श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
लोक ४१ ]
- साधक-संजीवनी *
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व्याख्या—‘कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः’ —जब युद्ध होता है, तब उसमें कुल-(वंश-) का क्षय (हास) होता है। जबसे कुल आरम्भ हुआ है, तभीसे कुलके धर्म अर्थात् कुलकी पवित्र परम्पराएँ, पवित्र रीतियाँ, मर्यादाएँ भी परम्परासे चलती आयी हैं। परन्तु जब कुलका क्षय हो जाता है, तब सदासे कुलके साथ रहनेवाले धर्म भी नष्ट हो जाते हैं अर्थात् जन्मके समय, द्विजाति-संस्कारके समय, विवाहके समय, मृत्युके समय और मृत्युके बाद किये जानेवाले जो-जो शास्त्रीय पवित्र रीति-रिवाज हैं, जो कि जीवित और मृतात्मा मनुष्योंके लिये इस लोकमें और परलोकमें कल्याण करनेवाले हैं, वे नष्ट हो जाते हैं। कारण कि जब कुलका ही नाश हो जाता है, तब कुलके आश्रित रहनेवाले धर्म किसके आश्रित रहेंगे ?
‘धर्मं नष्टे कुलं कृतनमधर्माऽभिभवत्युत’ —जब कुलकी पवित्र मर्यादाएँ, पवित्र आचरण नष्ट हो जाते हैं, तब धर्मका पालन न करना और धर्मसे विपरीत काम
करना अर्थात् करनेलायक कामको न करना और न करनेलायक कामको करनारूप अधर्म सम्पूर्ण कुलको दबा लेता है अर्थात् सम्पूर्ण कुलमें अधर्म छा जाता है।
अब यहाँ यह शंका होती है कि जब कुल नष्ट हो जायगा, कुल रहेगा ही नहीं, तब अधर्म किसको दबायेगा ? इसका उत्तर यह है कि जो लड़ाईके योग्य पुरुष हैं, वे तो युद्धमें मारे जाते हैं; किन्तु जो लड़ाईके योग्य नहीं हैं, ऐसे जो बालक और स्त्रियाँ पीछे बच जाती हैं, उनको अधर्म दबा लेता है। कारण कि जब युद्धमें शस्त्र, शास्त्र, व्यवहार आदिके जानकार और अनुभवी पुरुष मर जाते हैं, तब पीछे बचे लोगोंको अच्छी शिक्षा देनेवाले, उनपर शासन करनेवाले नहीं रहते। इससे मर्यादाका, व्यवहारका ज्ञान न होनेसे वे मनमाना आचरण करने लग जाते हैं अर्थात् वे करनेलायक कामको तो करते नहीं और न करनेलायक कामको करने लग जाते हैं। इसलिये उनमें अधर्म फैल जाता है।
अधर्माभिभावत्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वाष्ण्यं जायते वर्णसङ्करः ॥ ४१ ॥
कृष्ण = हे कृष्ण ! अधर्माभिभावत् = अधर्मके अधिक बढ़ जानेसे कुलस्त्रियः = कुलकी स्त्रियाँ
व्याख्या—‘अधर्माभिभावत्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः’ —धर्मका पालन करनेसे अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है। अन्तःकरण शुद्ध होनेसे बुद्धि सात्त्विकी बन जाती है। सात्त्विकी बुद्धिमें क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये—इसका विवेक जाग्रत् रहता है। परन्तु जब कुलमें अधर्म बढ़ जाता है, तब आचरण अशुद्ध होने लगते हैं, जिससे अन्तःकरण अशुद्ध हो जाता है। अन्तःकरण अशुद्ध होनेसे बुद्धि तामसी बन जाती है। बुद्धि तामसी होनेसे मनुष्य अकर्तव्यको कर्तव्य और कर्तव्यको अकर्तव्य मानने लग जाता है अर्थात् उसमें शास्त्र-मर्यादासे उलटी बातें पैदा होने लग जाती हैं। इस विपरीत बुद्धिसे कुलकी स्त्रियाँ दूषित अर्थात् व्यभिचारिणी हो जाती हैं।
प्रदुष्यन्ति = दूषित हो जाती हैं (और) वाष्ण्यं = हे वाष्ण्य ! स्त्रीषु = स्त्रियोंके
दुष्टासु = दूषित होनेपर वर्णसङ्करः = वर्णसंकर जायते = पैदा हो जाते हैं।
‘स्त्रीषु दुष्टासु वाष्ण्यं जायते वर्णसङ्करः’ —स्त्रियोंके दूषित होनेपर वर्णसंकर पैदा हो जाता है*। पुरुष और स्त्री—दोनों अलग-अलग वर्णके होनेपर उनसे जो संतान पैदा होती है, वह ‘वर्णसंकर’ कहलाती है।
अर्जुन यहाँ ‘कृष्ण’ सम्बोधन देकर यह कह रहे हैं कि आप सबको खींचनेवाले होनेसे ‘कृष्ण’ कहलाते हैं, तो आप यह बतायें कि हमारे कुलको आप किस तरफ खींचेंगे अर्थात् किधर ले जायेंगे ?
‘वाष्ण्यं’ सम्बोधन देनेका भाव है कि आप वृष्णिवंशमें अवतार लेनेके कारण ‘वाष्ण्यं’ कहलाते हैं। परन्तु जब हमारे कुल-(वंश-) का नाश हो जायगा, तब हमारे वंशज किस कुलके कहलायेंगे ? अतः कुलका नाश करना उचित नहीं है।
- परस्पर विरुद्ध धर्माँका मिश्रण होकर जो बनता है, उसको ‘संकर’ कहते हैं। जब कर्तव्यका पालन नहीं होता, तब धर्मसंकर, वर्णसंकर, जातिसंकर, कुलसंकर, वेशसंकर, भाषासंकर, आहारसंकर आदि अनेक संकरदोष आ जाते हैं।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो होषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ ४२ ॥
| सङ्कः | = वर्णसंकर | जानेवाला | एषाम् | = इन (कुलधातियों)-के |
|---|---|---|---|---|
| कुलघ्नानाम् | = कुलधातियोंको | एव | = ही (होता है)। | पितरः |
| च | = और | लुप्तपिण्डोदकक्रियाः | = श्राद्ध | हि |
| कुलस्य | = कुलको | और तर्पण न | ||
| नरकाय | = नरकमें ले | मिलनेसे | पतन्ति |
व्याख्या— ‘सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च’—वर्ण-मिश्रणसे पैदा हुए वर्णसंकर-(सन्तान-) में धार्मिक बुद्धि नहीं होती। वह मर्यादाओंका पालन नहीं करता; क्योंकि वह खुद बिना मर्यादासे पैदा हुआ है। इसलिये उसके खुदके कुलधर्म न होनेसे वह उनका पालन नहीं करता, प्रत्युत कुलधर्म अर्थात् कुलमर्यादासे विरुद्ध आचरण करता है।
जिन्होंने युद्धमें अपने कुलका संहार कर दिया है, उनको ‘कुलघाती’ कहते हैं। वर्णसंकर ऐसे कुलधातियोंको नरकमें ले जाता है। केवल कुलधातियोंको ही नहीं, प्रत्युत कुल-परम्परा नष्ट होनेसे सम्पूर्ण कुलको भी वह नरकमें ले जाता है।
‘पतन्ति पितरो होषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः’—जिन्होंने अपने कुलका नाश कर दिया है, ऐसे इन कुलधातियोंके पितरोंको वर्णसंकरके द्वारा पिण्ड और पानी (श्राद्ध और
तर्पण) न मिलनेसे उन पितरोंका पतन हो जाता है। कारण कि जब पितरोंको पिण्ड-पानी मिलता रहता है, तब वे उस पुण्यके प्रभावसे ऊँचे लोकोंमें रहते हैं। परन्तु जब उनको पिण्ड-पानी मिलना बन्द हो जाता है, तब उनका वहाँसे पतन हो जाता है अर्थात् उनको स्थिति उन लोकोंमें नहीं रहती।
पितरोंको पिण्ड-पानी न मिलनेमें कारण यह है कि वर्णसंकरकी पूर्वजोंके प्रति आदर-बुद्धि नहीं होती। इस कारण उनमें पितरोंके लिये श्राद्ध-तर्पण करनेकी भावना ही नहीं होती। अगर लोक-लिहाजमें आकर वे श्राद्ध-तर्पण करते भी हैं, तो भी शास्त्रविधिके अनुसार उनका श्राद्ध-तर्पणमें अधिकार न होनेसे वह पिण्ड-पानी पितरोंको मिलता ही नहीं। इस तरह जब पितरोंको आदरबुद्धिसे और शास्त्रविधिके अनुसार पिण्ड-जल नहीं मिलता, तब उनका अपने स्थानसे पतन हो जाता है।
परिशिष्ट भाव— पितरोंमें एक ‘आजान’ पितर होते हैं और एक ‘मर्त्य’ पितर। पितरलोकमें रहनेवाले पितर ‘आजान’ हैं और मनुष्यलोकसे मरकर गये पितर ‘मर्त्य’ हैं। श्राद्ध और तर्पण न मिलनेसे मर्त्य पितरोंका पतन होता है। पतन उन्हीं मर्त्य पितरोंका होता है, जो कुटुम्बसे, सन्तानसे सम्बन्ध रखते हैं और उनसे श्राद्ध-तर्पणकी आशा रखते हैं।
दोषैरैतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ ४३ ॥
| ऐतैः | = इन | दोषैः | = दोषोंसे | कुलधर्माः | = कुलधर्म |
|---|---|---|---|---|---|
| वर्णसङ्करकारकैः | = वर्णसंकर | कुलघ्नानाम् | = कुलधातियोंके | च | = और |
| पैदा | शाश्वताः | = सदासे चलते | जातिधर्माः | = जातिधर्म | |
| करनेवाले | आये | उत्साद्यन्ते | = नष्ट हो जाते हैं। |
व्याख्या— ‘दोषैरैतैः कुलघ्नानाम्.....कुलधर्माश्च शाश्वताः’—युद्धमें कुलका क्षय होनेसे कुलके साथ चलते आये कुलधर्माका भी नाश हो जाता है। कुलधर्मके नाशसे कुलमें अधर्मकी वृद्धि हो जाती है। अधर्मकी वृद्धिसे स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं। स्त्रियोंके दूषित होनेसे वर्णसंकर पैदा
हो जाते हैं। इस तरह इन वर्णसंकर पैदा करनेवाले दोषोंसे कुलका नाश करनेवालोंके जातिधर्म (वर्णधर्म) नष्ट हो जाते हैं।
कुलधर्म और जातिधर्म क्या हैं? एक ही जातिमें एक कुलकी जो अपनी अलग-अलग परम्पराएँ हैं, अलग-
श्लोक ४४-४५ ]
- साधक-संजीवनी *
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अलग मर्यादाएँ हैं, अलग-अलग आचरण हैं, वे सभी उस कुलके 'कुलधर्म' कहलाते हैं। एक ही जातिके सम्पूर्ण कुलोंके समुदायको लेकर जो धर्म कहे जाते हैं, वे सभी
'जातिधर्म' अर्थात् 'वर्णधर्म' कहलाते हैं, जो कि सामान्य धर्म हैं और शास्त्रविधिसे नियत हैं। इन कुलधर्मोंका और जातिधर्मोंका आचरण न होनेसे ये धर्म नष्ट हो जाते हैं।
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ ४४ ॥
| जनार्दन | = हे जनार्दन ! | मनुष्याणाम् | = (उन) | वासः | = वास |
|---|---|---|---|---|---|
| उत्सन्नकुलधर्माणाम् | = जिनके | मनुष्योंका | भवति | = होता है, | |
| कुलधर्म नष्ट | अनियतम् | = बहुत कालतक | इति | = ऐसा (हम) | |
| हो जाते हैं, | नरके | = नरकोंमें | अनुशुश्रुम | = सुनते आये हैं। |
व्याख्या —'उत्सन्नकुलधर्माणाम्....अनुशुश्रुम *'—भगवान्ने मनुष्यको विवेक दिया है, नया कर्म करनेका अधिकार दिया है। अतः यह कर्म करनेमें अथवा न करनेमें, अच्छा करनेमें अथवा मन्दा करनेमें स्वतन्त्र है। इसलिये इसको सदा विवेक-विचारपूर्वक कर्तव्य-कर्म करने चाहिये। परन्तु मनुष्य सुखभोग आदिके लोभमें आकर अपने विवेकका निरादर कर देते हैं और राग-द्वेषके वशीभूत हो जाते हैं, जिससे उनके आचरण शास्त्र और कुलमर्यादाके विरुद्ध होने लगते हैं। परिणामस्वरूप इस
लोकमें उनकी निन्दा, अपमान, तिरस्कार होता है और परलोकमें दुर्गति, नरकोंकी प्राप्ति होती है। अपने पापोंके कारण उनको बहुत समयतक नरकोंका कष्ट भोगना पड़ता है। ऐसा हम परम्परासे बड़े-बूढ़े गुरुजनोंसे सुनते आये हैं।
'मनुष्याणाम्' —पदमें कुलधाती और उनके कुलके सभी मनुष्योंका समावेश किया गया है अर्थात् कुलधातियोंके पहले जो हो चुके हैं—उन (पितरों)-का, अपना और आगे होनेवाले-(वंश-) का समावेश किया गया है।
सम्बन्ध—युद्धसे होनेवाली अनर्थ-परम्पराके वर्णका खुद अर्जुनपर क्या असर पड़ा ? इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ ४५ ॥
| अहो | = यह बड़े आश्चर्य | महत्पापम् | = बड़ा भारी पाप | राज्यसुखलोभेन | = राज्य और |
|---|---|---|---|---|---|
| (और) | कर्तुम् | = करनेका | सुखके लोभसे | ||
| बत | = खेदकी बात | व्यवसिताः | = निश्चय कर | स्वजनम् | = अपने स्वजनोंको |
| है कि | बैठे हैं, | हन्तुम् | = मारनेके लिये | ||
| वयम् | = हमलोग | यत् | = जो कि | उद्यताः | = तैयार हो गये हैं। |
व्याख्या —'अहो बत....स्वजनमुद्यताः'—ये दुर्घोष आदि दुष्ट हैं। इनकी धर्मपर दृष्टि नहीं है। इनपर लोभ सवार हो गया है। इसलिये ये युद्धके लिये तैयार हो जायें तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। परन्तु हमलोग तो धर्म-अधर्मको, कर्तव्य-अकर्तव्यको, पुण्य-पापको जाननेवाले हैं। ऐसे जानकार होते हुए भी अनजान मनुष्योंकी तरह
हमलोगोंने बड़ा भारी पाप करनेका निश्चय—विचार कर लिया है। इतना ही नहीं, युद्धमें अपने स्वजनोंको मारनेके लिये अस्त्र-शस्त्र लेकर तैयार हो गये हैं! यह हमलोगोंके लिये बड़े भारी आश्चर्यकी और खेद-(दुःख-)की बात है अर्थात् सर्वथा अनुचित बात है।
हमारी जो जानकारी है, हमने जो शास्त्रोंसे सुना है,
- शोकाविष्ट होनेके कारण ही अर्जुनने यहाँ 'अनुशुश्रुम' परोक्ष लिट्की क्रियाका प्रयोग किया है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
गुरुजनोंसे शिक्षा पायी है, अपने जीवनको सुधारनेका विचार किया है, उन सबका अनादर करके आज हमने युद्धरूपी पाप करनेके लिये विचार कर लिया है—यह बड़ा भारी पाप है—‘महत्पापम्’।
इस श्लोकमें ‘अहो’ और ‘बत’—ये दो पद आये हैं। इनमेंसे ‘अहो’ पद आश्चर्यका वाचक है। आश्चर्य यही है कि युद्धसे होनेवाली अनर्थ-परम्पराको जानते हुए भी हमलोगोंने युद्धरूपी बड़ा भारी पाप करनेका पक्का निश्चय कर लिया है! दूसरा ‘बत’ पद खेदका, दुःखका वाचक है। दुःख यही है कि थोड़े दिन रहनेवाले राज्य और सुखके लोभमें आकर हम अपने कुटुम्बियोंको मारनेके लिये तैयार हो गये हैं!
