें ममतायुक्त स्नेह हो जाता है तो कुटुम्बके अवगुणोंकी तरफ खयाल जाता ही नहीं; किन्तु 'ये मेरे हैं' —ऐसा भाव रहता है। ऐसे ही भगवान्का भक्तमें विशेष स्नेह हो जाता है तो भक्तके अवगुणोंकी तरफ भगवान्का खयाल जाता ही नहीं; किन्तु 'यह मेरा ही है' —

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कुरुवंशियोंको देखनेके लिये कहा। उसके बाद क्या हुआ—इसका वर्णन संजय आगेके श्लोकोंमें करते हैं।

तत्रापश्यत्तिस्थतान्यार्थः पितृनथ पितामहान् । आचार्यान्मातुलान्भ्रातृमुत्रान्यौत्रान्सर्खीस्तथा ॥ २६ ॥

श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।

अथ= उसके बादपितृन्= पिताओंको,तथा= तथा
पार्थः= पृथानन्दन अर्जुननेपितामहान्= पितामहोंको,सर्खीन्= मित्रोंको,
तत्र= उनआचार्यान्= आचार्योंको,श्वशुरान्= ससुरोंको
उभयोः= दोनोंमातुलान्= मामाओंको,= और
एव= हीभ्रातृन्= भाइयोंको,सुहृदः= सुहृदोंको
सेनयोः= सेनाओंमेंपुत्रान्= पुत्रोंको,अपि= भी
स्थितान्= स्थितपौत्रान्= पौत्रोंकोअपश्यत्= देखा।

व्याख्या—'तत्रापश्यत्.....सेनयोरुभयोरपि'—जब भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि इस रणभूमिमें इकट्ठे हुए कुरुवंशियोंको देख, तब अर्जुनकी दृष्टि दोनों सेनाओंमें स्थित अपने कुटुम्बियोंपर गयी। उन्होंने देखा कि उन सेनाओंमें युद्धके लिये अपने-अपने स्थानपर भूरिश्रवा आदि पिताके भाई खड़े हैं, जो कि मेरे लिये पिताके समान हैं। भीष्म, सोमदत्त आदि पितामह खड़े हैं। द्रोण, कृप आदि आचार्य (विद्या पढ़ानेवाले और कुलगुरु) खड़े हैं।

पुरुर्जित् कुन्तिभोज, शल्य, शकुनि आदि मामा खड़े हैं। भीम, दुर्योधन आदि भाई खड़े हैं। अभिमन्यु, घटोत्कच, लक्ष्मण (दुर्योधनका पुत्र) आदि मेरे और मेरे भाइयोंके पुत्र खड़े हैं। लक्ष्मण आदिके पुत्र खड़े हैं, जो कि मेरे पौत्र हैं। दुर्योधनके अश्वत्थामा आदि मित्र खड़े हैं और ऐसे ही अपने पक्षके मित्र भी खड़े हैं। द्रुपद, शैब्य आदि ससुर खड़े हैं। बिना किसी हेतुके अपने-अपने पक्षका हित चाहनेवाले सात्यकि, कृतवर्मा आदि सुहृद् भी खड़े हैं।

सम्बन्ध—अपने सब कुटुम्बियोंको देखनेके बाद अर्जुनने क्या किया—इसको आगेके श्लोकमें कहते हैं।

तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥ २७ ॥

कृपया पर्याविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।

अवस्थितान्= अपनी-अपनीसमीक्ष्य= देखकरकृपया= कायरतासे
जगहपर स्थितसः= वेआविष्टः= युक्त होकर
तान्= उनकौन्तेयः= कुलीनन्दनविषीदन्= विषाद करते हुए
सर्वान्= सम्पूर्णअर्जुनइदम्= ऐसा
बन्धून= बान्धवोंकोपरया= अत्यन्तअब्रवीत्= बोले।

४८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

व्याख्या—‘तान् सर्वान्बन्धूनवस्थितान् समीक्ष्य’— पूर्वश्लोकके अनुसार अर्जुन जिनको देख चुके हैं, उनके अतिरिक्त अर्जुने बाह्यीक आदि प्रपितामह; धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, सुरथ आदि साले; जयद्रथ आदि बहनहीं तथा अन्य कई सम्बन्धियोंको दोनों सेनाओंमें स्थित देखा।

‘स कौन्तेयः कृपया परयाविष्टः’— इन पदोंमें ‘स कौन्तेयः ’ कहनेका तात्पर्य है कि माता कुन्तीने जिनको युद्ध करनेके लिये सन्देश भेजा था और जिन्होंने शूरवीरतामें आकर ‘मेरे साथ दो हाथ करनेवाले कौन हैं?’—ऐसे मुख्य-मुख्य योद्धाओंको देखनेके लिये भगवान् श्रीकृष्णको दोनों सेनाओंके बीचमें रथ खड़ा करनेकी आज्ञा दी थी, वे ही कुन्तीनन्दन अर्जुन अत्यन्त कायरतासे युक्त हो जाते हैं!

