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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

४४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

जिससे तुम लोग अपने शत्रुओंको सुगमतासे मार सकोगे।*’ इस प्रकार जिनके रथकी ध्वजापर हनुमान्जी विराजमान हैं, उनकी विजय निश्चित है।

‘पाण्डवः’—धृतराष्ट्रने अपने प्रश्नमें ‘पाण्डवाः’ पदका प्रयोग किया था। अतः धृतराष्ट्रको बार-बार पाण्डवोंकी याद दिलानेके लिये संजय (१।१४ में और यहाँ) ‘पाण्डवः’ शब्दका प्रयोग करते हैं।

‘हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते’—पाण्डव-सेनाको देखकर दुर्योधन तो गुरु द्रोणाचार्यके पास जाकर चालाकीसे भरे हुए वचन बोलता है; परन्तु अर्जुन कौरव-सेनाको देखकर जो जगदगुरु हैं, अन्तर्धामी हैं, मन-बुद्धि आदिके प्रेरक हैं—ऐसे भगवान् श्रीकृष्णसे शूरवीरता, उत्साह और अपने कर्तव्यसे भरे हुए (आगे कहे जानेवाले) वचन बोलते हैं।

अर्जुन उवाच

सेनयोरुभयोर्यमध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥ २१ ॥ यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्। कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ॥ २२ ॥

अर्जुन बोले—

अच्युत= हे अच्युत !स्थापय= खड़ा कीजिये,निरीक्षे= देख न लूँ कि
उभयोः= दोनोंयावत्= जबतकअस्मिन्= इस
सेनयोः= सेनाओंकेअहम्= मैं (युद्धक्षेत्रमें)रणसमुद्यमे= युद्धरूप उद्योगमें
मध्ये= मध्यमेंअवस्थितान्= खड़े हुएमया= मुझे
मे= मेरेएतान्= इनकैः= किन-किनके
रथम्= रथको (आप
तबतक)योद्धुकामान्= युद्धकी
इच्छावालोंकोसह= साथ
योद्धव्यम्= युद्ध करना योग्य है।

व्याख्या—‘अच्युत सेनयोरुभयोर्यमध्ये रथं स्थापय’—दोनों सेनाएँ जहाँ युद्ध करनेके लिये एक-दूसरेके सामने खड़ी थीं, वहाँ उन दोनों सेनाओंमें इतनी दूरी थी कि एक सेना दूसरी सेनापर बाण आदि मार सके। उन दोनों सेनाओं-का मध्यभाग दो तरफसे मध्य था—(१) सेनाएँ जितनी चौड़ी खड़ी थीं, उस चौड़ाईका मध्यभाग और (२) दोनों सेनाओंका मध्यभाग, जहाँसे कौरव-सेना जितनी दूरीपर खड़ी थी, उतनी ही दूरीपर पाण्डव-सेना खड़ी थी। ऐसे मध्यभागमें रथ खड़ा करनेके लिये अर्जुन भगवान्से कहते हैं, जिससे दोनों सेनाओंको आसानीसे देखा जा सके।

‘सेनयोरुभयोर्यमध्ये’ पद गीतामें तीन बार आया है—यहाँ (१।२१ में), इसी अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें और दूसरे अध्यायके दसवें श्लोकमें। तीन बार आनेका तात्पर्य है कि पहले अर्जुन शूरवीरताके साथ अपने रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा करनेकी आज्ञा देते हैं (पहले अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक), फिर भगवान् दोनों सेनाओंके

बीचमें रथको खड़ा करके कुरुवंशियोंको देखनेके लिये कहते हैं (पहले अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक) और अन्तमें दोनों सेनाओंके बीचमें ही विषादमग्न अर्जुनको गीताका उपदेश देते हैं (दूसरे अध्यायका दसवाँ श्लोक)। इस प्रकार पहले अर्जुनमें शूरवीरता थी, बीचमें कुटुम्बियोंको देखनेसे मोहके कारण उनको युद्धसे उपरति हो गयी और अन्तमें उनको भगवान्से गीताका महान् उपदेश प्राप्त हुआ, जिससे उनका मोह दूर हो गया। इससे यह भाव निकलता है कि मनुष्य जहाँ-कहीं और जिस-किसी परिस्थितिमें स्थित है, वहाँ रहकर वह प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करके निष्काम हो सकता है और वहाँ उसको परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है। कारण कि परमात्मा सम्पूर्ण परिस्थितियोंमें सदा एकरूपसे रहते हैं।

‘यावदेतान्निरीक्षेऽहं’……‘रणसमुद्यमे’—दोनों सेनाओंके बीचमें रथ कबतक खड़ा करें ? इसपर अर्जुन कहते हैं कि युद्धकी इच्छाको लेकर कौरव-सेनामें आये हुए सेनासहित जितने भी राजालोग खड़े हैं, उन सबको जबतक

  • तदाहं बृहद्यध्यामि स्वरवेण रवं तव। विजयस्य ध्वजस्थश्च नदान् मोक्ष्यामि दारुणान् ॥

शत्रूणां ये प्राणहराः सुखं येन हनिष्यथ। (महाभारत, वन० १५१।१७-१८)

श्लोक २३—२५]

  • साधक-संजीवनी *

४५

में देख न लूँ, तबतक आप रथको वहीं खड़ा रखिये। इस युद्धके उद्योगमें मुझे किन-किनके साथ युद्ध करना है? उनमें कौन मेरे समान बलवाले हैं? कौन मेरेसे कम बलवाले हैं? और कौन मेरेसे अधिक बलवाले हैं? उन सबको मैं जरा देख लूँ।

यहाँ 'योद्धुकामान्' पदसे अर्जुन कह रहे हैं कि हमने तो सन्धिकी बात ही सोची थी, पर उन्होंने सन्धिकी बात स्वीकार नहीं की; क्योंकि उनके मनमें युद्ध करनेकी ज्यादा इच्छा है। अतः उनको मैं देखूँ कि कितने बलको लेकर वे युद्ध करनेकी इच्छा रखते हैं।

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।

धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३ ॥

दुर्बुद्धेः= दुष्टबुद्धिये= जोउतावले
धार्तराष्ट्रस्य= दुर्योधनकाएते= ये राजालोगहुए (इन)
युद्धे= युद्धमेंअत्र= इस सेनामेंसबको)
प्रियचिकीर्षवः= प्रिय करनेकीसमागताः= आये हुए हैं,अहम्
इच्छावालेयोत्स्यमानान्= युद्ध करनेकोअवेक्षे

व्याख्या —'धार्तराष्ट्रस्य * दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः'—यहाँ दुर्योधनको दुष्टबुद्धि कहकर अर्जुन यह बताना चाहते हैं कि इस दुर्योधनने हमारा नाश करनेके लिये आजतक कई तरहके षड्यन्त्र रचे हैं। हमें अपमानित करनेके लिये कई तरहके उद्योग किये हैं। नियमके अनुसार और न्यायपूर्वक हम आधे राज्यके अधिकारी हैं, पर उसको भी यह हड़पना चाहता है, देना नहीं चाहता। ऐसी तो इसकी दुष्टबुद्धि है; और यहाँ आये हुए राजालोग युद्धमें इसका प्रिय करना चाहते हैं! वास्तवमें तो मित्रोंका यह कर्तव्य होता है कि वे ऐसा काम करें, ऐसी बात बतायें, जिससे अपने मित्रका लोक-परलोकमें हित हो। परन्तु ये राजालोग दुर्योधनकी दुष्टबुद्धिको शुद्ध न करके उलटे उसको बढ़ाना चाहते हैं और दुर्योधनसे युद्ध कराकर, युद्धमें उसकी सहायता करके उसका पतन ही करना चाहते हैं।

तात्पर्य है कि दुर्योधनका हित किस बातमें है; उसको राज्य भी किस बातसे मिलेगा और उसका परलोक भी किस बातसे सुधरेगा—इन बातोंका वे विचार ही नहीं कर रहे हैं। अगर ये राजालोग उसको यह सलाह देते कि भाई, कम-से-कम आधा राज्य तुम रखो और पाण्डवोंका आधा राज्य पाण्डवोंको दे दो तो इससे दुर्योधनका आधा राज्य भी रहता और उसका परलोक भी सुधरता।

'योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः'—इन युद्धके लिये उतावले होनेवालोंको जरा देख तो लूँ! इन्होंने अधर्मका, अन्यायका पक्ष लिया है, इसलिये ये हमारे सामने टिक नहीं सकेंगे, नष्ट हो जायेंगे।

'योत्स्यमानान्' कहनेका तात्पर्य है कि इनके मनमें युद्धकी ज्यादा आ रही है; अतः देखूँ तो सही कि ये हैं कौन ?

सम्बन्ध —अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान्ने क्या किया—इसको संजय आगेके दो श्लोकोंमें कहते हैं।

सज्जय उवाच

एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।

सेनयोरुभयोर्यमध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।

उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरुन्निति ॥ २५ ॥

  • 'धार्तराष्ट्र' पदके दो अर्थ होते हैं—(१) धृतराष्ट्रके पुत्र अथवा सम्बन्धी (२) अन्यायपूर्वक राष्ट्र-(राज्य-) को धारण करनेवाले। यहाँ धृतराष्ट्रके पुत्र—दुर्योधनके लिये ही 'धार्तराष्ट्रस्य' पद आया है।

४६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

संजय बोले—

भारत | = हे भरतवंशी राजन्! | सेनयोः | = सेनाओंके | रथोत्तमम् | = श्रेष्ठ रथको ---|---|---|---|---|--- गुडाकेशन | = निद्राविजयी अर्जुनके द्वारा | मध्ये | = मध्यभागमें | स्थापयित्वा | = खड़ा करके एवम् | = इस तरह | भीष्मद्रोणप्रमुखतः | = पितामह भीष्म और आचार्य द्रोणके | इति | = इस प्रकार उक्तः | = कहनेपर | च | = तथा | उवाच | = कहा कि हृषीकेशः | = अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णने | सर्वेषाम् | = सम्पूर्ण | पार्थ | = 'हे पार्थ! उभयोः | = दोनों | महीक्षिताम् | = राजाओंके सामने | एतान् | = इन | | | | समवेतान् | = इकट्ठे हुए | | | | कुरुन् | = कुरुवंशियोंको | | | | पश्य | = देख'।

व्याख्या—'गुडाकेशन'—'गुडाकेश' शब्दके दो अर्थ होते हैं—(१) 'गुडा' नाम मुड़े हुआ है और 'केश' नाम बालोंका है। जिसके सिरके बाल मुड़े हुए अर्थात् घुँघराले हैं, उसका नाम 'गुडाकेश' है। (२) 'गुडाका' नाम निद्राका है और 'ईश' नाम स्वामीका है। जो निद्राका स्वामी है अर्थात् निद्रा ले चाहे न ले—ऐसा जिसका निद्रापर अधिकार है, उसका नाम 'गुडाकेश' है। अर्जुनके केश घुँघराले थे और उनका निद्रापर आधिपत्य था; अतः उनको 'गुडाकेश' कहा गया है।

'एवमुक्तः'—जो निद्रा-आलस्यके सुखका गुलाम नहीं होता और जो विषय-भोगोंका दास नहीं होता, केवल भगवान्का ही दास (भक्त) होता है, उस भक्तकी बात भगवान् सुनते हैं; केवल सुनते ही नहीं, उसकी आज्ञाका पालन भी करते हैं। इसलिये अपने सखा भक्त अर्जुनके द्वारा आज्ञा देनेपर अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णने दोनों सेनाओंके बीचमें अर्जुनका रथ खड़ा कर दिया।

'हृषीकेशः'—इन्द्रियोंका नाम 'हृषीक' है। जो इन्द्रियोंके ईश अर्थात् स्वामी हैं, उनको हृषीकेश कहते हैं। पहले इक्कीसवें श्लोकमें और यहाँ 'हृषीकेश' कहनेका तात्पर्य है कि जो मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि सबके प्रेरक हैं, सबको आज्ञा देनेवाले हैं, वे ही अन्तर्यामी भगवान् यहाँ अर्जुनकी आज्ञाका पालन करनेवाले बन गये हैं! यह उनकी अर्जुनपर कितनी अधिक कृपा है!