पाप करनेका निश्चय करनेमें और स्वजनोंको मारनेके लिये तैयार होनेमें केवल राज्यका और सुखका लोभ ही कारण है। तात्पर्य है कि अगर युद्धमें हमारी विजय हो जायगी तो हमें राज्य, वैभव मिल जायगा, हमारा आदर-सत्कार होगा, हमारी महत्ता बढ़ जायगी, पूरे राज्यपर हमारा प्रभाव रहेगा, सब जगह हमारा हुक्म चलेगा, हमारे पास धन होनेसे हम मनचाही भोग-सामग्री जुटा लेंगे, फिर खूब आराम करेंगे, सुख भोंगेंगे—इस तरह हमारेपर राज्य और सुखका लोभ छा गया है, जो हमारे-जैसे मनुष्योंके लिये सर्वथा अनुचित है।
इस श्लोकमें अर्जुन यह कहना चाहते हैं कि अपने सद्विचारोंका, अपनी जानकारीका आदर करनेसे ही शास्त्र, गुरुजन आदिकी आज्ञा मानी जा सकती है। परन्तु जो मनुष्य अपने सद्विचारोंका निरादर करता है, वह शास्त्रोंकी, गुरुजनोंकी और सिद्धान्तोंकी अच्छी-अच्छी बातोंको सुनकर भी उन्हें धारण नहीं कर सकता। अपने सद्विचारोंका बार-बार निरादर, तिरस्कार करनेसे सद्विचारोंकी सृष्टि बंद हो जाती है। फिर मनुष्यको दुर्गुण-दुराचारसे रोकनेवाला है ही
कौन? ऐसे ही हम भी अपनी जानकारीका आदर नहीं करेंगे, तो फिर हमें अनर्थ-परम्परासे कौन रोक सकता है? अर्थात् कोई नहीं रोक सकता।
यहाँ अर्जुनकी दृष्टि युद्धरूपी क्रियाकी तरफ है। वे युद्धरूपी क्रियाको दोषी मानकर उससे हटना चाहते हैं; परन्तु वास्तवमें दोष क्या है—इस तरफ अर्जुनकी दृष्टि नहीं है। युद्धमें कौटुम्बिक मोह, स्वार्थभाव, कामना ही दोष है, पर इधर दृष्टि न जानेके कारण अर्जुन यहाँ आश्चर्य और खेद प्रकट कर रहे हैं, जो कि वास्तवमें किसी भी विचारशील, धर्मात्मा, शूरवीर क्षत्रियके लिये उचित नहीं है।
[ अर्जुनने पहले अङ्गीसर्व श्लोकमें दुर्घाधनादिके युद्धमें प्रवृत्त होनेमें, कुलक्षयके दोषमें और मित्रद्रोहके पापमें लोभको कारण बताया; और यहाँ भी अपनेको राज्य और सुखके लोभके कारण महान् पाप करनेको उद्यत बता रहे हैं। इससे सिद्ध होता है कि अर्जुन पापके होनेमें ‘लोभ’ को हेतु मानते हैं। फिर भी आगे तीसरे अध्यायके छत्तीसवें श्लोकमें अर्जुनने ‘मनुष्य न चाहता हुआ भी पापका आचरण क्यों कर बैठा है’—ऐसा प्रश्न क्यों किया? इसका समाधान है कि यहाँ तो कौटुम्बिक मोहके कारण अर्जुन युद्धसे निवृत्त होनेको धर्म और युद्धमें प्रवृत्त होनेको अधर्म मान रहे हैं अर्थात् उनकी शरीर आदिको लेकर केवल लौकिक दृष्टि है, इसलिये वे युद्धमें स्वजनोंको मारनेमें लोभको हेतु मान रहे हैं। परन्तु आगे गीताका उपदेश सुनते-सुनते उनमें अपने श्रेय—कल्याणकी इच्छा जाग्रत् हो गयी (गीता—तीसरे अध्यायका दूसरा श्लोक)। इसलिये वे कर्तव्यको छोड़कर न करनेयोग्य काममें प्रवृत्त होनेमें कौन कारण है—ऐसा पूछते हैं अर्थात् वहाँ (तीसरे अध्यायके छत्तीसवें श्लोकमें) अर्जुन कर्तव्यकी दृष्टिसे, साधककी दृष्टिसे पूछते हैं। ]
सम्बन्ध—आश्चर्य और खेदमें निमग्न हुए अर्जुन आगेके श्लोकमें अपनी दलीलोंका अन्तिम निर्णय बताते हैं।
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्ने क्षेमतरं भवेत् ॥ ४६ ॥
| यदि | = अगर (ये) | रणे | = युद्धभूमिमें | हन्युः | = मार भी दें (तो) |
|---|---|---|---|---|---|
| शस्त्रपाणयः | = हाथोंमें शस्त्र- | ||||
| अस्त्र लिये हुए | अप्रतीकारम् | = सामना न | |||
| करनेवाले | तत् | = वह | |||
| धार्तराष्ट्राः | = धृतराष्ट्रके | ||||
| पक्षपाती | |||||
| लोग | अशस्त्रम् | = (तथा) | |||
| शस्त्ररहित | मे | = मेरे लिये | |||
| माम् | = मुझे | क्षेमतरम् | = बड़ा ही | ||
| हितकारक | |||||
| भवेत् | = होगा। |
श्लोक ४६ ]
- साधक-संजीवनी *
६१
व्याख्या —‘यदि माम्’……‘क्षेमतरं भवेत्’—अर्जुन कहते हैं कि अगर मैं युद्धसे सर्वथा निवृत्त हो जाऊँगा, तो शायद ये दुर्गंधन आदि भी युद्धसे निवृत्त हो जायेंगे। कारण कि हम कुछ चाहेंगे ही नहीं, लड़ेंगे भी नहीं, तो फिर ये लोग युद्ध करेंगे ही क्यों? परन्तु कदाचित् जोशमें भरे हुए तथा हाथोंमें शस्त्र धारण किये हुए ये धृतराष्ट्रके पक्षपाती लोग ‘सदाके लिये हमारे रास्तेका काँटा निकल जाय, वैरी समाप्त हो जाय’—ऐसा विचार करके सामना न करनेवाले तथा शस्त्रहरित मेरेको मार भी दें, तो उनका वह मारना मेरे लिये हितकारक ही होगा। कारण कि मैंने युद्धमें गुरुजनोंको मारकर बड़ा भारी पाप करनेका जो निश्चय किया था, उस निश्चयरूप पापका प्रायश्चित्त हो जायगा, उस पापसे मैं शुद्ध हो जाऊँगा। तात्पर्य है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तो मैं भी पापसे बचूँगा और मेरे कुलका भी नाश नहीं होगा।
[ जो मनुष्य अपने लिये जिस किसी विषयका वर्णन करता है, उस विषयका उसके स्वयंपर असर पड़ता है। अर्जुनने भी जब शोकाविष्ट होकर अट्टाईसवें श्लोकसे बोलना आरम्भ किया, तब वे उतने शोकाविष्ट नहीं थे, जितने वे अब शोकाविष्ट हैं। पहले अर्जुन युद्धसे उपरत नहीं हुए, पर शोकाविष्ट होकर बोलते-बोलते अन्तमें वे युद्धसे उपरत हो जाते हैं और बाणसहित धनुषका त्याग करके बैठ जाते हैं। भगवान्ने यह सोचा कि अर्जुनके बोलनेका वेग निकल जाय तो मैं बोलूँ अर्थात् बोलनेसे अर्जुनका शोक बाहर आ जाय, भीतरमें कोई शोक बाकी न रहे, तभी मेरे वचनोंका उसपर असर होगा। अतः भगवान् बीचमें कुछ नहीं बोले।]
विशेष बात
अबतक अर्जुनने अपनेको धर्मात्मा मानकर युद्धसे निवृत्त होनेमें जितनी दलीलें, युक्तियाँ दी हैं, संसारमें रचे-पचे लोग अर्जुनकी उन दलीलोंको ही ठीक समझेंगे और आगे भगवान् अर्जुनको जो बातें समझायेंगे, उनको ठीक नहीं समझेंगे! इसका कारण यह है कि जो मनुष्य जिस स्थितिमें हैं, उस स्थितिकी, उस श्रेणीकी बातको ही वे ठीक समझते हैं; उससे ऊँची श्रेणीकी बात वे समझ ही नहीं सकते। अर्जुनके भीतर कौटुम्बिक मोह है और उस मोहसे आविष्ट होकर ही वे धर्मकी, साधुताकी बड़ी अच्छी-अच्छी बातें कह रहे हैं। अतः जिन लोगोंके भीतर कौटुम्बिक मोह है, उन लोगोंको ही अर्जुनकी बातें ठीक लगेंगी। परन्तु भगवान्की दृष्टि जीवके कल्याणकी तरफ
है कि उसका कल्याण कैसे हो? भगवान्की इस ऊँची श्रेणीकी दृष्टिको वे (लौकिक दृष्टिवाले) लोग समझ ही नहीं सकते। अतः वे भगवान्की बातोंको ठीक नहीं मानेंगे, प्रत्युत ऐसा मानेंगे कि अर्जुनके लिये युद्धरूपी पापसे बचना बहुत ठीक था, पर भगवान्ने उनको युद्धमें लगाकर ठीक नहीं किया!