दोनों ही सेनाओंमें जन्मके और विद्याके सम्बन्धी—ही-सम्बन्धी देखनेसे अर्जुनेके मनमें यह विचार आया कि युद्धमें चाहे इस पक्षके लोग मरें, चाहे उस पक्षके लोग मरें, नुकसान हमारा ही होगा, कुल तो हमारा ही नष्ट होगा, सम्बन्धी तो हमारे ही मारे जायेंगे! ऐसा विचार आनेसे अर्जुनकी युद्धकी इच्छा तो मिट गयी और भीतरमें कायरता आ गयी। इस कायरताको भगवान्ने आगे (१।२-३ में) ‘कश्मलम् ’ तथा ‘हृदयदौर्बल्यम् ’ कहा है, और अर्जुनेने (१।७ में) ‘कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः ’ कहकर इसको स्वीकार भी किया है।

अर्जुन कायरतासे आविष्ट हुए हैं—‘कृपयाविष्टः ’। इससे सिद्ध होता है कि यह कायरता पहले नहीं थी, प्रत्युत अभी आयी है। अतः यह आगन्तुक दोष है। आगन्तुक होनेसे यह ठहरेगी नहीं। परन्तु शूरवीरता अर्जुनमें स्वाभाविक है; अतः वह तो रहेगी ही।

अत्यन्त कायरता क्या है? बिना किसी कारण निन्दा, तिरस्कार, अपमान करनेवाले, दुःख देनेवाले, वैरभाव रखनेवाले, नाश करनेकी चेष्टा करनेवाले दुर्गंधन, दुःशासन, शकुनि आदिको अपने सामने युद्ध करनेके लिये खड़े देखकर भी उनको मारनेका विचार न होना, उनका नाश करनेका उद्योग न करना—यह अत्यन्त कायरतारूप दोष है। यहाँ अर्जुनको कायरतारूप दोषने ऐसा घेर लिया है कि जो अर्जुन आदिका अनिष्ट चाहनेवाले और समय-समयपर अनिष्ट करनेका उद्योग करनेवाले हैं, उन अधर्मियों— पापियोंपर भी अर्जुनको करुणा आ रही है (गीता—पहले अध्यायका पैंतीसवाँ और छियालीसवाँ श्लोक) और वे क्षत्रियके कर्तव्यरूप अपने धर्मसे च्युत हो रहे हैं।

‘विषीदन्तिदमब्रवीत्’— युद्धके परिणाममें कुटुम्बकी, कुलकी, देशकी क्या दशा होगी—इसको लेकर अर्जुन बहुत दुःखी हो रहे हैं और उस अवस्थामें वे ये वचन बोलते हैं, जिसका वर्णन आगेके श्लोकोंमें किया गया है।

अर्जुन उवाच

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ २८ ॥ सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥ २९ ॥ गाण्डीवं संसते हस्तात्त्वकचैव परिदहाते। न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ ३० ॥

अर्जुन बोले—

कृष्ण= हे कृष्ण!मम= मेरेमे= मेरे
युयुत्सुम्= युद्धकी इच्छावालेगात्राणि= अंगशरीरे= शरीरमें
इमम्= इससीदन्ति= शिथिल हो रहे हैंवेपथुः= कँपकँपी (आ रही है)
स्वजनम्= कुटुम्ब-समुदायको= और= एवं
समुपस्थितम्= अपने सामने उपस्थितमुखम्= मुखरोमहर्षः= रोंगटे खड़े
दृष्ट्वा= देखकरपरिशुष्यति= सूख रहा हैजायते= हो रहे हैं।
= तथा

श्लोक ३१ ]

  • साधक-संजीवनी *

४९

हस्तात्= हाथसेएव= भीरहा है
गाण्डीवम्= गाण्डीव धनुषपरिदह्यते= जल रही है।
संसते= गिर रहा हैमे= मेराअवस्थातुम्
= औरमनः= मन
त्वक्= त्वचाभ्रमति, इव= भ्रमित-सा होन, शक्नोमि

