श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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व्याख्या—‘कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः’ —जब युद्ध होता है, तब उसमें कुल-(वंश-) का क्षय (हास) होता है। जबसे कुल आरम्भ हुआ है, तभीसे कुलके धर्म अर्थात् कुलकी पवित्र परम्पराएँ, पवित्र रीतियाँ, मर्यादाएँ भी परम्परासे चलती आयी हैं। परन्तु जब कुलका क्षय हो जाता है, तब सदासे कुलके साथ रहनेवाले धर्म भी नष्ट हो जाते हैं अर्थात् जन्मके समय, द्विजाति-संस्कारके समय, विवाहके समय, मृत्युके समय और मृत्युके बाद किये जानेवाले जो-जो शास्त्रीय पवित्र रीति-रिवाज हैं, जो कि जीवित और मृतात्मा मनुष्योंके लिये इस लोकमें और परलोकमें कल्याण करनेवाले हैं, वे नष्ट हो जाते हैं। कारण कि जब कुलका ही नाश हो जाता है, तब कुलके आश्रित रहनेवाले धर्म किसके आश्रित रहेंगे ?
‘धर्मं नष्टे कुलं कृतनमधर्माऽभिभवत्युत’ —जब कुलकी पवित्र मर्यादाएँ, पवित्र आचरण नष्ट हो जाते हैं, तब धर्मका पालन न करना और धर्मसे विपरीत काम
करना अर्थात् करनेलायक कामको न करना और न करनेलायक कामको करनारूप अधर्म सम्पूर्ण कुलको दबा लेता है अर्थात् सम्पूर्ण कुलमें अधर्म छा जाता है।
अब यहाँ यह शंका होती है कि जब कुल नष्ट हो जायगा, कुल रहेगा ही नहीं, तब अधर्म किसको दबायेगा ? इसका उत्तर यह है कि जो लड़ाईके योग्य पुरुष हैं, वे तो युद्धमें मारे जाते हैं; किन्तु जो लड़ाईके योग्य नहीं हैं, ऐसे जो बालक और स्त्रियाँ पीछे बच जाती हैं, उनको अधर्म दबा लेता है। कारण कि जब युद्धमें शस्त्र, शास्त्र, व्यवहार आदिके जानकार और अनुभवी पुरुष मर जाते हैं, तब पीछे बचे लोगोंको अच्छी शिक्षा देनेवाले, उनपर शासन करनेवाले नहीं रहते। इससे मर्यादाका, व्यवहारका ज्ञान न होनेसे वे मनमाना आचरण करने लग जाते हैं अर्थात् वे करनेलायक कामको तो करते नहीं और न करनेलायक कामको करने लग जाते हैं। इसलिये उनमें अधर्म फैल जाता है।
अधर्माभिभावत्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वाष्ण्यं जायते वर्णसङ्करः ॥ ४१ ॥
कृष्ण = हे कृष्ण ! अधर्माभिभावत् = अधर्मके अधिक बढ़ जानेसे कुलस्त्रियः = कुलकी स्त्रियाँ
व्याख्या—‘अधर्माभिभावत्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः’ —धर्मका पालन करनेसे अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है। अन्तःकरण शुद्ध होनेसे बुद्धि सात्त्विकी बन जाती है। सात्त्विकी बुद्धिमें क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये—इसका विवेक जाग्रत् रहता है। परन्तु जब कुलमें अधर्म बढ़ जाता है, तब आचरण अशुद्ध होने लगते हैं, जिससे अन्तःकरण अशुद्ध हो जाता है। अन्तःकरण अशुद्ध होनेसे बुद्धि तामसी बन जाती है। बुद्धि तामसी होनेसे मनुष्य अकर्तव्यको कर्तव्य और कर्तव्यको अकर्तव्य मानने लग जाता है अर्थात् उसमें शास्त्र-मर्यादासे उलटी बातें पैदा होने लग जाती हैं। इस विपरीत बुद्धिसे कुलकी स्त्रियाँ दूषित अर्थात् व्यभिचारिणी हो जाती हैं।
प्रदुष्यन्ति = दूषित हो जाती हैं (और) वाष्ण्यं = हे वाष्ण्य ! स्त्रीषु = स्त्रियोंके
दुष्टासु = दूषित होनेपर वर्णसङ्करः = वर्णसंकर जायते = पैदा हो जाते हैं।
‘स्त्रीषु दुष्टासु वाष्ण्यं जायते वर्णसङ्करः’ —स्त्रियोंके दूषित होनेपर वर्णसंकर पैदा हो जाता है*। पुरुष और स्त्री—दोनों अलग-अलग वर्णके होनेपर उनसे जो संतान पैदा होती है, वह ‘वर्णसंकर’ कहलाती है।
अर्जुन यहाँ ‘कृष्ण’ सम्बोधन देकर यह कह रहे हैं कि आप सबको खींचनेवाले होनेसे ‘कृष्ण’ कहलाते हैं, तो आप यह बतायें कि हमारे कुलको आप किस तरफ खींचेंगे अर्थात् किधर ले जायेंगे ?
‘वाष्ण्यं’ सम्बोधन देनेका भाव है कि आप वृष्णिवंशमें अवतार लेनेके कारण ‘वाष्ण्यं’ कहलाते हैं। परन्तु जब हमारे कुल-(वंश-) का नाश हो जायगा, तब हमारे वंशज किस कुलके कहलायेंगे ? अतः कुलका नाश करना उचित नहीं है।
- परस्पर विरुद्ध धर्माँका मिश्रण होकर जो बनता है, उसको ‘संकर’ कहते हैं। जब कर्तव्यका पालन नहीं होता, तब धर्मसंकर, वर्णसंकर, जातिसंकर, कुलसंकर, वेशसंकर, भाषासंकर, आहारसंकर आदि अनेक संकरदोष आ जाते हैं।