वास्तवमें भगवान्ने अर्जुनसे युद्ध नहीं कराया है, प्रत्युत उनको अपने कर्तव्यका ज्ञान कराया है। युद्ध तो अर्जुनको कर्तव्यरूपसे स्वतः प्राप्त हुआ था। अतः युद्धका विचार तो अर्जुनका खुदका ही था; वे स्वयं ही युद्धमें प्रवृत्त हुए थे, तभी वे भगवान्को निमन्त्रण देकर लाये थे। परन्तु उस विचारको अपनी बुद्धिसे अनिष्टकारक समझकर वे युद्धसे विमुख हो रहे थे अर्थात् अपने कर्तव्यके पालनसे हट रहे थे। इसपर भगवान्ने कहा कि यह जो तू युद्ध नहीं करना चाहता, यह तेरा मोह है। अतः समयपर जो कर्तव्य स्वतः प्राप्त हुआ है, उसका त्याग करना उचित नहीं है।
कोई बन्दीनारायण जा रहा था; परन्तु रास्तेमें उसे दिशाभ्रम हो गया अर्थात् उसने दक्षिणको उत्तर और उत्तरको दक्षिण समझ लिया। अतः वह बन्दीनारायणकी तरफ न चलकर उलटा चलने लग गया। सामनेसे उसको एक आदमी मिल गया। उस आदमीने पूछा कि ‘भाई! कहाँ जा रहे हो?’ वह बोला—‘बन्दीनारायण’। वह आदमी बोला कि ‘भाई! बन्दीनारायण इधर नहीं है, उधर है। आप तो उलटे जा रहे हैं!’ अतः वह आदमी उसको बन्दीनारायण भेजनेवाला नहीं है; किन्तु उसको दिशाका ज्ञान कराकर ठीक रास्ता बतानेवाला है। ऐसे ही भगवान्ने अर्जुनको अपने कर्तव्यका ज्ञान कराया है, युद्ध नहीं कराया है।
स्वजनोंको देखनेसे अर्जुनके मनमें यह बात आयी थी कि मैं युद्ध नहीं करूँगा—‘न योत्ये’ (२।१), पर भगवान्का उपदेश सुननेपर अर्जुनने ऐसा नहीं कहा कि मैं युद्ध नहीं करूँगा; किन्तु ऐसा कहा कि मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा;—‘करिष्ये वचनं तव’ (१८।७३) अर्थात् अपने कर्तव्यका पालन करूँगा। अर्जुनके इन वचनोंसे यही सिद्ध होता है कि भगवान्ने अर्जुनको अपने कर्तव्यका ज्ञान कराया है।
वास्तवमें युद्ध होना अवश्यम्भावी था; क्योंकि सबकी आयु समाप्त हो चुकी थी। इसको कोई भी टाल नहीं सकता था। स्वयं भगवान्ने विश्वरूपदर्शनके समय अर्जुनसे कहा है कि ‘मैं बढ़ा हुआ काल हूँ और सबका संहार करनेके लिये
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
यहाँ आया हूँ। अतः तेरे युद्ध किये बिना भी ये विपक्षमें खड़े योद्धालोग बचेंगे नहीं' (ग्यारहवें अध्यायका बत्तीसवें श्लोक)। इसलिये यह नरसंहार अवश्यम्भावी होनहार ही था। यह नरसंहार अर्जुन युद्ध न करते, तो भी होता। अगर अर्जुन युद्ध नहीं करते, तो जिन्होंने माँकी आज्ञासे द्रौपदीके साथ अपने सहित पाँचों भाइयोंका विवाह करना स्वीकार कर लिया था, वे युधिष्ठिर तो माँकी युद्ध करनेकी आज्ञासे युद्ध अवश्य करते ही। भीमसेन भी युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते; क्योंकि उन्होंने कौरवोंको मारनेकी प्रतिज्ञा कर रखी थी। द्रौपदीने तो यहाँतक कह दिया था कि अगर मेरे पति (पाण्डव) कौरवोंसे युद्ध नहीं करेंगे तो, मेरे पिता (द्रुपद),
भाई (धृष्टद्युम्न) और मेरे पाँचों पुत्र तथा अभिमन्यु कौरवोंसे युद्ध करेंगे*। इस तरह ऐसे कई कारण थे, जिससे युद्धको टालना सम्भव नहीं था।
होनहारको रोकना मनुष्यके हाथकी बात नहीं है; परन्तु अपने कर्तव्यका पालन करके मनुष्य अपना उद्धार कर सकता है और कर्तव्यच्युत होकर अपना पतन कर सकता है। तात्पर्य है कि मनुष्य अपना इष्ट-अनिष्ट करनेमें स्वतन्त्र है। इसलिये भगवान्ने अर्जुनको कर्तव्यका ज्ञान कराकर मनुष्यमात्रको उपदेश दिया है कि उसे शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार अपने कर्तव्यके पालनमें तत्पर रहना चाहिये, उससे कभी च्युत नहीं होना चाहिये।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अर्जुनने अपनी दलीलोंका निर्णय सुना दिया। उसके बाद अर्जुनने क्या किया— इसको संजय आगेके श्लोकमें बताते हैं।
सज्जय उवाच
एवमुक्त्वाजुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ ४७ ॥
संजय बोले—
| एवम् | = ऐसा | अर्जुनः | = अर्जुन | सङ्ख्ये | = युद्धभूमिमें |
|---|---|---|---|---|---|
| उक्त्वा | = कहकर | सशरम् | = बाणसहित | रथोपस्थे | = रथके |
| शोकसंविग्नमानसः | = शोकाकुल मनवाले | चापम् | = धनुषका | मध्यभागमें | |
| विसृज्य | = त्याग करके | उपाविशत् | = बैठ गये। |
व्याख्या—'एवमुक्त्वाजुनः' '..... शोकसंविग्नमानसः'— युद्ध करना सम्पूर्ण अनर्थीका मूल है, युद्ध करनेसे यहाँ कुटुम्बियोंका नाश होगा, परलोकमें नरकोंकी प्राप्ति होगी आदि बातोंको युक्ति और प्रमाणसे कहकर शोकसे अत्यन्त व्याकुल मनवाले अर्जुनने युद्ध न करनेका पक्का निर्णय कर लिया। जिस रणभूमिमें वे हाथमें धनुष लेकर उत्साहके साथ आये थे, उसी रणभूमिमें उन्होंने अपने बायें हाथसे गाण्डीव धनुषको और दायें हाथसे बाणको नीचे रख दिया और स्वयं रथके मध्यभागमें अर्थात् दोनों सेनाओंको देखनेके लिये जहाँपर खड़े थे, वहाँपर शोकमुद्रामें बैठ गये। अर्जुनकी ऐसी शोकाकुल अवस्था होनेमें मुख्य कारण है—भगवान्का भीष्म और द्रोणके सामने रथ खड़ा करके
अर्जुनसे कुरुवंशियोंको देखनेके लिये कहना और उनको देखकर अर्जुनके भीतर छिपे हुए मोहका जाग्रत् होना। मोहके जाग्रत् होनेपर अर्जुन कहते हैं कि युद्धमें हमारे कुटुम्बी मारे जायेंगे। कुटुम्बियोंका मरना ही बड़े नुकसानकी बात है। दुर्गोधन आदि तो लोभके कारण इस नुकसानकी तरफ नहीं देख रहे हैं। परन्तु युद्धसे कितनी अनर्थ परम्परा चल पड़ेगी—इस तरफ ध्यान देकर हमलोगोंको ऐसे पापसे निवृत्त हो ही जाना चाहिये। हमलोग राज्य और सुखके लोभसे कुलका संहार करनेके लिये रणभूमिमें खड़े हो गये हैं—यह हमने बड़ी भारी गलती की! अतः युद्ध न करते हुए शास्त्ररहित मेरेको यदि सामने खड़े हुए योद्धालोग मार भी दें, तो उससे मेरा हित ही होगा। इस तरह अन्तःकरणमें
- यदि भीमार्जुनी कृष्ण कृष्णी सन्धिकामुको। पिता मे योत्स्यते वृद्धः सह पुत्रैर्महारथैः ॥ पञ्च चैव महावीर्यैः पुत्रा मे मधुसूदन। अभिमन्यु पुरस्कृत्य योत्स्यन्ते कुरुभिः सह॥
(महाभारत, उद्योगो ८२। ३७-३८)
श्लोक ४७ ]
- साधक-संजीवनी *
६३
मोह छा जानेके कारण अर्जुन युद्धसे उपरत होनेमें एवं अपने पर जानेमें भी हित देखते हैं और अन्तमें उसी मोहके कारण बाणसहित धनुषका त्याग करके विषादमग्न होकर
बैठ जाते हैं। यह मोहकी ही महिमा है कि जो अर्जुन धनुष उठाकर युद्धके लिये तैयार हो रहे थे, वही अर्जुन धनुषको नीचे रखकर शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो रहे हैं!
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवनामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ‘अर्जुनविषादयोग’ नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥
प्रत्येक अध्यायकी समाप्तिपर महर्षि वेदव्यासजीने जो उपर्युक्त पुष्पिका लिखी है, इसमें श्रीमद्भगवद्गीताका विशेष माहात्म्य और प्रभाव ही प्रकट किया गया है।
‘ॐ, तत्, सत्’—ये तीनों सच्चिदानन्दधन परमात्माके पवित्र नाम हैं। ये मात्र जीवोंका कल्याण करनेवाले हैं। इनका उच्चारण परमात्माके सम्मुख करता है और शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्मके अंग-वैगुण्यको मिटाता है। अतः गीताके अध्यायका पाठ करनेमें श्लोक, पद और अक्षरोंके उच्चारणमें जो-जो भूलें हुई हैं, उनका परिमार्जन करनेके लिये और संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक भगवत्-सम्बन्धकी याद आनेके लिये प्रत्येक अध्यायके अन्तमें ‘ॐ तत्सत्’का उच्चारण किया गया है।
महर्षि वेदव्यासजीके द्वारा अध्यायके अन्तमें ‘ॐ’के उच्चारणका तात्पर्य है कि मेरी रचनाका अंग-वैगुण्य मिट जाय, ‘तत्’के उच्चारणका तात्पर्य है कि मेरी रचना भगवत्प्रीत्यर्थ हो जाय और ‘सत्’के उच्चारणका तात्पर्य है कि मेरी रचना सत् अर्थात् अविनाशी फल देनेवाली हो जाय। ‘इति’—बस, मेरा यही प्रयोजन है। इसके सिवाय मेरा व्यक्तिगत और कोई प्रयोजन नहीं है।
जो ‘श्रीमत्’ अर्थात् सर्वशोभासम्पन्न हैं और जिनमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य—ये छः ‘भग’ नित्य विद्यमान रहते हैं, उन भगवान्के मुखसे निकली हुई होनेके कारण इसको ‘श्रीमत् भगवत्’ कहा गया है।
जब मनुष्य मस्तीमें, आनन्दमें होता है, तब उसके मुखसे स्वतः गीत निकलता है। भगवान्ने इसको मस्तीमें आकर गाया है, इसलिये इसका नाम ‘गीता’ है। यद्यपि संस्कृत व्याकरणके नियमानुसार इसका नाम ‘गीतम्’ होना चाहिये था, तथापि उपनिषद्-स्वरूप होनेसे स्त्रीलिंग शब्द ‘गीता’का प्रयोग किया गया है।
इसमें सम्पूर्ण उपनिषदोंका सारतत्त्व संगृहीत है और यह स्वयं भी भगवद्वार्णी होनेसे उपनिषद्-स्वरूप है, इसलिये इसे ‘उपनिषद्’ कहा गया है।
वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका आग्रह न रखकर प्राणिमात्रका कल्याण करनेवाली सर्वश्रेष्ठ विद्या होनेके कारण इसका नाम ‘ब्रह्मविद्या’ है। इस ब्रह्मविद्यास्वरूप गीतामें कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग आदि योगसाधनोंकी शिक्षा दी गयी है, जिससे साधकको परमात्माके साथ अपने नित्य-सम्बन्धका अनुभव हो जाय। इसलिये इसे ‘योगशास्त्र’ कहा गया है।
यह साक्षात् पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण और भक्तप्रवर अर्जुनका संवाद है। अर्जुनने निःसंकोच-भावसे बातें पूछी हैं और भगवान्ने उदारतापूर्वक उनका उत्तर दिया है। इन दोनोंके ही भाव इसमें हैं। अतः इन दोनोंके नामसे इस गीताशास्त्रकी विशेष महिमा होनेके कारण इसे ‘श्रीकृष्णार्जुनसंवाद’ नामसे कहा गया है।
इस पहले अध्यायमें अर्जुनके विषादका वर्णन है। यह विषाद भी भगवान् अथवा सन्तोंका संग मिल जानेपर संसारसे वैराग्य उत्पन्न करके कल्याण करनेवाला हो जाता है। यद्यपि दुर्घटनादिको भी विषाद हुआ है, तथापि उनमें भगवान्ने विमुखा होनेके कारण उनका विषाद ‘योग’ नहीं हुआ। केवल अर्जुनका विषाद ही भगवान्की सम्मुखता होनेके कारण ‘योग’ अर्थात् भगवान्के नित्य-सम्बन्धका अनुभव करानेवाला हो गया। इसलिये इस अध्यायका नाम ‘अर्जुनविषादयोग’ रखा गया है।
प्रत्येक अध्यायके अन्तमें पुष्पिका देनेका तात्पर्य है कि अगर साधक एक अध्यायका भी ठीक तरहसे मनन-विचार करे, तो उस एक ही अध्यायसे उसका कल्याण हो जायगा।
- द्रष्टव्य—गीता—सत्रहवें अध्यायके तेईसवेंसे सत्ताईसवें श्लोकतक।