व्याख्या—‘दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्’— अर्जुनको ‘कृष्ण’ नाम बहुत प्रिय था। यह सम्बोधन गीतामें नौ बार आया है। भगवान् श्रीकृष्णके लिये दूसरा कोई सम्बोधन इतनी बार नहीं आया है। ऐसे ही भगवान्को अर्जुनका ‘पार्थ ’ नाम बहुत प्यारा था। इसलिये भगवान् और अर्जुन आपसकी बोलचालमें ये नाम लिया करते थे और यह बात लोगोंमें भी प्रसिद्ध थी। इसी दृष्टिसे संजयने गीताके अन्तमें ‘कृष्ण ’ और ‘पार्थ ’ नामका उल्लेख किया है—‘यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ’ (१८।७८)। धृतराष्ट्रने पहले ‘समवेता युयुत्सवः ’ कहा था और यहाँ अर्जुनने भी ‘युयुत्सुं समुपस्थितम् ’ कहा है; परन्तु दोनोंकी दृष्टियोंमें बड़ा अन्तर है। धृतराष्ट्रकी दृष्टिमें तो दुर्योधन आदि मेरे पुत्र हैं और युधिष्ठिर आदि पाण्डुके पुत्र हैं—ऐसा भेद है; अतः धृतराष्ट्रने वहाँ ‘मामकाः ’ और ‘पाण्डवाः ’ कहा है। परन्तु अर्जुनकी दृष्टिमें यह भेद नहीं है; अतः अर्जुनने यहाँ ‘स्वजनम् ’ कहा है, जिसमें दोनों पक्षके लोग आ जाते हैं। तात्पर्य है कि धृतराष्ट्रको तो युद्धमें अपने पुत्रोंके मरनेकी आशंकासे भय है, शोक है; परन्तु अर्जुनको दोनों ओरके कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे शोक हो रहा है कि किसी भी तरफका कोई भी मेरे, पर वह है तो हमारा ही कुटुम्बी।

अबतक ‘दृष्ट्वा ’ पद तीन बार आया है—‘दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकम् ’ (१।२), ‘व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् ’ (१।२०) और यहाँ ‘दृष्ट्वेमं स्वजनम्

(१।२८)। इन तीनोंका तात्पर्य है कि दुर्योधनका देखना तो एक तरहका ही रहा अर्थात् दुर्योधनका तो युद्धका ही एक भाव रहा; परन्तु अर्जुनका देखना दो तरहका हुआ। पहले तो अर्जुन धृतराष्ट्रके पुत्रोंको देखकर वीरतामें आकर युद्धके लिये धनुष उठाकर खड़े हो जाते हैं और अब स्वजनोंको देखकर कायरतासे आविष्ट हो रहे हैं, युद्धसे उपरत हो रहे हैं और उनके हाथसे धनुष गिर रहा है।

‘सीदन्ति मम गात्राणि’—‘भ्रमतीव च मे मनः’— अर्जुनके मनमें युद्धके भावी परिणामको लेकर चिन्ता हो रही है, दुःख हो रहा है। उस चिन्ता, दुःखका असर अर्जुनके सारे शरीरपर पड़ रहा है। उसी असरको अर्जुन स्पष्ट शब्दोंमें कह रहे हैं कि मेरे शरीरका हाथ, पैर, मुख आदि एक-एक अंग (अवयव) शिथिल हो रहा है! मुख सूखता जा रहा है, जिससे बोलना भी कठिन हो रहा है! सारा शरीर थर-थर काँप रहा है! शरीरके सभी रोंगटे खड़े हो रहे हैं अर्थात् सारा शरीर रोमांचित हो रहा है! जिस गाण्डीव धनुषकी प्रत्यंचाकी टंकरसे शत्रु भयभीत हो जाते हैं, वही गाण्डीव धनुष आज मेरे हाथसे गिर रहा है! त्वचामें—सारे शरीरमें जलन हो रही है*। मेरा मन भ्रमित हो रहा है अर्थात् मेरेको क्या करना चाहिये—यह भी नहीं सूझ रहा है! यहाँ युद्धभूमिमें रथपर खड़े रहनेमें भी मैं असमर्थ हो रहा हूँ। ऐसा लगता है कि मैं मूर्च्छित होकर गिर पड़ूँगा! ऐसे अनर्थकारक युद्धमें खड़ा रहना भी एक पाप मालूम दे रहा है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अपने शरीरके शोकजनित आठ चिन्होंका वर्णन करके अब अर्जुन भावी परिणामके सूचक शक्तोंकी दृष्टिसे युद्ध करनेका अनौचित्य बताते हैं।

