भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

वीरताका भाव जाग्रत् करनेके लिये भगवान् अर्जुनको 'पार्थ' नामसे सम्बोधित करते हैं*। तात्पर्य है कि अपनेमें कायरता लाकर तुम्हें माताकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करना चाहिये।

'कलैव्यं मा स्म गमः' —अर्जुन कायरताके कारण युद्ध करनेमें अधर्म और युद्ध न करनेमें धर्म मान रहे थे। अतः अर्जुनको चेतानेके लिये भगवान् कहते हैं कि युद्ध न करना धर्मकी बात नहीं है, यह तो नपुंसकता (हिजड़ापन) है। इसलिये तुम इस नपुंसकताको छोड़ दो।

'नैतत्त्वव्युपपद्यते' —तुम्हारेमें यह हिजड़ापन नहीं आना चाहिये था; क्योंकि तुम कुन्ती-जैसी वीर क्षत्राणी माताके पुत्र हो और स्वयं भी शूरवीर हो। तात्पर्य है कि जन्मसे और अपनी प्रकृतिसे भी यह नपुंसकता तुम्हारेमें सर्वथा अनुचित है।

'परन्तप' —तुम स्वयं 'परन्तप' हो अर्थात् शत्रुओंको तपानेवाले, भगानेवाले हो, तो क्या तुम इस समय युद्धसे विमुख होकर अपने शत्रुओंको हर्षित करोगे?

'शुद्धं हृदयदौर्बल्यं त्यक्तवोत्तिष्ठ' —यहाँ 'शुद्धम्' पदके दो अर्थ होते हैं—(१) यह हृदयकी दुर्बलता तुच्छताको

परिशिष्ट भाव —इस बातका विस्तार भगवान्ने आगे इकतीसवेंसे अड़तीसवें श्लोकतक किया है।

सम्बन्ध —पहले अध्यायमें अर्जुनने युद्ध न करनेके विषयमें बहुत-सी युक्तियाँ (दलीलें) दी थीं। उन युक्तियोंका कुछ भी आदर न करके भगवान्ने एकाएक अर्जुनको कायरतारूप दोषके लिये जोरसे फटकारा और युद्धके लिये खड़े हो जानेकी आज्ञा दे दी। इस बातको लेकर अर्जुन भी अपनी युक्तियोंका समाधान न पाकर एकाएक उत्तेजित होकर बोल उठे—

अर्जुन उवाच

कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजाहर्षवरिसूदन ॥ ४ ॥

अर्जुन बोले—

मधुसूदन= हे मधुसूदन!द्रोणम्= द्रोणके(क्योंकि)
अहम्= मैंप्रति= साथअरिसूदन
सङ्ख्ये= रणभूमिमेंइषुभिः= बाणोंसे
भीष्मम्= भीष्मकथम्= कैसेपूजाहर्ष
= औरयोत्स्यामि= युद्ध करूँ?

व्याख्या —'मधुसूदन' और 'अरिसूदन'—ये दो सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि आप दैत्योंको और शत्रुओंको

मारनेवाले हैं अर्थात् जो दुष्ट स्वभाववाले, अधर्ममय आचरण करनेवाले और दुनियाको कष्ट देनेवाले मधु-कैटभ

  • कुन्तीका सन्देश था—

एतद् धनञ्जयो वाच्यो नित्योद्युक्तो वृकोदरः ॥ यदर्थं क्षत्रिया सूते तस्य कालोऽयमागतः । (मह०, उद्यो० १३७।९-१०)

'तुम अर्जुनसे तथा युद्धके लिये सदा उद्यत रहनेवाले भीमसे यह कहना कि जिस कार्यके लिये क्षत्रियमाता पुत्र उत्पन्न करती है, अब उसका समय आ गया है।'