६४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
परिशिष्ट भाव —गीताकी पुण्यिकामें ‘ब्रह्मविद्यायाम्’, ‘योगशास्त्रे’ और ‘श्रीकृष्णार्जुनसंवादे’—ये तीन पद तो एकवचनमें आये हैं, पर ‘श्रीमद्भगवद्गीतासु’ और ‘उपनिषत्सु’—ये दो पद बहुवचनमें आये हैं। इसका तात्पर्य है कि भगवद्वाणी सम्पूर्ण उपनिषदोंमें श्रीमद्भगवद्गीता भी एक उपनिषद् है, जिसमें ‘ब्रह्मविद्या’ (ज्ञानयोग), ‘योगशास्त्र’ (कर्मयोग) और ‘श्रीकृष्णार्जुनसंवाद’ (भक्तियोग)—तीनों आये हैं।
गीतामें ‘श्रीकृष्णार्जुनसंवाद’का आरम्भ और अन्त भक्तिमें ही हुआ है। आरम्भमें अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ होकर भगवान्के शरण होते हैं। ‘शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्’ (२।७) और अन्तमें भगवान्के द्वारा ‘मामेकं शरणं ब्रज’ पदोंसे पूर्ण शरणागतिकी प्रेरणा करनेपर अर्जुन पूर्णतया शरणागत हो जाते हैं।—‘करिष्ये वचनं तव’ (१८।७३)। अर्जुनने अपने श्रेय—(कल्याण—) का उपाय पूछा था (२।७, ३।२, ५।१), इसलिये भगवान्ने गीतामें ‘ज्ञानयोग’ और ‘कर्मयोग’ का भी वर्णन किया है।
पहले अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें ‘अथ प्रथमोऽध्यायः’ के तीन, ‘धृतराष्ट्र उवाच’ ‘सञ्जय उवाच’ आदि पदोंके बारह, श्लोकोंके पाँच सौ अष्टावन और पुण्यिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग पाँच सौ छियासी है।
(२) इस अध्यायमें ‘अथ प्रथमोऽध्यायः’ के सात, ‘धृतराष्ट्र उवाच’ ‘सञ्जय उवाच’ आदि पदोंके सौतीस, श्लोकोंके एक हजार पाँच सौ चार और पुण्यिकाके अड़तालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग एक हजार पाँच सौ छियानवे है। इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें छः ‘उवाच’ हैं—एक ‘धृतराष्ट्र उवाच’, तीन ‘सञ्जय उवाच’ और दो ‘अर्जुन उवाच’।
पहले अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके सौतालीस श्लोकोंमेंसे—पाँचवें और तैंतीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा तैंतालीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘र-विपुला’; और पचीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा नवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘न-विपुला’ संज्ञावाले छन्द हैं। शेष बयालीस श्लोक ठीक ‘पध्यावक्त्र’ अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः
अवतरणिका—
दुर्योधनने द्रोणाचार्यसे दोनों सेनाओंकी बात कही, पर द्रोणाचार्य कुछ भी बोले नहीं। इससे दुर्योधन दुःखी हो गया। तब दुर्योधनको प्रसन्न करनेके लिये भीष्मजीने जोरसे शंख बजाया। भीष्मजीका शंख बजनेके बाद कौरव और पाण्डव-सेनाके बाजे बजे। इसके बाद (बीसवें श्लोकसे) श्रीकृष्णार्जुनसंवाद आरम्भ हुआ।
अर्जुनने भगवान्से अपने रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा करनेके लिये कहा। भगवान्ने दोनों सेनाओंके बीचमें भीष्म, द्रोण आदिके सामने रथको खड़ा करके अर्जुनसे कुरुवंशियोंको देखनेके लिये कहा। दोनों सेनाओंमें अपने ही स्वजनों—सम्बन्धियोंको देखकर अर्जुनमें कौटुम्बिक मोह जाग्रत् हुआ, जिसके परिणाममें अर्जुन युद्ध करना छोड़कर बाणसहित धनुषका त्याग करके रथके मध्यभागमें बैठ गये।
इसके बाद विषादमग्न अर्जुनके प्रति भगवान्ने क्या कहा—यह बात धृतराष्ट्रको सुनानेके लिये संजय दूसरे अध्यायका विषय आरम्भ करते हैं।
सज्जय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्। विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥
संजय बोले—
| तथा | = वैसी | अश्रुपूर्णा- | मधुसूदनः | = भगवान् | |
|---|---|---|---|---|---|
| कृपया | = कायरतासे | कुलेक्षणम् | = आँसुओंके कारण | मधुसूदन | |
| आविष्टम् | = व्याप्त हुए | जिनके नेत्रोंकी | इदम् | = यह (आगे कहे जानेवाले) | |
| तम् | = उन अर्जुनके प्रति, | देखनेकी शक्ति | |||
| विषीदन्तम् | = जो कि विषाद | अवरुद्ध हो रही | वाक्यम् | = वचन | |
| कर रहे हैं (और) | है, | उवाच | = बोले। |
व्याख्या—‘तं तथा कृपयाविष्टम्’—अर्जुन रथमें सारथिरूपसे बैठे हुए भगवान्को यह आज्ञा देते हैं कि हे अच्युत! मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा कीजिये, जिससे मैं यह देख लूँ कि इस युद्धमें मेरे साथ दो हाथ करनेवाले कौन हैं? अर्थात् मेरे-जैसे शूरवीरके साथ कौन-कौन-से योद्धा साहस करके लड़ने आये हैं? अपनी मौत सामने दीखते हुए भी मेरे साथ लड़नेकी उनकी हिम्मत कैसे हुई? इस प्रकार जिस अर्जुनमें युद्धके लिये इतना उत्साह था, वीरता थी, वे ही अर्जुन दोनों सेनाओंमें अपने कुटुम्बियोंको देखकर उनके मरनेकी आशंकासे मोहग्रस्त होकर इतने शोकाकुल हो गये हैं कि उनका शरीर शिथिल हो रहा है, मुख सूख रहा है, शरीरमें कैंपकँपी आ रही है, रोंगटे खड़े हो रहे हैं, हाथसे धनुष गिर रहा
है, त्वचा जल रही है, खड़े रहनेकी भी शक्ति नहीं रही है और मन भी भ्रमित हो रहा है। कहाँ तो अर्जुनका यह स्वभाव कि ‘न दैन्यं न पलायनम्’ और कहाँ अर्जुनका कायरताके दोषसे शोकाविष्ट होकर रथके मध्यभागमें बैठ जाना! बड़े आश्चर्यके साथ संजय यही भाव उपर्युक्त पदोंसे प्रकट कर रहे हैं।
पहले अध्यायके अट्टाईसवें श्लोकमें भी संजयने अर्जुनके लिये ‘कृपया परयाविष्टः’ पदोंका प्रयोग किया है।
‘अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्’—अर्जुन-जैसे महान् शूरवीरके भीतर भी कौटुम्बिक मोह छा गया और नेत्रोंमें आँसू भर आये! आँसू भी इतने ज्यादा भर आये कि नेत्रोंसे पूरी तरह देख भी नहीं सकते।
६६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
‘विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः’—इस प्रकार कायरताके कारण विषाद करते हुए अर्जुनसे भगवान् मधुसूदनने ये ( आगे दूसरे-तीसरे श्लोकोंमें कहे जाने-वाले) वचन कहे।
यहाँ ‘विषीदन्तमुवाच’ कहनेसे ही काम चल सकता था, ‘इदं वाक्यम्’ कहनेकी जरूरत ही नहीं थी; क्योंकि ‘उवाच’ क्रियाके अन्तर्गत ही ‘वाक्यम्’ पद आ जाता है। फिर भी ‘वाक्यम्’ पद कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का यह वचन, यह वाणी बड़ी विलक्षण है। अर्जुनमें धर्मका बाना पहनकर जो कर्तव्य-त्यागरूप बुराई आ गयी थी, उसपर यह
भगवद्वाणी सीधा आघात पहुँचानेवाली है। अर्जुनका युद्धसे उपराम होनेका जो निर्णय था, उसमें खलबली मचा देनेवाली है। अर्जुनको अपने दोषका ज्ञान कराकर अपने कल्याणकी जिज्ञासा जाग्रत् करा देनेवाली है। इस गम्भीर अर्थवाली वाणीके प्रभावसे ही अर्जुन भगवान्का शिष्यत्व ग्रहण करके उनके शरण हो जाते हैं (दूसरे अध्यायका सातवाँ श्लोक)।
संजयके द्वारा ‘मधुसूदनः’ पद कहनेका तात्पर्य है कि भगवान् श्रीकृष्ण ‘मधु नामक’ दैत्यको मारनेवाले अर्थात् दुष्ट स्वभाववालोंका संहार करनेवाले हैं। इसलिये वे दुष्ट स्वभाववाले दुर्घोषनादिका नाश करवाये बिना रहेंगे नहीं।
सम्बन्ध—भगवान्ने अर्जुनके प्रति कौन-से वचन कहे—इसे आगेके दो श्लोकोंमें कहते हैं।
श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन
॥ २ ॥
श्रीभगवान् बोले१—
अर्जुन = हे अर्जुन! विषमे = इस विषम अवसरपर त्वा = तुम्हें इदम् = यह कश्मलम् = कायरता
कुतः = कहाँसे समुपस्थितम् = प्राप्त हुई, (जिसका कि) अनार्यजुष्टम् = श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते,
अस्वर्ग्यम् = (जो) स्वर्गको देनेवाली नहीं है (और) अकीर्तिकरम् = कीर्ति करनेवाली भी नहीं है।
व्याख्या—‘अर्जुन’—यह सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि तुम स्वच्छ, निर्मल अन्तःकरणवाले हो। अतः तुम्हारे स्वभावमें कालुष्य—कायरताका आना बिलकुल विरुद्ध बात है। फिर यह तुम्हारेमें कैसे आ गयी?
‘कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्’—भगवान् आश्चर्य प्रकट करते हुए अर्जुनसे कहते हैं कि ऐसे युद्धके मौकेपर तो तुम्हारेमें शूरवीरता, उत्साह आना चाहिये था, पर इस बेमौकेपर तुम्हारेमें यह कायरता कहाँसे आ गयी!
आश्चर्य दो तरहसे होता है—अपने न जाननेके कारण और दूसरेको चेतानेके लिये। भगवान्का यहाँ जो आश्चर्य-पूर्वक बोलना है, वह केवल अर्जुनको चेतानेके लिये ही
है, जिससे अर्जुनका ध्यान अपने कर्तव्यपर चला जाय।
‘कुतः’ कहनेका तात्पर्य यह है कि मूलमें यह कायरतारूपी दोष तुम्हारेमें (स्वयंमें) नहीं है। यह तो आगन्तुक दोष है, जो सदा रहनेवाला नहीं है।
‘समुपस्थितम्’ कहनेका तात्पर्य है कि यह कायरता केवल तुम्हारे भावोंमें और वचनोंमें ही नहीं आयी है; किन्तु तुम्हारी क्रियाओंमें भी आ गयी है। यह तुम्हारेपर अच्छी तरहसे छा गयी है, जिसके कारण तुम धनुष-बाण छोड़कर रथके मध्यभागमें बैठ गये हो।
‘अनार्यजुष्टम्’१—समझदार श्रेष्ठ मनुष्योंमें जो भाव पैदा होते हैं, वे अपने कल्याणके उद्देश्यको लेकर ही होते
१-यहाँ ‘भगवान्’ पदमें ‘भग’ शब्दमें जो ‘मनुष्य’ प्रत्यय किया गया है, वह नित्ययोगमें किया गया है; क्योंकि समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य—ये छहों ‘भग’ भगवान्में नित्य रहते हैं।
२-‘अनार्यजुष्टम्’ पदमें जो ‘नञ्’ समास है, वह ‘आर्यजुष्टमार्जुनजुष्टम्’—इस तृतीया समासके बाद ही करना चाहिये; जैसे—‘न आर्यजुष्टम् अनार्यजुष्टम्’। अगर ‘नञ्’ समास तृतीया समासके पहले किया जाय कि ‘न आर्या अनार्याः अनार्यजुष्टमनार्यजुष्टम्’ तो यहाँ यह कहना बनता ही नहीं; क्योंकि अनार्य पुरुषोंके द्वारा जिसका सेवन किया जाता है, वह दूसरोंके लिये आदर्श नहीं होता।
श्लोक ३ ]
- साधक-संजीवनी *
६७
है। इसलिये श्लोकके उत्तरार्धमें भगवान् सबसे पहले उपर्युक्त पद देकर कहते हैं कि तुम्हारेमें जो कायरता आयी है, उस कायरताको श्रेष्ठ पुरुष स्वीकार नहीं करते। कारण कि तुम्हारी इस कायरतामें अपने कल्याणकी बात बिलकुल नहीं है। कल्याण चाहनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनोंमें अपने कल्याणका ही उद्देश्य रखते हैं। उनमें अपने कर्तव्यके प्रति कायरता उत्पन्न नहीं होती। परिस्थितिके अनुसार उनको जो कर्तव्य प्राप्त हो जाता है, उसको वे कल्याणप्राप्तिके उद्देश्यसे उत्साह और तत्परतापूर्वक सांगोपांग करते हैं। वे तुम्हारे-जैसे कायर होकर युद्धसे या अन्य किसी कर्तव्य-कर्मसे उपरत नहीं होते। अतः युद्ध-रूपसे प्राप्त कर्तव्य-कर्मसे उपरत होना तुम्हारे लिये कल्याणकारक नहीं है।