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ ३१ ॥

  • चिन्ता चिन्तासमा ह्युक्ता बिन्दुमात्रं विशेषतः। सजीवं दहते चिन्ता निर्जीवं दहते चिन्ता। ‘चिन्ताको चिन्ताके समान कहा गया है, केवल एक बिन्दुकी ही अधिकता है। चिन्ता जीवित पुरुषको जलाती है और चिन्ता मेरे हुए पुरुषको जलाती है।’

५०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

केशव | = हे केशव ! (मैं) | विपरीतानि | = विपरीत | हत्वा | = मारकर ---|---|---|---|---|--- निमित्तानि | = लक्षणों (शकुनों)-को | पश्यामि | = देख रहा हूँ (और) | श्रेयः | = श्रेय (लाभ) च | = भी | आहवे | = युद्धमें | च | = भी | | स्वजन्म | = स्वजनोंको | न | = नहीं | | | | अनुपश्यामि | = देख रहा हूँ।

व्याख्या —‘निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव’—हे केशव! मैं शकुनोंको१ भी विपरीत ही देख रहा हूँ। तात्पर्य है कि किसी भी कार्यके आरम्भमें मनमें जितना अधिक उत्साह (हर्ष) होता है, वह उत्साह उस कार्यको उतना ही सिद्ध करनेवाला होता है। परन्तु अगर कार्यके आरम्भमें ही उत्साह भंग हो जाता है, मनमें संकल्प-विकल्प ठीक नहीं होते, तो उस कार्यका परिणाम अच्छा नहीं होता। इसी भावसे अर्जुन कह रहे हैं कि अभी मेरे शरीरमें अवयवोंका शिथिल होना, कम्प होना, मुखका सूखना आदि जो लक्षण हो रहे हैं, ये व्यक्तिगत शकुन भी ठीक नहीं हो रहे हैं। इसके सिवाय आकाशसे उल्कापात होना, असमयमें ग्रहण लगना, भूकम्प होना, पशु-पक्षियोंका भयंकर बोली बोलना, चन्द्रमाके काले चिह्नका मिट-सा जाना, बादलोंसे रक्तकी वर्षा होना आदि जो पहले शकुन हुए हैं, वे भी ठीक नहीं हुए हैं। इस तरह अभीके और

पहलेके—इन दोनों शकुनोंकी ओर देखाता हूँ, तो मेरेको ये दोनों ही शकुन विपरीत अर्थात् भावी अनिष्टके सूचक दीखते हैं।

‘न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजन्माहवे’—युद्धमें अपने कुटुम्बियोंको मारनेसे हमें कोई लाभ होगा—ऐसी बात भी नहीं है। इस युद्धके परिणाममें हमारे लिये लोक और परलोक—दोनों ही हितकारक नहीं दीखते। कारण कि जो अपने कुलका नाश करता है, वह अत्यन्त पापी होता है। अतः कुलका नाश करनेसे हमें पाप ही लगेगा, जिससे नरकोंकी प्राप्ति होगी।

इस श्लोकमें ‘निमित्तानि पश्यामि’ और ‘श्रेयः अनुपश्यामि’१३—इन दोनों वाक्योंसे अर्जुन यह कहना चाहते हैं कि मैं शकुनोंको देखूँ अथवा स्वयं विचार करूँ, दोनों ही रीतिसे युद्धका आरम्भ और उसका परिणाम हमारे लिये और संसारमात्रके लिये हितकारक नहीं दीखता।

सम्बन्ध —जिसमें न तो शुभ शकुन दीखते हैं और न श्रेय ही दीखता है, ऐसी अनिष्टकारक विजयको प्राप्त करनेकी अनिच्छा अर्जुन आगेके श्लोकमें प्रकट करते हैं।

न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च। किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ ३२ ॥

कृष्ण= हे कृष्ण ! (मैं)= और,किम्= क्या लाभ ?
= न (तो)सुखानि= (न) सुखोंको
(ही चाहता हूँ) ।भोगैः= भोगोंसे (क्या लाभ ?)
विजयम्= विजयगोविन्द= हे गोविन्द !वा= अथवा
काङ्क्षे= चाहता हूँ,नः= हमलोगोंकोजीवितेन= जीनेसे (भी)
= नराज्येन= राज्यसेकिम्= क्या लाभ ?
राज्यम्= राज्य (चाहता हूँ)

