श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 60, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ४४-४५ ]
- साधक-संजीवनी *
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अलग मर्यादाएँ हैं, अलग-अलग आचरण हैं, वे सभी उस कुलके 'कुलधर्म' कहलाते हैं। एक ही जातिके सम्पूर्ण कुलोंके समुदायको लेकर जो धर्म कहे जाते हैं, वे सभी
'जातिधर्म' अर्थात् 'वर्णधर्म' कहलाते हैं, जो कि सामान्य धर्म हैं और शास्त्रविधिसे नियत हैं। इन कुलधर्मोंका और जातिधर्मोंका आचरण न होनेसे ये धर्म नष्ट हो जाते हैं।
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ ४४ ॥
| जनार्दन | = हे जनार्दन ! | मनुष्याणाम् | = (उन) | वासः | = वास |
|---|---|---|---|---|---|
| उत्सन्नकुलधर्माणाम् | = जिनके | मनुष्योंका | भवति | = होता है, | |
| कुलधर्म नष्ट | अनियतम् | = बहुत कालतक | इति | = ऐसा (हम) | |
| हो जाते हैं, | नरके | = नरकोंमें | अनुशुश्रुम | = सुनते आये हैं। |
व्याख्या —'उत्सन्नकुलधर्माणाम्....अनुशुश्रुम *'—भगवान्ने मनुष्यको विवेक दिया है, नया कर्म करनेका अधिकार दिया है। अतः यह कर्म करनेमें अथवा न करनेमें, अच्छा करनेमें अथवा मन्दा करनेमें स्वतन्त्र है। इसलिये इसको सदा विवेक-विचारपूर्वक कर्तव्य-कर्म करने चाहिये। परन्तु मनुष्य सुखभोग आदिके लोभमें आकर अपने विवेकका निरादर कर देते हैं और राग-द्वेषके वशीभूत हो जाते हैं, जिससे उनके आचरण शास्त्र और कुलमर्यादाके विरुद्ध होने लगते हैं। परिणामस्वरूप इस
लोकमें उनकी निन्दा, अपमान, तिरस्कार होता है और परलोकमें दुर्गति, नरकोंकी प्राप्ति होती है। अपने पापोंके कारण उनको बहुत समयतक नरकोंका कष्ट भोगना पड़ता है। ऐसा हम परम्परासे बड़े-बूढ़े गुरुजनोंसे सुनते आये हैं।
'मनुष्याणाम्' —पदमें कुलधाती और उनके कुलके सभी मनुष्योंका समावेश किया गया है अर्थात् कुलधातियोंके पहले जो हो चुके हैं—उन (पितरों)-का, अपना और आगे होनेवाले-(वंश-) का समावेश किया गया है।
सम्बन्ध—युद्धसे होनेवाली अनर्थ-परम्पराके वर्णका खुद अर्जुनपर क्या असर पड़ा ? इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ ४५ ॥
| अहो | = यह बड़े आश्चर्य | महत्पापम् | = बड़ा भारी पाप | राज्यसुखलोभेन | = राज्य और |
|---|---|---|---|---|---|
| (और) | कर्तुम् | = करनेका | सुखके लोभसे | ||
| बत | = खेदकी बात | व्यवसिताः | = निश्चय कर | स्वजनम् | = अपने स्वजनोंको |
| है कि | बैठे हैं, | हन्तुम् | = मारनेके लिये | ||
| वयम् | = हमलोग | यत् | = जो कि | उद्यताः | = तैयार हो गये हैं। |
व्याख्या —'अहो बत....स्वजनमुद्यताः'—ये दुर्घोष आदि दुष्ट हैं। इनकी धर्मपर दृष्टि नहीं है। इनपर लोभ सवार हो गया है। इसलिये ये युद्धके लिये तैयार हो जायें तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। परन्तु हमलोग तो धर्म-अधर्मको, कर्तव्य-अकर्तव्यको, पुण्य-पापको जाननेवाले हैं। ऐसे जानकार होते हुए भी अनजान मनुष्योंकी तरह
हमलोगोंने बड़ा भारी पाप करनेका निश्चय—विचार कर लिया है। इतना ही नहीं, युद्धमें अपने स्वजनोंको मारनेके लिये अस्त्र-शस्त्र लेकर तैयार हो गये हैं! यह हमलोगोंके लिये बड़े भारी आश्चर्यकी और खेद-(दुःख-)की बात है अर्थात् सर्वथा अनुचित बात है।
हमारी जो जानकारी है, हमने जो शास्त्रोंसे सुना है,
- शोकाविष्ट होनेके कारण ही अर्जुनने यहाँ 'अनुशुश्रुम' परोक्ष लिट्की क्रियाका प्रयोग किया है।