‘अस्वर्गयम्’ —कल्याणकी बात सामने न रखकर अगर सांसारिक दृष्टिसे भी देखा जाय, तो संसारमें स्वर्गलोक ऊँचा है। परन्तु तुम्हारी यह कायरता स्वर्गको देनेवाली भी नहीं है अर्थात् कायरतापूर्वक युद्धसे निवृत्त होनेका फल स्वर्गकी प्राप्ति भी नहीं हो सकता।
‘अकीर्तिकरम्’ —अगर स्वर्गप्राप्तिका भी लक्ष्य न हो, तो अच्छा माना जानेवाला पुरुष वही काम करता है, जिससे संसारमें कीर्ति हो। परन्तु तुम्हारी यह जो कायरता
है, यह इस लोकमें भी कीर्ति (यश) देनेवाली नहीं है, प्रत्युत अपकीर्ति (अपयश) देनेवाली है। अतः तुम्हारेमें कायरताका आना सर्वथा ही अनुचित है।
भगवान्ने यहाँ ‘अनार्थजुष्टम्’ ‘अस्वर्गयम्’ और ‘अकीर्तिकरम्’ —ऐसा क्रम देकर तीन प्रकारके मनुष्य बताये हैं—(१) जो विचारशील मनुष्य होते हैं, वे केवल अपना कल्याण ही चाहते हैं। उनका ध्येय, उद्देश्य केवल कल्याणका ही होता है। (२) जो पुण्यात्मा मनुष्य होते हैं, वे शुभ-कर्मोंके द्वारा स्वर्गकी प्राप्ति चाहते हैं। वे स्वर्गको ही श्रेष्ठ मानकर उसकी प्राप्तिका ही उद्देश्य रखते हैं। (३) जो साधारण मनुष्य होते हैं, वे संसारको ही आदर देते हैं। इसलिये वे संसारमें अपनी कीर्ति चाहते हैं और उस कीर्तिको ही अपना ध्येय मानते हैं।
उपर्युक्त तीनों पद देकर भगवान् अर्जुनको सावधान करते हैं कि तुम्हारा जो यह युद्ध न करनेका निश्चय है, यह विचारशील और पुण्यात्मा मनुष्योंके ध्येय—कल्याण और स्वर्गको प्राप्त करानेवाला भी नहीं है, तथा साधारण मनुष्योंके ध्येय—कीर्तिको प्राप्त करानेवाला भी नहीं है। अतः मोहेके कारण तुम्हारा युद्ध न करनेका निश्चय बहुत ही तुच्छ है, जो कि तुम्हारा पतन करनेवाला, तुम्हें नरकोंमें ले जानेवाला और तुम्हारी अपकीर्ति करनेवाला होगा।
सम्बन्ध—कायरता आनेके बाद अब क्या करें? इस जिज्ञासाको दूर करनेके लिये भगवान् कहते हैं—
कलैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वध्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥ ३ ॥
| पार्थ | = हे पृथानन्दन | त्वधि | = तुम्हारेमें | हृदयदौर्बल्यम् | = हृदयकी इस |
|---|---|---|---|---|---|
| अर्जुन! | एतत् | = यह | तुच्छ दुर्बलताका | ||
| कलैब्यम् | = इस नपुंसकताको | न, उपपद्यते | = उचित नहीं है। | त्यक्त्वा | = त्याग करके |
| मा, स्म, | = मत प्राप्त हो; | परन्तप | = हे परन्तप! | (युद्धके लिये) | |
| गमः | = (क्योंकि) | क्षुद्रम्, | उत्तिष्ठ | = खड़े हो जाओ। |
व्याख्या—‘पार्थ’*—माता पृथा-(कुन्ती-) के सन्देशकी | याद दिलाकर अर्जुनके अन्तःकरणमें क्षत्रियोचित
- पृथा-(कुन्ती-) के पुत्र होनेसे अर्जुनका एक नाम ‘पार्थ’ भी है। ‘पार्थ’ सम्बोधन भगवान्की अर्जुनके साथ प्रियता और घनिष्ठताका द्योतक है। गीतामें भगवान्ने अङ्गीतस बार ‘पार्थ’ सम्बोधनका प्रयोग किया है। अर्जुनके अन्य सभी सम्बोधनोंकी अपेक्षा ‘पार्थ’ सम्बोधनका प्रयोग अधिक हुआ है। इसके बाद सबसे अधिक प्रयोग ‘कौन्तेय’ सम्बोधनका हुआ है, जिसकी आवृत्ति कुल चौबीस बार हुई है।
भगवान्को अर्जुनसे जब कोई विशेष बात कहनी होती है या कोई आश्वासन देना होता है या उनके प्रति भगवान्का विशेषरूपसे प्रेम उमड़ता है, तब भगवान् उन्हें ‘पार्थ’ कहकर पुकारते हैं। इस सम्बोधनके प्रयोगसे मानो वे स्मरण कराते हैं कि तुम मेरी बुआ (पृथा—कुन्ती)-के लड़के तो हो ही, साथ-ही-साथ मेरे प्यारे भक्त और सखा भी हो (गीता ४।३)। अतः मैं तुम्हें विशेष गोपनीय बातें बताता हूँ और जो कुछ भी कहता हूँ, सत्य तथा केवल तुम्हारे हितके लिये कहता हूँ।
६८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
वीरताका भाव जाग्रत् करनेके लिये भगवान् अर्जुनको 'पार्थ' नामसे सम्बोधित करते हैं*। तात्पर्य है कि अपनेमें कायरता लाकर तुम्हें माताकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करना चाहिये।
'कलैव्यं मा स्म गमः' —अर्जुन कायरताके कारण युद्ध करनेमें अधर्म और युद्ध न करनेमें धर्म मान रहे थे। अतः अर्जुनको चेतानेके लिये भगवान् कहते हैं कि युद्ध न करना धर्मकी बात नहीं है, यह तो नपुंसकता (हिजड़ापन) है। इसलिये तुम इस नपुंसकताको छोड़ दो।
'नैतत्त्वव्युपपद्यते' —तुम्हारेमें यह हिजड़ापन नहीं आना चाहिये था; क्योंकि तुम कुन्ती-जैसी वीर क्षत्राणी माताके पुत्र हो और स्वयं भी शूरवीर हो। तात्पर्य है कि जन्मसे और अपनी प्रकृतिसे भी यह नपुंसकता तुम्हारेमें सर्वथा अनुचित है।
'परन्तप' —तुम स्वयं 'परन्तप' हो अर्थात् शत्रुओंको तपानेवाले, भगानेवाले हो, तो क्या तुम इस समय युद्धसे विमुख होकर अपने शत्रुओंको हर्षित करोगे?
'शुद्धं हृदयदौर्बल्यं त्यक्तवोत्तिष्ठ' —यहाँ 'शुद्धम्' पदके दो अर्थ होते हैं—(१) यह हृदयकी दुर्बलता तुच्छताको
परिशिष्ट भाव —इस बातका विस्तार भगवान्ने आगे इकतीसवेंसे अड़तीसवें श्लोकतक किया है।
सम्बन्ध —पहले अध्यायमें अर्जुनने युद्ध न करनेके विषयमें बहुत-सी युक्तियाँ (दलीलें) दी थीं। उन युक्तियोंका कुछ भी आदर न करके भगवान्ने एकाएक अर्जुनको कायरतारूप दोषके लिये जोरसे फटकारा और युद्धके लिये खड़े हो जानेकी आज्ञा दे दी। इस बातको लेकर अर्जुन भी अपनी युक्तियोंका समाधान न पाकर एकाएक उत्तेजित होकर बोल उठे—
अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजाहर्षवरिसूदन ॥ ४ ॥
अर्जुन बोले—
| मधुसूदन | = हे मधुसूदन! | द्रोणम् | = द्रोणके | (क्योंकि) |
|---|---|---|---|---|
| अहम् | = मैं | प्रति | = साथ | अरिसूदन |
| सङ्ख्ये | = रणभूमिमें | इषुभिः | = बाणोंसे | |
| भीष्मम् | = भीष्म | कथम् | = कैसे | पूजाहर्ष |
| च | = और | योत्स्यामि | = युद्ध करूँ? |
व्याख्या —'मधुसूदन' और 'अरिसूदन'—ये दो सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि आप दैत्योंको और शत्रुओंको
मारनेवाले हैं अर्थात् जो दुष्ट स्वभाववाले, अधर्ममय आचरण करनेवाले और दुनियाको कष्ट देनेवाले मधु-कैटभ
- कुन्तीका सन्देश था—
एतद् धनञ्जयो वाच्यो नित्योद्युक्तो वृकोदरः ॥ यदर्थं क्षत्रिया सूते तस्य कालोऽयमागतः । (मह०, उद्यो० १३७।९-१०)
'तुम अर्जुनसे तथा युद्धके लिये सदा उद्यत रहनेवाले भीमसे यह कहना कि जिस कार्यके लिये क्षत्रियमाता पुत्र उत्पन्न करती है, अब उसका समय आ गया है।'
श्लोक ५ ]
- साधक-संजीवनी *
६९
आदि दैत्य हैं, उनको भी आपने मारा है और जो बिना कारण द्वेष रखते हैं, अनिष्ट करते हैं, ऐसे शत्रुओंको भी आपने मारा है। परन्तु मेरे सामने तो पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण खड़े हैं, जो आचरणोंमें सर्वथा श्रेष्ठ हैं, मेरेपर अत्यधिक स्नेह रखनेवाले हैं और प्यारपूर्वक मेरेको शिक्षा देनेवाले हैं। ऐसे मेरे परम हितैषी दादाजी और विद्यागुरुको मैं कैसे मारूँ ?
‘कथं भीष्ममहं सङ्मुखे द्रोणं च’* —मैं कायरताके कारण युद्धसे विमुख नहीं हो रहा हूँ, प्रत्युत धर्मको देखकर युद्धसे विमुख हो रहा हूँ; परन्तु आप कह रहे हैं कि यह कायरता, यह नपुंसकता तुम्हारेमें कहाँसे आ गयी! आप जरा सोचें कि मैं पितामह भीष्म और आचार्य द्रोणके साथ बाणोंसे युद्ध कैसे करूँ? महाराज! यह मेरी कायरता नहीं है। कायरता तो तब कही जाय, जब मैं मरनेसे डरूँ। मैं मरनेसे नहीं डर रहा हूँ, प्रत्युत मारनेसे डर रहा हूँ।
संसारमें दो ही तरहके सम्बन्ध मुख्य हैं—जन्म-सम्बन्ध और विद्या-सम्बन्ध। जन्मके सम्बन्धसे तो पितामह भीष्म हमारे पूजनीय हैं। बचपनसे ही मैं उनकी गोदमें पला हूँ। बचपनमें जब मैं उनको ‘पिताजी-पिताजी’ कहता, तब वे प्यारसे कहते कि ‘मैं तो तेरे पिताका भी पिता हूँ!’ इस
तरह वे मेरेपर बड़ा ही प्यार, स्नेह रखते आये हैं। विद्याके सम्बन्धसे आचार्य द्रोण हमारे पूजनीय हैं। वे मेरे विद्यागुरु हैं। उनका मेरेपर इतना स्नेह है कि उन्होंने खास अपने पुत्र अश्वत्थामाको भी मेरे समान नहीं पढ़ाया। उन्होंने ब्रह्मास्त्रको चलाना तो दोनोंको सिखाया, पर ब्रह्मास्त्रका उपसंहार करना मेरेको ही सिखाया, अपने पुत्रको नहीं। उन्होंने मेरेको यह वरदान भी दिया है कि ‘मेरे शिष्योंमें अस्त्र-शस्त्र-कलामें तुम्हारेसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं होगा।’ ऐसे पूजनीय पितामह भीष्म और आचार्य द्रोणके सामने तो वाणीसे ‘रे’, ‘तू’—ऐसा कहना भी उनकी हत्या करनेके समान पाप है, फिर मारनेकी इच्छासे उनके साथ बाणोंसे युद्ध करना कितने भारी पापकी बात है!
‘इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजाही’ —सम्बन्धमें बड़े होनेके नाते पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण—ये दोनों ही आदरणीय और पूजनीय हैं। इनका मेरेपर पूरा अधिकार है। अतः ये तो मेरेपर प्रहार कर सकते हैं, पर मैं उनपर बाणोंसे कैसे प्रहार करूँ? उनका प्रतिद्वन्द्वी होकर युद्ध करना तो मेरे लिये बड़े पापकी बात है! क्योंकि ये दोनों ही मेरे द्वारा सेवा करनेयोग्य हैं और सेवासे भी बढ़कर पूजा करनेयोग्य हैं। ऐसे पूज्यजनोंको मैं बाणोंसे कैसे मारूँ?
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अर्जुनने उत्तेजित होकर भगवान्से अपना निर्णय कह दिया। अब भगवद्वाणीका असर होनेपर अर्जुन अपने और भगवान्के निर्णयका सन्तुलन करके कहते हैं—
गुरुनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
हृत्वार्यकामांस्तु गुरुनिहैव भुज्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥ ५ ॥
महानुभावान् = महानुभाव गुरुन् = गुरुजनोंको अहत्वा = न मारकर इह = इस लोके = लोकमें (में) भैक्ष्यम् = भिक्षाका अन्न भोक्तुम् = खाना
अपि = भी श्रेयः = श्रेष्ठ (समझता हूँ); हि = क्योंकि गुरुन् = गुरुजनोंको हत्वा = मारकर इह = यहाँ रुधिरप्रदिग्धान् = रक्तसे सने हुए
(तथा) अर्थकामान् = धनकी कामनाकी मुख्यतावाले भोगान् = भोगोंको एव = ही तु = तो भुज्जीय = भोगूँगा!
