भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

जिससे तुम लोग अपने शत्रुओंको सुगमतासे मार सकोगे।*’ इस प्रकार जिनके रथकी ध्वजापर हनुमान्जी विराजमान हैं, उनकी विजय निश्चित है।

‘पाण्डवः’—धृतराष्ट्रने अपने प्रश्नमें ‘पाण्डवाः’ पदका प्रयोग किया था। अतः धृतराष्ट्रको बार-बार पाण्डवोंकी याद दिलानेके लिये संजय (१।१४ में और यहाँ) ‘पाण्डवः’ शब्दका प्रयोग करते हैं।

‘हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते’—पाण्डव-सेनाको देखकर दुर्योधन तो गुरु द्रोणाचार्यके पास जाकर चालाकीसे भरे हुए वचन बोलता है; परन्तु अर्जुन कौरव-सेनाको देखकर जो जगदगुरु हैं, अन्तर्धामी हैं, मन-बुद्धि आदिके प्रेरक हैं—ऐसे भगवान् श्रीकृष्णसे शूरवीरता, उत्साह और अपने कर्तव्यसे भरे हुए (आगे कहे जानेवाले) वचन बोलते हैं।

अर्जुन उवाच

सेनयोरुभयोर्यमध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥ २१ ॥ यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्। कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ॥ २२ ॥

अर्जुन बोले—

अच्युत= हे अच्युत !स्थापय= खड़ा कीजिये,निरीक्षे= देख न लूँ कि
उभयोः= दोनोंयावत्= जबतकअस्मिन्= इस
सेनयोः= सेनाओंकेअहम्= मैं (युद्धक्षेत्रमें)रणसमुद्यमे= युद्धरूप उद्योगमें
मध्ये= मध्यमेंअवस्थितान्= खड़े हुएमया= मुझे
मे= मेरेएतान्= इनकैः= किन-किनके
रथम्= रथको (आप
तबतक)योद्धुकामान्= युद्धकी
इच्छावालोंकोसह= साथ
योद्धव्यम्= युद्ध करना योग्य है।

व्याख्या—‘अच्युत सेनयोरुभयोर्यमध्ये रथं स्थापय’—दोनों सेनाएँ जहाँ युद्ध करनेके लिये एक-दूसरेके सामने खड़ी थीं, वहाँ उन दोनों सेनाओंमें इतनी दूरी थी कि एक सेना दूसरी सेनापर बाण आदि मार सके। उन दोनों सेनाओं-का मध्यभाग दो तरफसे मध्य था—(१) सेनाएँ जितनी चौड़ी खड़ी थीं, उस चौड़ाईका मध्यभाग और (२) दोनों सेनाओंका मध्यभाग, जहाँसे कौरव-सेना जितनी दूरीपर खड़ी थी, उतनी ही दूरीपर पाण्डव-सेना खड़ी थी। ऐसे मध्यभागमें रथ खड़ा करनेके लिये अर्जुन भगवान्से कहते हैं, जिससे दोनों सेनाओंको आसानीसे देखा जा सके।

‘सेनयोरुभयोर्यमध्ये’ पद गीतामें तीन बार आया है—यहाँ (१।२१ में), इसी अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें और दूसरे अध्यायके दसवें श्लोकमें। तीन बार आनेका तात्पर्य है कि पहले अर्जुन शूरवीरताके साथ अपने रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा करनेकी आज्ञा देते हैं (पहले अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक), फिर भगवान् दोनों सेनाओंके

बीचमें रथको खड़ा करके कुरुवंशियोंको देखनेके लिये कहते हैं (पहले अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक) और अन्तमें दोनों सेनाओंके बीचमें ही विषादमग्न अर्जुनको गीताका उपदेश देते हैं (दूसरे अध्यायका दसवाँ श्लोक)। इस प्रकार पहले अर्जुनमें शूरवीरता थी, बीचमें कुटुम्बियोंको देखनेसे मोहके कारण उनको युद्धसे उपरति हो गयी और अन्तमें उनको भगवान्से गीताका महान् उपदेश प्राप्त हुआ, जिससे उनका मोह दूर हो गया। इससे यह भाव निकलता है कि मनुष्य जहाँ-कहीं और जिस-किसी परिस्थितिमें स्थित है, वहाँ रहकर वह प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करके निष्काम हो सकता है और वहाँ उसको परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है। कारण कि परमात्मा सम्पूर्ण परिस्थितियोंमें सदा एकरूपसे रहते हैं।

‘यावदेतान्निरीक्षेऽहं’……‘रणसमुद्यमे’—दोनों सेनाओंके बीचमें रथ कबतक खड़ा करें ? इसपर अर्जुन कहते हैं कि युद्धकी इच्छाको लेकर कौरव-सेनामें आये हुए सेनासहित जितने भी राजालोग खड़े हैं, उन सबको जबतक

  • तदाहं बृहद्यध्यामि स्वरवेण रवं तव। विजयस्य ध्वजस्थश्च नदान् मोक्ष्यामि दारुणान् ॥

शत्रूणां ये प्राणहराः सुखं येन हनिष्यथ। (महाभारत, वन० १५१।१७-१८)