'सेनयोरुभयोरमध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्'—दोनों सेनाओंके बीचमें जहाँ खाली जगह थी, वहाँ भगवान्ने अर्जुनके श्रेष्ठ रथको खड़ा कर दिया।

'भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्'—उस रथको भी भगवान्ने विलक्षण चतुराईसे ऐसी जगह खड़ा किया, जहाँसे अर्जुनको कौटुम्बिक सम्बन्धवाले पितामह भीष्म, विद्याके सम्बन्धवाले आचार्य द्रोण एवं कौरव-

सेनाके मुख्य-मुख्य राजालोग सामने दिखायी दे सकें।

'उवाच पार्थ पश्येतान्समवेतान्कुरुनिति'—'कुरु' पदमें धृतराष्ट्रके पुत्र और पाण्डुके पुत्र—ये दोनों आ जाते हैं; क्योंकि ये दोनों ही कुरुवंशी हैं। युद्धके लिये एकत्र हुए इन कुरुवंशियोंको देख—ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि इन कुरुवंशियोंको देखकर अर्जुनके भीतर यह भाव पैदा हो जाय कि हम सब एक ही तो हैं! इस पक्षके हों, चाहे उस पक्षके हों; भले हों, चाहे बुरे हों; सदाचारी हों, चाहे दुराचारी हों; पर हैं सब अपने ही कुटुम्बी। इस कारण अर्जुनमें छिपा हुआ कौटुम्बिक ममतायुक्त मोह जाग्रत् हो जाय और मोह जाग्रत् होनेसे अर्जुन जिज्ञासु बन जाय, जिससे अर्जुनको निमित्त बनाकर भावी कलियुगी जीवोंके कल्याणके लिये गीताका महान् उपदेश दिया जा सके—इसी भावसे भगवान्ने यहाँ 'पश्येतान् समवेतान् कुरुन्' कहा है। नहीं तो भगवान् 'पश्येतान् धार्तराष्ट्रान् समानिति'—ऐसा भी कह सकते थे; परन्तु ऐसा कहनेसे अर्जुनके भीतर युद्ध करनेका जोश आता; जिससे गीताके प्राकट्यका अवसर ही नहीं आता! और अर्जुनके भीतरका प्रसुप्त कौटुम्बिक मोह भी दूर नहीं होता, जिसको दूर करना भगवान् अपनी जिम्मेवारी मानते हैं। जैसे कोई फोड़ा हो जाता है तो वैद्यलोग पहले उसको पकानेकी चेष्टा करते हैं और जब वह पक जाता है, तब उसको चौरा देकर साफ कर देते हैं; ऐसे ही भगवान् भक्तके भीतर छिपे हुए मोहको पहले जाग्रत् करके फिर उसको मिटाते हैं। यहाँ भी भगवान् अर्जुनके भीतर छिपे हुए मोहको 'कुरुन् पश्य' कहकर जाग्रत् कर रहे हैं, जिसको आगे उपदेश देकर नष्ट कर देंगे।

अर्जुनने कहा था कि 'इनको मैं देख तूँ'—'निरिक्षे' (१।२२) 'अवेक्षे' (१।२३); अतः यहाँ भगवान्को 'पश्य' (तू देख ले)—ऐसा कहनेकी जरूरत ही नहीं थी। भगवान्को तो केवल रथ खड़ा कर देना चाहिये था। परन्तु

श्लोक २६—२८ ]

  • साधक-संजीवनी *

४७

भगवान्ने रथ खड़ा करके अर्जुनके मोहको जाग्रत करनेके लिये ही 'कुरुन्तु पश्य' (इन कुरुवंशियोंको देख) —ऐसा कहा है।

कौटुम्बिक स्नेह और भगवत्प्रेम —इन दोनोंमें बहुत अन्तर है। कुटुम्बमें ममतायुक्त स्नेह हो जाता है तो कुटुम्बके अवगुणोंकी तरफ खयाल जाता ही नहीं; किन्तु 'ये मेरे हैं' —ऐसा भाव रहता है। ऐसे ही भगवान्का भक्तमें विशेष स्नेह हो जाता है तो भक्तके अवगुणोंकी तरफ भगवान्का खयाल जाता ही नहीं; किन्तु 'यह मेरा ही है' —

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कुरुवंशियोंको देखनेके लिये कहा। उसके बाद क्या हुआ—इसका वर्णन संजय आगेके श्लोकोंमें करते हैं।

तत्रापश्यत्तिस्थतान्यार्थः पितृनथ पितामहान् । आचार्यान्मातुलान्भ्रातृमुत्रान्यौत्रान्सर्खीस्तथा ॥ २६ ॥

श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।

अथ= उसके बादपितृन्= पिताओंको,तथा= तथा
पार्थः= पृथानन्दन अर्जुननेपितामहान्= पितामहोंको,सर्खीन्= मित्रोंको,
तत्र= उनआचार्यान्= आचार्योंको,श्वशुरान्= ससुरोंको
उभयोः= दोनोंमातुलान्= मामाओंको,= और
एव= हीभ्रातृन्= भाइयोंको,सुहृदः= सुहृदोंको
सेनयोः= सेनाओंमेंपुत्रान्= पुत्रोंको,अपि= भी
स्थितान्= स्थितपौत्रान्= पौत्रोंकोअपश्यत्= देखा।

व्याख्या—'तत्रापश्यत्.....सेनयोरुभयोरपि'—जब भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि इस रणभूमिमें इकट्ठे हुए कुरुवंशियोंको देख, तब अर्जुनकी दृष्टि दोनों सेनाओंमें स्थित अपने कुटुम्बियोंपर गयी। उन्होंने देखा कि उन सेनाओंमें युद्धके लिये अपने-अपने स्थानपर भूरिश्रवा आदि पिताके भाई खड़े हैं, जो कि मेरे लिये पिताके समान हैं। भीष्म, सोमदत्त आदि पितामह खड़े हैं। द्रोण, कृप आदि आचार्य (विद्या पढ़ानेवाले और कुलगुरु) खड़े हैं।

पुरुर्जित् कुन्तिभोज, शल्य, शकुनि आदि मामा खड़े हैं। भीम, दुर्योधन आदि भाई खड़े हैं। अभिमन्यु, घटोत्कच, लक्ष्मण (दुर्योधनका पुत्र) आदि मेरे और मेरे भाइयोंके पुत्र खड़े हैं। लक्ष्मण आदिके पुत्र खड़े हैं, जो कि मेरे पौत्र हैं। दुर्योधनके अश्वत्थामा आदि मित्र खड़े हैं और ऐसे ही अपने पक्षके मित्र भी खड़े हैं। द्रुपद, शैब्य आदि ससुर खड़े हैं। बिना किसी हेतुके अपने-अपने पक्षका हित चाहनेवाले सात्यकि, कृतवर्मा आदि सुहृद् भी खड़े हैं।

सम्बन्ध—अपने सब कुटुम्बियोंको देखनेके बाद अर्जुनने क्या किया—इसको आगेके श्लोकमें कहते हैं।

तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥ २७ ॥

कृपया पर्याविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।

अवस्थितान्= अपनी-अपनीसमीक्ष्य= देखकरकृपया= कायरतासे
जगहपर स्थितसः= वेआविष्टः= युक्त होकर
तान्= उनकौन्तेयः= कुलीनन्दनविषीदन्= विषाद करते हुए
सर्वान्= सम्पूर्णअर्जुनइदम्= ऐसा
बन्धून= बान्धवोंकोपरया= अत्यन्तअब्रवीत्= बोले।

४८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

व्याख्या—‘तान् सर्वान्बन्धूनवस्थितान् समीक्ष्य’— पूर्वश्लोकके अनुसार अर्जुन जिनको देख चुके हैं, उनके अतिरिक्त अर्जुने बाह्यीक आदि प्रपितामह; धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, सुरथ आदि साले; जयद्रथ आदि बहनहीं तथा अन्य कई सम्बन्धियोंको दोनों सेनाओंमें स्थित देखा।

‘स कौन्तेयः कृपया परयाविष्टः’— इन पदोंमें ‘स कौन्तेयः ’ कहनेका तात्पर्य है कि माता कुन्तीने जिनको युद्ध करनेके लिये सन्देश भेजा था और जिन्होंने शूरवीरतामें आकर ‘मेरे साथ दो हाथ करनेवाले कौन हैं?’—ऐसे मुख्य-मुख्य योद्धाओंको देखनेके लिये भगवान् श्रीकृष्णको दोनों सेनाओंके बीचमें रथ खड़ा करनेकी आज्ञा दी थी, वे ही कुन्तीनन्दन अर्जुन अत्यन्त कायरतासे युक्त हो जाते हैं!

दोनों ही सेनाओंमें जन्मके और विद्याके सम्बन्धी—ही-सम्बन्धी देखनेसे अर्जुनेके मनमें यह विचार आया कि युद्धमें चाहे इस पक्षके लोग मरें, चाहे उस पक्षके लोग मरें, नुकसान हमारा ही होगा, कुल तो हमारा ही नष्ट होगा, सम्बन्धी तो हमारे ही मारे जायेंगे! ऐसा विचार आनेसे अर्जुनकी युद्धकी इच्छा तो मिट गयी और भीतरमें कायरता आ गयी। इस कायरताको भगवान्ने आगे (१।२-३ में) ‘कश्मलम् ’ तथा ‘हृदयदौर्बल्यम् ’ कहा है, और अर्जुनेने (१।७ में) ‘कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः ’ कहकर इसको स्वीकार भी किया है।

अर्जुन कायरतासे आविष्ट हुए हैं—‘कृपयाविष्टः ’। इससे सिद्ध होता है कि यह कायरता पहले नहीं थी, प्रत्युत अभी आयी है। अतः यह आगन्तुक दोष है। आगन्तुक होनेसे यह ठहरेगी नहीं। परन्तु शूरवीरता अर्जुनमें स्वाभाविक है; अतः वह तो रहेगी ही।

अत्यन्त कायरता क्या है? बिना किसी कारण निन्दा, तिरस्कार, अपमान करनेवाले, दुःख देनेवाले, वैरभाव रखनेवाले, नाश करनेकी चेष्टा करनेवाले दुर्गंधन, दुःशासन, शकुनि आदिको अपने सामने युद्ध करनेके लिये खड़े देखकर भी उनको मारनेका विचार न होना, उनका नाश करनेका उद्योग न करना—यह अत्यन्त कायरतारूप दोष है। यहाँ अर्जुनको कायरतारूप दोषने ऐसा घेर लिया है कि जो अर्जुन आदिका अनिष्ट चाहनेवाले और समय-समयपर अनिष्ट करनेका उद्योग करनेवाले हैं, उन अधर्मियों— पापियोंपर भी अर्जुनको करुणा आ रही है (गीता—पहले अध्यायका पैंतीसवाँ और छियालीसवाँ श्लोक) और वे क्षत्रियके कर्तव्यरूप अपने धर्मसे च्युत हो रहे हैं।

‘विषीदन्तिदमब्रवीत्’— युद्धके परिणाममें कुटुम्बकी, कुलकी, देशकी क्या दशा होगी—इसको लेकर अर्जुन बहुत दुःखी हो रहे हैं और उस अवस्थामें वे ये वचन बोलते हैं, जिसका वर्णन आगेके श्लोकोंमें किया गया है।

अर्जुन उवाच

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ २८ ॥ सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥ २९ ॥ गाण्डीवं संसते हस्तात्त्वकचैव परिदहाते। न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ ३० ॥

अर्जुन बोले—

कृष्ण= हे कृष्ण!मम= मेरेमे= मेरे
युयुत्सुम्= युद्धकी इच्छावालेगात्राणि= अंगशरीरे= शरीरमें
इमम्= इससीदन्ति= शिथिल हो रहे हैंवेपथुः= कँपकँपी (आ रही है)
स्वजनम्= कुटुम्ब-समुदायको= और= एवं
समुपस्थितम्= अपने सामने उपस्थितमुखम्= मुखरोमहर्षः= रोंगटे खड़े
दृष्ट्वा= देखकरपरिशुष्यति= सूख रहा हैजायते= हो रहे हैं।
= तथा

श्लोक ३१ ]

  • साधक-संजीवनी *

४९

हस्तात्= हाथसेएव= भीरहा है
गाण्डीवम्= गाण्डीव धनुषपरिदह्यते= जल रही है।
संसते= गिर रहा हैमे= मेराअवस्थातुम्
= औरमनः= मन
त्वक्= त्वचाभ्रमति, इव= भ्रमित-सा होन, शक्नोमि

व्याख्या—‘दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्’— अर्जुनको ‘कृष्ण’ नाम बहुत प्रिय था। यह सम्बोधन गीतामें नौ बार आया है। भगवान् श्रीकृष्णके लिये दूसरा कोई सम्बोधन इतनी बार नहीं आया है। ऐसे ही भगवान्को अर्जुनका ‘पार्थ ’ नाम बहुत प्यारा था। इसलिये भगवान् और अर्जुन आपसकी बोलचालमें ये नाम लिया करते थे और यह बात लोगोंमें भी प्रसिद्ध थी। इसी दृष्टिसे संजयने गीताके अन्तमें ‘कृष्ण ’ और ‘पार्थ ’ नामका उल्लेख किया है—‘यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ’ (१८।७८)। धृतराष्ट्रने पहले ‘समवेता युयुत्सवः ’ कहा था और यहाँ अर्जुनने भी ‘युयुत्सुं समुपस्थितम् ’ कहा है; परन्तु दोनोंकी दृष्टियोंमें बड़ा अन्तर है। धृतराष्ट्रकी दृष्टिमें तो दुर्योधन आदि मेरे पुत्र हैं और युधिष्ठिर आदि पाण्डुके पुत्र हैं—ऐसा भेद है; अतः धृतराष्ट्रने वहाँ ‘मामकाः ’ और ‘पाण्डवाः ’ कहा है। परन्तु अर्जुनकी दृष्टिमें यह भेद नहीं है; अतः अर्जुनने यहाँ ‘स्वजनम् ’ कहा है, जिसमें दोनों पक्षके लोग आ जाते हैं। तात्पर्य है कि धृतराष्ट्रको तो युद्धमें अपने पुत्रोंके मरनेकी आशंकासे भय है, शोक है; परन्तु अर्जुनको दोनों ओरके कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे शोक हो रहा है कि किसी भी तरफका कोई भी मेरे, पर वह है तो हमारा ही कुटुम्बी।