व्याख्या —[इस श्लोकसे ऐसा प्रतीत होता है कि दूसरे-तीसरे श्लोकोंमें भगवान्के कहे हुए वचन अब अर्जुनके भीतर असर कर रहे हैं। इससे अर्जुनके मनमें यह विचार आ रहा है कि भीष्म, द्रोण आदि गुरुजनोंको मारना धर्मयुक्त नहीं
है—ऐसा जानते हुए भी भगवान् मुझे बिना किसी सन्देहके युद्धके लिये आज्ञा दे रहे हैं, तो कहीं-न-कहीं मेरी समझमें ही गलती है! इसलिये अर्जुन अब पूर्वश्लोककी तरह उत्तेजित होकर नहीं बोलते, प्रत्युत कुछ ढिलाईसे बोलते हैं।]
- दूसरे श्लोकमें भगवान्ने ‘कुतः’ पदसे कहा था कि तुम्हारेमें यह कायरता कहाँसे आ गयी ? उस ‘कुतः’ पदके बदलेमें ही अर्जुन यहाँ ‘कथम्’ पदसे अपनी बात कहते हैं।
७०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
‘गुरुनहत्वा.....भक्ष्यमपीह लोके’—अब अर्जुन पहले अपने पक्षको सामने रखते हुए कहते हैं कि अगर मैं भीष्म, द्रोण आदि पूज्यजनोंके साथ युद्ध नहीं करूँगा, तो दुर्घोधन भी अकेला मेरे साथ युद्ध नहीं करेगा। इस तरह युद्ध न होनेसे मेरेको राज्य नहीं मिलेगा, जिससे मेरेको दुःख पाना पड़ेगा। मेरा जीवन-निर्वाह भी कठिनातासे होगा। यहाँतक कि क्षत्रियके लिये निषिद्ध जो भिक्षावृत्ति है, उसको भी जीवन-निर्वाहके लिये ग्रहण करना पड़ सकता है। परन्तु गुरुजनोंको मारनेकी अपेक्षा मैं उस कष्टदायक भिक्षा-वृत्तिको भी ग्रहण करना श्रेष्ठ मानता हूँ।
‘इह लोके’ कहनेका तात्पर्य है कि यद्यपि भिक्षा माँगकर खानेसे इस संसारमें मेरा अपमान-तिरस्कार होगा, लोग मेरी निन्दा करेंगे, तथापि गुरुजनोंको मारनेकी अपेक्षा भिक्षा माँगना श्रेष्ठ है।
‘अपि’ कहनेका तात्पर्य है कि मेरे लिये गुरुजनोंको मारना भी निषिद्ध है और भिक्षा माँगना भी निषिद्ध है; परन्तु इन दोनोंमें भी गुरुजनोंको मारना मुझे अधिक निषिद्ध दीखता है।
‘हत्वार्थकामांस्तु ..... रुधिरप्रदिग्धान्’—अब अर्जुन भगवान्के वचनोंकी तरफ दृष्टि करते हुए कहते हैं कि अगर मैं आपकी आज्ञाके अनुसार युद्ध करूँ, तो युद्धमें गुरुजनोंकी हत्याके परिणाममें मैं उनके खूनसे सने हुए और जिनमें धन आदिकी कामना ही मुख्य है, ऐसे भोगोंको ही तो भोगूँगा। मेरेको भोग ही तो मिलेंगे। उन भोगोंके मिलनेसे मुक्ति थोड़े ही होगी! शान्ति थोड़े ही मिलेगी!
यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि भीष्म, द्रोण आदि गुरुजन धनके द्वार ही कौरवोंसे बँधे थे; अतः यहाँ ‘अर्थकामान्’ पदको ‘गुरुन्’ पदका विशेषण मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है? इसका उत्तर यह है कि ‘अर्थकी कामनावाले गुरुजन’—ऐसा अर्थ करना उचित नहीं है। कारण कि पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण आदि गुरुजन धनकी कामनावाले नहीं थे। वे तो दुर्घोधनके वृत्तिभोगी थे, उन्होंने दुर्घोधनका अन्न खाया था। अतः युद्धके समय दुर्घोधनका साथ छोड़ना
कर्तव्य न समझकर ही वे कौरवोंके पक्षमें खड़े हुए थे। दूसरी बात, अर्जुनने भीष्म, द्रोण आदिके लिये ‘महानुभावान्’ पदका प्रयोग किया है। अतः ऐसे श्रेष्ठ भाववालोंको अर्थकी कामनावाले कैसे कहा जा सकता है! तात्पर्य है कि जो महानुभाव हैं, वे अर्थकी कामनावाले नहीं हो सकते और जो अर्थकी कामनावाले हैं, वे महानुभाव नहीं हो सकते। अतः यहाँ ‘अर्थकामान्’ पद ‘भोगान्’ पदका ही विशेषण हो सकता है।
विशेष बात
भगवान्ने दूसरे-तीसरे श्लोकोंमें अर्जुनके कल्याणकी दृष्टिसे ही उन्हें कायरताको छोड़कर युद्धके लिये खड़ा होनेकी आज्ञा दी थी। परन्तु अर्जुन उलटा ही समझे अर्थात् वे समझे कि भगवान् राज्यका भोग करनेकी दृष्टिसे ही युद्धकी आज्ञा देते हैं*। पहले तो अर्जुनका युद्ध न करनेका एक ही पक्ष था, जिससे वे धनुष-बाण छोड़कर और शोकाविष्ट होकर रथके मध्यभागमें बैठ गये थे (पहले अध्यायका सैतालीसवाँ श्लोक)। परंतु युद्ध करनेका पक्ष तो भगवान्के कहनेसे ही हुआ है। तात्पर्य है कि अर्जुनका भाव था कि हमलोग तो धर्मको जानते हैं, पर दुर्घोधन आदि धर्मको नहीं जानते, इसलिये वे धन, राज्य आदिके लोभसे युद्ध करनेके लिये तैयार खड़े हैं। अब वही बात अर्जुन यहाँ अपने लिये कहते हैं कि अगर मैं भी आपकी आज्ञाके अनुसार युद्ध करूँ, तो परिणाममें गुरुजनोंके रक्तसे सने हुए धन, राज्य आदिको ही तो प्राप्त करूँगा! इस तरह अर्जुनको युद्ध करनेमें बुराई-ही-बुराई दिखायी दे रही है।
जो बुराई बुराईके रूपमें आती है, उसको मिटाना बड़ा सुगम होता है। परंतु जो बुराई अच्छाईके रूपमें आती है, उसको मिटाना बड़ा कठिन होता है; जैसे—सीताजीके सामने रावण और हनुमान्जीके सामने कालनेमि राक्षस आये तो उनको सीताजी और हनुमान्जी पहचान नहीं सके; क्योंकि उन दोनोंका वेश साधुओंका था। अर्जुनकी मान्यतामें युद्धरूप कर्तव्य-कर्म करना बुराई है और युद्ध न करना भलाई है अर्थात् अर्जुनके मनमें धर्म-(हिंसा-त्याग-) रूप भलाईके
- केवल भौतिक दृष्टि रखनेवाले मनुष्य कल्याणकी बात सोच ही नहीं सकते। जबतक भौतिक पदार्थोंकी तरफ ही दृष्टि रहती है, तबतक आध्यात्मिक दृष्टि जाग्रत नहीं होती। यहाँ अर्जुनकी दृष्टिमें शरीर आदि भौतिक पदार्थोंकी मुख्यता हो रही है। वे कौटुम्बिक मोह-ममतामें फँसकर धर्मको भी भौतिक दृष्टिसे ही देख रहे हैं। भौतिक (प्राकृत) दृष्टिसे अत्यन्त विलक्षण आध्यात्मिक दृष्टिकी तरफ अभी अर्जुनका खयाल नहीं है अर्थात् उनकी दृष्टि भौतिक राज्यसे ऊपर नहीं जा रही है और वे कौटुम्बिक मोह-ममताके प्रवाहमें बह रहे हैं। इसलिये वे ऐसा समझ रहे हैं कि युद्धमें प्रवृत्त कराकर भगवान् मुझे राज्य दिलाना चाहते हैं, जबकि वास्तवमें भगवान् उनका कल्याण करना चाहते हैं।
श्लोक ६ ]
- साधक-संजीवनी *
७९
वेशमें कर्तव्य-त्यागरूप बुराई आयी है। उनको कर्तव्य-त्यागरूप बुराई बुराईके रूपमें नहीं दीख रही है; क्योंकि उनके भीतर शरीरोंको लेकर मोह है। अतः इस बुराईको मिटानेमें भगवान्को भी बड़ा जोर पड़ रहा है और समय लग रहा है।
आजकल समाजमें एकताके बहाने वर्ण-आश्रमकी मर्यादाको मिटानेकी कोशिश की जा रही है, तो यह बुराई एकतारूप अच्छाईके वेशमें आनेसे बुराईरूपसे नहीं दीख रही है। अतः वर्ण-आश्रमकी मर्यादा मिटनेसे परिणाममें लोगोंका कितना पतन होगा, लोगोंमें कितना आसुरभाव
आयेगा—इस तरफ दृष्टि ही नहीं जाती। ऐसे ही धनके बहाने लोग झूठ, कपट, बेईमानी, ठगी, विश्वासघात आदि-आदि दोषोंको भी दोषरूपसे नहीं जानते। यहाँ अर्जुनमें धर्मके रूपमें बुराई आयी है कि हम भीष्म, द्रोण आदि महानुभावोंको कैसे मार सकते हैं ? क्योंकि हम धर्मको जाननेवाले हैं। तात्पर्य है कि अर्जुने जिसको अच्छाई माना है, वह वास्तवमें बुराई ही है; परन्तु उसमें मान्यता अच्छाईकी होनेसे वह बुराईरूपसे नहीं दीख रही है।
परिशिष्ट भाव—‘महानुभावान्’ —भीष्म, द्रोण आदि गुरुजनोंका अनुभाव, भीतरका भाव श्रेष्ठ है, शुद्ध है; क्योंकि युद्ध करते हुए भी उनमें पक्षपात नहीं है।
सम्बन्ध—भगवान्के वचनोंमें ऐसी विलक्षणता है कि वे अर्जुनके भीतर अपना प्रभाव डालते जा रहे हैं, जिससे अर्जुनको अपने युद्ध न करनेके निर्णयमें अधिक सन्देह होता जा रहा है। ऐसी अवस्थाको प्राप्त हुए अर्जुन कहते हैं—
न चैतद्विद्यः कतरन्तो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥
| एतद् | = (हम) यह | गरीयः | = अत्यन्त श्रेष्ठ है | न, जिजीविषामः | = जीना भी |
|---|---|---|---|---|---|
| च | = भी | यत्, वा | = अथवा (हम उन्हें) | नहीं चाहते, | |
| न | = नहीं | जयेम | = जीतेंगे | ते | = वे |
| विद्यः | = जानते (कि) | यदि, वा | = या (वे) | एव | = ही |
| नः | = हमलोगोंके लिये | नः | = हमें | धार्तराष्ट्राः | = धृतराष्ट्रके |
| (युद्ध करना और | जयेयुः | = जीतेंगे। | सम्बन्धी | ||
| न करना—इन) | यान् | = जिनको | प्रमुखे | = (हमारे) सामने | |
| कतरत् | = दोनोंमेंसे कौन-सा | हत्वा | = मारकर (हम) | अवस्थिताः | = खड़े हैं। |
व्याख्या—‘न चैतद्विद्यः कतरन्तो गरीयः’ —में युद्ध करूँ अथवा न करूँ—इन दोनों बातोंका निर्णय मैं नहीं कर पा रहा हूँ। कारण कि आपकी दृष्टिमें तो युद्ध करना ही श्रेष्ठ है, पर मेरी दृष्टिमें गुरुजनोंको मारना पाप होनेके कारण युद्ध न करना ही श्रेष्ठ है। इन दोनों पक्षोंको सामने रखनेपर मेरे लिये कौन-सा पक्ष अत्यन्त श्रेष्ठ है—यह मैं नहीं जान पा रहा हूँ। इस प्रकार उपर्युक्त पदोंमें अर्जुनके भीतर भगवान्का पक्ष और अपना पक्ष दोनों समकक्ष हो गये हैं।
‘यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः’ —अगर आपकी आज्ञाके अनुसार युद्ध भी किया जाय, तो हम उनको जीतेंगे अथवा वे (दुर्योधनादि) हमारेको जीतेंगे—इसका भी हमें पता नहीं है।
यहाँ अर्जुनको अपने बलपर अविश्वास नहीं है, प्रत्युत
भविष्यपर अविश्वास है; क्योंकि भविष्यमें क्या होनहार है—इसका किसीको क्या पता?
‘यानेव हत्वा न जिजीविषामः’ —हम तो कुटुम्बियोंको मारकर जीनेकी भी इच्छा नहीं रखते; भोग भोगनेकी, राज्य प्राप्त करके हुकम चलानेकी बात तो बहुत दूर रही! कारण कि अगर हमारे कुटुम्बी मारे जायेंगे, तो हम जीकर क्या करेंगे? अपने हाथोंसे कुटुम्बको नष्ट करके बैठे-बैठे चिन्ता-शोक ही तो करेंगे! चिन्ता-शोक करने और वियोगका दुःख भोगनेके लिये हम जीना नहीं चाहते।
‘तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः’ —हम जिनको मारकर जीना भी नहीं चाहते, वे ही धृतराष्ट्रके सम्बन्धी हमारे सामने खड़े हैं। धृतराष्ट्रके सभी सम्बन्धी हमारे कुटुम्बी ही तो हैं। उन कुटुम्बियोंको मारकर हमारे जीनेको धिक्कार है!
