भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 48

श्लोक २६—२८ ]

  • साधक-संजीवनी *

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भगवान्ने रथ खड़ा करके अर्जुनके मोहको जाग्रत करनेके लिये ही 'कुरुन्तु पश्य' (इन कुरुवंशियोंको देख) —ऐसा कहा है।

कौटुम्बिक स्नेह और भगवत्प्रेम —इन दोनोंमें बहुत अन्तर है। कुटुम्बमें ममतायुक्त स्नेह हो जाता है तो कुटुम्बके अवगुणोंकी तरफ खयाल जाता ही नहीं; किन्तु 'ये मेरे हैं' —ऐसा भाव रहता है। ऐसे ही भगवान्का भक्तमें विशेष स्नेह हो जाता है तो भक्तके अवगुणोंकी तरफ भगवान्का खयाल जाता ही नहीं; किन्तु 'यह मेरा ही है' —

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कुरुवंशियोंको देखनेके लिये कहा। उसके बाद क्या हुआ—इसका वर्णन संजय आगेके श्लोकोंमें करते हैं।

तत्रापश्यत्तिस्थतान्यार्थः पितृनथ पितामहान् । आचार्यान्मातुलान्भ्रातृमुत्रान्यौत्रान्सर्खीस्तथा ॥ २६ ॥

श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।

अथ= उसके बादपितृन्= पिताओंको,तथा= तथा
पार्थः= पृथानन्दन अर्जुननेपितामहान्= पितामहोंको,सर्खीन्= मित्रोंको,
तत्र= उनआचार्यान्= आचार्योंको,श्वशुरान्= ससुरोंको
उभयोः= दोनोंमातुलान्= मामाओंको,= और
एव= हीभ्रातृन्= भाइयोंको,सुहृदः= सुहृदोंको
सेनयोः= सेनाओंमेंपुत्रान्= पुत्रोंको,अपि= भी
स्थितान्= स्थितपौत्रान्= पौत्रोंकोअपश्यत्= देखा।

व्याख्या—'तत्रापश्यत्.....सेनयोरुभयोरपि'—जब भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि इस रणभूमिमें इकट्ठे हुए कुरुवंशियोंको देख, तब अर्जुनकी दृष्टि दोनों सेनाओंमें स्थित अपने कुटुम्बियोंपर गयी। उन्होंने देखा कि उन सेनाओंमें युद्धके लिये अपने-अपने स्थानपर भूरिश्रवा आदि पिताके भाई खड़े हैं, जो कि मेरे लिये पिताके समान हैं। भीष्म, सोमदत्त आदि पितामह खड़े हैं। द्रोण, कृप आदि आचार्य (विद्या पढ़ानेवाले और कुलगुरु) खड़े हैं।

पुरुर्जित् कुन्तिभोज, शल्य, शकुनि आदि मामा खड़े हैं। भीम, दुर्योधन आदि भाई खड़े हैं। अभिमन्यु, घटोत्कच, लक्ष्मण (दुर्योधनका पुत्र) आदि मेरे और मेरे भाइयोंके पुत्र खड़े हैं। लक्ष्मण आदिके पुत्र खड़े हैं, जो कि मेरे पौत्र हैं। दुर्योधनके अश्वत्थामा आदि मित्र खड़े हैं और ऐसे ही अपने पक्षके मित्र भी खड़े हैं। द्रुपद, शैब्य आदि ससुर खड़े हैं। बिना किसी हेतुके अपने-अपने पक्षका हित चाहनेवाले सात्यकि, कृतवर्मा आदि सुहृद् भी खड़े हैं।

सम्बन्ध—अपने सब कुटुम्बियोंको देखनेके बाद अर्जुनने क्या किया—इसको आगेके श्लोकमें कहते हैं।

तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥ २७ ॥

कृपया पर्याविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।

अवस्थितान्= अपनी-अपनीसमीक्ष्य= देखकरकृपया= कायरतासे
जगहपर स्थितसः= वेआविष्टः= युक्त होकर
तान्= उनकौन्तेयः= कुलीनन्दनविषीदन्= विषाद करते हुए
सर्वान्= सम्पूर्णअर्जुनइदम्= ऐसा
बन्धून= बान्धवोंकोपरया= अत्यन्तअब्रवीत्= बोले।