अबतक ‘दृष्ट्वा ’ पद तीन बार आया है—‘दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकम् ’ (१।२), ‘व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् ’ (१।२०) और यहाँ ‘दृष्ट्वेमं स्वजनम्

(१।२८)। इन तीनोंका तात्पर्य है कि दुर्योधनका देखना तो एक तरहका ही रहा अर्थात् दुर्योधनका तो युद्धका ही एक भाव रहा; परन्तु अर्जुनका देखना दो तरहका हुआ। पहले तो अर्जुन धृतराष्ट्रके पुत्रोंको देखकर वीरतामें आकर युद्धके लिये धनुष उठाकर खड़े हो जाते हैं और अब स्वजनोंको देखकर कायरतासे आविष्ट हो रहे हैं, युद्धसे उपरत हो रहे हैं और उनके हाथसे धनुष गिर रहा है।

‘सीदन्ति मम गात्राणि’—‘भ्रमतीव च मे मनः’— अर्जुनके मनमें युद्धके भावी परिणामको लेकर चिन्ता हो रही है, दुःख हो रहा है। उस चिन्ता, दुःखका असर अर्जुनके सारे शरीरपर पड़ रहा है। उसी असरको अर्जुन स्पष्ट शब्दोंमें कह रहे हैं कि मेरे शरीरका हाथ, पैर, मुख आदि एक-एक अंग (अवयव) शिथिल हो रहा है! मुख सूखता जा रहा है, जिससे बोलना भी कठिन हो रहा है! सारा शरीर थर-थर काँप रहा है! शरीरके सभी रोंगटे खड़े हो रहे हैं अर्थात् सारा शरीर रोमांचित हो रहा है! जिस गाण्डीव धनुषकी प्रत्यंचाकी टंकरसे शत्रु भयभीत हो जाते हैं, वही गाण्डीव धनुष आज मेरे हाथसे गिर रहा है! त्वचामें—सारे शरीरमें जलन हो रही है*। मेरा मन भ्रमित हो रहा है अर्थात् मेरेको क्या करना चाहिये—यह भी नहीं सूझ रहा है! यहाँ युद्धभूमिमें रथपर खड़े रहनेमें भी मैं असमर्थ हो रहा हूँ। ऐसा लगता है कि मैं मूर्च्छित होकर गिर पड़ूँगा! ऐसे अनर्थकारक युद्धमें खड़ा रहना भी एक पाप मालूम दे रहा है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अपने शरीरके शोकजनित आठ चिन्होंका वर्णन करके अब अर्जुन भावी परिणामके सूचक शक्तोंकी दृष्टिसे युद्ध करनेका अनौचित्य बताते हैं।

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ ३१ ॥

  • चिन्ता चिन्तासमा ह्युक्ता बिन्दुमात्रं विशेषतः। सजीवं दहते चिन्ता निर्जीवं दहते चिन्ता। ‘चिन्ताको चिन्ताके समान कहा गया है, केवल एक बिन्दुकी ही अधिकता है। चिन्ता जीवित पुरुषको जलाती है और चिन्ता मेरे हुए पुरुषको जलाती है।’

५०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

केशव | = हे केशव ! (मैं) | विपरीतानि | = विपरीत | हत्वा | = मारकर ---|---|---|---|---|--- निमित्तानि | = लक्षणों (शकुनों)-को | पश्यामि | = देख रहा हूँ (और) | श्रेयः | = श्रेय (लाभ) च | = भी | आहवे | = युद्धमें | च | = भी | | स्वजन्म | = स्वजनोंको | न | = नहीं | | | | अनुपश्यामि | = देख रहा हूँ।

व्याख्या —‘निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव’—हे केशव! मैं शकुनोंको१ भी विपरीत ही देख रहा हूँ। तात्पर्य है कि किसी भी कार्यके आरम्भमें मनमें जितना अधिक उत्साह (हर्ष) होता है, वह उत्साह उस कार्यको उतना ही सिद्ध करनेवाला होता है। परन्तु अगर कार्यके आरम्भमें ही उत्साह भंग हो जाता है, मनमें संकल्प-विकल्प ठीक नहीं होते, तो उस कार्यका परिणाम अच्छा नहीं होता। इसी भावसे अर्जुन कह रहे हैं कि अभी मेरे शरीरमें अवयवोंका शिथिल होना, कम्प होना, मुखका सूखना आदि जो लक्षण हो रहे हैं, ये व्यक्तिगत शकुन भी ठीक नहीं हो रहे हैं। इसके सिवाय आकाशसे उल्कापात होना, असमयमें ग्रहण लगना, भूकम्प होना, पशु-पक्षियोंका भयंकर बोली बोलना, चन्द्रमाके काले चिह्नका मिट-सा जाना, बादलोंसे रक्तकी वर्षा होना आदि जो पहले शकुन हुए हैं, वे भी ठीक नहीं हुए हैं। इस तरह अभीके और

पहलेके—इन दोनों शकुनोंकी ओर देखाता हूँ, तो मेरेको ये दोनों ही शकुन विपरीत अर्थात् भावी अनिष्टके सूचक दीखते हैं।

‘न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजन्माहवे’—युद्धमें अपने कुटुम्बियोंको मारनेसे हमें कोई लाभ होगा—ऐसी बात भी नहीं है। इस युद्धके परिणाममें हमारे लिये लोक और परलोक—दोनों ही हितकारक नहीं दीखते। कारण कि जो अपने कुलका नाश करता है, वह अत्यन्त पापी होता है। अतः कुलका नाश करनेसे हमें पाप ही लगेगा, जिससे नरकोंकी प्राप्ति होगी।

इस श्लोकमें ‘निमित्तानि पश्यामि’ और ‘श्रेयः अनुपश्यामि’१३—इन दोनों वाक्योंसे अर्जुन यह कहना चाहते हैं कि मैं शकुनोंको देखूँ अथवा स्वयं विचार करूँ, दोनों ही रीतिसे युद्धका आरम्भ और उसका परिणाम हमारे लिये और संसारमात्रके लिये हितकारक नहीं दीखता।

सम्बन्ध —जिसमें न तो शुभ शकुन दीखते हैं और न श्रेय ही दीखता है, ऐसी अनिष्टकारक विजयको प्राप्त करनेकी अनिच्छा अर्जुन आगेके श्लोकमें प्रकट करते हैं।

न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च। किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ ३२ ॥

कृष्ण= हे कृष्ण ! (मैं)= और,किम्= क्या लाभ ?
= न (तो)सुखानि= (न) सुखोंको
(ही चाहता हूँ) ।भोगैः= भोगोंसे (क्या लाभ ?)
विजयम्= विजयगोविन्द= हे गोविन्द !वा= अथवा
काङ्क्षे= चाहता हूँ,नः= हमलोगोंकोजीवितेन= जीनेसे (भी)
= नराज्येन= राज्यसेकिम्= क्या लाभ ?
राज्यम्= राज्य (चाहता हूँ)

१-जितने भी शकुन होते हैं, वे किसी अच्छी या बुरी घटनाके होनेमें निमित्त नहीं होते अर्थात् वे किसी घटनाके निर्माता नहीं होते, प्रत्युत भावी घटनाकी सूचना देनेवाले होते हैं।

शकुन बतानेवाले प्राणी भी वास्तवमें शकुनोंको बताते नहीं हैं; किन्तु उनकी स्वाभाविक चेष्टासे शकुन सूचित होते हैं।

२-यद्यपि अर्जुन शरीरमें होनेवाले लक्षणोंको भी शकुन मान रहे हैं, तथापि वास्तवमें ये शकुन नहीं हैं। ये तो शोकके कारण इन्द्रियाँ, शरीर, मन, बुद्धिमें होनेवाले विकार हैं।

३-यहाँ ‘पश्यामि’ क्रिया भूत और वर्तमानके शकुनोंके विषयमें और ‘अनुपश्यामि’ क्रिया भविष्यके परिणामके विषयमें आयी है।

श्लोक ३३-३४ ]

  • साधक-संजीवनी *

५१

व्याख्या —‘न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च’—मान लें कि युद्धमें हमारी विजय हो जाय, तो विजय होनेसे पूरी पृथ्वीपर हमारा राज्य हो जायगा, अधिकार हो जायगा। पृथ्वीका राज्य मिलनेसे हमें अनेक प्रकारके सुख मिलेंगे। परन्तु इनमेंसे मैं कुछ भी नहीं चाहता अर्थात् मेरे मनमें विजय, राज्य एवं सुखोंकी कामना नहीं है।

‘किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा’ —जब हमारे मनमें किसी प्रकारकी (विजय, राज्य और सुखकी) कामना ही नहीं है, तो फिर कितना ही बड़ा राज्य क्यों न मिल जाय, पर उससे हमें क्या लाभ? कितने ही सुन्दर-सुन्दर भोग मिल जायें, पर उनसे हमें क्या लाभ?

सम्बन्ध—अर्जुन विजय आदि क्यों नहीं चाहते, इसका हेतु आगेके श्लोकमें बताते हैं।

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।

त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ ३३ ॥

येषाम् = जिनके अर्थे = लिये नः = हमारी राज्यम् = राज्य, भोगाः = भोग च = और

सुखानि = सुखकी काङ्क्षितम् = इच्छा है, ते = वे (ही) इमे = ये सब (अपने) प्राणान् = प्राणोंकी

च = और धनानि = धनकी आशाका त्यक्त्वा = त्याग करके युद्धे = युद्धमें अवस्थिताः = खड़े हैं।

व्याख्या —‘येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ’—हम राज्य, सुख, भोग आदि जो कुछ चाहते हैं, उनको अपने व्यक्तिगत सुखके लिये नहीं चाहते, प्रत्युत इन कुटुम्बियों, प्रेमियों, मित्रों आदिके लिये ही चाहते हैं। आचार्यों, पिताओं, पितामहों, पुत्रों आदिको सुख-आराम पहुँचे, इनकी सेवा हो जाय, ये प्रसन्न रहें—इसके लिये ही हम युद्ध करके राज्य लेना चाहते हैं, भोग-सामग्री इकट्ठी करना चाहते हैं।

‘त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च’ —पर वे ही ये सब-के-सब अपने प्राणोंकी और धनकी आशाको छोड़कर युद्ध करनेके लिये हमारे सामने इस रणभूमिमें खड़े हैं। इन्होंने ऐसा विचार कर लिया है कि

अथवा कुटुम्बियोंको मारकर हम राज्यके सुख भोगते हुए कितने ही वर्ष जीते रहें, पर उससे भी हमें क्या लाभ? तात्पर्य है कि ये विजय, राज्य और भोग तभी सुख दे सकते हैं, जब भीतरमें इनकी कामना हो, प्रियता हो, महत्त्व हो। परन्तु हमारे भीतर तो इनकी कामना ही नहीं है। अतः ये हमें क्या सुख दे सकते हैं? इन कुटुम्बियोंको मारकर हमारी जीनेकी भी इच्छा नहीं है; क्योंकि जब हमारे कुटुम्बी मर जायेंगे, तब ये राज्य और भोग किसके काम आयेंगे? राज्य, भोग आदि तो कुटुम्बके लिये होते हैं, पर जब ये ही मर जायेंगे, तब इनको कौन भोगेगा? भोगनेकी बात तो दूर रही, उलटे हमें और अधिक चिन्ता, शोक होंगे!

हमें न प्राणोंका मोह है और न धनकी तृष्णा है; हम मर बेशक जायें, पर युद्धसे नहीं हटेंगे। अगर ये सब मर ही जायेंगे, तो फिर हमें राज्य किसके लिये चाहिये? सुख किसके लिये चाहिये? धन किसके लिये चाहिये? अर्थात् इन सबकी इच्छा हम किसके लिये करें?

