श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 68, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ३ ]
- साधक-संजीवनी *
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है। इसलिये श्लोकके उत्तरार्धमें भगवान् सबसे पहले उपर्युक्त पद देकर कहते हैं कि तुम्हारेमें जो कायरता आयी है, उस कायरताको श्रेष्ठ पुरुष स्वीकार नहीं करते। कारण कि तुम्हारी इस कायरतामें अपने कल्याणकी बात बिलकुल नहीं है। कल्याण चाहनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनोंमें अपने कल्याणका ही उद्देश्य रखते हैं। उनमें अपने कर्तव्यके प्रति कायरता उत्पन्न नहीं होती। परिस्थितिके अनुसार उनको जो कर्तव्य प्राप्त हो जाता है, उसको वे कल्याणप्राप्तिके उद्देश्यसे उत्साह और तत्परतापूर्वक सांगोपांग करते हैं। वे तुम्हारे-जैसे कायर होकर युद्धसे या अन्य किसी कर्तव्य-कर्मसे उपरत नहीं होते। अतः युद्ध-रूपसे प्राप्त कर्तव्य-कर्मसे उपरत होना तुम्हारे लिये कल्याणकारक नहीं है।
‘अस्वर्गयम्’ —कल्याणकी बात सामने न रखकर अगर सांसारिक दृष्टिसे भी देखा जाय, तो संसारमें स्वर्गलोक ऊँचा है। परन्तु तुम्हारी यह कायरता स्वर्गको देनेवाली भी नहीं है अर्थात् कायरतापूर्वक युद्धसे निवृत्त होनेका फल स्वर्गकी प्राप्ति भी नहीं हो सकता।
‘अकीर्तिकरम्’ —अगर स्वर्गप्राप्तिका भी लक्ष्य न हो, तो अच्छा माना जानेवाला पुरुष वही काम करता है, जिससे संसारमें कीर्ति हो। परन्तु तुम्हारी यह जो कायरता
है, यह इस लोकमें भी कीर्ति (यश) देनेवाली नहीं है, प्रत्युत अपकीर्ति (अपयश) देनेवाली है। अतः तुम्हारेमें कायरताका आना सर्वथा ही अनुचित है।
भगवान्ने यहाँ ‘अनार्थजुष्टम्’ ‘अस्वर्गयम्’ और ‘अकीर्तिकरम्’ —ऐसा क्रम देकर तीन प्रकारके मनुष्य बताये हैं—(१) जो विचारशील मनुष्य होते हैं, वे केवल अपना कल्याण ही चाहते हैं। उनका ध्येय, उद्देश्य केवल कल्याणका ही होता है। (२) जो पुण्यात्मा मनुष्य होते हैं, वे शुभ-कर्मोंके द्वारा स्वर्गकी प्राप्ति चाहते हैं। वे स्वर्गको ही श्रेष्ठ मानकर उसकी प्राप्तिका ही उद्देश्य रखते हैं। (३) जो साधारण मनुष्य होते हैं, वे संसारको ही आदर देते हैं। इसलिये वे संसारमें अपनी कीर्ति चाहते हैं और उस कीर्तिको ही अपना ध्येय मानते हैं।
उपर्युक्त तीनों पद देकर भगवान् अर्जुनको सावधान करते हैं कि तुम्हारा जो यह युद्ध न करनेका निश्चय है, यह विचारशील और पुण्यात्मा मनुष्योंके ध्येय—कल्याण और स्वर्गको प्राप्त करानेवाला भी नहीं है, तथा साधारण मनुष्योंके ध्येय—कीर्तिको प्राप्त करानेवाला भी नहीं है। अतः मोहेके कारण तुम्हारा युद्ध न करनेका निश्चय बहुत ही तुच्छ है, जो कि तुम्हारा पतन करनेवाला, तुम्हें नरकोंमें ले जानेवाला और तुम्हारी अपकीर्ति करनेवाला होगा।
सम्बन्ध—कायरता आनेके बाद अब क्या करें? इस जिज्ञासाको दूर करनेके लिये भगवान् कहते हैं—
कलैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वध्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥ ३ ॥
| पार्थ | = हे पृथानन्दन | त्वधि | = तुम्हारेमें | हृदयदौर्बल्यम् | = हृदयकी इस |
|---|---|---|---|---|---|
| अर्जुन! | एतत् | = यह | तुच्छ दुर्बलताका | ||
| कलैब्यम् | = इस नपुंसकताको | न, उपपद्यते | = उचित नहीं है। | त्यक्त्वा | = त्याग करके |
| मा, स्म, | = मत प्राप्त हो; | परन्तप | = हे परन्तप! | (युद्धके लिये) | |
| गमः | = (क्योंकि) | क्षुद्रम्, | उत्तिष्ठ | = खड़े हो जाओ। |
व्याख्या—‘पार्थ’*—माता पृथा-(कुन्ती-) के सन्देशकी | याद दिलाकर अर्जुनके अन्तःकरणमें क्षत्रियोचित
- पृथा-(कुन्ती-) के पुत्र होनेसे अर्जुनका एक नाम ‘पार्थ’ भी है। ‘पार्थ’ सम्बोधन भगवान्की अर्जुनके साथ प्रियता और घनिष्ठताका द्योतक है। गीतामें भगवान्ने अङ्गीतस बार ‘पार्थ’ सम्बोधनका प्रयोग किया है। अर्जुनके अन्य सभी सम्बोधनोंकी अपेक्षा ‘पार्थ’ सम्बोधनका प्रयोग अधिक हुआ है। इसके बाद सबसे अधिक प्रयोग ‘कौन्तेय’ सम्बोधनका हुआ है, जिसकी आवृत्ति कुल चौबीस बार हुई है।
भगवान्को अर्जुनसे जब कोई विशेष बात कहनी होती है या कोई आश्वासन देना होता है या उनके प्रति भगवान्का विशेषरूपसे प्रेम उमड़ता है, तब भगवान् उन्हें ‘पार्थ’ कहकर पुकारते हैं। इस सम्बोधनके प्रयोगसे मानो वे स्मरण कराते हैं कि तुम मेरी बुआ (पृथा—कुन्ती)-के लड़के तो हो ही, साथ-ही-साथ मेरे प्यारे भक्त और सखा भी हो (गीता ४।३)। अतः मैं तुम्हें विशेष गोपनीय बातें बताता हूँ और जो कुछ भी कहता हूँ, सत्य तथा केवल तुम्हारे हितके लिये कहता हूँ।