—
७२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
सम्बन्ध—अपने कर्तव्यका निर्णय करनेमें अपनेको असमर्थ पाकर अब अर्जुन व्याकुलतापूर्वक भगवान्से प्रार्थना करते हैं।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पूच्छामि त्वां धर्मसम्भूदचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यानिश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ ७ ॥
| कार्पण्य- | पूच्छामि | = पूछता हूँ (कि) | ब्रूहि | = कहिये। |
|---|---|---|---|---|
| दोषोपहतस्वभावः=कायरतारूप | यत् | = जो | अहम् | = मैं |
| दोषसे तिरस्कृत | निश्चितम् | = निश्चित | ते | = आपका |
| स्वभाववाला (और) | श्रेयः | = कल्याण | शिष्यः | = शिष्य हूँ। |
| धर्मसम्भूदचेताः = धर्मके विषयमें | करनेवाली | त्वाम् | = आपके | |
| मोहित अन्तः- | स्यात् | = हो, | प्रपन्नम् | = शरण हुए |
| करणवाला (मैं) | तत् | = वह (बात) | माम् | = मुझे |
| त्वाम् = आपसे | मे | = मेरे लिये | शाधि | = शिक्षा दीजिये। |
व्याख्या—‘कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पूच्छामि त्वां धर्मसम्भूदचेताः’ —यद्यपि अर्जुन अपने मनमें युद्धसे सर्वथा निवृत्त होनेको सर्वश्रेष्ठ नहीं मानते थे, तथापि पापसे बचनेके लिये उनको युद्धसे उपराम होनेके सिवाय दूसरा कोई उपाय भी नहीं दीखता था। इसलिये वे युद्धसे उपराम होना चाहते थे और उपराम होनेको गुण ही मानते थे, कायरतारूप दोष नहीं। परन्तु भगवान्ने अर्जुनकी इस उपरतिको कायरता और हृदयकी तुच्छ दुर्बलता कहा, तो भगवान्के उन निःसंदिग्ध वचनोंसे अर्जुनको ऐसा विचार हुआ कि युद्धसे निवृत्त होना मेरे लिये उचित नहीं है। यह तो एक तरहकी कायरता ही है, जो मेरे स्वभावके बिलकुल विरुद्ध है; क्योंकि मेरे क्षात्र-स्वभावमें दीनता और पलायन (पीठ दिखाना)—ये दोनों ही नहीं हैं। इस तरह भगवान्के द्वारा कथित कायरतारूप दोषको अपनेमें स्वीकार करते हुए अर्जुन भगवान्से कहते हैं कि एक तो कायरतारूप दोषके कारण मेरा क्षात्र-स्वभाव एक तरहसे दब गया है और दूसरी बात, मैं अपनी बुद्धिसे धर्मके विषयमें कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ। मेरी बुद्धिमें ऐसी मुहता छा गयी है कि धर्मके विषयमें मेरी बुद्धि कुछ भी काम नहीं कर रही है!
तीसरे श्लोकमें तो भगवान्ने अर्जुनको स्पष्टरूपसे आज्ञा दे दी थी कि ‘हृदयकी तुच्छ दुर्बलताको, कायरताको छोड़कर युद्धके लिये खड़े हो जाओ’। इससे अर्जुनको धर्म-(कर्तव्य-) के विषयमें कोई सन्देह नहीं रहना चाहिये था। फिर भी सन्देह रहनेका कारण यह है कि एक तरफ
तो युद्धमें कुटुम्बका नाश करना, पूज्यजनोंको मारना अधर्म (पाप) दीखता है और दूसरी तरफ युद्ध करना क्षत्रियका धर्म दीखता है। इस प्रकार कुटुम्बियोंको देखते हुए युद्ध नहीं करना चाहिये और क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करना चाहिये—इन दो बातोंको लेकर अर्जुन धर्म-संकटमें पड़ गये। उनकी बुद्धि धर्मका निर्णय करनेमें कुण्ठित हो गयी। ऐसा होनेपर ‘अभी इस समय मेरे लिये खास कर्तव्य क्या है? मेरा धर्म क्या है?’ इसका निर्णय करानेके लिये वे भगवान्से पूछते हैं।
‘यच्छ्रेयः स्यानिश्चितं ब्रूहि तन्मे’ —इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि तू जो कायरताके कारण युद्धसे निवृत्त हो रहा है, तेरा यह आचरण ‘अनार्यजुष्ट’ है अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष ऐसा आचरण नहीं करते, वे तो जिसमें अपना कल्याण हो, वही आचरण करते हैं। यह बात सुनकर अर्जुनके मनमें आया कि मुझे भी वही करना चाहिये, जो श्रेष्ठ पुरुष किया करते हैं। इस प्रकार अर्जुनके मनमें कल्याणकी इच्छा जाग्रत् हो गयी और उसीको लेकर वे भगवान्से अपने कल्याणकी बात पूछते हैं कि जिससे मेरा निश्चित कल्याण हो जाय, ऐसी बात मेरेसे कहिये।
अर्जुनके हृदयमें हलचल (विषाद) होनेसे और अब यहाँ अपने कल्याणकी बात पूछनेसे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य जिस स्थितिमें स्थित है, उसी स्थितिमें वह संतोष करता रहता है तो उसके भीतर अपने असली उद्देश्यकी जागृति नहीं होती। वास्तविक उद्देश्य—कल्याणकी
१-यहाँ ‘चेतस्’ शब्द बुद्धिका वाचक है।
२-अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे न दैन्यं न पलायनम्।
श्लोक ८ ]
- साधक-संजीवनी *
७३
जागृति तभी होती है, जब मनुष्य अपनी वर्तमान स्थितिसे असन्तुष्ट हो जाय, उस स्थितिमें रह न सके।
‘शिष्यस्तेऽहम्’ —अपने कल्याणकी बात पछुनेपर अर्जुनके मनमें यह भाव पैदा हुआ कि कल्याणकी बात तो गुरुसे पूछी जाती है, सारथिसे नहीं पूछी जाती। इस बातको लेकर अर्जुनके मनमें जो रथीपनका भाव था, जिसके कारण वे भगवान्को यह आज्ञा दे रहे थे कि ‘हे अच्युत! मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा कीजिये’, वह भाव मिट जाता है और अपने कल्याणकी बात पछुनेके लिये अर्जुन भगवान्के शिष्य हो जाते हैं और कहते हैं कि ‘महाराज! मैं आपका शिष्य हूँ, शिक्षा लेनेका पात्र हूँ, आप मेरे कल्याणकी बात कहिये’।
‘शाधि मां त्वां प्रपन्नम्’ —गुरु तो उपदेश दे देंगे, जिस मार्गका ज्ञान नहीं है, उसका ज्ञान करा देंगे, पूरा प्रकाश दे देंगे, पूरी बात बता देंगे, पर मार्गपर तो स्वयं शिष्यको ही चलना पड़ेगा। अपना कल्याण तो शिष्यको ही करना पड़ेगा। मैं तो ऐसा नहीं चाहता कि भगवान् उपदेश दें और मैं उसका अनुष्ठान करूँ; क्योंकि उससे मेरा काम नहीं चलेगा। अतः अपने कल्याणकी जिम्मेवारी मैं अपनेपर क्यों रखूँ? गुरुपर ही क्यों न छोड़ दूँ! जैसे केवल माँके दूधपर ही निर्भर रहनेवाला बालक बीमार हो जाय, तो उसकी बीमारी दूर करनेके लिये औषधि स्वयं माँको खानी पड़ती है, बालकको नहीं। इसी तरह मैं भी सर्वथा गुरुके ही शरण हो जाऊँ, गुरुपर ही निर्भर हो जाऊँ, तो मेरे कल्याणका पूरा दायित्व गुरुपर ही आ जायगा, स्वयं गुरुको ही मेरा कल्याण करना पड़ेगा—इस भावसे अर्जुन कहते हैं कि ‘मैं आपके शरण हूँ, मेरेको शिक्षा दीजिये’।
यहाँ अर्जुन ‘त्वां प्रपन्नम्’ पदोंसे भगवान्के शरण होनेकी बात तो कहते हैं, पर वास्तवमें सर्वथा शरण हुए नहीं हैं। अगर वे सर्वथा शरण हो जाते, तो फिर उनके
द्वारा ‘शाधि माम्’ ‘मेरेको शिक्षा दीजिये’ यह कहना नहीं बनता; क्योंकि सर्वथा शरण होनेपर शिष्यका अपना कोई कर्तव्य रहता ही नहीं। दूसरी बात, आगे नवें श्लोकमें अर्जुन कहेंगे कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’—‘न योत्ये’ । अर्जुनकी वह बात भी शरणागतिके विरुद्ध पड़ती है। कारण कि शरणागत होनेके बाद ‘मैं युद्ध करूँगा या नहीं करूँगा; क्या करूँगा और क्या नहीं करूँगा’—यह बात रहती ही नहीं। उसको यह पता ही नहीं रहता कि शरण्य क्या करायेंगे और क्या नहीं करायेंगे। उसका तो यही एक भाव रहता है कि अब शरण्य जो करायेंगे, वही करूँगा। अर्जुनकी इस कमीको दूर करनेके लिये ही आगे चलकर भगवान्को ‘मामेकं शरणं व्रज’ (१८।६६) ‘एक मेरी शरणमें आ जा’—ऐसा कहना पड़ा। फिर अर्जुने भी ‘करिष्ये वचनं तव’ (१८।७३) ‘आपकी आज्ञाका पालन करूँगा’—ऐसा कहकर पूर्ण शरणागतिको स्वीकार किया।
इस श्लोकमें अर्जुने चार बातें कहीं हैं—(१) ‘कार्पण्यदोषो ..... धर्मसम्पृष्टचेताः’ (२) ‘यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे’ (३) ‘शिष्यस्तेऽहम्’ (४) ‘शाधि मां त्वां प्रपन्नम्’ । इनमेंसे पहली बातमें अर्जुन धर्मके विषयमें पूछते हैं, दूसरी बातमें अपने कल्याणके लिये प्रार्थना करते हैं, तीसरी बातमें शिष्य बन जाते हैं और चौथी बातमें शरणागत हो जाते हैं। अब इन चारों बातोंपर विचार किया जाय, तो पहली बातमें मनुष्य जिससे पूछता है, वह कहनेमें अथवा न कहनेमें स्वतन्त्र होता है। दूसरीमें, जिससे प्रार्थना करता है, उसके लिये कहना कर्तव्य हो जाता है। तीसरीमें, जिनका शिष्य बन जाता है, उन गुरुपर शिष्यको कल्याणका मार्ग बतानेका विशेष दायित्व आ जाता है। चौथीमें, जिसके शरणागत हो जाता है, उस शरण्यको शरणागतका उद्धार करना ही पड़ता है अर्थात् उसके उद्धारका उद्योग स्वयं शरण्यको करना पड़ता है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अर्जुन भगवान्के शरणागत तो हो जाते हैं, पर उनके मनमें आता है कि भगवान्का तो युद्ध करानेका ही भाव है, पर मैं युद्ध करना अपने लिये धर्मयुक्त नहीं मानता हूँ। उन्होंने जैसे पहले ‘उत्तिष्ठ’ कहकर युद्धके लिये आज्ञा दी, ऐसे ही वे अब भी युद्ध करनेकी आज्ञा दे देंगे। दूसरी बात, शायद मैं अपने हृदयके भावोंको भगवान्के सामने पूरी तरह नहीं रख पाया हूँ। इन बातोंको लेकर अर्जुन आगेके श्लोकमें युद्ध न करनेके पक्षमें अपने हृदयकी अवस्थाका स्पष्टरूपसे वर्णन करते हैं।
न हि प्रपश्यामि ममपनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।
अवाप्य भूमावसप्तलमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ ८ ॥
७४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
| हि | = कारण कि | सुराणाम् | = (स्वर्गमें) | मम | = मेरा |
|---|---|---|---|---|---|
| भूमौ | = पृथ्वीपर | देवताओंका | यत् | = जो | |
| क्रन्दम् | = धन-धान्य- | आधिपत्यम् | = आधिपत्य | शोकम् | = शोक है, (वह) |
| समुद्ध (और) | अवाप्य | = मिल जाय | अपनुद्यात् | = दूर हो जाय | |
| असपलम् | = शत्रुरहित | अपि | = तो भी | (—ऐसा मैं) | |
| राज्यम् | = राज्य | इन्द्रियाणाम् | = इन्द्रियोंको | न | = नहीं |
| च | = तथा | उच्छोषणम् | = सुखानेवाला | प्रपश्यामि | = देखता हूँ। |
व्याख्या —[अर्जुन सोचते हैं कि भगवान् ऐसा समझते होंगे कि अर्जुन युद्ध करेगा तो उसकी विजय होगी और विजय होनेपर उसको राज्य मिल जायगा, जिससे उसके चिन्ता-शोक मिट जायेंगे और संतोष हो जायगा। परन्तु शोकके कारण मेरी ऐसी दशा हो गयी है कि विजय होनेपर भी मेरा शोक दूर हो जाय—ऐसी बात मैं नहीं देखता।]
‘अवाप्य भूमावसपलम्बुद्धं राज्यम्’ —अगर मेरेको धन-धान्यसे सम्पन्न और निष्कण्टक राज्य मिल जाय अर्थात् जिस राज्यमें प्रजा खूब सुखी हो, प्रजाके पास खूब धन-धान्य हो, किसी चीजकी कमी न हो और राज्यमें कोई वैरी भी न हो—ऐसा राज्य मिल जाय, तो भी मेरा शोक दूर नहीं हो सकता।
‘सुराणामपि चाधिपत्यम्’ —इस पृथ्वीके तुच्छ भोगोंवाले राज्यकी तो बात ही क्या, इन्द्रका दिव्य भोगोंवाला राज्य भी मिल जाय, तो भी मेरा शोक, जलन, चिन्ता दूर नहीं हो सकती।