‘प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च’ का तात्पर्य है कि वे प्राणोंकी और धनकी आशाका त्याग करके खड़े हैं अर्थात् हम जीवित रहेंगे और हमें धन मिलेगा—इस इच्छाको छोड़कर वे खड़े हैं। अगर उनमें प्राणोंकी और धनकी इच्छा होती, तो वे मरनेके लिये युद्धमें क्यों खड़े होते? अतः यहाँ प्राण और धनका त्याग करनेका तात्पर्य उनकी आशाका त्याग करनेमें ही है।

सम्बन्ध—जिनके लिये हम राज्य, भोग और सुख चाहते हैं, वे लोग कौन हैं—इसका वर्णन अर्जुन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।

मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥ ३४ ॥

५२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

एतान् हन्तुमिच्छामि धन्तोऽपि मधुसूदन।

अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ ३५ ॥

आचार्याः१= आचार्य,तथा= तथा (अन्य जितने भी)मधुसूदन= हे मधुसूदन!(मुझे)
पितरः= पिता,सम्बन्धिनः= सम्बन्धी हैं, (मुझपर)त्रैलोक्य-राज्यस्य
पुत्राः= पुत्रहेतोः= मिलता हो
= औरधनः= प्रहार करनेपरअपि= तो भी (मैं इनको
तथा, एव= उसी प्रकारअपि= भी (मैं)मारना नहीं चाहता),
पितामहः= पितामह,एतान्= इनकोनु= फिर
मातुलाः= मामा,हन्तुम्= मारनामहीकृते= पृथ्वीके लिये तो
श्वशुराः= ससुर,= नहीं(मैं इनको मारूँ ही)
पौत्राः= पौत्र,इच्छामि= चाहता, (और)किम्= क्या ?
श्यालाः= साले

व्याख्या —[ भगवान् आगे सोलहवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें कहेंगे कि काम, क्रोध और लोभ—ये तीनों ही नरकके द्वार हैं। वास्तवमें एक कामके ही ये तीन रूप हैं। ये तीनों सांसारिक वस्तुओं, व्यक्तियों आदिको महत्व देनेसे पैदा होते हैं। काम अर्थात् कामनाकी दो तरहकी क्रियाएँ होती हैं—इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्ति। इनमेंसे इष्टकी प्राप्ति भी दो तरहकी होती है—संग्रह करना और सुख भोगना। संग्रहकी इच्छाका नाम ‘लोभ’ है और सुखभोगकी इच्छाका नाम ‘काम’ है। अनिष्टकी निवृत्तिमें बाधा पड़नेपर ‘क्रोध’ आता है अर्थात् भोगोंकी, संग्रहकी प्राप्तिमें बाधा देनेवालोंपर अथवा हमारा अनिष्ट करनेवालोंपर, हमारे शरीरका नाश करनेवालोंपर क्रोध आता है, जिससे अनिष्ट करनेवालोंका नाश करनेकी क्रिया होती है। इससे सिद्ध हुआ कि युद्धमें मनुष्यकी दो तरहसे ही प्रवृत्ति होती है—अनिष्टकी निवृत्तिके लिये अर्थात् अपने ‘क्रोध’ को सफल बनानेके लिये और इष्टकी प्राप्तिके लिये अर्थात् ‘लोभ’ की पूर्तिके लिये। परन्तु अर्जुन यहाँ इन दोनों ही बातोंका निषेध कर रहे हैं। ]

‘आचार्याः पितरः ..... किं नु महीकृते’ —अगर हमारे ये कुटुम्बीजन अपनी अनिष्ट-निवृत्तिके लिये क्रोधमें आकर मेरेपर प्रहार करके मेरा वध भी करना चाहें, तो भी मैं

अपनी अनिष्ट-निवृत्तिके लिये क्रोधमें आकर इनको मारना नहीं चाहता। अगर ये अपनी इष्टप्राप्तिके लिये राज्यके लोभमें आकर मेरेको मारना चाहें, तो भी मैं अपनी इष्ट-प्राप्तिके लिये लोभमें आकर इनको मारना नहीं चाहता। तात्पर्य यह हुआ कि क्रोध और लोभमें आकर मेरेको नरकोंका दरवाजा मोल नहीं लेना है।

यहाँ दो बार ‘अपि’ पदका प्रयोग करनेमें अर्जुनका आशय यह है कि मैं इनके स्वार्थमें बाधा ही नहीं देता तो ये मुझे मारेंगे ही क्यों ? पर मान लो कि ‘पहले इसने हमारे स्वार्थमें बाधा दी है’ ऐसे विचारसे ये मेरे शरीरका नाश करनेमें प्रवृत्त हो जायँ, तो भी (धन्तोऽपि) मैं इनको मारना नहीं चाहता। दूसरी बात, इनको मारनेसे मुझे त्रिलोकीका राज्य मिल जाय, यह तो सम्भावना ही नहीं है, पर मान लो कि इनको मारनेसे मुझे त्रिलोकीका राज्य मिलता हो, तो भी (अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः) मैं इनको मारना नहीं चाहता।

‘मधुसूदन’ सम्बोधनका तात्पर्य है कि आप तो दैत्योंको मारनेवाले हैं, पर ये द्रोण आदि आचार्य और भीष्म आदि पितामह दैत्य थोड़े ही हैं, जिससे मैं इनको मारनेकी इच्छा करूँ ? ये तो हमारे अत्यन्त नजदीकके खास सम्बन्धी हैं।

‘आचार्याः’ —इन कुटुम्बियोंमें जिन द्रोणाचार्य आदिसे

१-छब्बीसवें श्लोकमें ‘पितृन्थ पितामहान् .....’ कहकर सबसे पहले पिताओं और पितामहोंका नाम लिया गया है, और यहाँ ‘आचार्याः पितरः.....’ कहकर सबसे पहले आचार्योंका नाम लिया गया है। इसका तात्पर्य है कि वहाँ तो कुटुम्बिक स्नेहकी मुख्यता है, इसलिये वहाँ पिताका नाम सबसे पहले लिया है; और यहाँ न मारनेका विषय चल रहा है, इसलिये यहाँ सबसे पहले आदरणीय पूज्य आचार्यों—गुरुजनोंका नाम लिया है, जो कि जीवके परम हितैषी होते हैं।

२-‘मधु’ नामक दैत्यको मारनेके कारण भगवान्का नाम ‘मधुसूदन’ पड़ा था।

श्लोक ३६ ]

  • साधक-संजीवनी *

५३

हमारा विद्याका, हितका सम्बन्ध है, ऐसे पूज्य आचार्योंकी मेरेको सेवा करनी चाहिये कि उनके साथ लड़ाई करनी चाहिये? आचार्यके चरणोंमें तो अपने-आपको, अपने प्राणोंको भी समर्पित कर देना चाहिये। यही हमारे लिये उचित है।

'पितरः' —शरीरके सम्बन्धको लेकर जो पितालोग हैं, उनका ही तो रूप यह हमारा शरीर है। शरीरसे उनके स्वरूप होकर हम क्रोध या लोभमें आकर अपने उन पिताओंको कैसे मारें?

'पुत्राः' —हमारे और हमारे भाइयोंके जो पुत्र हैं, वे तो सर्वथा पालन करनेयोग्य हैं। वे हमारे विपरीत कोई क्रिया भी कर बैठें, तो भी उनका पालन करना ही हमारा धर्म है।

'पितामहाः' —ऐसे ही जो पितामह हैं, वे जब हमारे पिताजीके भी पूज्य हैं, तब हमारे लिये तो परमपूज्य हैं ही। वे हमारी ताड़ना कर सकते हैं, हमें मार भी सकते हैं। पर हमारी तो ऐसी ही चेष्टा होनी चाहिये, जिससे उनको किसी तरहका दुःख न हो, कष्ट न हो, प्रत्युत

उनको सुख हो, आराम हो, उनकी सेवा हो।

'मातुलाः' —हमारे जो मामालोग हैं, वे हमारा पालन-पोषण करनेवाली माताओंके ही भाई हैं। अतः वे माताओंके समान ही पूज्य होने चाहिये।

'श्वशुराः' —ये जो हमारे ससुर हैं, ये मेरी और मेरे भाइयोंकी पत्नियोंके पूज्य पिताजी हैं। अतः ये हमारे लिये भी पिताके ही तुल्य हैं। इनको मैं कैसे मारना चाहूँ?

'पौत्राः' —हमारे पुत्रोंके जो पुत्र हैं, वे तो पुत्रोंसे भी अधिक पालन-पोषण करनेयोग्य हैं।

'श्यालाः' —हमारे जो साले हैं, वे भी हमलोगोंकी पत्नियोंके प्यारे भैया हैं। उनको भी कैसे मारा जाय!

'सम्बन्धिनः' —ये जितने सम्बन्धी दीख रहे हैं और इनके अतिरिक्त जितने भी सम्बन्धी हैं, उनका पालन-पोषण, सेवा करनी चाहिये कि उनको मारना चाहिये? इनको मारनेसे अगर हमें त्रिलोकीका राज्य भी मिल जाय, तो भी क्या इनको मारना उचित है? इनको मारना तो सर्वथा अनुचित है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अर्जुनने स्वजनोंको न मारनेमें दो हेतु बताये। अब परिणामकी दृष्टिसे भी स्वजनोंको न मारना सिद्ध करते हैं।

निहत्य धार्तराष्ट्रानः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।

पापमेवाश्रयेदस्मान्

हत्वैतानाततायिनः ॥ ३६ ॥

जनार्दन= हे जनार्दन! (इन)का= क्याहत्वा= मारनेसे तो
धार्तराष्ट्रान्= धृतराष्ट्र-
सम्बन्धियोंकोप्रीतिः= प्रसन्नताअस्मान्= हमें
निहत्य= मारकरस्यात्= होगी?पापम्= पाप
नः= हमलोगोंकोएतान्= इनएव= ही
आततायिनः= आततायियोंकोआश्रयेत्= लगेगा।

व्याख्या— 'निहत्य धार्तराष्ट्रानः ..... हत्वैतानाततायिनः'—धृतराष्ट्रके पुत्र और उनके सहयोगी दूसरे जितने भी सैनिक हैं, उनको मारकर विजय प्राप्त करनेसे हमें क्या प्रसन्नता होगी? अगर हम क्रोध अथवा लोभके वेगमें आकर इनको मार भी दें, तो उनका वेग शान्त होनेपर हमें रोना ही पड़ेगा अर्थात् क्रोध और लोभमें आकर हम क्या अनर्थ कर बैठें—ऐसा पश्चाताप ही करना पड़ेगा। कुटुम्बियोंकी याद आनेपर उनका अभाव बार-बार खटकेगा। चित्तमें उनकी मृत्युका शोक सताता रहेगा। ऐसी स्थितिमें हमें कभी प्रसन्नता हो सकती है क्या? तात्पर्य है कि इनको मारनेसे हम

इस लोकमें जबतक जीते रहेंगे, तबतक हमारे चित्तमें कभी प्रसन्नता नहीं होगी और इनको मारनेसे हमें जो पाप लगेगा, वह परलोकमें हमें भयंकर दुःख देनेवाला होगा।

आततायी छः प्रकारके होते हैं—आग लगानेवाला, विष देनेवाला, हाथमें शस्त्र लेकर मारनेको तैयार हुआ, धनको हरनेवाला, जमीन (राज्य) छीननेवाला और स्त्रीका हरण करनेवाला*। दुर्मीधन आदिमें ये छहों ही लक्षण घटते थे। उन्होंने पाण्डवोंको लाक्षागृहमें आग लगाकर मारना चाहा था। भीमसेनको जहर खिलाकर जलमें फेंक दिया था। हाथमें शस्त्र लेकर वे पाण्डवोंको मारनेके लिये तैयार थे

  • अग्निदो गरदश्चैव शस्त्रपाणिर्धनापहः। क्षेत्रदारापहर्ता च षडैते ह्याततायिनः ॥ (वसिष्ठमूर्ति ३। १९)

'आग लगानेवाला, विष देनेवाला, हाथमें शस्त्र लेकर मारनेको उद्यत हुआ, धनका हरण करनेवाला, जमीन छीननेवाला और स्त्रीका हरण करनेवाला—ये छहों ही आततायी हैं।'

५४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

ही। द्युतक्रीडामें छल-कपट करके उन्होंने पाण्डवोंका धन और राज्य हर लिया था। द्रौपदीको भरी सभामें लाकर दुर्घोधनने 'मैंने तेरेको जीत लिया है, तू मेरी दासी हो गयी है' आदि शब्दोंसे बड़ा अपमान किया था और दुर्घोधनादिकी प्रेरणासे जयद्रथ द्रौपदीको हरकर ले गया था।

शास्त्रोंके वचनोंके अनुसार आततायीको मारनेसे मारनेवालेको कुछ भी दोष (पाप) नहीं लगता—'नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन' (मनुस्मृति ८।३५१)। परन्तु आततायीको मारना उचित होते हुए भी मारनेकी क्रिया अच्छी नहीं है। शास्त्र भी कहता है कि मनुष्यको कभी किसीकी हिंसा नहीं करनी चाहिये—'न हिंस्यात्सर्वं भूतानि'; हिंसा न करना परमधर्म है—'अहिंसा परमो धर्मः'।*। अतः

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें युद्धका दुष्परिणाम बताकर अब अर्जुन युद्ध करनेका सर्वथा अनौचित्य बताते हैं।

तस्मान्नाहर्षि वयं हन्तु धार्तराष्ट्रान्सवबान्धवान्।

स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥ ३७ ॥

तस्मात्= इसलियेवयम्= हमकुटुम्बियोंको
स्वबान्धवान्= अपने बान्धव (इन)न, अहर्षिः= योग्य नहीं हैं;हत्वा
धार्तराष्ट्रान्= धृतराष्ट्र-
सम्बन्धियोंकोहि= क्योंकिकथम्= कैसे
हन्तुम्= मारनेके लियेमाधव= हे माधव !सुखिनः
स्वजनम्= अपनेस्याम= होंगे ?