१-जितने भी शकुन होते हैं, वे किसी अच्छी या बुरी घटनाके होनेमें निमित्त नहीं होते अर्थात् वे किसी घटनाके निर्माता नहीं होते, प्रत्युत भावी घटनाकी सूचना देनेवाले होते हैं।

शकुन बतानेवाले प्राणी भी वास्तवमें शकुनोंको बताते नहीं हैं; किन्तु उनकी स्वाभाविक चेष्टासे शकुन सूचित होते हैं।

२-यद्यपि अर्जुन शरीरमें होनेवाले लक्षणोंको भी शकुन मान रहे हैं, तथापि वास्तवमें ये शकुन नहीं हैं। ये तो शोकके कारण इन्द्रियाँ, शरीर, मन, बुद्धिमें होनेवाले विकार हैं।

३-यहाँ ‘पश्यामि’ क्रिया भूत और वर्तमानके शकुनोंके विषयमें और ‘अनुपश्यामि’ क्रिया भविष्यके परिणामके विषयमें आयी है।

श्लोक ३३-३४ ]

  • साधक-संजीवनी *

५१

व्याख्या —‘न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च’—मान लें कि युद्धमें हमारी विजय हो जाय, तो विजय होनेसे पूरी पृथ्वीपर हमारा राज्य हो जायगा, अधिकार हो जायगा। पृथ्वीका राज्य मिलनेसे हमें अनेक प्रकारके सुख मिलेंगे। परन्तु इनमेंसे मैं कुछ भी नहीं चाहता अर्थात् मेरे मनमें विजय, राज्य एवं सुखोंकी कामना नहीं है।

‘किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा’ —जब हमारे मनमें किसी प्रकारकी (विजय, राज्य और सुखकी) कामना ही नहीं है, तो फिर कितना ही बड़ा राज्य क्यों न मिल जाय, पर उससे हमें क्या लाभ? कितने ही सुन्दर-सुन्दर भोग मिल जायें, पर उनसे हमें क्या लाभ?

सम्बन्ध—अर्जुन विजय आदि क्यों नहीं चाहते, इसका हेतु आगेके श्लोकमें बताते हैं।

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।

त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ ३३ ॥

येषाम् = जिनके अर्थे = लिये नः = हमारी राज्यम् = राज्य, भोगाः = भोग च = और

सुखानि = सुखकी काङ्क्षितम् = इच्छा है, ते = वे (ही) इमे = ये सब (अपने) प्राणान् = प्राणोंकी

च = और धनानि = धनकी आशाका त्यक्त्वा = त्याग करके युद्धे = युद्धमें अवस्थिताः = खड़े हैं।

व्याख्या —‘येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ’—हम राज्य, सुख, भोग आदि जो कुछ चाहते हैं, उनको अपने व्यक्तिगत सुखके लिये नहीं चाहते, प्रत्युत इन कुटुम्बियों, प्रेमियों, मित्रों आदिके लिये ही चाहते हैं। आचार्यों, पिताओं, पितामहों, पुत्रों आदिको सुख-आराम पहुँचे, इनकी सेवा हो जाय, ये प्रसन्न रहें—इसके लिये ही हम युद्ध करके राज्य लेना चाहते हैं, भोग-सामग्री इकट्ठी करना चाहते हैं।

‘त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च’ —पर वे ही ये सब-के-सब अपने प्राणोंकी और धनकी आशाको छोड़कर युद्ध करनेके लिये हमारे सामने इस रणभूमिमें खड़े हैं। इन्होंने ऐसा विचार कर लिया है कि

अथवा कुटुम्बियोंको मारकर हम राज्यके सुख भोगते हुए कितने ही वर्ष जीते रहें, पर उससे भी हमें क्या लाभ? तात्पर्य है कि ये विजय, राज्य और भोग तभी सुख दे सकते हैं, जब भीतरमें इनकी कामना हो, प्रियता हो, महत्त्व हो। परन्तु हमारे भीतर तो इनकी कामना ही नहीं है। अतः ये हमें क्या सुख दे सकते हैं? इन कुटुम्बियोंको मारकर हमारी जीनेकी भी इच्छा नहीं है; क्योंकि जब हमारे कुटुम्बी मर जायेंगे, तब ये राज्य और भोग किसके काम आयेंगे? राज्य, भोग आदि तो कुटुम्बके लिये होते हैं, पर जब ये ही मर जायेंगे, तब इनको कौन भोगेगा? भोगनेकी बात तो दूर रही, उलटे हमें और अधिक चिन्ता, शोक होंगे!

