भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।

पतन्ति पितरो होषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ ४२ ॥

सङ्कः= वर्णसंकरजानेवालाएषाम्= इन (कुलधातियों)-के
कुलघ्नानाम्= कुलधातियोंकोएव= ही (होता है)।पितरः
= औरलुप्तपिण्डोदकक्रियाः= श्राद्धहि
कुलस्य= कुलकोऔर तर्पण न
नरकाय= नरकमें लेमिलनेसेपतन्ति

व्याख्या— ‘सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च’—वर्ण-मिश्रणसे पैदा हुए वर्णसंकर-(सन्तान-) में धार्मिक बुद्धि नहीं होती। वह मर्यादाओंका पालन नहीं करता; क्योंकि वह खुद बिना मर्यादासे पैदा हुआ है। इसलिये उसके खुदके कुलधर्म न होनेसे वह उनका पालन नहीं करता, प्रत्युत कुलधर्म अर्थात् कुलमर्यादासे विरुद्ध आचरण करता है।

जिन्होंने युद्धमें अपने कुलका संहार कर दिया है, उनको ‘कुलघाती’ कहते हैं। वर्णसंकर ऐसे कुलधातियोंको नरकमें ले जाता है। केवल कुलधातियोंको ही नहीं, प्रत्युत कुल-परम्परा नष्ट होनेसे सम्पूर्ण कुलको भी वह नरकमें ले जाता है।

‘पतन्ति पितरो होषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः’—जिन्होंने अपने कुलका नाश कर दिया है, ऐसे इन कुलधातियोंके पितरोंको वर्णसंकरके द्वारा पिण्ड और पानी (श्राद्ध और

तर्पण) न मिलनेसे उन पितरोंका पतन हो जाता है। कारण कि जब पितरोंको पिण्ड-पानी मिलता रहता है, तब वे उस पुण्यके प्रभावसे ऊँचे लोकोंमें रहते हैं। परन्तु जब उनको पिण्ड-पानी मिलना बन्द हो जाता है, तब उनका वहाँसे पतन हो जाता है अर्थात् उनको स्थिति उन लोकोंमें नहीं रहती।

पितरोंको पिण्ड-पानी न मिलनेमें कारण यह है कि वर्णसंकरकी पूर्वजोंके प्रति आदर-बुद्धि नहीं होती। इस कारण उनमें पितरोंके लिये श्राद्ध-तर्पण करनेकी भावना ही नहीं होती। अगर लोक-लिहाजमें आकर वे श्राद्ध-तर्पण करते भी हैं, तो भी शास्त्रविधिके अनुसार उनका श्राद्ध-तर्पणमें अधिकार न होनेसे वह पिण्ड-पानी पितरोंको मिलता ही नहीं। इस तरह जब पितरोंको आदरबुद्धिसे और शास्त्रविधिके अनुसार पिण्ड-जल नहीं मिलता, तब उनका अपने स्थानसे पतन हो जाता है।

परिशिष्ट भाव— पितरोंमें एक ‘आजान’ पितर होते हैं और एक ‘मर्त्य’ पितर। पितरलोकमें रहनेवाले पितर ‘आजान’ हैं और मनुष्यलोकसे मरकर गये पितर ‘मर्त्य’ हैं। श्राद्ध और तर्पण न मिलनेसे मर्त्य पितरोंका पतन होता है। पतन उन्हीं मर्त्य पितरोंका होता है, जो कुटुम्बसे, सन्तानसे सम्बन्ध रखते हैं और उनसे श्राद्ध-तर्पणकी आशा रखते हैं।

दोषैरैतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः।

उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ ४३ ॥

ऐतैः= इनदोषैः= दोषोंसेकुलधर्माः= कुलधर्म
वर्णसङ्करकारकैः= वर्णसंकरकुलघ्नानाम्= कुलधातियोंके= और
पैदाशाश्वताः= सदासे चलतेजातिधर्माः= जातिधर्म
करनेवालेआयेउत्साद्यन्ते= नष्ट हो जाते हैं।

व्याख्या— ‘दोषैरैतैः कुलघ्नानाम्.....कुलधर्माश्च शाश्वताः’—युद्धमें कुलका क्षय होनेसे कुलके साथ चलते आये कुलधर्माका भी नाश हो जाता है। कुलधर्मके नाशसे कुलमें अधर्मकी वृद्धि हो जाती है। अधर्मकी वृद्धिसे स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं। स्त्रियोंके दूषित होनेसे वर्णसंकर पैदा

हो जाते हैं। इस तरह इन वर्णसंकर पैदा करनेवाले दोषोंसे कुलका नाश करनेवालोंके जातिधर्म (वर्णधर्म) नष्ट हो जाते हैं।

कुलधर्म और जातिधर्म क्या हैं? एक ही जातिमें एक कुलकी जो अपनी अलग-अलग परम्पराएँ हैं, अलग-