व्याख्या—'तस्मान्नाहर्षि वयं हन्तु धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान्'—अभीतक (पहले अध्यायके अट्टाईसवें श्लोकसे लेकर यहाँतक) मैंने कुटुम्बियोंको न मारनेमें जितनी युक्तियाँ, दलीलें दी हैं, जितने विचार प्रकट किये हैं, उनके रहते हुए हम ऐसे अनर्थकारी कार्यमें कैसे प्रवृत्त हो सकते हैं? अपने बान्धव इन धृतराष्ट्र-सम्बन्धियोंको मारनेका कार्य हमारे लिये सर्वथा ही अयोग्य है, अनुचित है। हम-जैसे अच्छे पुरुष ऐसा अनुचित कार्य कर ही कैसे सकते हैं ?

'स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव'—

क्रोध-लोभके वशीभूत होकर कुटुम्बियोंकी हिंसाका कार्य हम क्यों करें ?

आततायी होनेसे ये दुर्घोधन आदि मारनेके लायक हैं ही; परन्तु अपने कुटुम्बी होनेसे इनको मारनेसे हमें पाप ही लगेगा; क्योंकि शास्त्रोंमें कहा गया है कि जो अपने कुलका नाश करता है, वह अत्यन्त पापी होता है—'स एव पापिष्ठतमो यः कुर्यात्कुलनाशनम्'। अतः जो आततायी अपने खास कुटुम्बी हैं, उन्हें कैसे मारा जाय ? उनसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद कर लेना, उनसे अलग हो जाना तो ठीक है, पर उन्हें मारना ठीक नहीं है। जैसे, अपना बेटा ही आततायी हो जाय तो उससे अपना सम्बन्ध हटाया जा सकता है, पर उसे मारा थोड़े ही जा सकता है !

हे माधव ! इन कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे ही बड़ा दुःख हो रहा है, संताप हो रहा है, तो फिर क्रोध तथा लोभके वशीभूत होकर हम उनको मार दें तो कितना दुःख होगा ! उनको मारकर हम कैसे सुखी होंगे ?

यहाँ 'ये हमारे घनिष्ठ सम्बन्धी हैं'—इस ममताजनित मोहके कारण अपने क्षत्रियोचित कर्तव्यकी तरफ अर्जुनकी दृष्टि ही नहीं जा रही है। कारण कि जहाँ मोह होता है, वहाँ मनुष्यका विवेक दब जाता है। विवेक दबनेसे मोहकी प्रबलता हो जाती है। मोहके प्रबल होनेसे अपने कर्तव्यका स्पष्ट भान नहीं होता।

  • आततायीको मार दे—यह अर्थशास्त्र है और किसीकी भी हिंसा न करे—यह धर्मशास्त्र है। जिसमें अपना कोई स्वार्थ (मतलब) रहता है, वह 'अर्थशास्त्र' कहलाता है; और जिसमें अपना कोई स्वार्थ नहीं रहता, वह 'धर्मशास्त्र' कहलाता है। अर्थशास्त्रकी अपेक्षा धर्मशास्त्र बलवान् होता है। अतः शास्त्रोंमें जहाँ अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र— दोनोंमें विरोध आये, वहाँ अर्थशास्त्रका त्याग करके धर्मशास्त्रको ही ग्रहण करना चाहिये—

स्मृत्योविरोधे न्यायस्तु बलवान्यवहारतः । अर्थशास्त्रान्तु बलवद्भर्मशास्त्रमिति स्थितिः ॥ (याज्ञवल्क्यस्मृति २।२१)

श्लोक ३८-३९ ]

  • साधक-संजीवनी *

५५

सम्बन्ध—अब यहाँ यह शंका होती है कि जैसे तुम्हारे लिये दुर्योधन आदि स्वजन हैं, ऐसे ही दुर्योधन आदिके लिये भी तो तुम स्वजन हो। स्वजनकी दृष्टिसे तुम तो युद्धसे निवृत्त होनेकी बात सोच रहे हो, पर दुर्योधन आदि युद्धसे निवृत्त होनेकी बात ही नहीं सोच रहे हैं—इसका क्या कारण है? इसका उत्तर अर्जुन आगेके दो श्लोकोंमें देते हैं।

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।

कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ ३८ ॥

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।

कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दनं ॥ ३९ ॥

यद्यपि= यद्यपि= औरदोषम्= दोषको
लोभोपहतचेतसः= लोभकेमित्रद्रोहे= मित्रोंके साथ द्रष्ट करनेसे होनेवालेप्रपश्यद्भिः= टीक-टीक जाननेवाले
कारण जिनकाअस्माभिः= हम लोग
विवेक-विचार लुप्तपातकम्= पापकोअस्मात्= इस
हो गया है, ऐसे= नहींपापात्= पापसे
एते= ये (दुर्योधन आदि)पश्यन्ति= देखते, (तो भी)निवर्तितुम्= निवृत्त होनेका
कुलक्षयकृतम्= कुलका नाश करनेसे होनेवालेजनार्दन= हे जनार्दन!ज्ञेयम्= विचार
कुलक्षयकृतम्= कुलका नाश करनेसे होनेवालेकथम्= क्यों
दोषम्= दोषको= न करें?

व्याख्या —‘यद्यप्येते न पश्यन्ति ’” मित्रद्रोहे च पातकम्’—इतना मिल गया, इतना और मिल जाय; फिर ऐसा मिलता ही रहे—ऐसे धन, जमीन, मकान, आदर, प्रशंसा, पद, अधिकार आदिकी तरफ बढ़ती हुई वृत्तिका नाम ‘लोभ’ है। इस लोभ-वृत्तिके कारण इन दुर्योधनादिकी विवेक-शक्ति लुप्त हो गयी है, जिससे वे यह विचार नहीं कर पा रहे हैं कि जिस राज्यके लिये हम इतना बड़ा पाप करने जा रहे हैं, कुटुम्बियोंका नाश करने जा रहे हैं, वह राज्य हमारे साथ कितने दिन रहेगा और हम उसके साथ कितने दिन रहेंगे? हमारे रहते हुए यह राज्य चला जायगा तो हमारी क्या दशा होगी और राज्यके रहते हुए हमारे शरीर चले जायेंगे तो क्या दशा होगी? क्योंकि मनुष्य संयोगका जितना सुख लेता है, उसके व्योगका उतना दुःख उसे भोगना ही पड़ता है। संयोगमें इतना सुख नहीं होता, जितना व्योगमें दुःख होता है। तात्पर्य है कि अन्तःकरणमें लोभ छा जानेके कारण इनको राज्य-ही-राज्य दीख रहा है। कुलका नाश करनेसे कितना भयंकर पाप होगा, वह इनको दीख ही नहीं रहा है।

जहाँ लड़ाई होती है, वहाँ समय, सम्पत्ति, शक्तिका नाश हो जाता है। तरह-तरहकी चिन्ताएँ और आपत्तियाँ

आ जाती हैं। दो मित्रोंमें भी आपसमें खटपट मच जाती है, मनोमालिन्य हो जाता है। कई तरहका मतभेद हो जाता है। मतभेद होनेसे वैरभाव हो जाता है। जैसे द्रुपद और द्रोण—दोनों बचपनके मित्र थे। परन्तु राज्य मिलनेसे द्रुपदने एक दिन द्रोणका अपमान करके उस मित्रताको टुकरा दिया। इससे राजा द्रुपद और द्रोणाचार्यके बीच वैरभाव हो गया। अपने अपमानका बदला लेनेके लिये द्रोणाचार्यने मेरे द्वारा राजा द्रुपदको परास्त करकर उसका आधा राज्य ले लिया। इसपर द्रुपदने द्रोणाचार्यका नाश करनेके लिये एक यज्ञ कराया, जिससे धृष्टद्युम्न और द्रौपदी—दोनों पैदा हुए। इस तरह मित्रोंके साथ वैरभाव होनेसे कितना भयंकर पाप होगा, इस तरफ ये देख ही नहीं रहे हैं!

विशेष बात

अभी हमारे पास जिन वस्तुओंका अभाव है, उन वस्तुओंके बिना भी हमारा काम चल रहा है, हम अच्छी तरहसे जी रहे हैं। परन्तु जब वे वस्तुएँ हमें मिलनेके बाद फिर बिछुड़ जाती हैं, तब उनके अभावका बड़ा दुःख होता है। तात्पर्य है कि पहले वस्तुओंका जो निरन्तर अभाव था, वह इतना दुःखदायी नहीं था, जितना वस्तुओंका संयोग

५६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

होकर फिर उनसे वियोग होना दुःखदायी है। ऐसा होनेपर भी मनुष्य अपने पास जिन वस्तुओंका अभाव मानता है, उन वस्तुओंको वह लोभके कारण पानेकी चेष्टा करता रहता है। विचार किया जाय तो जिन वस्तुओंका अभी अभाव है, बीचमें प्रारब्धानुसार उनकी प्राप्ति होनेपर भी अन्तमें उनका अभाव ही रहेगा। अतः हमारी तो वही अवस्था रही, जो कि वस्तुओंके मिलनेसे पहले थी। बीचमें लोभके कारण उन वस्तुओंको पानेके लिये केवल परिश्रम-ही-परिश्रम पल्ले पड़ा, दुःख-ही-दुःख भोगना पड़ा। बीचमें वस्तुओंके संयोगसे जो थोड़ा-सा सुख हुआ है, वह तो केवल लोभके कारण ही हुआ है। अगर भीतरमें लोभ-रूपी दोष न हो, तो वस्तुओंके संयोगसे सुख हो ही नहीं सकता। ऐसे ही मोहरूपी दोष न हो, तो कुटुम्बियोंसे सुख हो ही नहीं सकता। लालचरूपी दोष न हो, तो संग्रहका सुख हो ही नहीं सकता। तात्पर्य है कि संसारका सुख किसी-न-किसी दोषसे ही होता है। कोई भी दोष न होनेपर संसारसे सुख हो ही नहीं सकता। परन्तु लोभके कारण मनुष्य ऐसा विचार कर ही नहीं सकता। यह लोभ उसके विवेक-विचारको लुप्त कर देता है।

‘कथं न ज्ञेयमस्माभिः.....प्रपश्यद्भिर्जनार्दन’—अब अर्जुन अपनी बात कहते हैं कि यद्यपि दुर्योधनादि अपने कुलक्षयसे होनेवाले दोषको और मित्रद्रोहसे होनेवाले पापको नहीं देखते, तो भी हमलोगोंको कुलक्षयसे होनेवाली अनर्थ-परम्पराको देखना ही चाहिये [जिसका वर्णन अर्जुन आगे चालीसवें श्लोकसे चौवालीसवें श्लोकतक करेंगे]; क्योंकि हम कुलक्षयसे होनेवाले दोषोंको भी अच्छी तरहसे जानते हैं और मित्रोंके साथ द्रोह-(वैर,

द्रोह-) से होनेवाले पापको भी अच्छी तरहसे जानते हैं। अगर वे मित्र हमें दुःख दें, तो वह दुःख हमारे लिये अनिष्टकारक नहीं है। कारण कि दुःखसे तो हमारे पूर्वपापोंका ही नाश होगा, हमारी शुद्धि ही होगी। परन्तु हमारे मनमें अगर द्रोह—वैरभाव होगा, तो वह मरनेके बाद भी हमारे साथ रहेगा और जन्म-जन्मान्तरक हमें पाप करनेमें प्रेरित करता रहेगा, जिससे हमारा पतन-ही-पतन होगा। ऐसे अनर्थ करनेवाले और मित्रोंके साथ द्रोह पैदा करनेवाले इस युद्धरूपी पापसे बचनेका विचार क्यों नहीं करना चाहिये? अर्थात् विचार करके हमें इस पापसे जरूर ही बचना चाहिये।

यहाँ अर्जुनकी दृष्टि दुर्योधन आदिके लोभकी तरफ तो जा रही है, पर वे खुद कौटुम्बिक स्नेह-(मोह-) में आबद्ध होकर बोल रहे हैं— इस तरफ उनकी दृष्टि नहीं जा रही है। इस कारण वे अपने कर्तव्यको नहीं समझ रहे हैं। यह नियम है कि मनुष्यकी दृष्टि जबतक दूसरोंके दोषकी तरफ रहती है, तबतक उसको अपना दोष नहीं दीखता, उल्टे एक अभिमान होता है कि इनमें तो यह दोष है, पर हमारेमें यह दोष नहीं है। ऐसी अवस्थामें वह यह सोच ही नहीं सकता कि अगर इनमें कोई दोष है तो हमारेमें भी कोई दूसरा दोष हो सकता है। दूसरा दोष यदि न भी हो, तो भी दूसरोंका दोष देखना—यह दोष तो है ही। दूसरोंका दोष देखना एवं अपनेमें अच्छाईका अभिमान करना—ये दोनों दोष साथमें ही रहते हैं। अर्जुनको भी दुर्योधन आदिमें दोष दीख रहे हैं और अपनेमें अच्छाईका अभिमान हो रहा है (अच्छाईके अभिमानकी छायामें मात्र दोष रहते हैं), इसलिये उनको अपनेमें मोहरूपी दोष नहीं दीख रहा है।

सम्बन्ध—कुलका क्षय करनेसे होनेवाले जिन दोषोंको हम जानते हैं, वे दोष कौन-से हैं? उन दोषोंकी परम्परा आगेके पाँच श्लोकोंमें बताते हैं।

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।

धर्मं नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्माऽभिभवत्युत ॥ ४० ॥

कुलक्षये= कुलका क्षय होनेपरउत= औरकृत्स्नम्= सम्पूर्ण
सनातनाः= सदासे चलते आयेधर्मं= धर्मकाकुलम्= कुलको
कुलधर्माः= कुलधर्मनष्टे= नाश होनेपर (बचे हुए)अधर्मः= अधर्म
प्रणश्यन्ति= नष्ट हो जाते हैंअभिभवति= दबा लेता है।

लोक ४१ ]

  • साधक-संजीवनी *

५७

व्याख्या—‘कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः’ —जब युद्ध होता है, तब उसमें कुल-(वंश-) का क्षय (हास) होता है। जबसे कुल आरम्भ हुआ है, तभीसे कुलके धर्म अर्थात् कुलकी पवित्र परम्पराएँ, पवित्र रीतियाँ, मर्यादाएँ भी परम्परासे चलती आयी हैं। परन्तु जब कुलका क्षय हो जाता है, तब सदासे कुलके साथ रहनेवाले धर्म भी नष्ट हो जाते हैं अर्थात् जन्मके समय, द्विजाति-संस्कारके समय, विवाहके समय, मृत्युके समय और मृत्युके बाद किये जानेवाले जो-जो शास्त्रीय पवित्र रीति-रिवाज हैं, जो कि जीवित और मृतात्मा मनुष्योंके लिये इस लोकमें और परलोकमें कल्याण करनेवाले हैं, वे नष्ट हो जाते हैं। कारण कि जब कुलका ही नाश हो जाता है, तब कुलके आश्रित रहनेवाले धर्म किसके आश्रित रहेंगे ?