अर्जुनने पहले अध्यायमें यह बात कही थी कि मैं न विजय चाहता हूँ, न राज्य चाहता हूँ और न सुख ही चाहता हूँ; क्योंकि उस राज्यसे क्या होगा ? उन भोगोंसे क्या होगा ? और उस जीनेसे क्या होगा ? जिनके लिये हम राज्य, भोग एवं सुख चाहते हैं, वे ही मरनेके लिये सामने खड़े हैं (पहले
अध्यायका बत्तीसवाँ-तैंतीसवाँ श्लोक)। यहाँ अर्जुन कहते हैं कि पृथ्वीका धन-धान्य-सम्पन्न और निष्कण्टक राज्य मिल जाय तथा देवताओंका आधिपत्य मिल जाय, तो भी मेरा शोक दूर नहीं हो सकता, मैं उनसे सुखी नहीं हो सकता। वहाँ (पहले अध्यायके बत्तीसवाँ-तैंतीसवाँ श्लोकमें) तो कौटुम्बिक ममताकी वृत्ति ज्यादा होनेसे अर्जुनकी युद्धसे उपरति हुई है, पर यहाँ उनकी जो उपरति हो रही है, वह अपने कल्याणकी वृत्ति पैदा होनेसे हो रही है। अतः वहाँकी उपरति और यहाँकी उपरतिमें बहुत अन्तर है।
‘न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषण-मिन्द्रियाणाम्’ —जब कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे ही मेरेको इतना शोक हो रहा है, तब उनके मरनेपर मेरेको कितना शोक होगा ! अगर मेरेको राज्यके लिये ही शोक होता तो वह राज्यके मिलनेसे मिट जाता; परन्तु कुटुम्बके नाशकी आशंकासे होनेवाला शोक राज्यके मिलनेसे कैसे मिटेगा ? शोकका मिटना तो दूर रहा, प्रत्युत शोक और बढ़ेगा; क्योंकि युद्धमें सब मारे जायेंगे तो मिले हुए राज्यको कौन भोगेगा ? वह किसके काम आयेगा ? अतः पृथ्वीका राज्य और स्वर्गका आधिपत्य मिलनेपर भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा शोक दूर नहीं हो सकता।
सम्बन्ध—प्राकृत पदार्थोंके प्राप्त होनेपर भी मेरा शोक दूर हो जाय, यह मैं नहीं देखता हूँ—ऐसा कहनेके बाद अर्जुनने क्या किया ? इसका वर्णन संजय आगेके श्लोकमें करते हैं।
संजय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप। न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥ ९ ॥
संजय बोले—
| परन्तप | = हे शत्रुतापन | जीतनेवाले अर्जुन | इति | = ऐसा |
|---|---|---|---|---|
| ध्रुतराष्ट्र ! | हृषीकेशम् | = अन्तर्धामी | ह | |
| एवम् | = ऐसा | गोविन्दम् | = भगवान् गोविन्दसे | उक्त्वा |
| उक्त्वा | = कहकर | न, योत्स्ये | = ‘मैं युद्ध नहीं | तूष्णीम् |
| गुडाकेशः | = निद्राको | करूँगा’ | बभूव |
{
"lines": [
"श्लोक १० ] * साधक-संजीवनी * ७५",
"व्याख्या—'एवमुक्त्वा हृषीकेशम्............बभूव ह'—",
"अर्जुनने अपना और भगवान्का—दोनोंका पक्ष सामने",
"रखकर उनपर विचार किया, तो अन्तमें वे इसी निर्णयपर",
"पहुँचे कि युद्ध करनेसे तो अधिक-से-अधिक राज्य",
"प्राप्त हो जायगा, मान हो जायगा, संसारमें यश हो जायगा,",
"परन्तु मेरे हृदयमें जो शोक है, चिन्ता है, दुःख है, वे",
"दूर नहीं होंगे। अतः अर्जुनको युद्ध न करना ही ठीक",
"मालूम दिया।",
"यद्यपि अर्जुन भगवान्की बातका आदर करते हैं और",
"उसको मानना भी चाहते हैं; परंतु उनके भीतर युद्ध",
"करनेकी बात ठीक-ठीक जँच नहीं रही है। इसलिये अर्जुन",
"अपने भीतर जँची हुई बातको ही यहाँ स्पष्टरूपसे, साफ-",
"साफ कह देते हैं कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा'। इस प्रकार",
"जब अपनी बात, अपना निर्णय भगवान्से साफ-साफ कह",
"दिया, तब भगवान्से कहनेके लिये और कोई बात बाकी",
"नहीं रही; अतः वे चुप हो जाते हैं।",
"सम्बन्ध—जब अर्जुनने युद्ध करनेके लिये साफ मना कर दिया, तब उसके बाद क्या हुआ—इसको संजय आगेके",
"श्लोकमें बताते हैं।",
"तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।",
"सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥ १० ॥",
"भारत = हे भरतवंशोद्भव विषीदन्तम् = विषाद करते हुए हृषीकेश",
"धृतराष्ट्र ! तम् = उस अर्जुनके इदम् = यह (आगे कहे",
"उभयोः = दोनों प्रति जानेवाले)",
"सेनयोः = सेनाओंके प्रहसन्, इव = हँसते हुए-से वचः = वचन",
"मध्ये = मध्यभागमें हृषीकेशः = भगवान् उवाच = बोले ।",
"व्याख्या—'तमुवाच हृषीकेशः........विषीदन्तमिदं",
"वचः'—अर्जुनने बड़ी शूरवीरता और उत्साहपूर्वक",
"योद्धाओंको देखनेके लिये भगवान्से दोनों सेनाओंके बीचमें",
"रथ खड़ा करनेके लिये कहा था। अब वहींपर अर्थात् दोनों",
"सेनाओंके बीचमें अर्जुन विषादमग्न हो गये! वास्तवमें होना",
"यह चाहिये था कि वे जिस उद्देश्यसे आये थे, उस",
"उद्देश्यके अनुसार युद्धके लिये खड़े हो जाते। परन्तु उस",
"उद्देश्यको छोड़कर अर्जुन चिन्ता-शोकमें फँस गये। अतः",
"अब दोनों सेनाओंके बीचमें ही भगवान् शोकमग्न अर्जुनको",
"उपदेश देना आरम्भ करते हैं।",
"'प्रहसन्निव'—(विशेषतासे हँसते हुएकी तरह-) का",
"तात्पर्य है कि अर्जुनके भाव बदलनेको देखकर अर्थात्",
"पहले जो युद्ध करनेका भाव था, वह अब विषादमें बदल",
"गया—इसको देखकर भगवान्को हँसी आ गयी। दूसरी",
"बात, अर्जुनने पहले (दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें)",
"कहा था कि मैं आपके शरण हूँ, मेरेको शिक्षा दीजिये",
"अर्थात् मैं युद्ध करूँ या न करूँ, मेरेको क्या करना",
"चाहिये—इसकी शिक्षा दीजिये; परन्तु यहाँ मेरे कुछ बोले",
"बिना अपनी तरफसे ही निश्चय कर लिया कि 'मैं युद्ध",
"नहीं करूँगा'—यह देखकर भगवान्को हँसी आ गयी।",
"कारण कि शरणागत होनेपर 'मैं क्या करूँ और क्या नहीं",
"करूँ' आदि कुछ भी सोचनेका अधिकार नहीं रहता।",
"उसको तो इतना ही अधिकार रहता है कि शरण जो काम",
"कहता है, वही काम करे। अर्जुन भगवान्के शरण होनेके",
"बाद 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' ऐसा कहकर एक तरहसे",
"शरणागत होनेसे हट गये। इस बातको लेकर भगवान्को",
"हँसी आ गयी। 'इव' का तात्पर्य है कि जोरसे हँसी आनेपर",
"भी भगवान् मुसकराते हुए ही बोले।",
"जब अर्जुनने यह कह दिया कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा'",
"तब भगवान्को यही कह देना चाहिये था कि जैसी तेरी मर्जी",
"आये, वैसा कर—'यथेच्छसि तथा कुरु' (१८। ६३)।",
"परन्तु भगवान्ने यही समझा कि मनुष्य जब चिन्ता-शोकसे",
"विकल हो जाता है, तब वह अपने कर्तव्यका निर्णय न कर",
"सकनेके कारण कभी कुछ, तो कभी कुछ बोल उठता है।",
"यही दशा अर्जुनकी हो रही है। अतः भगवान्के हृदयमें",
"अर्जुनके प्रति अत्यधिक स्नेह होनेके कारण कृपालुता उमड़",
"पड़ी। कारण कि भगवान् साधकके वचनोंकी तरफ ध्यान न",
"देकर उसके भावकी तरफ ही देखते हैं। इसलिये भगवान्",
"अर्जुनके 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' इस वचनकी तरफ ध्यान न",
"देकर (आगेके श्लोकसे) उपदेश आरम्भ कर देते हैं।",
"जो वचनमात्रसे भी भगवान्के शरण हो जाता है,",
"भगवान् उसको स्वीकार कर लेते हैं। भगवान्के हृदयमें"
]
}
}
७६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
प्राणियोंके प्रति कितनी दयालुता है!
‘हूयिकेश ’ कहनेका तात्पर्य है कि भगवान् अन्तर्यामी हैं अर्थात् प्राणियोंके भीतरी भावोंको जाननेवाले हैं। भगवान् अर्जुनके भीतरी भावोंको जानते हैं कि अभी तो कौटुम्बिक मोहके वेगके कारण और राज्य मिलनेसे अपना शोक मिटता न दीखनेके कारण यह कह रहा है कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’; परन्तु जब इसको स्वयं चेत होगा, तब यह बात ठहरेगी नहीं और मैं जैसा कहूँगा, वैसा ही यह करेगा।
परिशिष्ट भाव —धर्मभूमि कुरुक्षेत्रके एक भागमें कौरव-सेना खड़ी है और दूसरे भागमें पाण्डव-सेना। दोनों सेनाओंके मध्यभागमें श्वेत घोड़ोंसे युक्त एक महान् रथ खड़ा है। उस रथके एक भागमें भगवान् श्रीकृष्ण बैठे हैं और एक भागमें अर्जुन! अर्जुनके निमित्त मनुष्यमात्रका कल्याण करनेके लिये भगवान् अपना अलौकिक उपदेश आरम्भ करते हैं और सर्वप्रथम शरीर तथा शरीरीके विभागका वर्णन करते हैं।
सम्बन्ध—शोकाविष्ट अर्जुनको शोक-निवृत्तिका उपदेश देनेके लिये भगवान् आगेका प्रकरण कहते हैं।
श्रीभगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ ११ ॥
श्रीभगवान् बोले—
| त्वम् | = तुमने | की बातें | च | = और |
|---|---|---|---|---|
| अशोच्यान् | = शोक न करनेयोग्यका | भाषसे | = कह रहे हो; (परन्तु) | अगतासून |
| अन्वशोचः | = शोक किया है | गतासून | = जिनके प्राण चले गये हैं, उनके लिये | पण्डिताः |
| च | = और | न, अनुशोचन्ति | ||
| प्रज्ञावादान् | = विद्वता (पण्डिताई) |
व्याख्या —[मनुष्यको शोक तब होता है, जब वह संसारके प्राणी-पदार्थोंमें दो विभाग कर लेता है कि ये मेरे हैं और ये मेरे नहीं हैं; ये मेरे निजी कुटुम्बी हैं और ये मेरे निजी कुटुम्बी नहीं हैं; ये हमारे वर्णके हैं और ये हमारे वर्णके नहीं हैं; ये हमारे आश्रमके हैं और ये हमारे आश्रमके नहीं हैं; ये हमारे पक्षके हैं और ये हमारे पक्षके नहीं हैं। जो हमारे होते हैं, उनमें ममता, कामना, प्रियता, आसक्ति हो जाती है। इन ममता, कामना आदिसे ही शोक, चिन्ता, भय, उद्वेग, हलचल, संताप आदि दोष पैदा होते हैं। ऐसा कोई भी दोष, अनर्थ नहीं है, जो ममता, कामना आदिसे पैदा न होता हो—यह सिद्धान्त है।
गीतामें सबसे पहले धृतराष्ट्रने कहा कि मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने युद्धभूमिमें क्या किया? यद्यपि पाण्डव धृतराष्ट्रको अपने पितासे भी अधिक आदर-दृष्टिसे देखते
‘इदं वचः उवाच’ पदोंमें केवल ‘उवाच’ कहनेसे ही काम चल सकता था; क्योंकि ‘उवाच’ के अन्तर्गत ही ‘वचः’ पदका अर्थ आ जाता है। अतः ‘वचः’ पद देना पुनरुक्तिदोष दीखता है। परन्तु वास्तवमें यह पुनरुक्तिदोष नहीं है, प्रत्युत इसमें एक विशेष भाव भरा हुआ है। अभी आगेके श्लोकसे भगवान् जिस रहस्यमय ज्ञानको प्रकट करके उसे सरलतासे, सुबोध भाषामें समझाते हुए बोलेंगे, उसकी तरफ लक्ष्य करनेके लिये यहाँ ‘वचः’ पद दिया गया है।
थे, तथापि धृतराष्ट्रके मनमें अपने पुत्रोंके प्रति ममता थी। अतः उनका अपने पुत्रोंमें और पाण्डवोंमें भेदभावपूर्वक पक्षपात था कि ये मेरे हैं और ये मेरे नहीं हैं।
जो ममता धृतराष्ट्रमें थी, वही ममता अर्जुनमें भी पैदा हुई। परन्तु अर्जुनकी वह ममता धृतराष्ट्रकी ममताके समान नहीं थी। अर्जुनमें धृतराष्ट्रकी तरह पक्षपात नहीं था; अतः वे सभीको स्वजन कहते हैं—‘दृष्ट्वेवमं स्वजनम् ’ (१।२८), और दुर्योधन आदिको भी स्वजन कहते हैं—‘स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ’ (१।३७)। तात्पर्य है कि अर्जुनकी सम्पूर्ण कुरुवंशियोंमें ममता थी और उस ममताके कारण ही उनके मरनेकी आशंकासे अर्जुनको शोक हो रहा था। इस शोकको मिटानेके लिये भगवान्ने अर्जुनको गीताका उपदेश दिया है, जो इस ग्यारहवें श्लोकसे आरम्भ होता है। इसके अन्तमें भगवान् इसी शोकको अनुचित बताते