श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
व्याख्या—‘तान् सर्वान्बन्धूनवस्थितान् समीक्ष्य’— पूर्वश्लोकके अनुसार अर्जुन जिनको देख चुके हैं, उनके अतिरिक्त अर्जुने बाह्यीक आदि प्रपितामह; धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, सुरथ आदि साले; जयद्रथ आदि बहनहीं तथा अन्य कई सम्बन्धियोंको दोनों सेनाओंमें स्थित देखा।
‘स कौन्तेयः कृपया परयाविष्टः’— इन पदोंमें ‘स कौन्तेयः ’ कहनेका तात्पर्य है कि माता कुन्तीने जिनको युद्ध करनेके लिये सन्देश भेजा था और जिन्होंने शूरवीरतामें आकर ‘मेरे साथ दो हाथ करनेवाले कौन हैं?’—ऐसे मुख्य-मुख्य योद्धाओंको देखनेके लिये भगवान् श्रीकृष्णको दोनों सेनाओंके बीचमें रथ खड़ा करनेकी आज्ञा दी थी, वे ही कुन्तीनन्दन अर्जुन अत्यन्त कायरतासे युक्त हो जाते हैं!
दोनों ही सेनाओंमें जन्मके और विद्याके सम्बन्धी—ही-सम्बन्धी देखनेसे अर्जुनेके मनमें यह विचार आया कि युद्धमें चाहे इस पक्षके लोग मरें, चाहे उस पक्षके लोग मरें, नुकसान हमारा ही होगा, कुल तो हमारा ही नष्ट होगा, सम्बन्धी तो हमारे ही मारे जायेंगे! ऐसा विचार आनेसे अर्जुनकी युद्धकी इच्छा तो मिट गयी और भीतरमें कायरता आ गयी। इस कायरताको भगवान्ने आगे (१।२-३ में) ‘कश्मलम् ’ तथा ‘हृदयदौर्बल्यम् ’ कहा है, और अर्जुनेने (१।७ में) ‘कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः ’ कहकर इसको स्वीकार भी किया है।
अर्जुन कायरतासे आविष्ट हुए हैं—‘कृपयाविष्टः ’। इससे सिद्ध होता है कि यह कायरता पहले नहीं थी, प्रत्युत अभी आयी है। अतः यह आगन्तुक दोष है। आगन्तुक होनेसे यह ठहरेगी नहीं। परन्तु शूरवीरता अर्जुनमें स्वाभाविक है; अतः वह तो रहेगी ही।
अत्यन्त कायरता क्या है? बिना किसी कारण निन्दा, तिरस्कार, अपमान करनेवाले, दुःख देनेवाले, वैरभाव रखनेवाले, नाश करनेकी चेष्टा करनेवाले दुर्गंधन, दुःशासन, शकुनि आदिको अपने सामने युद्ध करनेके लिये खड़े देखकर भी उनको मारनेका विचार न होना, उनका नाश करनेका उद्योग न करना—यह अत्यन्त कायरतारूप दोष है। यहाँ अर्जुनको कायरतारूप दोषने ऐसा घेर लिया है कि जो अर्जुन आदिका अनिष्ट चाहनेवाले और समय-समयपर अनिष्ट करनेका उद्योग करनेवाले हैं, उन अधर्मियों— पापियोंपर भी अर्जुनको करुणा आ रही है (गीता—पहले अध्यायका पैंतीसवाँ और छियालीसवाँ श्लोक) और वे क्षत्रियके कर्तव्यरूप अपने धर्मसे च्युत हो रहे हैं।
‘विषीदन्तिदमब्रवीत्’— युद्धके परिणाममें कुटुम्बकी, कुलकी, देशकी क्या दशा होगी—इसको लेकर अर्जुन बहुत दुःखी हो रहे हैं और उस अवस्थामें वे ये वचन बोलते हैं, जिसका वर्णन आगेके श्लोकोंमें किया गया है।
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ २८ ॥ सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥ २९ ॥ गाण्डीवं संसते हस्तात्त्वकचैव परिदहाते। न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ ३० ॥
अर्जुन बोले—
| कृष्ण | = हे कृष्ण! | मम | = मेरे | मे | = मेरे |
|---|---|---|---|---|---|
| युयुत्सुम् | = युद्धकी इच्छावाले | गात्राणि | = अंग | शरीरे | = शरीरमें |
| इमम् | = इस | सीदन्ति | = शिथिल हो रहे हैं | वेपथुः | = कँपकँपी (आ रही है) |
| स्वजनम् | = कुटुम्ब-समुदायको | च | = और | च | = एवं |
| समुपस्थितम् | = अपने सामने उपस्थित | मुखम् | = मुख | रोमहर्षः | = रोंगटे खड़े |
| दृष्ट्वा | = देखकर | परिशुष्यति | = सूख रहा है | जायते | = हो रहे हैं। |
| च | = तथा |