‘धर्मं नष्टे कुलं कृतनमधर्माऽभिभवत्युत’ —जब कुलकी पवित्र मर्यादाएँ, पवित्र आचरण नष्ट हो जाते हैं, तब धर्मका पालन न करना और धर्मसे विपरीत काम

करना अर्थात् करनेलायक कामको न करना और न करनेलायक कामको करनारूप अधर्म सम्पूर्ण कुलको दबा लेता है अर्थात् सम्पूर्ण कुलमें अधर्म छा जाता है।

अब यहाँ यह शंका होती है कि जब कुल नष्ट हो जायगा, कुल रहेगा ही नहीं, तब अधर्म किसको दबायेगा ? इसका उत्तर यह है कि जो लड़ाईके योग्य पुरुष हैं, वे तो युद्धमें मारे जाते हैं; किन्तु जो लड़ाईके योग्य नहीं हैं, ऐसे जो बालक और स्त्रियाँ पीछे बच जाती हैं, उनको अधर्म दबा लेता है। कारण कि जब युद्धमें शस्त्र, शास्त्र, व्यवहार आदिके जानकार और अनुभवी पुरुष मर जाते हैं, तब पीछे बचे लोगोंको अच्छी शिक्षा देनेवाले, उनपर शासन करनेवाले नहीं रहते। इससे मर्यादाका, व्यवहारका ज्ञान न होनेसे वे मनमाना आचरण करने लग जाते हैं अर्थात् वे करनेलायक कामको तो करते नहीं और न करनेलायक कामको करने लग जाते हैं। इसलिये उनमें अधर्म फैल जाता है।

अधर्माभिभावत्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।

स्त्रीषु दुष्टासु वाष्ण्यं जायते वर्णसङ्करः ॥ ४१ ॥

कृष्ण = हे कृष्ण ! अधर्माभिभावत् = अधर्मके अधिक बढ़ जानेसे कुलस्त्रियः = कुलकी स्त्रियाँ

व्याख्या—‘अधर्माभिभावत्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः’ —धर्मका पालन करनेसे अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है। अन्तःकरण शुद्ध होनेसे बुद्धि सात्त्विकी बन जाती है। सात्त्विकी बुद्धिमें क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये—इसका विवेक जाग्रत् रहता है। परन्तु जब कुलमें अधर्म बढ़ जाता है, तब आचरण अशुद्ध होने लगते हैं, जिससे अन्तःकरण अशुद्ध हो जाता है। अन्तःकरण अशुद्ध होनेसे बुद्धि तामसी बन जाती है। बुद्धि तामसी होनेसे मनुष्य अकर्तव्यको कर्तव्य और कर्तव्यको अकर्तव्य मानने लग जाता है अर्थात् उसमें शास्त्र-मर्यादासे उलटी बातें पैदा होने लग जाती हैं। इस विपरीत बुद्धिसे कुलकी स्त्रियाँ दूषित अर्थात् व्यभिचारिणी हो जाती हैं।

प्रदुष्यन्ति = दूषित हो जाती हैं (और) वाष्ण्यं = हे वाष्ण्य ! स्त्रीषु = स्त्रियोंके

दुष्टासु = दूषित होनेपर वर्णसङ्करः = वर्णसंकर जायते = पैदा हो जाते हैं।

‘स्त्रीषु दुष्टासु वाष्ण्यं जायते वर्णसङ्करः’ —स्त्रियोंके दूषित होनेपर वर्णसंकर पैदा हो जाता है*। पुरुष और स्त्री—दोनों अलग-अलग वर्णके होनेपर उनसे जो संतान पैदा होती है, वह ‘वर्णसंकर’ कहलाती है।

अर्जुन यहाँ ‘कृष्ण’ सम्बोधन देकर यह कह रहे हैं कि आप सबको खींचनेवाले होनेसे ‘कृष्ण’ कहलाते हैं, तो आप यह बतायें कि हमारे कुलको आप किस तरफ खींचेंगे अर्थात् किधर ले जायेंगे ?

‘वाष्ण्यं’ सम्बोधन देनेका भाव है कि आप वृष्णिवंशमें अवतार लेनेके कारण ‘वाष्ण्यं’ कहलाते हैं। परन्तु जब हमारे कुल-(वंश-) का नाश हो जायगा, तब हमारे वंशज किस कुलके कहलायेंगे ? अतः कुलका नाश करना उचित नहीं है।

  • परस्पर विरुद्ध धर्माँका मिश्रण होकर जो बनता है, उसको ‘संकर’ कहते हैं। जब कर्तव्यका पालन नहीं होता, तब धर्मसंकर, वर्णसंकर, जातिसंकर, कुलसंकर, वेशसंकर, भाषासंकर, आहारसंकर आदि अनेक संकरदोष आ जाते हैं।

५८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।

पतन्ति पितरो होषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ ४२ ॥

सङ्कः= वर्णसंकरजानेवालाएषाम्= इन (कुलधातियों)-के
कुलघ्नानाम्= कुलधातियोंकोएव= ही (होता है)।पितरः
= औरलुप्तपिण्डोदकक्रियाः= श्राद्धहि
कुलस्य= कुलकोऔर तर्पण न
नरकाय= नरकमें लेमिलनेसेपतन्ति

व्याख्या— ‘सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च’—वर्ण-मिश्रणसे पैदा हुए वर्णसंकर-(सन्तान-) में धार्मिक बुद्धि नहीं होती। वह मर्यादाओंका पालन नहीं करता; क्योंकि वह खुद बिना मर्यादासे पैदा हुआ है। इसलिये उसके खुदके कुलधर्म न होनेसे वह उनका पालन नहीं करता, प्रत्युत कुलधर्म अर्थात् कुलमर्यादासे विरुद्ध आचरण करता है।

जिन्होंने युद्धमें अपने कुलका संहार कर दिया है, उनको ‘कुलघाती’ कहते हैं। वर्णसंकर ऐसे कुलधातियोंको नरकमें ले जाता है। केवल कुलधातियोंको ही नहीं, प्रत्युत कुल-परम्परा नष्ट होनेसे सम्पूर्ण कुलको भी वह नरकमें ले जाता है।

‘पतन्ति पितरो होषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः’—जिन्होंने अपने कुलका नाश कर दिया है, ऐसे इन कुलधातियोंके पितरोंको वर्णसंकरके द्वारा पिण्ड और पानी (श्राद्ध और

तर्पण) न मिलनेसे उन पितरोंका पतन हो जाता है। कारण कि जब पितरोंको पिण्ड-पानी मिलता रहता है, तब वे उस पुण्यके प्रभावसे ऊँचे लोकोंमें रहते हैं। परन्तु जब उनको पिण्ड-पानी मिलना बन्द हो जाता है, तब उनका वहाँसे पतन हो जाता है अर्थात् उनको स्थिति उन लोकोंमें नहीं रहती।

पितरोंको पिण्ड-पानी न मिलनेमें कारण यह है कि वर्णसंकरकी पूर्वजोंके प्रति आदर-बुद्धि नहीं होती। इस कारण उनमें पितरोंके लिये श्राद्ध-तर्पण करनेकी भावना ही नहीं होती। अगर लोक-लिहाजमें आकर वे श्राद्ध-तर्पण करते भी हैं, तो भी शास्त्रविधिके अनुसार उनका श्राद्ध-तर्पणमें अधिकार न होनेसे वह पिण्ड-पानी पितरोंको मिलता ही नहीं। इस तरह जब पितरोंको आदरबुद्धिसे और शास्त्रविधिके अनुसार पिण्ड-जल नहीं मिलता, तब उनका अपने स्थानसे पतन हो जाता है।

परिशिष्ट भाव— पितरोंमें एक ‘आजान’ पितर होते हैं और एक ‘मर्त्य’ पितर। पितरलोकमें रहनेवाले पितर ‘आजान’ हैं और मनुष्यलोकसे मरकर गये पितर ‘मर्त्य’ हैं। श्राद्ध और तर्पण न मिलनेसे मर्त्य पितरोंका पतन होता है। पतन उन्हीं मर्त्य पितरोंका होता है, जो कुटुम्बसे, सन्तानसे सम्बन्ध रखते हैं और उनसे श्राद्ध-तर्पणकी आशा रखते हैं।

दोषैरैतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः।

उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ ४३ ॥

ऐतैः= इनदोषैः= दोषोंसेकुलधर्माः= कुलधर्म
वर्णसङ्करकारकैः= वर्णसंकरकुलघ्नानाम्= कुलधातियोंके= और
पैदाशाश्वताः= सदासे चलतेजातिधर्माः= जातिधर्म
करनेवालेआयेउत्साद्यन्ते= नष्ट हो जाते हैं।

व्याख्या— ‘दोषैरैतैः कुलघ्नानाम्.....कुलधर्माश्च शाश्वताः’—युद्धमें कुलका क्षय होनेसे कुलके साथ चलते आये कुलधर्माका भी नाश हो जाता है। कुलधर्मके नाशसे कुलमें अधर्मकी वृद्धि हो जाती है। अधर्मकी वृद्धिसे स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं। स्त्रियोंके दूषित होनेसे वर्णसंकर पैदा

हो जाते हैं। इस तरह इन वर्णसंकर पैदा करनेवाले दोषोंसे कुलका नाश करनेवालोंके जातिधर्म (वर्णधर्म) नष्ट हो जाते हैं।

कुलधर्म और जातिधर्म क्या हैं? एक ही जातिमें एक कुलकी जो अपनी अलग-अलग परम्पराएँ हैं, अलग-

श्लोक ४४-४५ ]

  • साधक-संजीवनी *

५९

अलग मर्यादाएँ हैं, अलग-अलग आचरण हैं, वे सभी उस कुलके 'कुलधर्म' कहलाते हैं। एक ही जातिके सम्पूर्ण कुलोंके समुदायको लेकर जो धर्म कहे जाते हैं, वे सभी

'जातिधर्म' अर्थात् 'वर्णधर्म' कहलाते हैं, जो कि सामान्य धर्म हैं और शास्त्रविधिसे नियत हैं। इन कुलधर्मोंका और जातिधर्मोंका आचरण न होनेसे ये धर्म नष्ट हो जाते हैं।

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।

नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ ४४ ॥

जनार्दन= हे जनार्दन !मनुष्याणाम्= (उन)वासः= वास
उत्सन्नकुलधर्माणाम्= जिनकेमनुष्योंकाभवति= होता है,
कुलधर्म नष्टअनियतम्= बहुत कालतकइति= ऐसा (हम)
हो जाते हैं,नरके= नरकोंमेंअनुशुश्रुम= सुनते आये हैं।

व्याख्या —'उत्सन्नकुलधर्माणाम्....अनुशुश्रुम *'—भगवान्ने मनुष्यको विवेक दिया है, नया कर्म करनेका अधिकार दिया है। अतः यह कर्म करनेमें अथवा न करनेमें, अच्छा करनेमें अथवा मन्दा करनेमें स्वतन्त्र है। इसलिये इसको सदा विवेक-विचारपूर्वक कर्तव्य-कर्म करने चाहिये। परन्तु मनुष्य सुखभोग आदिके लोभमें आकर अपने विवेकका निरादर कर देते हैं और राग-द्वेषके वशीभूत हो जाते हैं, जिससे उनके आचरण शास्त्र और कुलमर्यादाके विरुद्ध होने लगते हैं। परिणामस्वरूप इस