हमें न प्राणोंका मोह है और न धनकी तृष्णा है; हम मर बेशक जायें, पर युद्धसे नहीं हटेंगे। अगर ये सब मर ही जायेंगे, तो फिर हमें राज्य किसके लिये चाहिये? सुख किसके लिये चाहिये? धन किसके लिये चाहिये? अर्थात् इन सबकी इच्छा हम किसके लिये करें?

‘प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च’ का तात्पर्य है कि वे प्राणोंकी और धनकी आशाका त्याग करके खड़े हैं अर्थात् हम जीवित रहेंगे और हमें धन मिलेगा—इस इच्छाको छोड़कर वे खड़े हैं। अगर उनमें प्राणोंकी और धनकी इच्छा होती, तो वे मरनेके लिये युद्धमें क्यों खड़े होते? अतः यहाँ प्राण और धनका त्याग करनेका तात्पर्य उनकी आशाका त्याग करनेमें ही है।

सम्बन्ध—जिनके लिये हम राज्य, भोग और सुख चाहते हैं, वे लोग कौन हैं—इसका वर्णन अर्जुन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।

मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥ ३४ ॥

५२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

एतान् हन्तुमिच्छामि धन्तोऽपि मधुसूदन।

अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ ३५ ॥

आचार्याः१= आचार्य,तथा= तथा (अन्य जितने भी)मधुसूदन= हे मधुसूदन!(मुझे)
पितरः= पिता,सम्बन्धिनः= सम्बन्धी हैं, (मुझपर)त्रैलोक्य-राज्यस्य
पुत्राः= पुत्रहेतोः= मिलता हो
= औरधनः= प्रहार करनेपरअपि= तो भी (मैं इनको
तथा, एव= उसी प्रकारअपि= भी (मैं)मारना नहीं चाहता),
पितामहः= पितामह,एतान्= इनकोनु= फिर
मातुलाः= मामा,हन्तुम्= मारनामहीकृते= पृथ्वीके लिये तो
श्वशुराः= ससुर,= नहीं(मैं इनको मारूँ ही)
पौत्राः= पौत्र,इच्छामि= चाहता, (और)किम्= क्या ?
श्यालाः= साले

व्याख्या —[ भगवान् आगे सोलहवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें कहेंगे कि काम, क्रोध और लोभ—ये तीनों ही नरकके द्वार हैं। वास्तवमें एक कामके ही ये तीन रूप हैं। ये तीनों सांसारिक वस्तुओं, व्यक्तियों आदिको महत्व देनेसे पैदा होते हैं। काम अर्थात् कामनाकी दो तरहकी क्रियाएँ होती हैं—इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्ति। इनमेंसे इष्टकी प्राप्ति भी दो तरहकी होती है—संग्रह करना और सुख भोगना। संग्रहकी इच्छाका नाम ‘लोभ’ है और सुखभोगकी इच्छाका नाम ‘काम’ है। अनिष्टकी निवृत्तिमें बाधा पड़नेपर ‘क्रोध’ आता है अर्थात् भोगोंकी, संग्रहकी प्राप्तिमें बाधा देनेवालोंपर अथवा हमारा अनिष्ट करनेवालोंपर, हमारे शरीरका नाश करनेवालोंपर क्रोध आता है, जिससे अनिष्ट करनेवालोंका नाश करनेकी क्रिया होती है। इससे सिद्ध हुआ कि युद्धमें मनुष्यकी दो तरहसे ही प्रवृत्ति होती है—अनिष्टकी निवृत्तिके लिये अर्थात् अपने ‘क्रोध’ को सफल बनानेके लिये और इष्टकी प्राप्तिके लिये अर्थात् ‘लोभ’ की पूर्तिके लिये। परन्तु अर्जुन यहाँ इन दोनों ही बातोंका निषेध कर रहे हैं। ]

‘आचार्याः पितरः ..... किं नु महीकृते’ —अगर हमारे ये कुटुम्बीजन अपनी अनिष्ट-निवृत्तिके लिये क्रोधमें आकर मेरेपर प्रहार करके मेरा वध भी करना चाहें, तो भी मैं