लोकमें उनकी निन्दा, अपमान, तिरस्कार होता है और परलोकमें दुर्गति, नरकोंकी प्राप्ति होती है। अपने पापोंके कारण उनको बहुत समयतक नरकोंका कष्ट भोगना पड़ता है। ऐसा हम परम्परासे बड़े-बूढ़े गुरुजनोंसे सुनते आये हैं।

'मनुष्याणाम्' —पदमें कुलधाती और उनके कुलके सभी मनुष्योंका समावेश किया गया है अर्थात् कुलधातियोंके पहले जो हो चुके हैं—उन (पितरों)-का, अपना और आगे होनेवाले-(वंश-) का समावेश किया गया है।

सम्बन्ध—युद्धसे होनेवाली अनर्थ-परम्पराके वर्णका खुद अर्जुनपर क्या असर पड़ा ? इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।

यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ ४५ ॥

अहो= यह बड़े आश्चर्यमहत्पापम्= बड़ा भारी पापराज्यसुखलोभेन= राज्य और
(और)कर्तुम्= करनेकासुखके लोभसे
बत= खेदकी बातव्यवसिताः= निश्चय करस्वजनम्= अपने स्वजनोंको
है किबैठे हैं,हन्तुम्= मारनेके लिये
वयम्= हमलोगयत्= जो किउद्यताः= तैयार हो गये हैं।

व्याख्या —'अहो बत....स्वजनमुद्यताः'—ये दुर्घोष आदि दुष्ट हैं। इनकी धर्मपर दृष्टि नहीं है। इनपर लोभ सवार हो गया है। इसलिये ये युद्धके लिये तैयार हो जायें तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। परन्तु हमलोग तो धर्म-अधर्मको, कर्तव्य-अकर्तव्यको, पुण्य-पापको जाननेवाले हैं। ऐसे जानकार होते हुए भी अनजान मनुष्योंकी तरह

हमलोगोंने बड़ा भारी पाप करनेका निश्चय—विचार कर लिया है। इतना ही नहीं, युद्धमें अपने स्वजनोंको मारनेके लिये अस्त्र-शस्त्र लेकर तैयार हो गये हैं! यह हमलोगोंके लिये बड़े भारी आश्चर्यकी और खेद-(दुःख-)की बात है अर्थात् सर्वथा अनुचित बात है।

हमारी जो जानकारी है, हमने जो शास्त्रोंसे सुना है,

  • शोकाविष्ट होनेके कारण ही अर्जुनने यहाँ 'अनुशुश्रुम' परोक्ष लिट्की क्रियाका प्रयोग किया है।

६०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

गुरुजनोंसे शिक्षा पायी है, अपने जीवनको सुधारनेका विचार किया है, उन सबका अनादर करके आज हमने युद्धरूपी पाप करनेके लिये विचार कर लिया है—यह बड़ा भारी पाप है—‘महत्पापम्’।

इस श्लोकमें ‘अहो’ और ‘बत’—ये दो पद आये हैं। इनमेंसे ‘अहो’ पद आश्चर्यका वाचक है। आश्चर्य यही है कि युद्धसे होनेवाली अनर्थ-परम्पराको जानते हुए भी हमलोगोंने युद्धरूपी बड़ा भारी पाप करनेका पक्का निश्चय कर लिया है! दूसरा ‘बत’ पद खेदका, दुःखका वाचक है। दुःख यही है कि थोड़े दिन रहनेवाले राज्य और सुखके लोभमें आकर हम अपने कुटुम्बियोंको मारनेके लिये तैयार हो गये हैं!

पाप करनेका निश्चय करनेमें और स्वजनोंको मारनेके लिये तैयार होनेमें केवल राज्यका और सुखका लोभ ही कारण है। तात्पर्य है कि अगर युद्धमें हमारी विजय हो जायगी तो हमें राज्य, वैभव मिल जायगा, हमारा आदर-सत्कार होगा, हमारी महत्ता बढ़ जायगी, पूरे राज्यपर हमारा प्रभाव रहेगा, सब जगह हमारा हुक्म चलेगा, हमारे पास धन होनेसे हम मनचाही भोग-सामग्री जुटा लेंगे, फिर खूब आराम करेंगे, सुख भोंगेंगे—इस तरह हमारेपर राज्य और सुखका लोभ छा गया है, जो हमारे-जैसे मनुष्योंके लिये सर्वथा अनुचित है।

इस श्लोकमें अर्जुन यह कहना चाहते हैं कि अपने सद्विचारोंका, अपनी जानकारीका आदर करनेसे ही शास्त्र, गुरुजन आदिकी आज्ञा मानी जा सकती है। परन्तु जो मनुष्य अपने सद्विचारोंका निरादर करता है, वह शास्त्रोंकी, गुरुजनोंकी और सिद्धान्तोंकी अच्छी-अच्छी बातोंको सुनकर भी उन्हें धारण नहीं कर सकता। अपने सद्विचारोंका बार-बार निरादर, तिरस्कार करनेसे सद्विचारोंकी सृष्टि बंद हो जाती है। फिर मनुष्यको दुर्गुण-दुराचारसे रोकनेवाला है ही

कौन? ऐसे ही हम भी अपनी जानकारीका आदर नहीं करेंगे, तो फिर हमें अनर्थ-परम्परासे कौन रोक सकता है? अर्थात् कोई नहीं रोक सकता।

यहाँ अर्जुनकी दृष्टि युद्धरूपी क्रियाकी तरफ है। वे युद्धरूपी क्रियाको दोषी मानकर उससे हटना चाहते हैं; परन्तु वास्तवमें दोष क्या है—इस तरफ अर्जुनकी दृष्टि नहीं है। युद्धमें कौटुम्बिक मोह, स्वार्थभाव, कामना ही दोष है, पर इधर दृष्टि न जानेके कारण अर्जुन यहाँ आश्चर्य और खेद प्रकट कर रहे हैं, जो कि वास्तवमें किसी भी विचारशील, धर्मात्मा, शूरवीर क्षत्रियके लिये उचित नहीं है।

[ अर्जुनने पहले अङ्गीसर्व श्लोकमें दुर्घाधनादिके युद्धमें प्रवृत्त होनेमें, कुलक्षयके दोषमें और मित्रद्रोहके पापमें लोभको कारण बताया; और यहाँ भी अपनेको राज्य और सुखके लोभके कारण महान् पाप करनेको उद्यत बता रहे हैं। इससे सिद्ध होता है कि अर्जुन पापके होनेमें ‘लोभ’ को हेतु मानते हैं। फिर भी आगे तीसरे अध्यायके छत्तीसवें श्लोकमें अर्जुनने ‘मनुष्य न चाहता हुआ भी पापका आचरण क्यों कर बैठा है’—ऐसा प्रश्न क्यों किया? इसका समाधान है कि यहाँ तो कौटुम्बिक मोहके कारण अर्जुन युद्धसे निवृत्त होनेको धर्म और युद्धमें प्रवृत्त होनेको अधर्म मान रहे हैं अर्थात् उनकी शरीर आदिको लेकर केवल लौकिक दृष्टि है, इसलिये वे युद्धमें स्वजनोंको मारनेमें लोभको हेतु मान रहे हैं। परन्तु आगे गीताका उपदेश सुनते-सुनते उनमें अपने श्रेय—कल्याणकी इच्छा जाग्रत् हो गयी (गीता—तीसरे अध्यायका दूसरा श्लोक)। इसलिये वे कर्तव्यको छोड़कर न करनेयोग्य काममें प्रवृत्त होनेमें कौन कारण है—ऐसा पूछते हैं अर्थात् वहाँ (तीसरे अध्यायके छत्तीसवें श्लोकमें) अर्जुन कर्तव्यकी दृष्टिसे, साधककी दृष्टिसे पूछते हैं। ]

सम्बन्ध—आश्चर्य और खेदमें निमग्न हुए अर्जुन आगेके श्लोकमें अपनी दलीलोंका अन्तिम निर्णय बताते हैं।

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्ने क्षेमतरं भवेत् ॥ ४६ ॥

यदि= अगर (ये)रणे= युद्धभूमिमेंहन्युः= मार भी दें (तो)
शस्त्रपाणयः= हाथोंमें शस्त्र-
अस्त्र लिये हुएअप्रतीकारम्= सामना न
करनेवालेतत्= वह
धार्तराष्ट्राः= धृतराष्ट्रके
पक्षपाती
लोगअशस्त्रम्= (तथा)
शस्त्ररहितमे= मेरे लिये
माम्= मुझेक्षेमतरम्= बड़ा ही
हितकारक
भवेत्= होगा।

श्लोक ४६ ]

  • साधक-संजीवनी *

६१

व्याख्या —‘यदि माम्’……‘क्षेमतरं भवेत्’—अर्जुन कहते हैं कि अगर मैं युद्धसे सर्वथा निवृत्त हो जाऊँगा, तो शायद ये दुर्गंधन आदि भी युद्धसे निवृत्त हो जायेंगे। कारण कि हम कुछ चाहेंगे ही नहीं, लड़ेंगे भी नहीं, तो फिर ये लोग युद्ध करेंगे ही क्यों? परन्तु कदाचित् जोशमें भरे हुए तथा हाथोंमें शस्त्र धारण किये हुए ये धृतराष्ट्रके पक्षपाती लोग ‘सदाके लिये हमारे रास्तेका काँटा निकल जाय, वैरी समाप्त हो जाय’—ऐसा विचार करके सामना न करनेवाले तथा शस्त्रहरित मेरेको मार भी दें, तो उनका वह मारना मेरे लिये हितकारक ही होगा। कारण कि मैंने युद्धमें गुरुजनोंको मारकर बड़ा भारी पाप करनेका जो निश्चय किया था, उस निश्चयरूप पापका प्रायश्चित्त हो जायगा, उस पापसे मैं शुद्ध हो जाऊँगा। तात्पर्य है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तो मैं भी पापसे बचूँगा और मेरे कुलका भी नाश नहीं होगा।

[ जो मनुष्य अपने लिये जिस किसी विषयका वर्णन करता है, उस विषयका उसके स्वयंपर असर पड़ता है। अर्जुनने भी जब शोकाविष्ट होकर अट्टाईसवें श्लोकसे बोलना आरम्भ किया, तब वे उतने शोकाविष्ट नहीं थे, जितने वे अब शोकाविष्ट हैं। पहले अर्जुन युद्धसे उपरत नहीं हुए, पर शोकाविष्ट होकर बोलते-बोलते अन्तमें वे युद्धसे उपरत हो जाते हैं और बाणसहित धनुषका त्याग करके बैठ जाते हैं। भगवान्ने यह सोचा कि अर्जुनके बोलनेका वेग निकल जाय तो मैं बोलूँ अर्थात् बोलनेसे अर्जुनका शोक बाहर आ जाय, भीतरमें कोई शोक बाकी न रहे, तभी मेरे वचनोंका उसपर असर होगा। अतः भगवान् बीचमें कुछ नहीं बोले।]

विशेष बात

अबतक अर्जुनने अपनेको धर्मात्मा मानकर युद्धसे निवृत्त होनेमें जितनी दलीलें, युक्तियाँ दी हैं, संसारमें रचे-पचे लोग अर्जुनकी उन दलीलोंको ही ठीक समझेंगे और आगे भगवान् अर्जुनको जो बातें समझायेंगे, उनको ठीक नहीं समझेंगे! इसका कारण यह है कि जो मनुष्य जिस स्थितिमें हैं, उस स्थितिकी, उस श्रेणीकी बातको ही वे ठीक समझते हैं; उससे ऊँची श्रेणीकी बात वे समझ ही नहीं सकते। अर्जुनके भीतर कौटुम्बिक मोह है और उस मोहसे आविष्ट होकर ही वे धर्मकी, साधुताकी बड़ी अच्छी-अच्छी बातें कह रहे हैं। अतः जिन लोगोंके भीतर कौटुम्बिक मोह है, उन लोगोंको ही अर्जुनकी बातें ठीक लगेंगी। परन्तु भगवान्की दृष्टि जीवके कल्याणकी तरफ

है कि उसका कल्याण कैसे हो? भगवान्की इस ऊँची श्रेणीकी दृष्टिको वे (लौकिक दृष्टिवाले) लोग समझ ही नहीं सकते। अतः वे भगवान्की बातोंको ठीक नहीं मानेंगे, प्रत्युत ऐसा मानेंगे कि अर्जुनके लिये युद्धरूपी पापसे बचना बहुत ठीक था, पर भगवान्ने उनको युद्धमें लगाकर ठीक नहीं किया!

वास्तवमें भगवान्ने अर्जुनसे युद्ध नहीं कराया है, प्रत्युत उनको अपने कर्तव्यका ज्ञान कराया है। युद्ध तो अर्जुनको कर्तव्यरूपसे स्वतः प्राप्त हुआ था। अतः युद्धका विचार तो अर्जुनका खुदका ही था; वे स्वयं ही युद्धमें प्रवृत्त हुए थे, तभी वे भगवान्को निमन्त्रण देकर लाये थे। परन्तु उस विचारको अपनी बुद्धिसे अनिष्टकारक समझकर वे युद्धसे विमुख हो रहे थे अर्थात् अपने कर्तव्यके पालनसे हट रहे थे। इसपर भगवान्ने कहा कि यह जो तू युद्ध नहीं करना चाहता, यह तेरा मोह है। अतः समयपर जो कर्तव्य स्वतः प्राप्त हुआ है, उसका त्याग करना उचित नहीं है।

कोई बन्दीनारायण जा रहा था; परन्तु रास्तेमें उसे दिशाभ्रम हो गया अर्थात् उसने दक्षिणको उत्तर और उत्तरको दक्षिण समझ लिया। अतः वह बन्दीनारायणकी तरफ न चलकर उलटा चलने लग गया। सामनेसे उसको एक आदमी मिल गया। उस आदमीने पूछा कि ‘भाई! कहाँ जा रहे हो?’ वह बोला—‘बन्दीनारायण’। वह आदमी बोला कि ‘भाई! बन्दीनारायण इधर नहीं है, उधर है। आप तो उलटे जा रहे हैं!’ अतः वह आदमी उसको बन्दीनारायण भेजनेवाला नहीं है; किन्तु उसको दिशाका ज्ञान कराकर ठीक रास्ता बतानेवाला है। ऐसे ही भगवान्ने अर्जुनको अपने कर्तव्यका ज्ञान कराया है, युद्ध नहीं कराया है।

स्वजनोंको देखनेसे अर्जुनके मनमें यह बात आयी थी कि मैं युद्ध नहीं करूँगा—‘न योत्ये’ (२।१), पर भगवान्का उपदेश सुननेपर अर्जुनने ऐसा नहीं कहा कि मैं युद्ध नहीं करूँगा; किन्तु ऐसा कहा कि मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा;—‘करिष्ये वचनं तव’ (१८।७३) अर्थात् अपने कर्तव्यका पालन करूँगा। अर्जुनके इन वचनोंसे यही सिद्ध होता है कि भगवान्ने अर्जुनको अपने कर्तव्यका ज्ञान कराया है।

वास्तवमें युद्ध होना अवश्यम्भावी था; क्योंकि सबकी आयु समाप्त हो चुकी थी। इसको कोई भी टाल नहीं सकता था। स्वयं भगवान्ने विश्वरूपदर्शनके समय अर्जुनसे कहा है कि ‘मैं बढ़ा हुआ काल हूँ और सबका संहार करनेके लिये

६२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

यहाँ आया हूँ। अतः तेरे युद्ध किये बिना भी ये विपक्षमें खड़े योद्धालोग बचेंगे नहीं' (ग्यारहवें अध्यायका बत्तीसवें श्लोक)। इसलिये यह नरसंहार अवश्यम्भावी होनहार ही था। यह नरसंहार अर्जुन युद्ध न करते, तो भी होता। अगर अर्जुन युद्ध नहीं करते, तो जिन्होंने माँकी आज्ञासे द्रौपदीके साथ अपने सहित पाँचों भाइयोंका विवाह करना स्वीकार कर लिया था, वे युधिष्ठिर तो माँकी युद्ध करनेकी आज्ञासे युद्ध अवश्य करते ही। भीमसेन भी युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते; क्योंकि उन्होंने कौरवोंको मारनेकी प्रतिज्ञा कर रखी थी। द्रौपदीने तो यहाँतक कह दिया था कि अगर मेरे पति (पाण्डव) कौरवोंसे युद्ध नहीं करेंगे तो, मेरे पिता (द्रुपद),

भाई (धृष्टद्युम्न) और मेरे पाँचों पुत्र तथा अभिमन्यु कौरवोंसे युद्ध करेंगे*। इस तरह ऐसे कई कारण थे, जिससे युद्धको टालना सम्भव नहीं था।

होनहारको रोकना मनुष्यके हाथकी बात नहीं है; परन्तु अपने कर्तव्यका पालन करके मनुष्य अपना उद्धार कर सकता है और कर्तव्यच्युत होकर अपना पतन कर सकता है। तात्पर्य है कि मनुष्य अपना इष्ट-अनिष्ट करनेमें स्वतन्त्र है। इसलिये भगवान्ने अर्जुनको कर्तव्यका ज्ञान कराकर मनुष्यमात्रको उपदेश दिया है कि उसे शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार अपने कर्तव्यके पालनमें तत्पर रहना चाहिये, उससे कभी च्युत नहीं होना चाहिये।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अर्जुनने अपनी दलीलोंका निर्णय सुना दिया। उसके बाद अर्जुनने क्या किया— इसको संजय आगेके श्लोकमें बताते हैं।

सज्जय उवाच

एवमुक्त्वाजुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ ४७ ॥

संजय बोले—

एवम्= ऐसाअर्जुनः= अर्जुनसङ्ख्ये= युद्धभूमिमें
उक्त्वा= कहकरसशरम्= बाणसहितरथोपस्थे= रथके
शोकसंविग्नमानसः= शोकाकुल मनवालेचापम्= धनुषकामध्यभागमें
विसृज्य= त्याग करकेउपाविशत्= बैठ गये।

व्याख्या—'एवमुक्त्वाजुनः' '..... शोकसंविग्नमानसः'— युद्ध करना सम्पूर्ण अनर्थीका मूल है, युद्ध करनेसे यहाँ कुटुम्बियोंका नाश होगा, परलोकमें नरकोंकी प्राप्ति होगी आदि बातोंको युक्ति और प्रमाणसे कहकर शोकसे अत्यन्त व्याकुल मनवाले अर्जुनने युद्ध न करनेका पक्का निर्णय कर लिया। जिस रणभूमिमें वे हाथमें धनुष लेकर उत्साहके साथ आये थे, उसी रणभूमिमें उन्होंने अपने बायें हाथसे गाण्डीव धनुषको और दायें हाथसे बाणको नीचे रख दिया और स्वयं रथके मध्यभागमें अर्थात् दोनों सेनाओंको देखनेके लिये जहाँपर खड़े थे, वहाँपर शोकमुद्रामें बैठ गये। अर्जुनकी ऐसी शोकाकुल अवस्था होनेमें मुख्य कारण है—भगवान्का भीष्म और द्रोणके सामने रथ खड़ा करके

अर्जुनसे कुरुवंशियोंको देखनेके लिये कहना और उनको देखकर अर्जुनके भीतर छिपे हुए मोहका जाग्रत् होना। मोहके जाग्रत् होनेपर अर्जुन कहते हैं कि युद्धमें हमारे कुटुम्बी मारे जायेंगे। कुटुम्बियोंका मरना ही बड़े नुकसानकी बात है। दुर्गोधन आदि तो लोभके कारण इस नुकसानकी तरफ नहीं देख रहे हैं। परन्तु युद्धसे कितनी अनर्थ परम्परा चल पड़ेगी—इस तरफ ध्यान देकर हमलोगोंको ऐसे पापसे निवृत्त हो ही जाना चाहिये। हमलोग राज्य और सुखके लोभसे कुलका संहार करनेके लिये रणभूमिमें खड़े हो गये हैं—यह हमने बड़ी भारी गलती की! अतः युद्ध न करते हुए शास्त्ररहित मेरेको यदि सामने खड़े हुए योद्धालोग मार भी दें, तो उससे मेरा हित ही होगा। इस तरह अन्तःकरणमें

  • यदि भीमार्जुनी कृष्ण कृष्णी सन्धिकामुको। पिता मे योत्स्यते वृद्धः सह पुत्रैर्महारथैः ॥ पञ्च चैव महावीर्यैः पुत्रा मे मधुसूदन। अभिमन्यु पुरस्कृत्य योत्स्यन्ते कुरुभिः सह॥

(महाभारत, उद्योगो ८२। ३७-३८)

श्लोक ४७ ]

  • साधक-संजीवनी *

६३

मोह छा जानेके कारण अर्जुन युद्धसे उपरत होनेमें एवं अपने पर जानेमें भी हित देखते हैं और अन्तमें उसी मोहके कारण बाणसहित धनुषका त्याग करके विषादमग्न होकर

बैठ जाते हैं। यह मोहकी ही महिमा है कि जो अर्जुन धनुष उठाकर युद्धके लिये तैयार हो रहे थे, वही अर्जुन धनुषको नीचे रखकर शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो रहे हैं!

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवनामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ‘अर्जुनविषादयोग’ नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥

प्रत्येक अध्यायकी समाप्तिपर महर्षि वेदव्यासजीने जो उपर्युक्त पुष्पिका लिखी है, इसमें श्रीमद्भगवद्गीताका विशेष माहात्म्य और प्रभाव ही प्रकट किया गया है।

‘ॐ, तत्, सत्’—ये तीनों सच्चिदानन्दधन परमात्माके पवित्र नाम हैं। ये मात्र जीवोंका कल्याण करनेवाले हैं। इनका उच्चारण परमात्माके सम्मुख करता है और शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्मके अंग-वैगुण्यको मिटाता है। अतः गीताके अध्यायका पाठ करनेमें श्लोक, पद और अक्षरोंके उच्चारणमें जो-जो भूलें हुई हैं, उनका परिमार्जन करनेके लिये और संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक भगवत्-सम्बन्धकी याद आनेके लिये प्रत्येक अध्यायके अन्तमें ‘ॐ तत्सत्’का उच्चारण किया गया है।

महर्षि वेदव्यासजीके द्वारा अध्यायके अन्तमें ‘ॐ’के उच्चारणका तात्पर्य है कि मेरी रचनाका अंग-वैगुण्य मिट जाय, ‘तत्’के उच्चारणका तात्पर्य है कि मेरी रचना भगवत्प्रीत्यर्थ हो जाय और ‘सत्’के उच्चारणका तात्पर्य है कि मेरी रचना सत् अर्थात् अविनाशी फल देनेवाली हो जाय। ‘इति’—बस, मेरा यही प्रयोजन है। इसके सिवाय मेरा व्यक्तिगत और कोई प्रयोजन नहीं है।

जो ‘श्रीमत्’ अर्थात् सर्वशोभासम्पन्न हैं और जिनमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य—ये छः ‘भग’ नित्य विद्यमान रहते हैं, उन भगवान्के मुखसे निकली हुई होनेके कारण इसको ‘श्रीमत् भगवत्’ कहा गया है।

जब मनुष्य मस्तीमें, आनन्दमें होता है, तब उसके मुखसे स्वतः गीत निकलता है। भगवान्ने इसको मस्तीमें आकर गाया है, इसलिये इसका नाम ‘गीता’ है। यद्यपि संस्कृत व्याकरणके नियमानुसार इसका नाम ‘गीतम्’ होना चाहिये था, तथापि उपनिषद्-स्वरूप होनेसे स्त्रीलिंग शब्द ‘गीता’का प्रयोग किया गया है।

इसमें सम्पूर्ण उपनिषदोंका सारतत्त्व संगृहीत है और यह स्वयं भी भगवद्वार्णी होनेसे उपनिषद्-स्वरूप है, इसलिये इसे ‘उपनिषद्’ कहा गया है।

वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका आग्रह न रखकर प्राणिमात्रका कल्याण करनेवाली सर्वश्रेष्ठ विद्या होनेके कारण इसका नाम ‘ब्रह्मविद्या’ है। इस ब्रह्मविद्यास्वरूप गीतामें कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग आदि योगसाधनोंकी शिक्षा दी गयी है, जिससे साधकको परमात्माके साथ अपने नित्य-सम्बन्धका अनुभव हो जाय। इसलिये इसे ‘योगशास्त्र’ कहा गया है।

यह साक्षात् पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण और भक्तप्रवर अर्जुनका संवाद है। अर्जुनने निःसंकोच-भावसे बातें पूछी हैं और भगवान्ने उदारतापूर्वक उनका उत्तर दिया है। इन दोनोंके ही भाव इसमें हैं। अतः इन दोनोंके नामसे इस गीताशास्त्रकी विशेष महिमा होनेके कारण इसे ‘श्रीकृष्णार्जुनसंवाद’ नामसे कहा गया है।

इस पहले अध्यायमें अर्जुनके विषादका वर्णन है। यह विषाद भी भगवान् अथवा सन्तोंका संग मिल जानेपर संसारसे वैराग्य उत्पन्न करके कल्याण करनेवाला हो जाता है। यद्यपि दुर्घटनादिको भी विषाद हुआ है, तथापि उनमें भगवान्ने विमुखा होनेके कारण उनका विषाद ‘योग’ नहीं हुआ। केवल अर्जुनका विषाद ही भगवान्की सम्मुखता होनेके कारण ‘योग’ अर्थात् भगवान्के नित्य-सम्बन्धका अनुभव करानेवाला हो गया। इसलिये इस अध्यायका नाम ‘अर्जुनविषादयोग’ रखा गया है।

प्रत्येक अध्यायके अन्तमें पुष्पिका देनेका तात्पर्य है कि अगर साधक एक अध्यायका भी ठीक तरहसे मनन-विचार करे, तो उस एक ही अध्यायसे उसका कल्याण हो जायगा।

  • द्रष्टव्य—गीता—सत्रहवें अध्यायके तेईसवेंसे सत्ताईसवें श्लोकतक।