अपनी अनिष्ट-निवृत्तिके लिये क्रोधमें आकर इनको मारना नहीं चाहता। अगर ये अपनी इष्टप्राप्तिके लिये राज्यके लोभमें आकर मेरेको मारना चाहें, तो भी मैं अपनी इष्ट-प्राप्तिके लिये लोभमें आकर इनको मारना नहीं चाहता। तात्पर्य यह हुआ कि क्रोध और लोभमें आकर मेरेको नरकोंका दरवाजा मोल नहीं लेना है।

यहाँ दो बार ‘अपि’ पदका प्रयोग करनेमें अर्जुनका आशय यह है कि मैं इनके स्वार्थमें बाधा ही नहीं देता तो ये मुझे मारेंगे ही क्यों ? पर मान लो कि ‘पहले इसने हमारे स्वार्थमें बाधा दी है’ ऐसे विचारसे ये मेरे शरीरका नाश करनेमें प्रवृत्त हो जायँ, तो भी (धन्तोऽपि) मैं इनको मारना नहीं चाहता। दूसरी बात, इनको मारनेसे मुझे त्रिलोकीका राज्य मिल जाय, यह तो सम्भावना ही नहीं है, पर मान लो कि इनको मारनेसे मुझे त्रिलोकीका राज्य मिलता हो, तो भी (अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः) मैं इनको मारना नहीं चाहता।

‘मधुसूदन’ सम्बोधनका तात्पर्य है कि आप तो दैत्योंको मारनेवाले हैं, पर ये द्रोण आदि आचार्य और भीष्म आदि पितामह दैत्य थोड़े ही हैं, जिससे मैं इनको मारनेकी इच्छा करूँ ? ये तो हमारे अत्यन्त नजदीकके खास सम्बन्धी हैं।

‘आचार्याः’ —इन कुटुम्बियोंमें जिन द्रोणाचार्य आदिसे

१-छब्बीसवें श्लोकमें ‘पितृन्थ पितामहान् .....’ कहकर सबसे पहले पिताओं और पितामहोंका नाम लिया गया है, और यहाँ ‘आचार्याः पितरः.....’ कहकर सबसे पहले आचार्योंका नाम लिया गया है। इसका तात्पर्य है कि वहाँ तो कुटुम्बिक स्नेहकी मुख्यता है, इसलिये वहाँ पिताका नाम सबसे पहले लिया है; और यहाँ न मारनेका विषय चल रहा है, इसलिये यहाँ सबसे पहले आदरणीय पूज्य आचार्यों—गुरुजनोंका नाम लिया है, जो कि जीवके परम हितैषी होते हैं।

२-‘मधु’ नामक दैत्यको मारनेके कारण भगवान्का नाम ‘मधुसूदन’ पड़ा था।

श्लोक ३६ ]

  • साधक-संजीवनी *

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हमारा विद्याका, हितका सम्बन्ध है, ऐसे पूज्य आचार्योंकी मेरेको सेवा करनी चाहिये कि उनके साथ लड़ाई करनी चाहिये? आचार्यके चरणोंमें तो अपने-आपको, अपने प्राणोंको भी समर्पित कर देना चाहिये। यही हमारे लिये उचित है।

'पितरः' —शरीरके सम्बन्धको लेकर जो पितालोग हैं, उनका ही तो रूप यह हमारा शरीर है। शरीरसे उनके स्वरूप होकर हम क्रोध या लोभमें आकर अपने उन पिताओंको कैसे मारें?

'पुत्राः' —हमारे और हमारे भाइयोंके जो पुत्र हैं, वे तो सर्वथा पालन करनेयोग्य हैं। वे हमारे विपरीत कोई क्रिया भी कर बैठें, तो भी उनका पालन करना ही हमारा धर्म है।

'पितामहाः' —ऐसे ही जो पितामह हैं, वे जब हमारे पिताजीके भी पूज्य हैं, तब हमारे लिये तो परमपूज्य हैं ही। वे हमारी ताड़ना कर सकते हैं, हमें मार भी सकते हैं। पर हमारी तो ऐसी ही चेष्टा होनी चाहिये, जिससे उनको किसी तरहका दुःख न हो, कष्ट न हो, प्रत्युत

उनको सुख हो, आराम हो, उनकी सेवा हो।

'मातुलाः' —हमारे जो मामालोग हैं, वे हमारा पालन-पोषण करनेवाली माताओंके ही भाई हैं। अतः वे माताओंके समान ही पूज्य होने चाहिये।

'श्वशुराः' —ये जो हमारे ससुर हैं, ये मेरी और मेरे भाइयोंकी पत्नियोंके पूज्य पिताजी हैं। अतः ये हमारे लिये भी पिताके ही तुल्य हैं। इनको मैं कैसे मारना चाहूँ?

'पौत्राः' —हमारे पुत्रोंके जो पुत्र हैं, वे तो पुत्रोंसे भी अधिक पालन-पोषण करनेयोग्य हैं।

'श्यालाः' —हमारे जो साले हैं, वे भी हमलोगोंकी पत्नियोंके प्यारे भैया हैं। उनको भी कैसे मारा जाय!

'सम्बन्धिनः' —ये जितने सम्बन्धी दीख रहे हैं और इनके अतिरिक्त जितने भी सम्बन्धी हैं, उनका पालन-पोषण, सेवा करनी चाहिये कि उनको मारना चाहिये? इनको मारनेसे अगर हमें त्रिलोकीका राज्य भी मिल जाय, तो भी क्या इनको मारना उचित है? इनको मारना तो सर्वथा अनुचित है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अर्जुनने स्वजनोंको न मारनेमें दो हेतु बताये। अब परिणामकी दृष्टिसे भी स्वजनोंको न मारना सिद्ध करते हैं।

निहत्य धार्तराष्ट्रानः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।

पापमेवाश्रयेदस्मान्

हत्वैतानाततायिनः ॥ ३६ ॥

जनार्दन= हे जनार्दन! (इन)का= क्याहत्वा= मारनेसे तो
धार्तराष्ट्रान्= धृतराष्ट्र-
सम्बन्धियोंकोप्रीतिः= प्रसन्नताअस्मान्= हमें
निहत्य= मारकरस्यात्= होगी?पापम्= पाप
नः= हमलोगोंकोएतान्= इनएव= ही
आततायिनः= आततायियोंकोआश्रयेत्= लगेगा।

व्याख्या— 'निहत्य धार्तराष्ट्रानः ..... हत्वैतानाततायिनः'—धृतराष्ट्रके पुत्र और उनके सहयोगी दूसरे जितने भी सैनिक हैं, उनको मारकर विजय प्राप्त करनेसे हमें क्या प्रसन्नता होगी? अगर हम क्रोध अथवा लोभके वेगमें आकर इनको मार भी दें, तो उनका वेग शान्त होनेपर हमें रोना ही पड़ेगा अर्थात् क्रोध और लोभमें आकर हम क्या अनर्थ कर बैठें—ऐसा पश्चाताप ही करना पड़ेगा। कुटुम्बियोंकी याद आनेपर उनका अभाव बार-बार खटकेगा। चित्तमें उनकी मृत्युका शोक सताता रहेगा। ऐसी स्थितिमें हमें कभी प्रसन्नता हो सकती है क्या? तात्पर्य है कि इनको मारनेसे हम

इस लोकमें जबतक जीते रहेंगे, तबतक हमारे चित्तमें कभी प्रसन्नता नहीं होगी और इनको मारनेसे हमें जो पाप लगेगा, वह परलोकमें हमें भयंकर दुःख देनेवाला होगा।

आततायी छः प्रकारके होते हैं—आग लगानेवाला, विष देनेवाला, हाथमें शस्त्र लेकर मारनेको तैयार हुआ, धनको हरनेवाला, जमीन (राज्य) छीननेवाला और स्त्रीका हरण करनेवाला*। दुर्मीधन आदिमें ये छहों ही लक्षण घटते थे। उन्होंने पाण्डवोंको लाक्षागृहमें आग लगाकर मारना चाहा था। भीमसेनको जहर खिलाकर जलमें फेंक दिया था। हाथमें शस्त्र लेकर वे पाण्डवोंको मारनेके लिये तैयार थे

  • अग्निदो गरदश्चैव शस्त्रपाणिर्धनापहः। क्षेत्रदारापहर्ता च षडैते ह्याततायिनः ॥ (वसिष्ठमूर्ति ३। १९)

'आग लगानेवाला, विष देनेवाला, हाथमें शस्त्र लेकर मारनेको उद्यत हुआ, धनका हरण करनेवाला, जमीन छीननेवाला और स्त्रीका हरण करनेवाला—ये छहों ही आततायी हैं।'